सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Wednesday, March 17, 2010

लंका दहन नायक पवनपुत्र महावीर हनुमान जी ने मन्दिर को टूटने से बचाना क्यों जरूरी न समझा ? plain truth about Hindu Rashtra .


मकड़जालग्रस्त और इतिहास बोध ‘शून्य कुछ लोग कह रहे हैं कि हिन्दू कभी किसी धर्म को बुरा नहीं कह सकता । मेरी पोस्ट पर मौजूद टिप्पणियां उनकी ग़लतफ़हमी दूर करने के लिए काफ़ी हैं परन्तु फिर भी एक पूरी पोस्ट में वर्णवादी ग्रन्थों के प्रमाण देकर उनके दिलों को पूरी तरह मुतमईन कर दिया जाएगा ।
इन अबोध बालकों को हिन्दुत्व के क़सीदे पढ़ते हुए भी सुना जा रहा है ।

किसी भी मत या दर्शन के लिए ज़रूरी है कि वह सारे जगत के लिए समान रूप से हितकारी हो ।यदि हिन्दुत्व में यह ‘शर्त पूरी होती है तो किसी को भी इसे अपनाने में झिझकना नहीं चाहिए ।
आइये इसके लिए हिन्दुत्व के प्रचारकों से ही पूछते हैं कि
1-हिन्दू ‘शब्द कितना पुराना है?
2-इस ‘शब्द का अर्थ घृणित तो नहीं है ?
3-यह ‘शब्द किसी देशी ग्रन्थ का है ?
4-या विदेशियों का बख़शा हुआ है?
5-जिन लोगों ने हिन्दू ‘शब्द दिया उनके ‘शब्दकोष में इसका अर्थ क्या है?
6- क्या कोई आर्य विद्वान ऐसा हुआ है जिसने हिन्दू ‘शब्द पर आपत्ति प्रकट की हो ?
7-हिन्दुत्व क्या है ?
8-इस ‘शब्द को कब गढ़ा गया ?
9-इसकी परिभाषा क्या है?
10-हिन्दुत्ववादी के लक्षण और कर्तव्य क्या होते हैं ?
11-क्या हिन्दुत्व किसी ईश्वरीय ग्रन्थ पर आधारित है ?
12-क्या हिन्दुत्व के सिद्धान्तों पर दुनिया में कभी कोई समाज स्थापित हुआ है?
14-यदि हुआ है तो उसमें महिलाओं और कमज़ोर वर्गों के उत्थान के लिए क्या किया गया ?
15-क्या हिन्दुत्व एक विश्वव्यापी अवधारणा है ?
16-या फिर क्षेत्रीय ?
17-जो लोग हिन्दुत्व के अलावा किसी अन्य विचारधारा को मानते हैं , उन्हें हिन्दुत्वादी अपने से हीन समझते हैं , या अपने बराबरया अपने से ऊँचा ?
18-हिन्दुत्व ने समरस और समानता के सिद्धान्त इसलाम से क्यों लिए?
19-यदि नहीं लिए तो फिर किस वर्णवादी ग्रन्थ से लिए हैं? उसका स्रोत बताया जाए ।
19-हिन्दुत्व की नज़र में वर्ण व्यवस्था की क्या वैल्यू है ?
20-वह वर्ण व्यवस्था की वापसी चाहता है ?या उसका सफ़ाया?
21-तथाकथित वैदिक काल में ‘शूद्रों , औरतों और घोड़ों पर हुए अत्याचारों को वह निन्दनीय मानता है ?
22-या प्रशंसनीय ?
23-पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के अनुयायियों द्वारा अविष्कृत अनगिनत साधनों से लाभ उठाने के बाद एक हिन्दुत्ववादी स्वयं को उनके प्रति कितना कृतज्ञ मानता है?
24-या फिर उनके उन्मूलन की चिन्ता में ही घुलता रहता है ?
25- ग्राहम स्टेन्स को उसके मासूम बच्चों सहित ज़िन्दा जलाने वाले दारा को हिन्दुत्ववादी मानवता का अपराधी मानते हैं ?
26- या फिर अपना आदर्श और हीरो?
27- महात्मा गांधी के हत्यारे की वे सराहना करते हैं या निन्दा ?
28- हनुमान जी को वे जीवित मानते हैं या मृत ?
29- मीर बाक़ी द्वारा श्री रामचन्द्र जी का मन्दिर गिराया जाना उचित था या अनुचित?
30- लंका दहन नायक पवनपुत्र महावीर हनुमान जी ने मन्दिर को टूटने से बचाना क्यों जरूरी न समझा ?

उम्मीद है कि इन सवालों के जवाब से यह पूरी तरह साफ़ हो जाएगा कि हिन्दुत्व किसके लिए और कितना लाभकारी है?

59 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

1-हिन्दुत्व ने समरस और समानता के सिद्धान्त इसलाम से क्यों लिए?
2-यदि नहीं लिए तो फिर किस वर्णवादी ग्रन्थ से लिए हैं? उसका स्रोत बताया जाए ।
उम्मीद है कि इन सवालों के जवाब से यह पूरी तरह साफ़ हो जाएगा कि हिन्दुत्व किसके लिए और कितना लाभकारी है?

VICHAAR SHOONYA said...

Dr.Jamal sahab,
I am following your articles for quite sometime. I wanted to post my comments on them but there are so many things that I wished to share with you for which this space was not enough. Therefore I have published my views on my blog. Hope u will go through them.

Anonymous said...

सावधान , ये चुइत्ये की ओलाद पागल हो गया है. और इसके एक मकसद हे की लोग को भड़काया जा सके ताकि इसकी हलाल की दूकान चलती रहे. इसलिए इस्पे अपने बात नहीं रखे तो बेहतर.

Anonymous said...

इस सिरफिरे के सभी सवालों के जवाब देता है -http://harf-e-galat.blogspot.com/2009/11/blog-post.html

क़ुरआन के बड़े बड़े हयूले बनाए गए, बड़ी बड़ी मर्यादाएं रची गईं, ऊंची ऊंची मीनारें कायम की गईं, इसे विज्ञान का का जामा पहनाया गया, तो कहीं पर रहस्यों का दफीना साबित किया गया है. यह कहीं पर अजमतों का निशान बतलाया गया है तो कहीं पर जन्नत की कुंजी है और हर सूरत में नजात (मुक्ति) का रास्ता, निजामे हयात (जीवन विद्या) तो हर अदना पदना मुसलमान इसे कह कर फूले नहीं समाता, गोकि दिनोरात मुस्लमान इन्हीं क़ुरानी आयतों की गुमराही में मुब्तितिला, पस्पाइयों में समाता चला जा रहा है. आम मुसलमान क़ुरआन को अज़ खुद कभी समझने की कोशिश नहीं करता, उसे हमेशा अपनी माँओं के खसम ओलिमा (धर्म गुरु ) ही समझाते हैं.

इस्लाम क्या है? इसकी बरकत क्या है? छोटे से लेकर बड़े तक सारे मुसलमान ही दानिस्ता और गैर दानिस्ता तौर पर इस के झूठे और खोखले फायदे और बरकतों से जुड़े हुए हैं.

सच पूछिए तो कुछ मुट्ठी भर अय्यार और बेज़मीर मुसलमानों का सब से बड़ा ज़रीया मुआश (भरण पोषण) इस्लाम है जो कि मेहनत कश इसी तबके के अवाम पर मुनहसर करता है यानी बाकी कौमों से बचने के बाद खुद मुसलमान मुसलमानों का इस्तेह्सल (शोषण) करते हैं. दर अस्ल यही मज़हब फरोशों का तबका, गरीब मुसलामानों का ख़ुद दोहन करता है और दूसरों से भी इस्तेह्साल कराता है. वह इनको इस्लामी जेहालत के दायरे से बहार ही निकलने नहीं देता.

क़ुरआन निजामे हयात नहीं बल्कि मुसलमानों के लिए अज़ाबे है. इसके लिए शर्त है कि मुसलमान अकीदत की टोपी को सर से उतारकर, खुले सर होकर क़ुरआन का मुतालिआ (अध्धयन) करें, और हकीक़त को समझें. क़ुरआन में एक हज़ार खामियां हैं, इसे अकले सलीम को पेश नज़र रख कर समझें और कुछ बुनयादी सवालों पर गौर करें.....

