सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Saturday, October 30, 2010

A divine call to sister Divya हिन्दू समाज मेरे अपने लोगों का समाज है, मेरे पूर्वजों का समाज है, मेरा अपना समाज है। उन्हें संकट में घिरा देखकर मेरा दुखी होना स्वाभाविक है - Anwer Jamal

आपकी इस पोस्ट पर मेरा आपसे दूसरा प्रश्न है। जो इस प्रकार है --
आप एक विद्वान् व्यक्ति हैं, जिसने हिन्दू और इस्लाम के बहुत से ग्रन्थ पढ़े हैं। क्या इतना पढने लिखने के बाद भी एक इंसान सदियों तक दुसरे धर्म की कमियाँ ही गिनता रहता है ? क्या आप अपने धर्म से खुश नहीं हैं ? किसी दुसरे की आस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाना आपका प्रिय शगल है क्या ?
यदि हिन्दू जनता आपकी आस्था पर चोट करे तो कैसा लगेगा ?
क्या तलाक तलाक कहकर अपनी पत्नी को छोड़ देना उचित है ?
क्या बुर्के में बंद करके आप स्त्री के साथ कुछ ज्यादती नहीं कर रहे ?। क्या मान मर्यादा की रक्षा बुर्के में ढके रहने से होती है , या फिर परिवेश से मिले संस्कारों से ?
------------------------------------------------------------------------------------
हिन्दू धर्म मेरे लिए पराया नहीं है
1. सभ्य और विचारशील बहन दिव्या जी ! आपसे मुझे अच्छे संवाद की आशा है लेकिन आप मुझे अपनाने के बजाय कह रही हैं कि मैं भी आपको और हिन्दुओं को ‘दूसरा‘ समझूं और उनके धर्म को अपना नहीं बल्कि ‘दूसरों का धर्म‘ समझूं , ऐसा क्यों ?
क्या आप मेरी अपनी बहन नहीं हैं ?
क्या जनाब अमित साहब मेरे अनुज नहीं हैं ?
अगर आप मेरे अपने हैं तो आपका धर्म भी मेरा अपना है। आपके ज़रिए भी हिन्दू धर्म मेरा अपना धर्म है और बिना आपके मैं खुद भी हिन्दू हूं।
हिन्दू किसे कहते हैं ?
‘हिन्दू‘ शब्द की जो भी परिभाषा आप तय करेंगे, वह आपसे पहले मुझमें घटित होगी, इन्शा अल्लाह। पहले इसे भौगोलिक सीमाओं से जोड़कर बयान किया जाता था लेकिन आजकल ‘हिन्दू‘ शब्द को भू-सांस्कृतिक अवधारणा के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। आर. एस. एस. के विचारकों ने भी मुसलमानों को ‘हिन्दूपने‘ से ख़ारिज नहीं किया है। उन्होंने मुसलमानों को ‘मुहम्मदी हिन्दू‘ कहा है। इस सर्टिफ़िकेट के बाद भी आप क्यों चाहती हैं कि मैं हिन्दू धर्म को अपना नहीं बल्कि दूसरों का धर्म समझूं और उसके बारे में सोचना और बोलना छोड़ दूं ?
आप में से कौन है जो खुद को ‘मनुवादी हिन्दू‘ कहने को तैयार हो ?
आप में से कौन है जो मनु के मौलिक धर्म को आज भी प्रासंगिक मानता हो और उसका पालन करता हो ?
आप में से कौन है जो कहता हो कि हिन्दू धर्म में एक भी कमी नहीं है ?
मैं अपने आप में ‘यूनिक हिन्दू‘ हूं
ऐसा आप में से एक भी नहीं है लेकिन मैं एक ऐसा ही हिन्दू हूं। आपको चाहिए था कि मेरा अनुसरण करते लेकिन आप मुझ पर आरोप लगाने लगीं कि मैं ‘दूसरों के धर्म में कमियां‘ गिनता रहता हूं।
‘कमियां‘ बहुवचन है ‘कमी‘ शब्द का। जब मैं हिन्दू धर्म में एक भी कमी नहीं मानता तो बहुत सारी कमियां कैसे मान लूंगा ? और उन्हें गिनूंगा कैसे ?
हिन्दू समाज मेरे अपने लोगों का समाज है, मेरे पूर्वजों का समाज है, मेरा अपना समाज है। उन्हें संकट में घिरा देखकर मेरा दुखी होना स्वाभाविक है। इनसान के संकटों से उसके कर्मों का सीधा संबंध है। अगर आज नक्सलवादी रोटी और रोज़गार के लिए आतंक मचा रहे हैं, अगर 2 लाख से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं, अगर अकेले उत्तर प्रदेश में मलेरिया से हज़ारों मर चुके हैं और ग़रीबों को रोटी और इलाज मयस्सर नहीं है तो पत्थर की मूर्तियों पर अरबों-खरबों रूपये बर्बाद करना राष्ट्रद्रोह भी है और संवेदनहीनता भी। ईश्वर की बनाई जीवित मूर्तियां तड़प-तड़प कर मर रही हों और लोग अपनी बनाई बेजान मूर्ति के आगे खुशी से नाचते हुए बाजे बजा रहे हों ?
यह धर्म नहीं है बल्कि अपने मन से निकाली गईं परंपराएं हैं जिन्हें धर्म के नाम पर किया जाता है। इस तरह की परंपराओं को वैदिक ऋषियों ने कभी न तो खुद किया और न ही कभी समाज से करने के लिए कहा, जिन्हें हिन्दू धर्म का आदर्श समझा जाता है। तब ‘धन उड़ाऊ और जग डुबाऊ‘ परंपराओं को क्यों किया जाए ?
कोई रीज़न तो दीजिए।
ऋषि मार्ग से हटने के बाद हिन्दू समाज भटक गया है। इस भटकाव में ही वह यह सब कर रहा है जिससे मैं उसे रोक रहा हूं और आप मुझे रोकने से रोक रही हैं। सही बात बताना मेरा फ़र्ज़ है और उसे मानना आपका। मैं अपना फ़र्ज़ अदा कर रहा हूं, आप भी अपना फ़र्ज़ अदा कीजिए।
आपने पूछा है कि क्या मैं अपने धर्म से, इस्लाम से खुश नहीं हूं ?
‘इस्लाम‘ का अर्थ है एकनिष्ठ भाव से केवल एक परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण करना। मैं इस्लाम से बहुत ज़्यादा खुश हूं, इतना ज़्यादा खुश हूं कि आपको भी अपनी खुशी में शरीक करना चाहता हूं। मेरे लिए हिन्दू धर्म इस्लाम का विरोधी नहीं है बल्कि उसी का एक पर्यायवाची है, अरबी शब्द इस्लाम का ही वह एक हिन्दी नाम है। आपको भी इस गहरी हक़ीक़त को जान लेना चाहिए, मैं बस यही चाहता हूं।
2. आपने पूछा है कि यदि हिन्दू जनता मेरी आस्था पर चोट करे तो मुझे कैसा लगेगा ?
इसमें यदि शब्द की गुंजाइश ही कहां है ? वह आए दिन मेरी आस्था पर चोट करती ही रहती है और यक़ीनन मुझे बहुत बुरा लगता है। अब यह भी जान लीजिए कि वह क्यों चोट करती है मेरी आस्था पर ?
और मुझे बुरा क्यों लगता है ?
वे समझते हैं कि मैं हिन्दू धर्म में कमियां निकाल रहा हूं, मैं हिन्दुओं को नीचा दिखा रहा हूं। इसलिए वे बेचारे मेरी आस्था पर चोट करते हैं। जहां वे आश्वस्त होते हैं, जिन्हें वे अपने जैसा मानते हैं, उनकी पोस्ट पर वे ऊटपटांग नहीं लिखते। जब वे मेरी तरफ़ से आश्वस्त हो जाएंगे तब वे मेरे साथ भी ठीक हो जाएंगे। जो भाई आश्वस्त हो चुके हैं, उनका व्यवहार काफ़ी हद तक बदल चुका है। उनमें से एक ‘मान जी‘ हैं। पहले कभी वे मेरे ब्लाग पर गालियां लिखकर जाया करते थे लेकिन बाद में उन्होंने माफ़ी भी मांगी और उसके बाद फिर उनकी प्रतिक्रियाएं भी ठीक आने लगीं और अब तो वह कुछ लिखते भी नहीं, हालांकि पढ़ते वह आज भी हैं। मुझे बुरा इसलिए लगता है कि वे जिस बात की मज़ाक़ उड़ा रहे हैं, वह सनातन सत्य है। वह केवल मुहम्मद साहब स. के समय से ही नहीं है बल्कि उनके पहले से है वह सत्य। इस्लाम का कोई भी मूल सिद्धांत वैदिक धर्म से भिन्न नहीं है। जब वे इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाते हैं तो अपनी अज्ञानता के कारण वे वैदिक धर्म का ही मज़ाक़ उड़ा रहे होते हैं, इसीलिए मुझे दुख होता है।
3. आपने जानना चाहा है कि क्या तलाक़-तलाक़ कहकर अपनी पत्नी को छोड़ देना उचित है ?
बिल्कुल अनुचित है, सरासर जुल्म और गुनाह है एकमुश्त तीन तलाक़ देना। जो आदमी ऐसा करता है वह एक औरत की कोमल भावनाओं और उसके त्याग की क़द्र करने वाला नहीं हो सकता। आम तौर पर वह एक जाहिल और फूहड़ आदमी ही हो सकता है। ऐसे नाक़दरे से उसकी बीवी को तुरंत अलग हो जाना चाहिए और हुकूमत को उसकी कमर पर बेंत लगानी चाहिएं। इस्लामी हुकूमत में ऐसा ही होता है और अगर आप सहयोग दें तो यहां भी उसे दोहराया जा सकता है।
एक मुश्त तीन तलाक़ देना ‘बिदअत‘ है, गुनाह है, तलाक़ का मिसयूज़ है। यह कमी मुस्लिम समाज की है न कि इस्लाम की। अल्लाह की नज़र में जायज़ चीज़ों में सबसे ज़्यादा नापसंद तलाक़ है। जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव आते हैं, बहुत से अलग-अलग मिज़ाजों के लोगों के सामने बहुत तरह की समस्याएं आती हैं। जब दोनों का साथ रहना मुमकिन हो और दोनों तरफ़ के लोगों के समझाने के बाद भी वे साथ रहने के लिए तैयार न हों तो फिर समाज के लिए एक सेफ़्टी वाल्व की तरह है तलाक़। तलाक़ का आदर्श तरीक़ा कुरआन में है। कुरआन की 65 वीं सूरह का नाम ही ‘सूरा ए तलाक़‘ है। तलाक़ का उससे अच्छा तरीक़ा दुनिया में किसी समाज के पास नहीं है। हिन्दू समाज में तलाक़ का कॉन्सेप्ट ही नहीं था। उसने इस्लाम से लिया है तलाक़ और पुनर्विवाह का सिद्धांत। इस्लाम को अंश रूप में स्वीकारने वाले समाज से हम यही कहते हैं कि इसे आप पूर्णरूपेण ग्रहण कीजिए। आपका मूल धर्म भी यही है।
4. आपने पूछा है कि क्या बुरक़े में बंद करके आप स्त्री के साथ कुछ ज़्यादती नहीं कर रहे हैं ?
अच्छा तो यह रहता कि आप एक ट्रिप मेरे करतीं मेरे घर के लिए और यह सवाल आप मेरी बहनों और मेरी वाइफ़ से पूछतीं। इसका बिल्कुल सटीक जवाब तो वही दे सकती हैं जो बुरक़ा पहनने का अनुभव रखती हैं। इस्लाम में हिजाब और पर्दा है बुरक़ा नहीं है। बुरक़ा पर्दा करने वाली औरतों ने खुद बनाया है अपनी सहूलियत की ख़ातिर।
कुरआन में कहा गया है कि नेक औरतें जब घर से बाहर निकलें तो वे अपने अंगों की और अपनी सजावट की नुमाइश न करें। वे अपने बदन और सिर पर चादर ढक लें ताकि वे सताई न जाएं। ‘हिजाब‘ औरत की सुरक्षा करता है। इससे नेक औरत का तो दम नहीं घुटता लेकिन शैतान मर्द ज़रूर घुटन महसूस करते हैं क्योंकि हिजाब की वजह से वे औरत के अंगों की ऊंचाई और गहराई नापने का लुत्फ़ नहीं उठा पाते जैसा कि दूसरी औरतों के साथ करने में वे आसानी से करते रहते हैं, यह नज़र का व्यभिचार कहलाता है।
हिजाब इस्लाम का एक ऐसा विशेष गुण है जिसे आज ग़ैर-मुस्लिम लड़कियां भी शौक़ से अपना रही हैं। इस्लाम में आने से पहले वे इस्लामी रिवाज इख्तियार कर रही हैं। इससे इस्लाम के प्रति उनके आकर्षण का पता चलता है।
5. मान-मर्यादा की रक्षा ‘हिजाब‘ से ही संभव है। इस्लाम के उसूल से हटकर चलने वाली लड़कियां अक्सर भारी नुक्सान उठा बैठती हैं। परिवेश से मिलने वाले संस्कार औरत की सुरक्षा नहीं कर सकते। मेरे एक पुराने लेख से आप यह बख़ूबी समझ सकती हैं।
जो चीज़ें मामूली समझी जाती हैं, उन्हें सबके सामने यूं ही डाल दिया जाता है और उन्हें छिपाया नहीं जाता जैसे कि घर का कूड़ेदान दरवाज़े पर ही डाल दिया जाता है लेकिन हीरे-मोती सबकी नज़रों से छिपाकर रखे जाते हैं। हीरे-मोती से भी ज़्यादा क़ीमती दुनिया में नेक औरत है, उसकी आबरू है। जो आबरू की क़ीमत जानते हैं, केवल वही उसकी हिफ़ाज़त के लिए औरत को बुरी नज़रों से बचाने की कोशिश करते हैं।
आप मुझे दूसरों के धर्म में कमियां ढूंढने से मना कर रही हैं और खुद तलाक़ और बुरक़े पर ऐतराज़ जता रही हैं ?
क्या खूब अदा है नसीहत की और नादानी की ?
आपके अलावा भी एक भाई ने मज़ार पर ऐतराज़ जताया है।
इस्लाम में क़ब्र पक्की बनाना और उस पर बाजे बजाना हराम है। यह कमी मुस्लिम समाज की है, इस्लाम की नहीं है। उन्हें नहीं करना चाहिए यह सब।
एक साहब ने हज को फ़िज़ूलख़र्ची कह दिया। जिस ख़र्च से आदमी का विचार बदले, उसके चरित्र का विकास हो, वह ख़र्च फ़िजूलख़र्ची की श्रेणी में नहीं आता। संक्षेप में यही कहा जा सकता है। हज के ज़रिए मानव जाति को बांटने वाली दीवारें गिरती हैं और वे एक सच्चे रब के बन्दे बनकर एक समुदाय बनते हैं। समर्पणवादी शांतिकारियों का अन्तर्राष्ट्रीय रूहानी सम्मेलन है हज। इसके बारे में विस्तार से बताऊंगा एक पूरी किताब का अनुवाद करके। अनुवाद पूरा हो चुका है। बस पेश करना बाक़ी है।
मूर्तियां और आडम्बर हिन्दू-मुसलमानों को बांटकर भारत को कमज़ोर बना रहे हैं। इन्हें त्यागते ही दोनों एक हो जाएंगे और भारत सशक्त होते ही विश्व नेतृत्व पद पर विराजमान हो जाएगा जो कि मेरा सपना है। इसी सपने को साकार करने के लिए मैं आपको सहयोग के लिए आमंत्रित करता हूं।