१. यह कायनात अरबों खरबों साल पहले नहीं बल्कि इन हिन्दसों को दोहराते हुए आप की उम्र गुज़र जाए और आखिर में आप कहें कि ये कायनात तब पैदा हुई थी, तब भी सवाल वहीँ का वहीँ कायम रहता है कि उसके पहले क्या था?

इतने तवील वक्फे में कोई अल्लाह आज से चौदह सौ साल पहले पैदा हुआ और तेईस साल चार महीने की उम्र पाई (ये मुहम्मद की उम्रे पयाम्बरी है) , उसी में वह किसी यहूदी फ़रिश्ते गिब्रील को पकडा और कुरानी आयतों का सिलसिला उसके कानों में कहना शुरू किया, फिर उसने उन्हें मुहम्मद के कानों में फुसका और मुहम्मद ने लोगों में इसका एलान किया. तैयार हो गई क़ुरआन.

उसके बाद अल्लाह ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के सर सींग.

चौदह सौ साल हो गए हैं उसका कोई अता पता नहीं, नादार कौम मुस्लिम उस हवाई बुत (अल्लाह) के फरेब में आज तक मुब्तिला है और पत्थर तथा मिटटी के बुत परस्तो से जेहाद पर आमादः है..

२. इंसान जब हालात-ए-नीम हैवानी में था तो उसका जेहन डर या ख़ुशी के आलम में किसी अनजानी ताक़त पर आकर आकर कायम हो जाता था जिसने आवाज़ की शक्ल पाई 'हू'. अरब के समाजी ढांचे बतलाते हैं कि नूह के वक़्त तक 'हू' का आलम ही रहा, बाबा इब्राहीम के आते आते 'या हू' तक पहुंचा जिसे अर्वाहे-आसमानी (आकाशीय आत्माएं) की तरहजाना जाता था.

मूसा के आते आते यहूदियों ने अपना निजी खुदा बना लिया और नाम रक्खा 'यहवः' ,ये हू, या हू यहवः सुलेमान और दाऊद तक 'इलाह' और 'इलोही' होता गया. अरबियों में खुदा को हिंदुस्तान की तरह मुख्तलिफ देवी देवताओं की तरह 'लात, मनात, उज़ज़ा वगैरह के साथ साथ इलाह, इलाही जैसी गैबी ताक़त को यहूदियों और ईसाइयों की शक्ल और नक़ल में मानते रहे.

मुहम्मद ने इसे एक नया और बिदअती नाम दिया और नया खुदा पैदा किया, नाम दिया 'अल्लाह'. 'अल्लाह जल्ले जलालहू' वैसे क़ुरआन ने इसके सौ नाम गढे हैं इसके मगर अस्ल यही जलाली अल्लाह है जो हर वक़्त मुसलमानों के पीछे दोज़ख के अंगार लिए खडा रहता है.

गैर मुस्लिमों को तो खैर वह जहन्नम रसीद करना फैसल कर रखा है चाहे उन्हें दावते इसलाम मिली हो या नहीं. हत्ता कि इसलाम से पहले जो मरे वह भी जहन्नुमी चाहे वह मुहम्मद के बाप ही क्यूं न हों. यह बात खुद जाहिल मुहम्मद एक हदीस में इरशाद फरमाते हैं.

जिस अल्लाह को मुहम्मद ने गढा उसने मुहम्मद को अपना प्यरा नबी, अपना रसूल बना कर अपना पैगाम क़ुरआन की शक्ल में अर्श आला से उतार कर ज़मीन पर भेजा कि तुम और तुम्हारे अरबी वरिसैन अर्जे पाक की बीस फी सद इंसानी आबादी को सदियों तक जंगी भट्टियों में झोकते रहो और वह अहमक जिल्लत की ज़िन्दगी को ढोते रहें.

सलीम ख़ान said...

भाई क्या ऊर्जा है आपमें...

लगता है शीघ्र ही ब्लॉग जगत आपका लोहा मानने लगेगा (सिवाय एर जो महात्मा गांधी के हत्यारे की वे सराहना करते हैं)

सलीम ख़ान said...
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सलीम ख़ान said...

लगता है शीघ्र ही ब्लॉग जगत आपका लोहा मानने लगेगा (सिवाय वे जो महात्मा गांधी के हत्यारे की वे सराहना करते हैं)

Anonymous said...

गायत्री मन्त्र चारों वेदों में केवल ऋग्वेद दो जगह में पाया जाता है ।
लेकिन कहां कहां पाया जाता है ?
और दोनों के अक्षरों में क्या अन्तर है ?

Waqt said...

इंसान जब हालात-ए-नीम हैवानी में था तो उसका जेहन डर या ख़ुशी के आलम में किसी अनजानी ताक़त पर आकर आकर कायम हो जाता था जिसने आवाज़ की शक्ल पाई 'हू'. अरब के समाजी ढांचे बतलाते हैं कि नूह के वक़्त तक 'हू' का आलम ही रहा, बाबा इब्राहीम के आते आते 'या हू' तक पहुंचा जिसे अर्वाहे-आसमानी (आकाशीय आत्माएं) की तरहजाना जाता था.

पी के शर्मा said...

धार्मिक आधार पर इस देश के नेताओं ने काफी नुकसान कर लिया है और अभी कर ही रहे हैं। मेरी एक सलाह है ब्‍लॉग जगत में इस तरह के विषय न उठा कर मानव के कल्‍याणकारी कोई विषय छुए जा सकते हैं।

DR. ANWER JAMAL said...

@Allama Iqbal ke tasawwur ke mard e momin , Assalamu alaykum .
Hosla afzai ke liye shukriya.
maine ek nai post LBA par publish ki thi lekin woh display nahin ho rahi hai.
apka blog update ho raha hai , kya is wajah se ya kuchh digar wajah hai ?

DR. ANWER JAMAL said...

@Waqt ji
Thanks for giving this mysterious sentence.

Amit said...

Jmaal saab m aap se सार्थक संवाद की एक मिसाल क़ायम karna chata hun, or aap h ki us post ka samvad chod na jane fir kya le kar baith jaate hain, aap toh apne imaan pe bhi kayam na reh paaye h, aapne kha tha-@जब आपकी टिप्पणियां मिलनी बन्द हो जाएंगी । तभी मैं इस ब्लॉग पर नई पोस्ट क्रिएट करूंगा ।@

DR. ANWER JAMAL said...

@ Hazaar izzaton ke haqdar janab P. K. Sharma ji
Aap ki baat se puri tarah ittefaq rakta hun. maine bhi likha tha ki
मुझे समझाइये कि हिन्दी वेबजगत में इसलाम को बदनाम करने वालों को उनकी बदतमीज़ियों से कैसे रोका जाए ?
lekin
उन्होंने श्री श्री रविशंकर जी के बारे में अपमानजनक बातें कहने वाले श्री आत्रेय जी को तो कुछ न कहा लेकिन मुझ पर पिल पड़े ।

DR. ANWER JAMAL said...

@Sabhi vicharvano
dekho
anonymous ke naam se jo apni maa ko yahan galiyan de raha hai
jante ho ye kaun hai?
Ye mahan arya vidvan ke yuva shishya raj muradabadi hain.
Bank men accountent hain lekin bhasha ....
Ye blog ek aaina bhi hai .
har admi ki asliyat yahan aakar khul jati hai.
Peetal bandhu hosh men aao.

DR. ANWER JAMAL said...

@Vichar shunya ji
aadab
apke blog par main apne vichar aur nishan ankit kar aaya hun.

Anonymous said...

Dr Anvar ,
Phir tumne hindu dharm ke baare mein galat post kar dii.
Tumne ye sidhha kar diya ki
Kute ke jaise tumharii bhii dum siidhii nahi ho saktii.

Tumharii sarii posto se ye dikhtaa hai ki, dharm ke naam per musalmaan jab bhii muh kholata, hai to , Gatar ke jaise Badboo marta hain

DR. ANWER JAMAL said...

@ Rajbeer ji ( anonymous )
maine apke sabhi comments print karwa liye hain .
In sabko Dr. Alam ko courier karunga. Unke hath apki mata ji ke pas bhijwaunga.
Tab apni dasha dekhna .

DR. ANWER JAMAL said...

@ Blogvani ko Hindu Nav varsh ki Mangal Kamnayen.
ब्लॉगवाणी क्या है ? क्या यह चिठ्ठों का एक एग्रीगेटर है ? या इस के अलावा कुछ और भी है ?
ब्लॉगवाणी दरअस्ल एक विचार है । विचार लोगों को जोड़ने का , बिछुड़ों को मिलाने का , फ़ासलों को मिटाने का , तंग ज़हन लोगों को विराट विश्व से एकाकार करने का ।
ब्लॉगवाणी एक परिवर्तन का जनक है जिसकी ऋणी न केवल भारत जाति बल्कि विश्व भर की मानव जाति सदा रहेगी ।
ब्लॉगवाणी वेब जगत में धरती माता और भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि है ।
जो भारत में एक बार आ गया तो बस आ गया । इसी का होकर रह गया । उसकी कहीं जाने की तमन्ना ही ख़त्म हो गयी ।
ब्लॉगवाणी विश्वव्यापी है इसे सभी मुल्कों में सभी जातियों और सभी रूचियों के लोग देखते हैं ।
ब्लॉगवाणी निष्पक्ष है और हरेक संकीर्णता से मुक्त भी । मैं इसका सुबूत भी हूं और गवाह भी। मैं अपनी हर नमाज़ में ब्लागवाणी के निर्माता और प्रबंध तन्त्र के सदस्यों और उनके सभी मुताल्लिक़ीन के लिए हर सच्चे सुख और ज्ञान वृद्धि की दुआ करता हूं और यह दुआ मेरी आत्मा की गहराई से निकलती है ।
ब्लॉगवाणी सदा फले फूले । प्रभु परमेश्वर से मेरी यही कामना है ।
आप भी कहिये आमीन
या फिर तथास्तु ।

Tarkeshwar Giri said...

अनवर भाई देख लिया न आपने एक हिन्दुस्तानी का गुस्सा। इसी लिए कहता हूँ की आप अपनी जानकारियों को भलाई मैं लगाये - बुराई मैं नहीं। अभी तो एक ने बोला है, कुछ और अगर शुरू हो गए तो हमें दोष मत देना।

Amit said...
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Amit said...

हिन्‍दुत्‍व के प्रमुख तत्त्व
1. ईश्वर एक नाम अनेक
2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है
3. ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें
4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर
5. हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है
6. क्रिया की प्रतिक्रिया होती है
7. परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम्
8. प्राणि-सेवा ही परमात्मा की सेवा है
9. स्त्री आदरणीय है
10. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है
11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में
12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता
13. हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी
14. आत्मा अजर-अमर है
15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र
16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं
17. हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है
18. हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है

Amit said...

हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।

आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: 'आर्य' शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी 'सिन्धु' नदी को 'हिन्दु' कहते थे क्योंकि वे 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख 'अवेस्ता' में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है

हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।

एक अन्य श्लोक में कहा गया है

ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:

गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।

ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।

Amit said...

चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।

भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।

हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।

Amit said...

Yah jaankari yhaa uplabdh h-
http://hindi.vishwahindusamaj.com/hindutva.htm

Amit said...

ऋग्वेद कहता है कि ईश्वर एक है किन्तु दृष्टिभेद से मनीषियों ने उसे भिन्न-भिन्न नाम दे रखा है । जैसे एक ही व्यक्ति दृष्टिभेद के कारण परिवार के लोगों द्वारा पिता, भाई, चाचा, मामा, फूफा, दादा, बहनोई, भतीजा, पुत्र, भांजा, पोता, नाती आदि नामों से संबोधित होता है, वैसे ही ईश्वर भी भिन्न-भिन्न कर्ताभाव के कारण अनेक नाम वाला हो जाता है । यथा-

जिस रूप में वह सृष्टिकर्ता है वह ब्रह्मा कहलाता है ।

जिस रूप में वह विद्या का सागर है उसका नाम सरस्वती है ।

जिस रूप में वह सर्वत्र व्याप्त है या जगत को धारण करने वाला है उसका नाम विष्णु है ।

जिस रूप में वह समस्त धन-सम्पत्ति और वैभव का स्वामी है उसका नाम लक्ष्मी है ।

जिस रूप में वह संहारकर्ता है उसका नाम रुद्र है ।

जिस रूप में वह कल्याण करने वाला है उसका नाम शिव है ।

जिस रूप में वह समस्त शक्ति का स्वामी है उसका नाम पार्वती है, दुर्गा है ।

जिस रूप मे वह सबका काल है उसका नाम काली है ।

जिस रूप मे वह सामूहिक बुद्धि का परिचायक है उसका नाम गणेश है ।

जिस रूप में वह पराक्रम का भण्डार है उसका नाम स्कंद है ।

जिस रूप में वह आनन्ददाता है, मनोहारी है उसका नाम राम है ।

जिस रूप में वह धरती को शस्य से भरपूर करने वाला है उसका नाम सीता है ।

जिस रूप में वह सबको आकृष्ट करने वाला है, अभिभूत करने वाला है उसका नाम कृष्ण है ।

जिस रूप में वह सबको प्रसन्न करने, सम्पन्न करने और सफलता दिलाने वाला है उसका नाम राधा है ।

लोग अपनी रुचि के अनुसार ईश्वर के किसी नाम की पूजा करते हैं । एक विद्यार्थी सरस्वती का पुजारी बन जाता है, सेठ-साहूकार को लक्ष्मी प्यारी लगती है । शक्ति के उपासक की दुर्गा में आस्था बनती है । शैव को शिव और वैष्णव को विष्णु नाम प्यारा लगता है । वैसे सभी नामों को हिन्दू श्रद्धा की दृष्टि से स्मरण करता है ।

Amit said...

ब्रह्माण्ड का जो भी स्वरूप है वही ब्रह्म का रूप या शरीर है । वह अनादि है, अनन्त है । जैसे प्राण का शरीर में निवास है वैसे ही ब्रह्म का अपने शरीर या ब्रह्माण्ड में निवास है । वह कण-कण में व्याप्त है, अक्षर है, अविनाशी है, अगम है, अगोचर है, शाश्वत है । ब्रह्म के प्रकट होने के चार स्तर हैं - ब्रह्म, ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट (विराज) । भौतिक संसार विराट है, बुद्धि का संसार हिरण्यगर्भ है, मन का संसार ईश्वर है तथा सर्वव्यापी चेतना का संसार ब्रह्म है ।

‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म सत्य और अनन्त ज्ञान-स्वरूप है । इस विश्वातीत रूप में वह उपाधियों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म या परब्रह्म कहलाता है । जब हम जगत् को सत्य मानकर ब्रह्म को सृष्टिकर्ता, पालक, संहारक, सर्वज्ञ आदि औपाधिक गुणों से संबोधित करते हैं तो वह सगुण ब्रह्म या ईश्वर कहलाता है । इसी विश्वगत रूप में वह उपास्य है । ब्रह्म के व्यक्त स्वरूप (माया या सृष्टि) में बीजावस्था को हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) कहते हैं । आधार ब्रह्म के इस रूप का अर्थ है सकल सूक्ष्म विषयों की समष्टि । जब माया स्थूल रूप में अर्थात् दृश्यमान विषयों में अभिव्यक्त होती है तब आधार ब्रह्म वैश्वानर या विराट कहलाता है ।

Amit said...