Friday, October 29, 2010

A reply to sister Divya मूर्तियों को बनाने,बहाने और जलाने में हर साल लगने वाला अरबों रूपया इनसानों की भलाई में, ग़रीबों की बेहतरी में लगे तो समाज का उत्थान भी होगा और ईश्वर भी प्रसन्न होगा - Anwer Jamal

बहन दिव्या, आपका स्वागत है। आप एक विचारशील और विदुषी लेडी हैं। आप शिक्षित हैं। आज हरेक शिक्षित व्यक्ति यह जानता है कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री साहिबा ने करोड़ों रूपया पार्क और सड़कों पर उन लोगों की मूर्तियां लगाने में ख़र्च कर दिए, जो दलितों की मुक्ति के लिए अपने समय के रावण से लड़े। राष्ट्रवादी विचारकों ने इसे जन-धन की बर्बादी बताया। इसी बात को वे उन लोगों की मूर्ति स्थापन के बारे में नहीं कहते, जो पुराने समय में सवर्णों लाभ पहुंचाने के लिए लड़े। यहां आकर उनकी ज़ुबान ख़ामोश हो जाती है। वे खुद बड़े-बड़े पुतले हर साल बनाते हैं और उनमें आग लगा देते हैं। अरबों रूपये पहले इन पुतलों को तैयार करने में लगाते हैं और फिर इन्हें जलाने में। अरबों रूपये आतिशबाज़ी में खर्च कर दिए जाते हैं। बहुत सारी मूर्तियां नदियों में बहा दी जाती हैं जो जल प्रवाह को भी अवरूद्ध करती हैं और पानी को प्रदूषित भी करती हैं। मूर्तियों को बनाने,बहाने और जलाने में हर साल लगने वाला अरबों रूपया इनसानों की भलाई में, ग़रीबों की बेहतरी में लगे तो समाज का उत्थान भी होगा और ईश्वर भी प्रसन्न होगा। तब नक्सलवाद जैसी समस्याएं भी पैदा नहीं होंगी जो देश की अखण्डता के लिए एक भारी ख़तरा बनी हुई है।
मूर्तियां व्यर्थ हैं। यह इतनी आसान बात है कि इसे एक अनपढ़ व्यक्ति भी समझ सकता है। कबीर साहिब अनपढ़ थे लेकिन उन्होंने भी ‘पाहन पूजा से हरि न मिलने‘ की बात कही। दयानन्द जी तो अपने बचपन में ही समझ गए थे कि ‘शिवलिंग‘ कुछ भी नहीं है। इसी लिए उन्होंने घर छोड़ दिया लेकिन मूर्तिपूजा न की। निरंकारी और राधास्वामी जैसे बहुत हिंदू मत मूर्तिपूजा को व्यर्थ बताते हैं। इनकी बात बड़े पते की बात मानी जाती है, इन्हें संत-महंत बल्कि ईश्वर से भी बड़ा माना जाता है और मुझे कुछ भी नहीं। मेरी बात को ‘मज़ाक़ करना‘ माना जाता है, आखि़र क्यों ?
मैंने कोई नई बात तो कही नहीं, फिर मेरी बात बेवज़्न क्यों और उनकी बात जानदार क्यों ?
चलिए, मेरी बात नहीं मानते, मत मानिए, उनकी बात तो मान लीजिए, जिनके बारे में आप कहते हैं कि ये भारतीय जाति के लिए पुनरोद्धार के लिए ही खड़े हुए थे।
मूर्ति की मज़ाक़ मैं नहीं बनाता बल्कि मूर्तिपूजक खुद अपनी मूर्तियों की मज़ाक़ बनाते हैं, जब वे नई मर्तियां घर में ले आते हैं और पुरानी बाहर कूड़े पर फेंक देते हैं या फिर पानी डुबा देते हैं और कहीं-कहीं मूर्तियां इतनी विशाल बना लेते हैं कि वे डूबने में ही नहीं आतीं। फिर इस पर वे खुद ही लेख लिखते हैं, उनके फ़ोटो खींचते हैं और दुनिया को दिखाकर उनकी मज़ाक़ उड़ाते हैं लेकिन जो लोग यहां ऐतराज़ करते हैं वे उनकी बात को मज़ाक़ नहीं बताते। इस लिंक
यह केसी आस्था कि हम अपने इष्ट को, अपने ईश्बर को पेरो मै रोंदे?
 पर आप खुद देख सकते हैं कि मूर्तिपूजक अपनी मूर्ति को साष्टांग दण्डवत की हालत में छोड़कर चले गए। मूर्ति यहां पड़ी है और मूर्तिपूजक अपने घर पड़ा है। जब इसे फेंकना ही था तो इसे बनाया ही क्यों ?
क्या यह खुद एक मज़ाक़ नहीं है ?
@ भाई गिरी जी ! हरेक सवाल का जवाब दिया जाता है लेकिन आप उन पर विचार नहीं करते। अब आपको यह जवाब दिया गया है। आप विचार करके अपनी राय से ज़रूर आगाह करें, आपका अहसान होगा। धन्यवाद .