कुछ पंथ या मजहब कहते हैं कि ईश्वर से डरोगे, संयम रखोगे तो मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा और सरकशी का जीवन बिताओगे तो नरक मिलेगा । स्वर्ग में सुन्दर स्त्री मिलती है; मनचाहे भोजन का, सुगन्धित वायु का और कर्णप्रिय संगीत का आनंद मिलता है; नेत्रों को प्रिय लगने वाले दर्शनीय स्थल होते हैं अर्थात् पांचों ज्ञानेन्द्रियों को परम तृप्ति जहाँ मिले वहीं स्वर्ग है । नरक में यातनाएँ मिलती हैं पुलिसिया अंदाज में; जैसे अपराधी से उसका अपराध कबूल करवाने या सच उगलवाने के लिए व्यक्ति को उल्टा लटका देना, बर्फ की सिल्लियों पर लिटा देना आदि या आतंकवादियों, डकैतों और तस्करों के कुकृत्य की तरह जो शारीरिक और मानसिक यातना देने की सारी सीमाएँ तोड़ देते हैं । नरक में इससे अधिक कुछ नहीं है ।

स्वर्ग के जो सुख बताये गये हैं, उन सुखों को विलासी राजाओं और बादशाहों ने इस धरती पर ही प्राप्त कर लिया । और नरक की जो स्थिति बतायी गयी है, मजहब और पंथ के नाम पर आतंकवादी इस धरती को ही नरक बना रहें हैं । नरक का भय दिखाकर तो हम ईश्वर को सबसे बड़ा आतंकवादी ही साबित करेंगे । वस्तुत: ईश्वर को स्वर्ग के सुख या नारकीय यातना से जोड़ने का कोई सर्वस्वीकार्य कारण उपलब्ध नहीं है ।

हिन्दू धर्म में जो संकेत मिलते हैं उसके अनुसार स्वर्ग और नरक यहीं हैं । हमारे शरीर एवं इन्द्रियों की क्षमताएँ सीमित हैं । हम अत्यधिक विषयासक्ति के दुष्परिणामों से बच नहीं सकते । किन्तु हिन्दू समाज में भी स्वर्ग और नरक के लोकों के अन्यत्र स्थित होने को मान्यता दी गयी है । यदि हम इसे सही मान लें तो जिन लोगों ने नेक काम किये हैं उन्हें स्वर्ग में और जिन लोगों ने बुरे काम किये हैं उन्हें नरक में होना चाहिए । चाहे सुख हो या यातना दोनों को शरीर के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है । इस स्थिति में स्वर्ग की आबादी तो बहुत बढ़ जानी चाहिए । अप्सराओं की संख्या तो सीमित है; वे कितने लोगों का मन बहलाती होंगी? वस्तुत: यह धरती ही स्वर्ग है, यह धरती ही नरक है । इस धरती को नरक बनने से रोकने और स्वर्ग में बदलने का उत्तरदायित्व हमारा है । यह कार्य सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना और सामूहिक प्रयास से ही सम्भव है । इसीलिए धर्म की आवश्यकता है ।

हिन्दुत्व कहता है कि यदि हमने सत्कर्म किये हैं और हमें लगता है कि पूर्ण कर्म-फल नहीं मिला तो हमारा पुनर्जन्म हो सकता है - अतृप्त कामना की पूर्ति के लिए । और यदि हमने दुष्कर्म कियें हैं तो कर्म-फल भोगने के लिए हमारा पुनर्जन्म होगा । किन्तु यदि संसार से हमारा मोह-भंग हो जाता है, कर्मों में आसक्ति समाप्त हो जाती है, कोई कामना शेष नहीं रहती या ईश्वर में असीम श्रद्धा और भक्ति के कारण ईश्वर को पाने की इच्छा ही शेष रहती है तो हम पुनर्जन्म सहित सभी बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं, मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं । इस प्रकार हिन्दुत्व का परम लक्ष्य स्वर्ग-प्राप्ति न होकर मोक्ष की प्राप्ति है ।

Amit said...

संसार में हिन्दू धर्म ही ऐसा है जो ईश्वर या परमात्मा को स्त्रीवाचक शब्दों जैसे सरस्वती माता, दुर्गा माता, काली मैया, लक्ष्मी माता से भी संबोधित करता है । वही हमारा पिता है, वही हमारी माता है (त्वमेव माता च पिता त्वमेव) । हम कहते हैं राधे-कृष्ण, सीता-राम अर्थात् स्त्रीवाचक शब्द का प्रयोग पहले । भारतभूमि भारतमाता है । पशुओं में भी गाय गो माता है किन्तु बैल पिता नहीं है । हिन्दुओं में ‘ओम् जय जगदीश हरे’ या ‘ॐ नम: शिवाय’ का जितना उद्घोष होता है उतना ही ‘जय माता की’ का भी । स्त्रीत्व को अत्यधिक आदर प्रदान करना हिन्दू जीवन पद्धति के महत्त्वपूर्ण मूल्यों में से एक है । कहा गया है :-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: ।

जहां पर स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता रमते हैं । जहाँ उनकी पूजा नहीं होती, वहाँ सब काम निष्फल होते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।

न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।

जिस कुल में स्त्रियाँ दु:खी रहती हैं, वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है । जहां वे दु:खी नहीं रहतीं, उस कुल की वृद्धि होती है ।

Amit said...

पत्नी की सत्यनिष्ठा पति में होने को हिन्दू धर्म में आदर्श के रूप में देखा गया है । स्त्री संतान को जन्म देती है । बालक/बालिका को प्रारम्भिक संस्कार अपनी माता से ही मिलता है । यदि स्त्री स्वेच्छाचारिणी होगी तो उसकी संतान में भी उस दुर्गुण के आने की अत्यधिक सम्भावना रहेगी । पुरुष संतति-पालन का भार उठाने को प्राय: तभी तैयार होगा जब उसे विश्वास होगा कि उसकी पत्नी के उदर से उत्पन्न संतान का वास्तविक पिता वही है । पति की मृत्यु होने पर भी उत्तम संस्कार वाली स्त्री संतान के सहारे अपना बुढ़ापा काट सकती है । पश्चिम के आदर्शविहीन समाज में स्त्रियाँ अपना बुढ़ापा पति के अभाव में अनाथाश्रम में काटती हैं ।

इसका अर्थ यह नहीं है कि पुरुष को उच्छृंखल जीवन जीने की छूट मिली हुई है । एक पत्नीव्रत निभाने की अपेक्षा पुरुष से भी की गयी है; किन्तु ऐसा करने वाले पुरुष पर कोई महानता नहीं थोपी गयी है । गृहस्थी का कामकाज देखने वाली स्त्री अपने पति के प्रति सत्यनिष्ठ होकर ही महान हो जाती है जबकि पुरुष देश की रक्षा, निर्बलों की रक्षा, जनोत्थान के कार्य करके महान बनता है ।

अपने पति की चिता में बैठकर या कूदकर जल मरने वाली स्त्री को सती नहीं कहा गया । इस तरह का दुष्प्रचार पाखण्डियों द्वारा ही किया जाता है । विधवा स्त्री को मिलने वाली सम्‍पत्ति का हरण करने के लिए उसके परिवार वाले इस प्रकार का नाटक रचाते हैं । शान्तनु के मरने पर सत्यवती जीवित रही । दशरथ के मरने पर उनकी तीनों रानियां जीवित रहीं । पाण्डु के मरने पर कुन्ती जीवित रही । माद्री ने चिता में कूदकर आत्महत्त्या ग्लानिवश की क्योंकि वह पति के मरण का कारण बनी थी । सती अनसूया, सती सावित्री किसी को भी सती पति के साथ जल मरने के लिए नहीं कहा गया ।

Anonymous said...

http://harf-e-galat.blogspot.com/2010/02/blog-post_22.html . aapke savalo ka javab yaha milega doctor saahab . please visit kare dhanayavad . satay ko pahachano . aur apana aur apane samaj ka navanirman karo

Amit said...
This comment has been removed by the author.
Amit said...

@ Amit ji malik apko sehat aut daulat se malamal kare.
lekin jo sawal apne kiya hai uska jawab apko lena to padega aur mere sawalon ke jawab apko dene padenge.
ab aapoot patang copy paste na karen.
post men pooche gaye sawalon ke aur tippani men uthaye gaye prashno ke jawab den.
warna man len ki apke paas waqt ke saat gyan bhi kum hai.

AB BATAYE INHE KOI MUJH AGYANI KI SIDHI SARAL JAWAB BHI INKO UTPATANG LAGNE LAGEN HAI.
AJI DR.SAAB HINDU KYA H KI SAAR GRAHI HOTA H, ISLIYE AAP KE SAARE KE SAARE SADE HUYE VICHARO ME SE JO MUJH KAM AKL KO JO KAM SADE HUYE LAGTE HAI UNHI SE SAMBANDHIT JAWABDENE KI KOSHISH HOTI H.
BAAKI SHURU SHURU ME AAPNE APNE KO DHANE KA PRYAAS KIYA THA. KHUD KO UDAAR MAN DIKHANE KI KOSHISH KI THI,WOH SAFED CHHADAR TOH AB AAP KI GANDGI SE MAILI HONE LAGI H.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

भैंस और बीन में क्या सम्बन्ध है.

Mohammed Umar Kairanvi said...