Thursday, October 28, 2010

Give up your prejudices धर्म वही है जो हमें भगवान तक पहुंचा दे - Anwer Jamal

महकती है मेरे चमन की कली-कली

कल श्री होतीलाल जी के साथ एक ऐसे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में जाने का इत्तेफ़ाक़ हुआ जो गांव वालों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए गांव में ही क़ायम किया गया है। वापसी में हम दोनों एक जगह चाय के लिए रूक गए। चाय की यह दुकान जी. टी. रोड पर एक लोहे के खोके में बनी है जिस पर ‘ओम टी स्टाल‘ लिखा था। दुकान पर उस वक्त एक बहन थीं। वे हमारे लिए चाय बनाने लगीं तो मेरी नज़र उनके खोके की दीवार पर गई। उनके काउन्टर और दीवार पर कुछ अच्छी बातें लिखी थीं। मुझे अच्छी लगीं और मैंने तुरंत इन्हें लिख लिया।
1. धर्म और भगवान नित्य हैं।
2. धर्म वही है जो हमें भगवान तक पहुंचा दे।
3. भोग और संग्रह की इच्छा ही सारे पापों की जड़ है।
4. धन की प्यास कभी बुझती नहीं अतः संतोष ही परम सुख है।
5. शत्रु और रोग को कभी दुर्बल नहीं समझना चाहिए।
6. स्वार्थी मनुष्य को संसार में कोई अच्छा नहीं कहता।
7. संपन्नता मित्र बनाती है लेकिन उनकी परख विपदा के समय होती है।
8. पुण्य-पाप की सबसे बड़ी निर्णायक आत्मा है।
9. मौन और एकांत आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं।
10. कामनाएं सागर की भांति अतृप्त हैं।
11. आपत्तियां किसी को दृढ़ बनाती हैं और किसी को निर्बल।
12. दुख ही व्यक्ति को दयालु, सुहृदय और सामाजिक बनाता है।
13. शिक्षा मनुष्य चेतना को जिज्ञासु बनाती है।
इन सब के ऊपर ‘ऊँ‘ लिखा था और फिर लिखा था-
चित्रकूट के घाट पर, लगी संतन की भीर
चाय पी रहे बैठ कर, राजा रंक और फ़क़ीर
इसके बाद लिखा था-
‘स्मृति पीछे नज़र डालती है और आत्मा आगे‘
मुझे ये सभी बातें बहुत अच्छी लगीं और मुझे लगा कि इन बातों को तुरंत मान लेना चाहिए।
क्या ये बातें अच्छी नहीं हैं ?
मुझे लगा कि इतने ज्ञान की बातें हैं यह ज़रूर किसी ब्राह्मण की दुकान होगी। चाय का पेमेंट करते हुए जब मैंने उन बहन से पूछा तो उन्होंने बताया कि वे खटीक जाति से हैं। मैंने उन बातों की तारीफ़ की और अपना ख़याल बताया तो वे बोलीं कि ज़रूरी नहीं है कि अच्छी बातें केवल ब्राह्मण ही बता सकता है। मैंने उनकी राय से इत्तेफ़ाक़ ज़ाहिर किया और उनका शुक्रिया भी।
क्या मेरे लिए इन बातों को न मानने के लिए यह कोई जायज़ वजह कहलाएगी कि
1. ये बातें उर्दू और अरबी में नहीं हैं ?
2. इन बातों को किसी मुस्लिम आलिम ने नहीं लिखा है ?
3. इन बातों को किसी हिन्दू ने लिखा है ?
4. हिन्दुओं में भी किसी फ़िलॉस्फ़र जाति के आदमी ने नहीं लिखा है ?
5. मैं शहर का आदमी हूं किसी देहाती की बातें क्यों मानूं ? आदि आदि
6. क्या इस तरह का विचार जायज़ है ?
7. क्या इस तरह का संकीर्ण विचार रखने के बाद मेरे कल्याण की कोई आशा शेष रह जाएगी ?
नहीं, बिल्कुल नहीं। इस तरह की बात मैं अपने लिए हितकारी नहीं मानता और जो चीज़ मैं अपने लिए पसंद नहीं करता वह किसी दूसरे के लिए भी पसंद नहीं करता, अपने विरोधी के लिए भी नहीं, अपने दुश्मन के लिए भी नहीं। ये सभी बातें चाहे कुरआन और हदीस में ठीक इन शब्दों में न आई हों तब भी हदीस में यह हिदायत साफ़ आई है कि ‘हिकमत अर्थात तत्वदर्शिता की बात जहां से भी मिले, ले लो।‘
अल्लामा इक़बाल अपनी नज़्म ‘राम‘ में कह चुके हैं कि ‘लबरेज़ है शराबे हक़ीक़त से जामे हिन्द‘ और हम देख रहे हैं कि हिन्दुस्तान के चायख़ाने की दीवार पर भी आरिफ़ाना कलाम मौजूद है। इस कलाम की सच्चाई को और हिन्दुस्तान की अज़्मत को जो न माने वह सिर्फ़ हठधर्म है और कुछ भी नहीं।
आज भी एक साहब के साथ एक ही गाड़ी पर आने का इत्तेफ़ाक़ हुआ। वह जाट हैं और थाना दनकौर के गांव भट्टा पारसौल के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि हमारे गांव में मर्डर, लूट और चोरी नहीं होती। हमारे गांव में पुलिस आती है, हम उनका आदर करते हैं लेकिन हमारे गांव का कोई मुक़द्दमा थाने में नहीं लिखा जाता।
मैंने पूछा, तब तो आपके गांव की लड़कियां भी नहीं सताई जाती होंगी सुसराल में ?
उन्होंने बताया कि सवाल ही नहीं है। कहीं कोई शिकायत होती है तो तुरंत पहुंच जाते हैं ट्रैक्टर ट्रौली में भरकर सब के सब।

अनुकरणीय उदाहरण
उन्होंने यह भी बताया कि जब हमारे गांव में किसी ग़रीब आदमी की बेटी का ब्याह होता है तो हरेक घर से उसे चावल और कपड़ा वग़ैरह दिया जाता है। इसी तरह की उन्होंने और भी बातें बताईं जो कि वास्तव में अनुकरणीय हैं।
क्या उन्हें केवल इसलिए नहीं माना जाएगा कि बताने वाला आदमी जाट जाति से है ?
उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने बाबा रामदेव के बताए तरीक़े से अनुलोम-विलोम और कपालभांति प्राणायाम किया और उनका चश्मा उतर गया, उनका पेट भी ठीक हो गया।
ऐरौबिक्स और ऐनारौबिक्स एक्सरसाईज़ की तरह योग भी वाक़ई मुफ़ीद है बल्कि उनसे ज़्यादा मुफ़ीद है। यह केवल तन पर ही नहीं बल्कि मन पर भी असर डालता है। यूरोप और अमेरिका में हुई से रिसर्च से भी इस बात की तस्दीक़ हो चुकी है।
क्या योग को केवल इसलिए नकार दिया जाए कि इसे एक सन्यासी सिखा रहा है ?
लोग अपनी समस्याओं से परेशान हैं। उनकी समस्या का हल अगर योग में है तो क्यों न योग को अपनाया जाए ?
इसी तरह अगर इस्लाम के एकेश्वरवाद से मूर्तिपूजा और दूसरे आडम्बरों से मुक्ति मिल सकती है, विधवाओं का पुनर्विवाह आसान हो सकता है तो इस्लाम को अपनाने से क्यों हिचका जाए ?

Tuesday, October 26, 2010

An english lady accepts Islam and veil पश्चिम में इस्लाम तेज़ी से क्यों फैल रहा है ? - Anwer jamal

खुशख़बरी
‘चेरी ब्लेयर की बहन ने इस्लाम कुबूल किया‘ आज सुबह उठा तो यह खुशख़बरी दिखाई दी।                                                            (हिन्दुस्तान, 26.10.2010, पृष्ठ 16)
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की पत्नी चेरी ब्लेयर की सौतेली बहन लौरेन बूथ ईरान के दौरे पर गईं। उन्होंने वहां औरतों को देखा। वहां की सोसायटी में उनका आदर और उनकी सुरक्षा देखी। उनके पतियों को देखा कि न तो वे पीते हैं और न ही दीगर औरतों से अवैध संबंध वहां आम बात हैं। न वहां औरतें ही नंगी-अधनंगी घूमती हैं और न ही यूरोप की तरह अवैध संतानें वहां सोसायटी के लिए कोई मसला है। बलात्कार वहां होते नहीं और कोई कर ले वह ज़िन्दा बचता नहीं। उन्होंने देखा कि यह सब इस्लाम की बरकतें हैं। उन्होंने दौरे से वापस लौटकर इस्लाम कुबूल कर लिया। अख़बारों और न्यूज़ चैनल्स पर आज यही चर्चा का मुद्दा है।
पश्चिम में इस्लाम तेज़ी से क्यों फैल रहा है ?
‘डेली मेल‘ के अनुसार 43 साल की बूथ दो बच्चों की मां हैं। अब वह घर से बाहर निकलते समय हिजाब पहनती हैं। इसके साथ ही उन्होंने अब शराब पीना छोड़ दिया है और नियमित नमाज़ पढ़ने के साथ पवित्र कुरआन पढ़ती हैं। कभी ब्रिटेन में टेलीविज़न कलाकार रही बूथ अब ईरान के समाचार चैनल ‘प्रेस टीवी‘ के लिए काम कर रही हैं।
क्या आपने कभी सोचा है कि पश्चिम में इस्लाम तेज़ी से क्यों फैल रहा है ?
ख़ास तौर से औरतों में ?
वहां तो कोई औरंगज़ेब भी नहीं है और न ही इस्लाम कुबूल करने वाले ग़रीब और कमज़ोर वर्ग से हैं, तब भी वे धड़ाधड़ इस्लाम कुबूल कर रहे हैं, आखि़र क्यों ?
अमेरिका और यूरोप में आम आदमी भी इस्लाम कुबूल कर रहे हैं और ख़ास आदमी भी। चर्च बिक रहे हैं और उनमें मस्जिदें बन रही हैं। पिछले लगभग सवा सौ साल के अंदर ही ब्रिटेन में 1500 से भी ज़्यादा मस्जिदें बन चुकी हैं और लगातार बन रही हैं। टूटते हुए घरों और बिखरते हुए परिवारों को बचाने के लिए को बचाने के लिए लोग ईश्वर से जुड़ रहे हैं, ईश्वर से जुड़ने का एकमात्र अधिकृत मार्ग इस्लाम है। इसी धर्म का प्रचार पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. से पहले ईसा मसीह अ. ने किया था। इस बात को ईसाई दुनिया धीरे-धीरे जानती जा रही है।
सोहबत इन्सान के ज़हन के सोचने की दिशा बदल देती है
एक तरफ़ तो सच्चाई है कि जिन्होंने क्रिश्चिएनिटी में आंखे खोली वे औरतें नंगेपन को छोड़कर ‘हिजाब‘ अपना रही हैं और दूसरी तरफ बहन हमारी एक पत्रकार बहन ऐसी भी हैं जो इस्लाम जैसी दौलत की क़द्र न कर सकीं और खुद भी हिजाब छोड़ दिया और अपने पूरे घर की औरतों को बेहिजाब कर डाला और फिर इस पर गर्व भी किया और इसका प्रचार भी किया। ऐसा क्यों हुआ ?
लौरेन को अच्छी सोहबत मिली, वह अच्छी बन गई। पत्रकार बहन का रसूख़ अजमेर के बम धमाकेबाज़ों के कारण चर्चित किसी नेता से हो गया तो पर्दा उनके बदन से उतरकर उनके ज़हन पर पड़ गया और जैसी बातें ग़ैर-मुस्लिम करते हैं, इस्लाम के बारे में वैसी ही बातें वे करने लगीं। सोहबत इन्सान के ज़हन के सोचने की दिशा बदल देती है।
इन्सान की अक्ल पर अगर पर्दा पड़ जाए तो फिर वह सच को नहीं देख पाता। सच को झूठ साबित करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। ‘भंडाफोड़ू ब्लॉग के भाई बी. एन. शर्मा जी‘ भी एक ऐसे ही शख्स हैं जो अल्लामा इक़बाल बनने की सलाहियत रखते हैं लेकिन अपनी मेधा और ऊर्जा का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं।
हर रास्ता एक ही सच्चाई तक पहुंचाएगा
हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई को नकारने के लिए उन्होंने बाइबिल का सहारा लिया और बताया कि बाइबिल में हज़रत मुहम्मद स. को बुरा कहा गया है और माना कि बाइबिल की भविष्यवाणी उनके और उनके मानने वालों के बारे में पूरी हुई। हमें उनसे असहमति है लेकिन अगर वे बाइबिल की सच्चाई पर संतुष्ट हैं तो उन्हें यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करने में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर वे इस रास्ते पर भी चले तो वे देर-सवेर लौरेन बूथ की तरह अंतिम और शुद्ध सत्य को जान ही जाएंगे। लेकिन वे ईसाईयत को भी अपनाने वाले नहीं हैं क्योंकि उन्हें सच की तलाश नहीं है बल्कि इस्लाम के खि़लाफ़ भ्रम फैलाना है और इस्लाम के खि़लाफ़ नफ़रत में अंधे होकर वे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के बारे में बाइबिल से उद्धरण ला रहे हैं, वे भी ग़लत और सिर्फ़ ग़लत। नफ़रत में वे इस क़दर अंधे हो चुके हैं कि जिस प्रकाशित वाक्य से वे उद्धरण ला रहे हैं एक तो वह किसी पैग़म्बर की या मसीह की वाणी नहीं है और दूसरे यह कि वे बातें पैग़म्बर साहब स. के बारे में नहीं कही गईं और तीसरे वह किताब बाइबिल की अंतिम किताब है।
बाइबिल की पहली किताब है ‘उत्पत्ति‘। उत्पत्ति में, बिल्कुल शुरू में ही लिखा है कि -
‘और नूह किसानी करने लगा, और उसने दाख की बारी लगाई। और वह दाखमधु पीकर मतवाला हुआ और अपने तम्बू के भीतर नंगा हो गया। तब कनान के पिता हाम ने , अपने पिता को नंगा देखा और बाहर आकर अपने दोनों भाइयों को बतला दिया। (उत्पत्ति, 9, 20-22)
हज़रत नूह कौन हैं ?
वैदिक साहित्य में इन्हें ‘जल प्रलय वाले मनु‘ के नाम से जाना जाता है। सारी दुनिया इन्हें अपना पिता मानती है, इन्हें आदर देती है। यहूदी इन्हें शराबी बता रहे हैं और शर्मा जी उनकी हां में हां मिला रहे हैं। ईश्वर का मार्ग दिखाने वाले सत्पुरूषों का चरित्र बिगाड़ने में यहूदी और ईसाई दोनों एक से हैं। दोनों ने ही नबियों के चरित्र और उनकी शिक्षाओं को बिगाड़कर रख दिया। इन्होंने ईसा अ. के बारे में भी लिख दिया कि वे झूठ भी बोल दिया करते थे। (देखिए यूहन्ना, 7, 8-10)
यह अक्ल पर पर्दा पड़ना नहीं तो क्या है ?
कुरआन से पता चलता है ऋषियों-नबियों का सच्चा चरित्र और उनका असली धर्म
अपने ऋषियों का चरित्र और शिक्षाएं बिगाड़ने में हिन्दुओं ने इन दोनों को भी मात कर दिया।
ब्राह्मणों से हमें अच्छी उम्मीदें हैं। उन्हें अपने पिता पर आरोप लगाने वालों के साथ नहीं खड़ा होना चाहिए बल्कि उन्हें उनका साथ देना चाहिए जो उनके पिता पर लगने वाले आरोपों का खंडन करता है और उनकी पवित्रता और उनकी महानता की गवाही देता है। आपने बाइबिल पढ़ ही ली है, अब आप कुरआन भी पढ़ लीजिए और उसमें ‘महर्षि मनु‘ का ज़िक्र पढ़ लीजिए कि किस तरह वह उन पर लगने वाले हरेक आरोप का खण्डन कर रहा है, आपकी सारी नफ़रतें दूर हो जाएंगी। इसके बावजूद भी अगर आप पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की निन्दा और अपमान को ही अपना तरीक़ा बनाये रखते हैं तो अपने कर्मों के प्रति आप खुद जवाबदेह होंगे। तब आप ईश्वर से भी शर्मिंदा होंगे और अपने पिता मनु से भी।
यूहन्ना लैटिन भाषा जानते ही नहीं थे
भाई बी. एन. शर्मा जी ने जिस लैटिन शब्द के अंक 666 बनाए हैं। उसके बारे में भी यह जान लेना चाहिए कि जब यूहन्ना ने स्वप्न या दर्शन देखा था तो उसे उन्होंने आरामी या हिब्रू भाषा में बयान किया था न कि लैटिन में। लैटिन तो मसीह और उनके साथियों की भाषा थी ही नहीं। इसलिए अगर किसी नाम के अंक निकाले जाने चाहिएं तो वह नाम या शब्द हिब्रू भाषा का होना चाहिए न कि उसके अनुवाद की भाषा का। अगर अनुवाद की भाषाओं के शब्दों के अंक निकाले जाएंगे तो हरेक भाषा में अलग-अलग अंक मिलेंगे जो कि सिर्फ़ ग़लत होंगे जैसे कि आपके द्वारा निकाले गए अंक ग़लत हैं।
कीरोलोजी का आधार है ‘इल्मे जफ़र‘