गुरू जी आपका लोहा आज 4 हाट पोस्‍टस से हमने देख लिया, मैं जानता हूं आप 10 भी दिखा देंगें, तारकेश्‍वर जी के मशवरों पर ध्‍यान दिजिये, अब शांत हो जाईये और शांति से बात किजिये

कृष्‍ण जी भी आपके साथ उसकी फोज भी आपके साथ फिर चिंता काहे की

A Secular (सच्ची-मुच्ची) said...

@भारतीय नागरिक - Indian Citizen
भैंस और बीन में क्या सम्बन्ध है?

उत्तर - जैसे अभी अमित ने जमाल के आगे बीन बजाई है इसे ही कहते हैं भैंस के आगे बीन बजाना और यही संबंध है भैंस और बीन में .

तो भाई लोगो क्यों सब अपना टाइम वेस्ट करते हो इसके लेख पढ़ कर और टिप्पणी करके ये अपनी बकवासों से नहीं बाज आने वाला.

मैंने आज ही इस chu..a के लेख देखे हैं और आश्चर्य हुआ सुरेश चिपलूनकर जी जैसे चिठ्ठाकारों ने भी यहाँ आकार अपना समय नष्ट किया है.

सभी से निवेदन है इसकी बेकार की झूठी बातों का कोई विश्वास ना करे और मेरा यकीन न हो तो जिस जगह का ये कहीं भी उदाहरण देता है उसको जाँच लें झूठ ही निकलेगा क्योंकि मैंने भी कुछ बातें अभी चेक की थी सब इस का झूठ है.

अवधिया चाचा said...

गुरू जी,
तीसों सवालों के जवाब यहाँ पर दे दिये उनहोने,
अब आप किया करोगे इसे देख कर ही अवध जाउंगा.

Anonymous said...

कठमुल्ले के सवाल के उत्तर 1-10 -

1. हिन्दू शब्द कितना पुराना है?
इसकी जवाब जरूरी नहीं क्योंकि हिन्दू शब्द दूसरों द्वारा दिया गया है और हिन्दू संस्कृति से पुराना नहीं है. हिन्दूओं को क्योंकि बदलाव से परहेज नहीं, इसलिये अब वह उनकी पहचान है.

वैसे तो अल्लाह शब्द भी दूसरों का दिया हुआ है. मुहम्मद ने मूर्तिपूजक अरबों के कई भगवानों में से अल्लाह का नाम अपने ईश्वर को नाम देने के लिये किया. अल्लाह उनके ब्रह्मा के समान था (http://en.wikipedia.org/wiki/Allah).

1. अल्लाह शब्द कितना पुराना है?

2 क्या इस शब्द का अर्थ घृणित है?
शब्द का मतलब वही होता है जिसके लिए उसका इस्तेमाल किया जाता है. हिन्दू शब्द हिन्दुस्तानियों की पहचान है, और इसका अर्थ वही है. अगर अनर्थ निकालने कि जिद हो तो शब्द कई मिल जाते हैं.

2. ईस्लाम में ईश्वर के लिये जो शब्द है उसका अमेरिकि सैनिक किस मंतव्य में प्रयोग करते हैं?

3. यह शब्द किसी देशी ग्रन्थ का है?
बेशक इससे हिन्दओं को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इतना सद्भाव और खुलापन उनमें आ चुका है कि वह हर बात का प्रमाण किसी ग्रंथ में खोजना जरूरी नहीं समझते.

3. अल्लाह शब्द की उत्पत्ति किसने की?

4. या विदेशियों का बख्शा हुआ है?
बख्शा तो खैर क्या होगा? वैसे बख्शा तो बहुत कुछ गया था. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक बहुत बड़ी रियासत बख्शी थी कुछ लालची अरबों ने एक गोरी विदेशी कौम के साथ मिलकर.

4. उस बख्शी गई रियासत का नाम क्या है.

5. हिन्दू शब्द का शब्दकोष में अर्थ क्या है?
कृपया न. 2 देखें.

5. सारी पश्चिमी सभ्यता के शब्दकोष में इस्लाम का अर्थ क्या है?

6. क्या किसी हिन्दू विद्वान ने इस नाम पर आपत्ति की है?
हिन्दूओं को धर्मान्धों कि आपत्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता. किसी 'विद्वान' की फतवागिरी यहां नहीं चलती इसलिये आपत्ति कि बात हो न हो उसका कोई मतलब नहीं है.

6. उस कुरान के ज्ञानी विद्वान का नाम क्या है जिसका कलाम इतना सनसनीखेज है?

7. हिन्दुत्व क्या है?
हिन्दुत्व एक संस्कृति है, एक जीवनशैली है, एक पहचान है, एक विचार है, और भारत को जोड़ने वाला सबसे मजबूत सूत्र है. यह धर्म से आगे है,

7. एक खास धर्म में ऐसा क्या है जो उसको मानने वाले लोग इस कदर दीवाने हुये जाते हैं की इन्सान को इन्सान नहीं समझते?

8. इस शब्द को कब गढ़ा गया?
यह भी महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि यह संस्कृति इसको दिये गये हर नाम से पुरानी है.

8. इस्लाम को पैगंबर ने कब अपनाया? इससे पहले वह किस धर्म को मानते थे?

9. इसकी परिभाषा क्या है?
एक ही सवाल बार-बार चोला बदल कर पूछा जाये तो क्या पूछने वाले के दिमागी संतुलन पर सवाल उठाया जा सकता है?

9. पूछने वाले को यह बेबात जिद क्यों है?

10. हिन्दुववादी के लक्षण और कार्य
हिन्दुव बहुत विशाल है. इसका कोई धार्मिक लक्षण नहीं. हिन्दुत्व अपने अन्दर सनातन धर्म, आर्यसमाज, बुद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म, नास्तिकता और अगर चाहें तो इस्लाम और ईसाइयत को भी अपनाने की शक्ति रखता है. जो विशाल हृदय मानवता के लक्षण हैं वहीं हिन्दुत्व के लक्षण हैं.

10. क्या इन लक्षणों का अनुकरण करने के बारे में कभी सोचा है, या सिर्फ एक खास किताब में लिखे लक्षणों से ही इन्सान परिभाषित होता है?

Anonymous said...

कठमुल्ले के सवाल के उत्तर 11-20

11. क्या हिन्दुत्व किसी इश्वरीय ग्रन्थ पर आधारित है?
जब हिन्दुत्व धर्म के दायरे में नहीं आता तो उसके किसी ग्रन्थ पर आधारित होने का सवाल नहीं है. हां बहुत सारे ग्रन्थ हिन्दुत्व पर आधारित हैं. इनमें से कुछ सही हैं और कुछ गलत. यहां तक की हर ग्रन्थ में सही या गलत बातें मौजूद हो सकती हैं और हिन्दुत्व इस बात को स्वीकारता है और इन्हें सुधारता है.

11. क्या एक खास धर्म में लिखी किताब को अक्षरश: सही मान लेना बेवकूफाना नहीं है?

12. क्या हिन्दुत्व के सिद्धान्तो पर दुनिया में समाज है?
इस सवाल का जवाब सवाल से ही

12. जिन्हें भारतवर्ष दुनिया की सबसे पुराने सभ्यता (इस्लाम से भी पुरानी) नहीं दिखती उन्हें चश्मा बदलना चाहिये या नहीं?

13. इस नंबर का सवाल नहीं है.. क्या किसी खास धर्म में इस नंबर का प्रयोग वर्जित है? अगरा हां तो जरा वैज्ञानिक आधार बतायें.

14. महिलाओं के उत्थान के लिये हिन्दुत्व ने क्या किया?
800 साल के कुशासन और दमन के दौरान जो कमजोरियां हिन्दुत्व में आईं उन्हें लगातार दूर किया. पर्दा प्रथा हिन्दुओं में खत्म प्राय है. और इसी समाज की स्त्रियां एक खास धर्म की स्त्रियों से ज्यादा मुक्त, शिक्षित हैं. इसलिये अगर प्रतिशत में देखा जाये तो हिन्दू स्त्रियों की उपस्थिति सरकारी नौकरियों, प्राइवेट नौकरियों, बिजनेस में कहीं ज्यादा है. आज हिन्दू नारिया अपने हक के लिये पुरुषों की मोहताज नहीं है.

14. एक दूसरे धर्म में नारियों को अब तक कैद रखने की जिद क्यों है?