दूसरी बात आपको यह भी जान लेनी चाहिए कि लैटिन अक्षरों के अंक ‘कीरो‘ ने निर्धारित किए हैं और उनके अक्षरों का मान निर्धारित करने के लिए उन्होंने हिब्रू और अरबी का अध्ययन किया क्योंकि इन भाषाओं में पहले से ही अक्षरों का मान निर्धारित चला आ रहा है। अरबी अंकशास्त्र के आधार पर अब कुछ ज्योतिषी साहिबान हिन्दी और संस्कृत के अक्षरों का भी मान निर्धारित करने की कोशिश कर रहे हैं। दुनिया में सारी विद्याएं भारत से फैलने का दावा करने वाले देख सकते हैं कि भारतीय भाषाओं में से किसी भी भाषा के अंकों का मान निर्धारित नहीं है। मुसलमानों के पास यह इल्म ‘इल्मे जफ़र‘ के नाम से मौजूद है और आली मक़ाम इमाम जनाब हज़रत जाफ़र रह. के नाम पर इसका नाम ‘इल्मे  जफ़र‘ पड़ा। इस इल्म में उनकी ख़ास महारत की वजह से ऐसा हुआ वर्ना यह इल्म उनसे पहले भी हरेक इमाम के पास मौजूद था।
ओउम के अंक क्या हैं ?
यही वजह है कि आज तक कोई हिन्दू ज्योतिषी या आचार्य यह नहीं बता सका कि ‘ओउम‘ शब्द के अंक कितने हैं जबकि यह नाम हिन्दू समाज में सबसे ज़्यादा बोला जाता है। एक मुसलमान जानता है कि ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम‘ के अदद 786 हैं। जो ज़्यादा जानता है वह आपको यह भी बता देगा कि ‘अल्लाह‘ नाम के अदद 66 हैं और ‘मुहम्मद‘ नाम के अदद 92 हैं। जो और ज़्यादा जानता है और भी ज़्यादा बता देगा बल्कि उन नामों के अदद भी बता देगा जिनके अदद आज तक किसी पण्डित और किसी ज्योतिषी ने न बताए हों।
ओउम के अंक हैं 47
जिन दिनों मैं ‘हाज़िरात का फ़न‘ सीख रहा था, उन दिनों मैं मुख्तलिफ़ नामों और आयतों के अंक निकाल कर उनके नक्श बनाया करता था और फिर अपने ‘मीडियम‘ पर उनका प्रयोग करता था। जो आत्मा, रूह और शैतान वग़ैरह को नहीं मानते वे इस अमल को देखकर यह जान सकते हैं कि हमारे अलावा भी कुछ चेतन शक्तियां हमारे चारों तरफ़ मौजूद रहती हैं।
बहरहाल वह एक अलग विषय है। अब से लगभग 10 साल पहले मैंने ‘ओउम‘ के अदद निकालने चाहे तो भारतीय ज्योतिष या साममुद्रिक शास्त्र से मुझे कोई मदद न मिली। तब मैंने ‘ओउम‘ को अरबी में लिखा तो तीन हरफ़ ज़ाहिर हुए-            1.  अलिफ़, 2.  वाओ, 3.   मीम
अलिफ़ का मान 1 है, वाओ का मान 6 है और मीम का मान है 40, इस तरह ‘ओउम‘ शब्द का मान मैंने अरबी अंकशास्त्र से मालूम किया तो उसका मान 47 निकला। तब मैंने उसका नक्श बनाया और अपने रूहानी तजर्बात में उसका इस्तेमाल किया।
ओउम की मान-मर्यादा
हिन्दू भाईयों को न तो ‘ओउम‘ का मान पता है और न ही वे उसकी मान-मर्यादा का ध्यान रखते हैं। धूप, अगरबत्ती, बोरी-कट्टों और कैलेण्डर्स पर यह नाम लिख देते हैं और फिर उन्हें फेंक देते हैं कूड़े पर। मैं देखता रहता हूं और कुढ़ता रहता हूं। एक मुसलमान यह नहीं करता लेकिन मुसलमानों से हिन्दुओं को ऐलानिया कुछ सीखना नहीं है, उनकी अच्छी बात भी नहीं सीखनी। मैं उन नामों को भी आदर देता हूं जो अरबी में हैं और उन नामों को भी जो दूसरी भाषाओं में हैं। वे नाम चाहे मालिक के हों या सत्पुरूषों के। देवबंद की बात है, आज से तक़रीबन 17 साल पहले की। मैं मुन्सफ़ी के ढलान से उतर रहा था कि मैंने एक कैलण्डर को नाली में पड़े देखा जिसपर ओउम लिखा था। मैंने उसे बड़े जतन से बाहर निकाला और उसमें से ‘ओउम‘ शब्द को अलग करके उसे एक मैदान की दीवार में सैट कर दिया ताकि इधर उधर किसी के पैरों में न आए।
भारतीय संस्कृति की रक्षा का सही तरीक़ा
भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद की रक्षा के नाम पर यह सब दुष्प्रचार किया जा रहा है लेकिन उनके दावे में कोई सच्चाई नहीं है। पहली बात तो यह है कि भारतीय संस्कृति आदर करना सिखाती है, निरादर करना नहीं। दूसरी बात यह है कि राष्ट्रवाद के ज़्यादातर दावेदार झूठे हैं। अगर वे अपने दावे में सच्चे होते तो वे भारतीय संस्कृति को अपनाते। भारतीय संस्कृति गुरूकुल की संस्कृति है। वे अपने बच्चों का उपनयन संस्कार कराते, उन्हें गुरूकुलों में पढ़ाते, उन्हें वेद और वेदान्त पढ़ाते लेकिन ये लोग अपने बच्चों को वहां नहीं पढ़ाते बल्कि उन्हें पढ़ाने के लिए आॅस्ट्रेलिया भेजते हैं, जहां वे वैसी ज़िल्लत झेलते हैं जैसी कि कभी खुद वे दूसरों को दिया करते थे। ज़िल्लत झेलने और अपनी जान देने वे अपनी औलादों को गाय काटने और उसे खाने वालों के देश तो भेजते हैं लेकिन अपने देश के गुरूकुलों में नहीं भेजते। वहां भेजने से पहले वे देश में ईसाई मिशनरियों की देखरेख में चलने वाले स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं और उनकी महंगी फ़ीस देने की हैसियत नहीं रखते वे खुद स्कूल खोलते हैं लेकिन उन्हीं गाय खाने वाले वेद निन्दकों के पैटर्न पर। अपने बच्चों को वेद पढ़ने के लिए नहीं भेजेंगे तो वेद का लोप तो होगा ही।
हिन्दुओं के घरों से वेदों के लोप होने का कारण
आज आप सौ हिन्दुओं से मिलिए, उनमें से एक के घर में भी वेद नहीं मिलेगा। हज़ार में से एक हिन्दू के घर में भी आज वेद मुश्किल से ही मिलेगा। पढ़ नहीं सकते तब भी ख़रीदकर तो रख सकते हैं। एक मुसलमान चाहे वह कुरआन पढ़ना जानता हो या न जानता हो लेकिन उसके घर में कुरआन ज़रूर मिलेगा। यही वजह है कि कुरआन आज सुरक्षित है। जिसे कुरआन याद है वह भी कुरआन रखता है और जिसे कुरआन याद नहीं है वह भी कुरआन रखता है। जिस चीज़ को आप अपनी संस्कृति का मूल मानते हैं जब आप उसकी रक्षा नहीं करेंगे तो उसका तो लोप होना निश्चित है। इसके दोषी तो आप खुद हैं। सिक्ख अगर केश रखने छोड़ दें तो केश का लोप हो जाएगा। आपने चोटी रखनी और जनेऊ पहननी छोड़ दी तो उनका लोप हो गया। औरंगज़ेब के समय में भी बल्कि अंग्रेज़ों के समय तक आप चोटी रखते और जनेऊ पहनते थे। इनका लोप तो आपने खुद किया आज़ादी के बाद, अपनी संस्कृति को मिटाने के मुजरिम आप खुद हैं और इल्ज़ाम दे रहे हैं मुसलमानों को ?
मुजरिम खुद हैं और दोष देते हैं मुसलमानों को
अपनी संस्कृति पर खुद आचरण नहीं करेंगे तो संस्कृति का क्षरण तो खुद होगा। चलिए अपनी संस्कृति पर, तब ही आप उसकी रक्षा कर पाएंगे। मुसलमानों के खि़लाफ़ नफ़रत और भ्रम फैलाकर आप अपनी संस्कृति की रक्षा नहीं कर पाएंगे। आप तो ऐसे बलशाली भी नहीं हैं जैसे कि पश्चिमी देश हैं। जिन पश्चिमी देशों का अंधानुकरण आप कर रहे हैं, खुद वे अपना रहे हैं इस्लाम को। वहां इस्लाम के खि़लाफ़ दुष्प्रचार यहां से ज़्यादा है लेकिन तब भी जिसे सत्य की तलाश है उन्हें कोई झूठ रोक नहीं पाता। लौरेन बूथ इसकी ज़िन्दा मिसाल हैं। जो लोग बाइबिल पढ़ रहे हैं और क्रूसेड लड़ रहे हैं, वे खुद इस्लाम की तरफ़ बढ़ रहे हैं।
लोगों के विचार की क़द्र करता है पश्चिम
एक ख़ास बात यह भी देखने की है कि ब्रिटेन ईरान के खि़लाफ़ है। इसके बावजूद जब एक ताक़तवर राजनैतिक घराने की औरत वहां इस्लाम कुबूल कर लेती है और तुरंत ही उसके विरोधी देश की समाचार एजेंसी के लिए काम करने लगती है, तब भी न तो उसे कोई देश का ग़द्दार कहता है और न ही वहां के दक्षिणपंथी धड़े उससे देश की वफ़ादारी का सुबूत मांगते हैं। यह उनकी बहुत सी खूबियों में से एक हैं जिनकी वजह से वे दुनिया पर राज कर रहे हैं। अफ़सोस कि लोगों को ‘पश्चिम‘ केवल बुराईयों का अड्डा नज़र आता है लेकिन उनकी खूबियां वे देख नहीं पाते। लोग या तो पश्चिम को कोसते रहते हैं या फिर उनकी बुराईयों को अपना शौक़ बना लेते हैं, जिन्हें वे खुद छोड़ रहे हैं।
आने वाले का स्वागत है और बाद में आने वालों के लिए प्रार्थना
विश्व भर के 153 करोड़ की आबादी के मुस्लिम परिवार में शामिल होने के उनके फ़ैसले का हम स्वागत करते हैं और जो आने में अभी झिझक रहे हैं उनके कल्याण के लिए परमप्रधान परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। मालिक हम सबको नफ़रत से मुक्ति दे और हमारे दिलों में अपना प्रेम दे और हमारे दिलों को सत्य के प्रकाश से जगमगा दे ताकि हम वह काम अंजाम दे सकें जिसके लिए उसने इस धरती पर हमें पैदा किया है।