15. क्या हिन्दुत्व एक विश्वव्यापी अवधारणा है?
क्योंकि हिन्दुत्व की कुचेष्टा दूसरे धर्म के लोगों को बलात, या लालच देकर अपना धर्म बदलने की नहीं रही इसलिये इस धर्म के लोग धर्म परिवर्तन नहीं करते. वरन हिन्दू हर धर्म को अपना लेते हैं इसलिये हिन्दू घरों में गुरु नानक भी मिलेंगे, बुद्ध भी और जीसस भी.

15. क्या कोई दूसरा धर्म है ऐसा उदार?

16. या फिर क्षेत्रिय
जवाब 15 देखें.

16. एक दूसरे धर्म से अभी-अभी कौन सा क्षेत्र छीन कर एक तीसरे धर्म वालों ने कब्जा किया. नाम बतायें.

17. जो लोग हिन्दुत्व को नहीं मानते क्या हिन्दुत्व वादी उन्हें हीन समझते हैं?
हो सकता है कि पि़छली सदी में यह किसी हद तक सत्य हो लेकिन आज के दिन में कम से कम में यह बिना संशय के साथ कह सकता है कि हिन्दुत्व को मानने वाले सारी दुनिया के साथ कंधा मिलाकर चलते हैं न ऊपर न नीचे. हम हिन्दू सबकी तरह इन्सान है कोई और नस्ल नहीं.

17. क्यों एक खास धर्म को मानने वाले हमेशा अपने धर्म को ऊपर दिखलाने की जिद करते हैं? उनमें कौन से लाल लगे हैं?

18. हिन्दुत्व ने समरस और समानता के सिद्धान्त इस्लाम से लिये?
नहीं यह सिद्धान्त इन्सानियत से लिये. इस्लाम से इतर बिना धार्मिक सोच रखने वालों ने इन सिद्धांतों को जन्म दिया. इसका क्रेडिट लोकतांत्रिक मूल्यों के जनकों और एक हद तक मार्कसवादी मूल्यों के जनकों को जाना चाहिये न कि किसी धर्म को

18. क्यों एक खास धर्म के लिये सिर्फ वही बराबर हैं जो उस धर्म को मानते हैं और बाकी सब हेय?

19. यदि नहीं लिया तो किस वर्णवादी ग्रन्थ से लिये.
दूसरे धर्मों की तरह हिन्दु धर्म नयी सोच के लिये अपने ग्रन्थों का मोहताज नहीं. हम खुद भी सोच लेते हैं.

19. एक खास धर्म में हर व्याख्या किसी एक किताब के संदर्भ में ही क्यों करनी पड़ती है? क्या उनके पास खुद का दिमाग है?

20. वह वर्ण व्यवस्था की वापसी चाहता है या सफाया?
निश्चित ही सफाया. आज का हिन्दू पहले के हिन्दू के मुकाबले कम वर्णवादी है, और आगे और कम होगा. हम अच्छी शिक्षा से यह संभव बना रहे हैं. हम तो बदलेंगे ही.

20. क्यों एक खास धर्म बाकी सारे धर्मों का सफाया चाहता है?

Anonymous said...

कठमुल्ले के उत्तर 21-30 -

21. तथाकथित वैदिक काल में शूद्रों आदी पर अत्याचार निंदनीय है?
बिलकुल है, किसी भी इन्सान या फिर जीवित जानवर पर अमानवीय अत्याचार निंदनीय है और हिन्दूत्व को जानने वाले यह कहते, मानते, करते हैं.

21. क्यों धीरे-धीरे गला रेत कर दर्दनाक मौत मारने को सबाब का काम समझा जाता है?

22. या प्रशंसनीय?
यह उसी सवाल का बेबात का एक्सटेंशन है. नहीं यह प्रशंसनीय भी नहीं है.

22. क्यों धीरे-धीरे गला रेत कर दर्दनाक मौत मारने को कुर्बानी कहकर प्रशंसा की जाती है?

23. पैगंबर हजरत... के अनुयायियों के द्वारा अविष्कृत सामान का लाभ हिन्दू उठाते हैं?
हिन्दूत्व को मानने वाले लोग धार्मिकता के कारण अंधाये नहीं है कि वो इन्सान और इन्सान के असबाब में धर्म के नाम पर फर्क करें. हिन्दुओं के भी बहुत सारे आविष्कार पैगंबर हजरत... के मानने वाले उपयोग करते रहे जैसे शून्य, गणित विद्या आदी. आज भी हिन्दू आविष्कारक और इन्जीनियर हिन्दुस्तान और उससे बाहर बहुत से ऐसे नये आविष्कार कर रहे हैं जिसका उपयोग पैंगबर हजरत... के मानने वाले करते हैं. यहां कि कम्पयुटर के आविष्कार में भी एक हिन्दू ने रोल निभाया (विनोद धाम)

23. क्या इस खास धर्म को मानने वाले दूसरे धर्मों के आविष्कारकों के द्वारा बनाये उपकरणों का उपयोग नहीं करते? आपको पता है कि अनिस्थिसिया का आविष्कार एक यहूदी ने किया, आइंस्टाइन यहूदी था, मानव खून की ग्रुपिंग यहूदी ने की, यहां तक की आज इस्लामिक देशों की पहली चाहत एटम बम का आविष्कार भी यहूदियों ने किया. यहुदियों ने ज्यादा आविष्कार किये या एक खास धर्म के मानने वालों ने? सूची तैयार करें.

24. या फिर उनके उन्मूलन की चिन्ता में घुलते हैं?
हिन्दुओं ने कभी उनका उन्मूलन नहीं चाहा. हिन्दूत्व को मानने वाले न धर्म परिवर्तन करते हैं न धार्मिकता कि यह अन्धी जिद फैला रहे हैं जिसमें उन्हें धर्म के आगे कुछ दिखाई न दे. वह चितिंत हैं तो अपनी पहचान और जीवनशैली की रक्षा के लिये.

24. जब भी एक खास धर्म का शासन रहा तो उनके शासन में हिन्दुओं का लोप और उन्मूलन क्यों हुआ?

25. ग्राहम स्टेन्स को जिन्दा... अपराध मानते हैं?
किसी की भी हत्या अपराध है और यह हर हिन्दू मानता है दोषी पर कार्यवाही के लिये कानून का उपयोग होना चाहिये जो ग्राहम स्टेन्स के हत्यारे पर हुआ और हिन्दुओं ने ही समर्थन किया.

25. क्यों एक खास धर्म में यह जिद है कि दूसरे धर्म वाले को मारना अपराध नहीं. या फिर उसके मानने वाले कहते हैं कि उनके धर्म को छोड़ने वाले को मारना अपराध नहीं?

26. या फिर अपना आदर्श और हीरो़?
हमारा आदर्श वो कातिल नहीं. हमारा आदर्श है डा. भाभा (एक पारसी), एपीजे कलाम (मुसलमान) और हर वह इन्सान हिन्दू या दूसरे धर्म का जो इन्सानियत पर भरोसा करता है.

26. 5000 लोगों को एक झटके में मारने वाला क्यों एक खास धर्म का हीरो है?

27. महात्मा गांधी के हत्यारे कि सराहना या निन्दा?
निश्चय ही निन्दा. महात्मा गांधी का सम्मान हिन्दुओं के भरोसे ही है वरना आजादी में उनका योगदान का कितना वर्णन हिन्दुस्तान से ही कटे पाकिस्तान और बांग्लादेश में मिलता है वह सर्वविदित है.

27. क्या आप 5000 लोगों के हत्यारे की निन्दा पर एक निब्ंध लिखोगे या यह लिखोगे कि हर मुस्लिम को वैसा बनना चाहिये? (जैसा लिख चुके हैं)

28. हनुमान जी को वे जीवित मानते हैं या मृत?
हनुमान जी को हिन्दू ईश्वर का अंश मानते हैं.

28. इश्वर है या नहीं?

29. मीर बाकी द्वारा हनुमान जी का मंदिर गिराया उचित या नहीं?
बिलकुल अनुचित आपको संशय?

29. गुस्साये हिन्दू भीड़ के द्वारा मस्जित गिराया जाना उचित या अनुचित?

30. हनुमान जी ने मंदिर बचाना जरूरी क्यों नहीं समझा?
ठीक उसी लिये जिस तरह अल्लाह ने अपने जिन्नात/फरिश्ते आदी भेजकर मस्जिद बचाना नहीं समझा.