Sunday, October 24, 2010

Ram in muslim poetry, third beam श्री रामचन्द्र जी ने दुनिया के सामने मां-बाप का हुक्म मानने का क़ाबिले-क़द्र नमूना पेश किया - Professor Yusuf saleem chishti

अल्लामा इक़बाल रहमतुल्लाह अलैह की नज़्म ‘राम‘ पर मैंने अपने कुछ ख़यालात पेश किए थे। अल्लामा की नज़्म की व्याख्या में प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती साहब ने भी बहुत अच्छे ख़यालात का इज़्हार किया है-
हिन्दुस्तान का जाम ‘शराबे हक़ीक़त‘ से लबरेज़ है, इसका मतलब है यह है कि हिन्दुस्तान के तत्वदर्शियों ने ‘सत्य की खोज‘ में बड़ी माअरकतुल आरा बहसें की हैं।
खि़त्ता ए मग़रिब से यूरोप मुराद है। वाज़ह हो कि यूरोप के फ़लसफ़ियों ने हिन्दुस्तान के फ़लसफ़े के मुख्तलिफ़ मदारिस से जिन्हें इस्तलाह में ‘दर्शन‘ कहते हैं, बहुत कुछ इस्तफ़ादह किया है और यहां के पुराने फ़लसफ़ियों की मन्तक़ी मूशगाफ़ियों का ऐतराफ़ किया है। मेरे ख़याल में ‘सत्य‘ विषयक बहसों में हिन्दी फ़लसफ़ियों ने बड़ी परिपक्व दृष्टि का सुबूत दिया है। चुनांचे यूरोप के फ़लसफ़ियों ने अभी तक कोई ऐसा फ़लसफ़ियाना नज़रिया पेश नहीं किया है जिसे हिन्दुस्तानी फ़लसफ़ियों ने किसी न किसी रंग में उससे पहले पेश न कर दिया हो। यही वजह है कि अल्लामा इक़बाल ने जो खुद भी एक ऊंचे दर्जे के फ़लसफ़ी थे और बक़ौल आरनॉल्ड पूर्व और पश्चिम के तमाम दार्शनिक चिंतन धाराओं पर गहरी नज़र रखते थे। हिन्दुस्तानी फ़लसफ़े की अज़्मत का इस शेर में ऐतराफ़ किया है।
‘राम ए हिन्द‘-राम में हक़ीक़त ए इब्हाम है क्योंकि इसके दो अर्थ हैं-
1. राम को संस्कृत का लफ़्ज़ क़रार दिया जाए तो यह एक शख्स का नाम है।
2. राम को फ़ारसी का लफ़्ज़ क़रार दिया जाए तो उसका अर्थ है ‘अधीन‘, ‘फ़रमांबरदार‘ यानि यूरोप के सारे दार्शनिक हिन्दुस्तानी फ़लसफ़े के प्रशंसक हैं। फ़िक्र ए फ़लक रस- आसमान तक पहुंचने की कूव्वत रखने वाली चिंतन शक्ति। स्पष्ट रहे कि ‘फ़िक्र‘ वह कूव्वत है जिसकी बदौलत इन्सान फ़लसफ़ियाना और मन्तक़ी मसाएल में ग़ौर व फ़िक्र कर सकता है। मलक ए सरिश्त- ऐसे नेक लोग जो फ़रिश्तों की तरह पाकीज़ा चरित्र रखते थे। अहले नज़र- अरबाब ए अक़्ल। ऐजाज़- मौजज़ा। राम को इक़बाल ने चराग़ ए हिदायत इसलिए कहा है कि उन्होंने हिन्दुस्तानियों को खुदापरस्ती सिखाई। धनी था यानि तलवारबाज़ी में माहिर था। फ़र्द यानि कि यकता।
तब्सरा- इक़बाल ने इस नज़्म में श्री रामचन्द्र जी की खि़दमत में खि़राजे तहसीन पेश किया है जिन्हें तमाम सनातन धर्मी हिन्दू ईश्वर का अवतार और श्री कृष्ण जी से भी ज़्यादा वाजिबुल अहतराम समझते हैं। इसीलिए अल्लामा इक़बाल ने यह लिखा है कि राम के वुजूद पर हिन्दुस्तान को नाज़ है। उनकी शख्सियत में बहुत सी खूबियां जमा थीं मस्लन वह बहुत बहादुर थे, पाक तबियत थे और अपने बाप के बहुत फ़रमांबरदार थे। चुनांचे उन्होंने अपने बाप के कहने से 14 साल के लिए वनवास ले लिया। तमाम तकलीफ़ों को बखुशी बर्दाश्त किया और दुनिया के सामने मां-बाप का हुक्म मानने का क़ाबिले-क़द्र नमूना पेश किया। (बांगे दिरा मय शरह, पृष्ठ 468-469 पर नज़्म ‘राम‘ की व्याख्या में प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती)

Thursday, October 21, 2010

Ram in muslim poetry, second beam चराग़ ए हिदायत और इमाम ए हिन्द हैं राम - Anwer Jamal