30. मस्जिद को बचाना अल्लाह या उसके फरिश्तों ने जरूरी क्यों नहीं समझा? सद्दाम हुसैन को बचाना? अफगानिस्तान को बचाना? इराक को बचाना? फिलिस्तीन को बचाना? पाकिस्तान को खुद से ही बचाना?

Anonymous said...

Dear Dr Anvar,

हिन्‍दुत्‍व के प्रमुख तत्त्व के लिये इस साइट को देखे. यहां आपको इस्लाम धर्म के बारे मे भी पढ़ने को मिलेगा
www.dharm.raftaar.in

Thanks

मिहिरभोज said...

कभी गंगा मैं स्नान करके आओ ...वहां कोई न कोई आपको जरूर मिलेगा...जो कि आपकी पांच सात पुश्त पहिले का आपको बतायेगा कि वे भी हिंदु थे......उनको मुस्लिम हमलावरों ने कितने कष्ट देकर मुसलमान बनाया....जो बहादुर थे वे लङकर शहीद हो गये......जो डरपोक जिंदा बचे ,जिन्होने सर झुकाना कबूल किया वे आपके बाप दादै थे.....आज वे सर पीट रहे होंगे कि आप उनको गालियां दे रहे हो......

अनोप मंडल said...

अभी हमने एक टिप्पणी लिखी लेकिन वो प्रकाशित नहीं हुई क्या बात है?

अनोप मंडल said...

वो टिप्पणी जैनों के विषय में थी जो कि दुनिया को अपने जादू से भरमा कर आपस में लड़वा रहे हैं

त्यागी said...

मित्र सलीम गुड पर ही नहीं विष्ठा पर भी मक्खी बैठती है. सो गुड जब तक उपलब्ध नहीं तब तक इसी से काम चलाओ. इसी लिया आज कल तुम्हारी नजर में इसका लोहा माना जा रहा है.
लोगो ने तो इस सड़ाध से नाक बंद कर रखी है और कईओ ने अपने मुह इस के लिया खोल रखे है जिन में से आप एक.
parshuram27.blogspot.com/

Suresh Chiplunkar said...

भारतीय नागरिक जी, जानता हूं कि आप दोबारा यहाँ नहीं आयेंगे मेरा कमेंट पढ़ने, लेकिन फ़िर भी - जमाल साहब यहाँ जो दुर्गन्ध फ़ैला रहे हैं, असल में वह "हर्फ़-ए-गलत" नाम के ब्लॉग से लगी हुई मिर्ची है… उधर जाकर तो वे उस उम्मी की बातों का जवाब देंगे नहीं, लेकिन चिढ़कर इधर अपने ब्लॉग पर हिन्दुओं और वेदों को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं… इसे कहते हैं Frustration...

और अनवर जमाल इस ब्लॉग में जो भी लेख छाप रहे हैं असल में वह बरसों पूर्व हिन्दी पत्रिका "सरिता" में छपे लेखों की नकल मात्र हैं, शब्दों का थोड़ा फ़ेरबदल करके उसे ये अपने नाम से चेपे जा रहे हैं…।

हालांकि मैं भी इस ब्लॉग पर आज अन्तिम बार ही आ रहा हूं, लेकिन सिर्फ़ भारतीय नागरिक को जवाब देने कि भाई साहब "समय नष्ट करने का शौक मुझे भी नहीं है"… मैंने गलती की जो इस सड़ांध भरी जगह पर आ गया… अब गलती सुधारता हूं… और अन्तिम नमस्कार…

जमाल साहब यदि वाकई में ज्ञानी हैं तो हर्फ़-ए-गलत पर जाकर अपनी विद्वत्ता दिखायेंगे… इधर तो वे सिर्फ़ हिन्दुओं के खिलाफ़ अपनी भड़ास निकाल रहे हैं… :)

Amit said...

क्या आप मुसलमानों द्वारा खोले गए किसी अस्पताल (सिर्फ हकिम्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुसलमानों का ही इलाज होता हो )
या धर्मशाला (मुस्लिम मुसाफ्हिर्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुस्लिम ही ठहर सकतें हों ) या अन्य सेवा कार्यों का विवरण बतला सकतें हैं ,
की ऐसे सेवा कार्य देश में कहाँ कहाँ चल रहें हैं मुझे जानने की बड़ी जिज्ञासा है

Rishabh said...

मैंने पढ़ा आपका article और ये जान क आच्छा लगा की आपने कभी research की हिन्दू धर्म क बारे मैं ....और आपने article अपना ब्लॉग हिंदी मैं रखा ये तो और भी अच्छी बात है |

आपने काफी आच्चे और महतवपूर्ण सवाल उठाये इसके लिए आपका धन्यवाद |

मगर आप जब बात करते हो इतिहास मैं हुए‘शूद्रों , औरतों और घोड़ों पर हुए अत्याचारों की तो बात कुछ हज़म नि हुई जो मुस्लिम समाज है वो क्या तब पैदल चलता था
???

वो क्युएँ चल कर आये इतने दूर से साले "बहन चोद्द ..." ऍम सॉरी की मैंने बोला बुत दर्द होता है तब मऊंह से निकल जाता है

हमने तब भी उनको आँखों पर रखा आज भी कहते है चलो हमें बहुत अच्छी इमारते दी कुछ नया सलीका भी दिया |

लकिन वो किस नियत से आये से आये थे ये आप से अच्छी तरह नि समझ सकता |

सवाल केवल आपके मन मैं ही नहीं है हमारे पास भी है हम भी जानना कहते है....


पहले अपने धर्म की गंदगी को साफ़ कीजये तब झांकिए किसी और सिर्फ चार P.hD
करते तो अपने धर्मे और कुरान मैं करते |

क्या आपके समाज मैं महिला आज भी सुरचित है?

डॉ. साब कहने और होने मैं बहुत अन्तेर है. पहले अपने आप मैं झांक के देखिये आज
हर दंगल मैं एक मुस्लिम जरूर क्युएँ होता है? ये कोन सा जिहाद है आप

मांस हलाल का क्युएँ खाते हो?
औरत परदे मैं क्यूँ रखते हो?
आप बात बच्चो की तालीम की बात करते है मदरसे मैं क्या पढाया और क्या सिखाया जाता है और पैसा कान्हा से आता है ये भी पता करो |

संजय बेंगाणी said...

मीर बाक़ी द्वारा श्री रामचन्द्र जी का मन्दिर गिराया जाना उचित था या अनुचित?

यानी तुम हिन्दुओं की बात मानते हो कि मन्दीर गिराया गया था? बहुत सही. तो फिर बाबरी गिराए जाने पर छाती-पिटा क्यों?

अवधिया चाचा said...

बेटा जमाल देखा तेरा कमाल, ऊपर हमारे नाम का कमेंटस देख के भ्रमित न होना, 'धान के देश में' ब्‍लाग है हमारा, हम पियक्‍कडों की तरह नहीं कि जब ब्‍लाग का नाम रजिस्‍टर करने गये तो रख कुछ और आये, 'धान के देश में' में को ठीक से men लिखना, खेर तुम्‍हें क्‍या समझाना नकल के लिये भी अक्‍ल की ज़रूरत होती है, और हमारी तो नकल हो ही नहीं सकती, यह भाषा कहाँ से लाओगे, वो भी बिना अवध गये, तुम कभी जाओ तो दूसरे खान को हमारा सलाम कहना वह तुम पे बडा फिदा है, हीरा बतावे है तुम्‍हें
अभी दुनिया तुम्‍हें पत्‍थर समझ रही है मेरा आशिर्वाद है जल्‍द सब तुम्‍हें हीरा मानेंगे

अवधिया चाचा
जो कभी अवध न गया

Anonymous said...

1-हिन्दुत्व ने समरस और समानता के सिद्धान्त इसलाम से क्यों लिए?
2-यदि नहीं लिए तो फिर किस वर्णवादी ग्रन्थ से लिए हैं? उसका स्रोत बताया जाए ।
उम्मीद है कि इन सवालों के जवाब से यह पूरी तरह साफ़ हो जाएगा कि हिन्दुत्व किसके लिए और कितना लाभकारी है?

Ans 1: Agar Islam mein Samras or Samaantaa kaa Sidhaant hota to tum ye Saare savaal nahii poochhte.
Islam main "Samaantaa kaa Sidhaant" naam kii koi cheej nahii hai. Isme keval Dusre dharmo ke logo ko marne or galii dene walon jannat milti hain. To phir "Samras or Samaantaa" ka sawaal hi paida nahi hota

Ans 2 : Hindu Granth koi chori ke grandh nahi hai, jo "Samras or Samaantaa " kahii or se churaye

Amit said...
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Amit said...

इनके लिए तो कोई २४ घंटे ज़वाब लिखने के लिए ही बैठा रहे , तो कुछ अक्ल ठिकाने आ सकती हैं इनकी , , अब वैदिक संस्कृत आम हिन्दू तो क्या बड़े बड़े विद्वानों के भी समझ में नहीं आती है ,और यह जमाल साहब जैसे लोग अर्थ का अनर्थ किये जा रहें हैं .इनके एजेंडे पिछले १४०० सालों मैं नहीं कामयाब नहीं हो पाए हैं और अब भी नहीं हो पाएंगे .हिन्दुओं को कितना मरेंगे काटेंगे , कितना धर्म परिवर्तन करेंगे , फिर भी दारुल इस्लाम के सपने को ढ़ोते ढ़ोते ही मर जायेंगे , पर हिदुत्व का झंडा यों ही लहराता रहेगा
"सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणी पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग्यभवेद” ।
जो संस्कृति सारी सृस्ती के कल्याण की भावना रखती हैं उसे कोन मिटा सकता है

naveen tyagi said...

हिंदू शब्द भारतीय विद्दवानो के अनुसार कम से कम ४००० वर्ष पुराना है।

शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी शताब्दी में रचित है ,में मन्त्र है.............

"हीनं दुष्यति इतिहिंदू जाती विशेष:"

अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है।

इसी प्रकार अदभुत कोष में मन्त्र आता है.........................

"हिंदू: हिन्दुश्च प्रसिद्धौ दुशतानाम च विघर्षने"।

अर्थात हिंदू और हिंदु दोनों शब्द दुष्टों को नष्ट करने वाले अर्थ में प्रसिद्द है।

वृद्ध स्म्रति (छठी शताब्दी)में मन्त्र है,...........................

हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्पर:।
वेद्.........हिंदु मुख शब्द भाक्। "

अर्थात जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर चलने वाला, हिंसा से दुख मानने वाला है, वह हिंदु है।

ब्रहस्पति आगम (समय ज्ञात नही) में श्लोक है,................................

"हिमालय समारभ्य यवाद इंदु सरोवं।
तं देव निर्वितं देशम हिंदुस्थानम प्रच्क्षेत ।

अर्थात हिमालय पर्वत से लेकर इंदु(हिंद) महासागर तक देव पुरुषों द्बारा निर्मित इस छेत्र को हिन्दुस्थान कहते है।

पारसी समाज के एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ में लिखा है कि,
"अक्नुम बिरह्मने व्यास नाम आज हिंद आमद बस दाना कि काल चुना नस्त"।

अर्थात व्यास नमक एक ब्र्हामन हिंद से आया जिसके बराबर कोई अक्लमंद नही था।

इस्लाम के पैगेम्बर मोहम्मद साहब से भी १७०० वर्ष पुर्व लबि बिन अख्ताब बिना तुर्फा नाम के एक कवि अरब में पैदा हुए। उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में लिखा है,............................

"अया मुबार्केल अरज यू शैये नोहा मिलन हिन्दे।
व अरादाक्ल्लाह मन्योंज्जेल जिकर्तुं॥

अर्थात हे हिंद कि पुन्य भूमि! तू धन्य है,क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना है।

१० वीं शताब्दी के महाकवि वेन .....अटल नगर अजमेर,अटल हिंदव अस्थानं ।
महाकवि चन्द्र बरदाई....................जब हिंदू दल जोर छुए छूती मेरे धार भ्रम ।

जैसे हजारो तथ्य चीख-चीख कर कहते है की हिंदू शब्द हजारों-हजारों वर्ष पुराना है।
इन हजारों तथ्यों के अलावा भी लाखों तथ्य इस्लाम के लूटेरों ने तक्ष शिला व नालंदा जैसे विश्व -विद्यालयों को नष्ट करके समाप्त कर दिए।

इसलिए मेरा सभी ब्लोगर्स से अनुरोध है कि वे किसी अध्यन हीन व बुद्धि हीन व्यक्ति की ग़लत जानकारी को सच न माने।हिंदू धर्म की बुराई करो और अपने को हिंदू कहो ,ऐसा करने से कोई हिंदू नही बन जाता।
और हाँ बुद्धिहीन जमाल एक बात और सुन कि मुसलमान लूटेरों ने इर्श्यावश हिन्दू का अर्थ काला व चोर बताया .लेकिन हिन्दू शब्द का अर्थ फारसी में "लड़कियों का दिल चुराने वाला प्रेमी".जिसे कुछ तेरे जैसे बुद्धिहीनो ने चोर लिख दिया.दूसरा अर्थ है लड़कियों के गाल पर सुन्दरता का प्रतीक काला तिल.जिसको मोहम्मद कि ओलाद केवल काला लिखती है.और अब सुन मुस्लिम का अर्थ,तो तुझे बताऊँ कि मुस्लिम का अर्थ गद्दार होता है अर्थार्त "जो अपने मित्र को शत्रु को सोंप दे".तेरे मोहमद ने भी इस शब्द से शुरू में परहेज करना चाहा था किन्तु बाद में चालाकी से इसका अर्थ बदल दिया जो कि यह है -----_"वह जो अपने व्यक्तित्व को अल्लाह को समर्पित कर दे."तो अब बता कि तू गद्दार है कि नहीं.

मनुज said...

jamal sahab
aapke reply kee prateekshaa hai

Satish said...

देखिये जनाब,आप बिलकुल हिंदुत्व की बुराई कर सकते है,क्युकी ये नाम तो वैसे भी मुगलों द्वारा दिया हुआ है,पर हनुमान जी के बारे में जो बात आपने कही है....उसका जवाब आपको हनुमान जी ही देंगे,हनुमान जी की शक्ति को कभी आजमा लीजियेगा समझ में आ जायेगा.....और बात रही हिन्दू धर्म की तो आपकी हिन्दू घर्म के बारे में इतनी बुराई करने और हनुमान जी के बारे में उनकी शक्ति पे संदेह करने करने के बावजूद मैं आपको बिना कोई अपशब्द या गाली दिए बगैर अगर ये प्रेम पूर्वक कहता हु की दुसरे धर्म की बुराई करने से बाज़ आये,तो यही हिन्दू धर्म है,यही है हिन्दू धर्म जो अपने ही देश में किसी के आलोचना करने के बाद भी उसके गर्दन पे तलवार नहीं रखता,जैसा आपके इस्लाम में नहीं होता है.........

md Junaid said...

Mai aapke baato se sahmat hun.

md Junaid said...

Allah ne ham logon ko nabi ke sadke tufail me paida kiya hai.
Gunahgar q ho rhe ho mere aziz bhaiyon?
Kon kahta hai hamare nabi baad me aaye.
Sirf duniya me baad me tashrif laye.noor ko duniya kayam hone se pahle to kya balki zibrail alaihissalam se bhi pahle allah ne ek noor banaya.
Gunahon se bacho iman waalo
Or jo islam ko nhi mante hai,to quran pr gaor kr ke to dekho ye kya kahta.
Allah ki likhi huyi kabhi galat nhi ho sakta
Wedon or purano me sahi likha hai lekin gaor kro isme bhi likha hai ke koi aasmani kitab ayegi jo ek rishi yani mohammad sallal lahu alaihi wasallam pr utari jayegi,tum sab usi pr iman laana.
Gor kren ganahgar nhi bane allah ek hai

md Junaid said...

Islam ye salah nhi deta hai ke kisi bekusur ki jaan li jaye.
Lekin allah ne kaha hai sirf meri puja kro..
Aapka allah wahi hai jo mera hai
Ham logon ko ekhi mazhab pr chalna chahiiiye.
Gor karen do sage bhai ka pita ekhi ho sakta hai do nhi.
Ham log aapas me bhai hai or sab ka khuda sirf ek hai.aapke kitabon me bhi likha hai.fir aap murtiyon ko q pujte hai.