                राम
लबरेज़ है शराबे हक़ीक़त से जामे हिन्द         
सब फ़लसफ़ी हैं खि़त्ता ए मग़रिब के राम ए हिन्द
यह हिन्दियों के फ़िक्र ए फ़लक रस का है असर
रिफ़अ़त में आसमां से भी ऊंचा है बामे हिन्द
इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त
मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम ए हिन्द
है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द
ऐजाज़ उस चराग़ ए हिदायत का है यही
रौशनतर अज़ सहर है ज़माने में शाम ए हिन्द
तलवार का धनी था शुजाअत में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश ए मुहब्बत में फ़र्द था
      -बांगे दिरा मय शरह उर्दू से हिन्दी, पृष्ठ 467, एतक़ाद पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 2
शब्दार्थ- लबरेज़-लबालब भरा हुआ, शराबे हक़ीक़त-तत्वज्ञान, ईश्वरीय चेतना, आध्यात्मिक ज्ञान, खि़त्ता ए मग़रिब-पश्चिमी देश, राम ए हिन्द-हिन्दुस्तान के अधीन (‘राम‘ यहां फ़ारसी शब्द के तौर पर आया है जिसका अर्थ है आधिपत्य), फ़िक्र ए फ़लक रस-आसमान तक पहुंच रखने वाला चिंतन, रिफ़अत-ऊंचाई, बामे हिन्द-हिन्दुस्तान का मक़ाम, मलक सरिश्त-फ़रिश्तों जैसा निष्पाप, अहले नज़र-तत्वदृष्टि प्राप्त ज्ञानी, इमाम ए हिन्द-हिन्दुस्तान का रूहानी पेशवा, ऐजाज़-चमत्कार, चराग़ ए हिदायत-धर्म मार्ग दिखाने वाला दीपक, रौशनतर अज़ सहर-सुबह से भी ज़्यादा रौशन, शुजाअत-वीरता, पाकीज़गी-पवित्रता, फ़र्द-यकता, अपनी मिसाल आप
गागर में सागर
अल्लामा इक़बाल की यह नज़्म ‘गागर में सागर‘ का एक बेहतरीन नमूना है। इस एक नज़्म की व्याख्या के लिए एक पूरी किताब चाहिए, यह एक हक़ीक़त है। मस्लन इसमें ‘शराबे हक़ीक़त‘ से हिन्दुस्तानी दिलो-दिमाग़ को भरा हुआ बताया गया है। इसे नज़्म पढने वाला पढ़ेगा और गुज़र जाएगा लेकिन इस एक वाक्य का सही अर्थ वह तब तक नहीं समझ सकता जब तक कि वह यह न जान ले कि ‘शराबे हक़ीक़त‘ होती क्या चीज़ है ?
विश्व गुरू है भारत
अल्लामा इक़बाल ने कहा है कि पश्चिमी दार्शनिक सब के सब भारत के अधीन हैं। इस वाक्य की गहराई जानने के लिए आदमी की नज़र पश्चिमी दर्शन पर होना ज़रूरी है और साथ ही उसे भारतीय दर्शन की भी गहरी जानकारी होना ज़रूरी है। तब ही वह अल्लामा के कथन की सच्चाई को जान पाएगा। उनका यह वाक्य केवल भारत का महिमागान नहीं है बल्कि एक तथ्य जिसे वे बयान कर रहे हैं। प्रोफ़ेसर आरनॉल्ड ने कहा है कि अल्लामा इक़बाल पूर्व और पश्चिम के सभी दार्शनिक मतों पर गहरी नज़र रखते थे। बांगे दिरा की शरह में प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती साहब ने लिखा है कि यूरोप के दार्शनिकों ने हिन्दुस्तानी फ़लसफ़े के विभिन्न मतों से जिन्हें इस्तलाह में ‘दर्शन‘ कहते हैं, बहुत कुछ इस्तफ़ादह किया है। (पृष्ठ 468)
राम शब्द की व्यापकता
‘राम ए हिन्द‘ वाक्य में उन्होंने एक अजीब लुत्फ़ पैदा कर दिया है क्योंकि यहां उन्होंने ‘राम‘ शब्द को एक फ़ारसी शब्द के तौर पर इस्तेमाल किया है। फ़ारसी में ‘राम‘ कहते हैं किसी को अपने अधीन करने को। इस तरह वे ‘राम‘ शब्द की व्यापकता को भी बता रहे हैं और यह भी दिखा रहे हैं कि ‘राम‘ केवल हिन्दी-संस्कृत भाषा और हिन्दुस्तान की भौगोलिक सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है।
निष्कलंक है राम का चरित्र
अल्लामा हिन्दुस्तानियों के चिंतन को ‘फ़लक रस‘ अर्थात आसमान तक पहुंचने की ताक़त रखने वाला बता रहे हैं और इसी की वजह से वे हिन्दुस्तान के मक़ाम को आसमान से भी ऊंचा कह रहे हैं। हिन्दुस्तान की शोहरत की एक वजह वे यह बता रहे हैं कि हिन्दुस्तान में केवल ऊंचे दर्जे का दर्शन ही नहीं है बल्कि सदाचार की मिसाल क़ायम करने वाले ऐसे लोग भी इस देश में हुए हैं जिनका व्यक्तित्व फ़रिश्तों जैसा निष्कलंक और निष्पाप था और उनकी तादाद भी दो-चार नहीं बल्कि हज़ारों है।
अल्लामा इस भूमिका के बाद मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचन्द्र जी का परिचय कराते हैं। वे कहते हैं कि उनके वुजूद पर हिन्दुस्तान को नाज़ है। ‘अहले नज़र‘ उन्हें ‘इमाम ए हिन्द‘ समझते हैं। इस वाक्य को समझने के लिए आदमी को पहले ‘अहले नज़र‘ और ‘इमाम‘, इन दो शब्दों के अर्थ को समझना पड़ेगा। ‘अहले नज़र‘ का शाब्दिक अर्थ तो है ‘नज़र वाले आदमी‘ लेकिन यहां ‘नज़र‘ से तात्पर्य आंख की नज़र नहीं है बल्कि ‘रूहानी नज़र‘ है। ‘अहले नज़र‘ से मुराद ऐसे लोग हैं जिन्हें ‘बोध‘ प्राप्त है, जो सही बात को ग़लत बात से अलग करके देखने की योग्यता रखते हैं। ‘इमाम‘ का शाब्दिक अर्थ तो ‘नेतृत्व करने वाला‘ होता है लेकिन यहां ‘इमाम‘ से मुराद है ‘रूहानी पेशवा‘ जो लोगों को सच्चाई और नेकी का रास्ता दिखाए। ‘इमाम ए हिन्द‘ का अर्थ यह हुआ कि उनका आदर्श सारे हिन्दुस्तान को सच्चाई और नेकी का रास्ता दिखा रहा है।
राम को पहचानने के लिए चाहिए ‘ज्ञानदृष्टि‘
हक़ीक़त यह है कि श्री रामचन्द्र जी को ‘इमाम ए हिन्द‘ केवल वही समझ सकता है जो ‘अहले नज़र‘ है। जो ‘अहले नज़र‘ नहीं है वह सही बात को ग़लत बात से अलग करके नहीं देखेगा और इसके दो ही नतीजे होंगे।
1. अगर आदमी उनके बारे में लिखी गई बातों को ज्यों का त्यों सही मान लेगा तो वह उन्हें ईश्वर का अवतार अर्थात मानव रूप में स्वयं ईश्वर ही मान लेगा।
2. दूसरा नतीजा यह होगा कि वह श्री रामचन्द्र जी को औरतों और शूद्रों के साथ जुल्म और ज़्यादती करने वाला समझ बैठेगा। यह भी तभी होगा जबकि पाठक उनके बारे में लिखी गई हरेक बात को ज्यों का त्यों सही मान ले। दलित साहित्य में विशेषकर यही देखने में आता है।
राम मर्यादा पुरूषोत्तम थे, इमाम ए हिन्द थे
ये दोनों ही बातें ग़लत हैं। सच्चाई इनके दरम्यान है। श्री रामचन्द्र जी न तो ईश्वर थे और न ही कोई ज़ालिम या पक्षपाती राजा। वे ‘इमाम ए हिन्द‘ थे, वे हिन्दुस्तान के नायक थे, वास्तव में वे मर्यादा पुरूषोत्तम थे। अल्लामा इक़बाल द्वारा श्री रामचन्द्र जी को ‘इमाम ए हिन्द‘ कहा जाना यह सिद्ध करता है कि अल्लामा खुद भी ‘अहले नज़र‘ थे।
श्री रामचन्द्र जी के वुजूद पर हिन्दुस्तानियों को नाज़ है। यह सही है, हरेक आदमी यह दावा कर सकता है कि उसे भी उन पन नाज़ है, गर्व है क्योंकि साधारण हैसियत का आदमी अपनी किसी बात पर तो गर्व कर नहीं सकता। सो वह खुद को किसी बड़े आदमी से या किसी बड़ी चीज़ से जोड़ लेता है जिसकी बड़ाई को दुनिया मानती हो। इस तरह वह केवल अपने अहंकार को ही तुष्ट करता है लेकिन श्री रामचन्द्र जी केवल गर्व की चीज़ ही नहीं हैं बल्कि ‘इमाम ए हिन्द‘ भी हैं, वे अपने अमल से एक आदर्श भी पेश करते हैं जिसपर चलना अनिवार्य है। जो उनके मार्ग पर नहीं चलता वह उन्हें अपना आदर्श भी नहीं मानता। वह झूठा है, वह समाज को ही नहीं बल्कि खुद अपने आप को भी धोखा दे रहा है।
मां-बाप की आज्ञाकारिता से मिलते हैं बुलंद मर्तबे
श्री रामचन्द्र जी के आदर्श में बहुत सी खूबियां हैं लेकिन सबसे ज़्यादा उभरी हुई खूबी है उनका आज्ञाकारी होना। केवल अपने पिता का ही नहीं बल्कि अपनी माता का भी और केवल अपनी सगी मां का ही नहीं बल्कि अपनी सौतेली मां का भी। वे चाहते तो अपने माता-पिता की आज्ञा नहीं भी मान सकते थे बल्कि उनके पिता राजा दशरथ ने तो उन्हें जंगल में जाने की आज्ञा दी ही नहीं थी, वे चाहते तो रूक सकते थे अयोध्या में लेकिन वे नहीं रूके। वे जंगल में चले गए। इस तरह उन्होंने भाइयों के बीच के उस आपसी टकराव को टाल दिया जो उनके बहुत बाद महाभारत काल में दिखाई दिया। आज भी भाई का भाई से टकराव एक बड़ी समस्या है, सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में। यह टकराव टाला जा सकता है लेकिन बड़े भाई को वन में जाना होगा। ‘बड़ा भाई‘ आज वन में जाने के लिए तैयार नहीं है लेकिन फिर भी कहता है कि उसे गर्व है श्री रामचन्द्र जी पर, अजीब विडम्बना है।
चराग़ ए हिदायत हैं राम
अल्लामा ने श्री रामचन्द्र जी को ‘इमाम ए हिन्द‘ कहने के बाद ‘चराग़ ए हिदायत‘ भी कहा है। ‘हिदायत‘ का शाब्दिक अर्थ तो ‘मार्गदर्शन‘ है लेकिन यहां ‘हिदायत‘ से उनका तात्पर्य ‘ईश्वर के धर्म का मार्ग दिखाने‘ से है। वे कहते हैं कि यह श्री रामचन्द्र जी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव है कि आज जब भारत का वैभव पहले जैसा नहीं रहा तब भी हिन्दुस्तान की शाम भी ज़माने भर की सुबह की ज़्यादा से रौशन है, तेजोमय है।
अपनी खूबियों में बेमिसाल हैं राम
अल्लामा इक़बाल श्री रामचन्द्र जी को ‘फ़र्द‘ कहते हैं वीरता में, पाकीज़गी में और मुहब्बत में और वे उन्हें तलवार का धनी भी बताते हैं। ‘फ़र्द‘ उस आदमी को कहा जाता है जो किसी खूबी में अपनी मिसाल आप हो, वह खूबी उस दर्जे में उस समय किसी में भी न पाई जाती हो। अल्लामा ने तीन गुण उनके गिनाए हैं वीरता, पवित्रता और प्रेम। दरअस्ल अल्लामा ने तीन गुण नहीं गिनाए हैं बल्कि सारे गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन गुणों का ज़िक्र किया है। मस्लन वीरता से रक्षा करने का गुण भी जुड़ा हुआ है। पवित्रता के साथ ईश्वर और धर्म का बोध, कर्तव्य का बोध और निर्वाह भी लाज़िमी तौर पर जुड़ा हुआ है। प्रेम के साथ शांति और धैर्य भी स्वभाव में पाए जाएंगे क्योंकि इनके बिना प्रेम संभव ही नहीं है और प्रेमी त्याग और बलिदान के गुणों से युक्त भी मिलेगा क्योंकि प्रेम बलिदान मांगता है। जितना बड़ा बलिदान होगा उतना बड़ा दर्जा होगा प्रेम करने वाले का।
प्रेम और बलिदान से मिलती है अमरता
इनसान को अमर करने वाली चीज़ वास्तव में बलिदान ही है। प्रेम एक जज़्बा है, जो दिल में छिपा रहता है, दुनिया उसे देख नहीं सकती लेकिन दुनिया बलिदान को देख सकती है। देखी हुई चीज़ को भुलाना आदमी के लिए मुमकिन नहीं होता। यही कारण है कि श्री रामचन्द्र जी के बलिदान को भुलाना हिन्दुस्तानियों के लिए आज तक मुमकिन न हो सका। उनका बलिदान कोई मजबूरीवश किया गया काम नहीं था क्योंकि अल्लामा इक़बाल उन्हें ‘तलवार का धनी‘ कहते हैं। ‘तलवार का धनी‘ एक मशहूर हिन्दी कहावत है जिसे वीर सैनिक के लिए बोला जाता है। श्री रामचन्द्र जी को मर्यादा पुरूषोत्तम बनाने वाले यही गुण हैं।
अच्छाई के प्रतीक हैं राम
ये गुण आज भी ज़रूरी हैं। इन्हीं गुणों की बदौलत वे भारतीय समाज में अच्छाई के प्रतीक बन गये हैं और उनके विरूद्ध लड़ने वाले रावण को बुरा और बुराई का प्रतीक माना जाता है। राम की सराहना होती है और रावण की निन्दा। राम जी की बारात और जुलूस निकाले जाते हैं जबकि रावण को जलाया जाता है हर साल। हर साल रावण को जलाने बावजूद भारतीय समाज में जुर्म और पाप लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। यह नज़्म अंग्रेजी शासन काल में लिखी गई थी और आज भारत आज़ाद है लेकिन तब से अब तक जुल्म और गुनाह में इज़ाफ़ा ही हुआ है। ऐसा क्यों हुआ ?
बुराई में इज़ाफ़ा क्यों हुआ ?
ऐसा इसलिए हुआ कि लोगों ने सिर्फ़ प्रतीक को जलाया, रावण को नहीं। लोग अपनों से प्रेम न कर सके, अपने लालच की बलि न दे सके, वे राम के रास्ते पर दो पग भी न धर सके। वे राममय न हो सके। जीवन में वे राम के पक्ष में न लड़ सके। नतीजा यह हुआ कि रावण के सैनिक बनकर रह गए और वे रावण को बलवान बनाते चले गए और उन्हें इसकी चेतना भी न हो सकी। यही कारण बना भारत के पतन का, उसके गौरव सूर्य के अस्त होने का।
रामनीति से होगा भारत का पुनरूत्थान
भारत में ज्ञान की कमी नहीं है। हिन्दुस्तानी पात्र ‘शराबे हक़ीक़त‘ से लबालब भरा हुआ है। भारतीयों में संभावनाएं और योग्ताएं भी ऐसी हैं कि उनका चिंतन ‘आकाश‘ छू चुका है। जो पहले हो चुका है उसे फिर से दोहराना कुछ मुश्किल नहीं है लेकिन अपनी लड़ाई हमें आप लड़नी होगी। राम ने खुद संघर्ष किया, अब आपकी बारी है, आपको भी खुद ही संघर्ष करना होगा। संघर्ष तो करना ही होगा और हरेक इन्सान कर भी रहा है क्योंकि जीवन में संघर्ष के सिवा और है भी क्या ? लेकिन अगर वह संघर्ष रामनीति के तहत नहीं है, राम के पवित्र आदर्श को सामने रखकर नहीं किया जा रहा है तो वह रावण को बलशाली बना रहा है। वह राम के खि़लाफ़ लड़ रहा है और जो राम के खि़लाफ़ लड़ेगा वह कभी जीतने वाला नहीं क्योंकि वह राम के खि़लाफ़ नहीं बल्कि वास्तव में ईश्वर के खि़लाफ़ लड़ रहा है।
क्या है रामनीति ?
ईश्वर इस सारे ब्रह्माण्ड का राजा है। इन्सानों को उसी ने पैदा किया और उन्हें राज्य भी दिया और शक्ति भी दी। सत्य और न्याय की चेतना उनके अंतःकरण में पैवस्त कर दी। किसी को उसने थोड़ी ज़मीन पर अधिकार दिया और किसी को ज़्यादा ज़मीन पर। एक परिवार भी एक पूरा राज्य होता है और सारा राज्य भी एक ही परिवार होता है। ‘रामनीति‘ यही है। जब तक राजनीति रामनीति के अधीन रहती है, राज्य रामराज्य बना रहता है और जब वह रामनीति से अपना दामन छुड़ा लेती है तो वह रावणनीति बन जाती है।
सत्य के लिए संघर्ष करना ही जिहाद है
सत्य और न्याय हरेक मनुष्य की चेतना का अखण्ड भाग है। जो आदमी सत्य और न्याय के लिए लड़ता है, दरअस्ल वह ईश्वर के लिए लड़ता है, जिहाद की वास्तविकता भी यही है और जो आदमी उसके खि़लाफ़ लड़ता है दरअस्ल वह सत्य और न्याय के विरूद्ध लड़ता है, वह सत्य और न्याय की रक्षा का नियम बनाने वाले ईश्वर के विरूद्ध लड़ता है। जो अपनी आत्मा के विरूद्ध लड़ता है, वह परमात्मा के विरूद्ध लड़ता है, परमेश्वर के विरूद्ध लड़ता है क्योंकि ईश्वर सत्य है और जहां कहीं भी सत्य है वह ईश्वर की ही ओर से है। जो प्रकट सत्य के विरूद्ध खड़ा होगा वह नज़र की पकड़ से बुलन्द महान सत्य को कभी पा नहीं सकता, उसका हरेक यज्ञ, उसका हरेक कर्म अन्ततः असफल हो जाएगा और उसे केवल अपयश ही दिलाएगा। रावण को भी यही मिला था और जो आज उसके गुणधारी बने हुए हैं उनका अंजाम भी इसके सिवाय कुछ होने वाला नहीं है और यही हो रहा है।
प्रेम की शक्ति से प्रकट होते हैं राम
‘राम नाम मुक्ति देता है‘ यह सही बात है लेकिन कब और कैसे देता है यह राम नाम मुक्ति ?
राम का नाम राम की याद दिलाता है, उनके काम की याद दिलाता है। राम के नाम को उनके काम से जोड़कर देखना होगा और जब आपके सामने वैसी ही परिस्थिति आए तो आपको वही करना होगा जो कि श्री रामचन्द्र जी ने किया था। आप क्या खो रहे हैं यह नहीं देखना है बल्कि देखना यह है कि आप श्री राम को पा रहे हैं। श्री राम आपके दिल से निकल आपके कर्मों में प्रकट हो रहे हैं। प्रेम से ऐसे ही प्रकट होते हैं श्री राम। श्री राम ही क्या , एक प्रेमी अपने प्रेम की शक्ति से जिसे चाहे, जब चाहे प्रकट कर ले, लेकिन उसे देखने के लिए भी नज़र प्रेम की ही चाहिए। जिसके पास यह नज़र होती है उसे ही ‘अहले नज़र‘ कहा जाता है। जिसके पास यह नज़र नहीं है, वह अंधा है, वह ‘चराग़ ए हिदायत‘ की रौशनी से कुछ फ़ायदा नहीं उठा सकता।
घर को आग लग रही है घर के चराग़ से
अंधा आदमी चराग़ लेकर घर में घूमे तो घर भर में आग ज़रूर लगा देगा। शक्ति का एक पहलू सृजन का होता है और दूसरा विनाश का। अगर शक्ति से काम लेने वाला व्यक्ति कुशल नहीं है तो वह सृजन नहीं कर सकता अलबत्ता अपनी उल्टी-सीधी छेड़छाड़ के कारण विनाश और तबाही ज़रूर ले आता है।
‘राम नाम में अपार शक्ति मौजूद है‘ लेकिन अक्ल के अंधे इससे वैमनस्य और विध्वंस फैला रहे हैं। अक्ल को अंधा बनाता है लालच। लालच में अंधा होने के बाद आदमी अपने भाई को भी नहीं पहचानता। जो लोग आज कुर्सी और शोहरत के लालच में राम-नाम ले रहे हैं, उन्हें जानना चाहिए कि इन चीज़ों को तो खुद श्री राम ने त्याग दिया था। इस त्याग से ही लालच का अंत होता है, अक्ल का अंधापन दूर होता है। तभी आदमी ‘राम नाम की अपार शक्ति‘ का सही इस्तेमाल कर पाता है।
क्या है राम नाम की अपार शक्ति ?
भौतिक शक्ति में अभी तक परमाणु की शक्ति को सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है लेकिन यह शक्ति केवल दुनिया में उजाला फैला सकती है लेकिन इन्सान के अंदर उजाला फैलाने की ताक़त इसमें नहीं है। ‘राम नाम‘ इन्सान के अंदर भी उजाला कर देता है। ‘हिदायत‘ खुद एक नूर है और श्री राम ‘हिदायत‘ के चराग़ हैं। अभी तक कोई ऐसी भौतिक शक्ति नहीं है जो आदमी का दिल बदल दे, उसे बुरे इन्सान से एक अच्छा इन्सान बना दे। ‘राम नाम‘ में यह ताक़त मौजूद है कि एक बुरे इन्सान को एक बिल्कुल नया इन्सान बना दे। खुद श्री रामचन्द्र की ज़िन्दगी में जो उजाला था वह भी ‘राम नाम‘ ही उजाला तो था।
राम नाम का रौशन रहस्य
‘राम नाम‘ के साथ ‘चन्द्र‘ शब्द जुड़ने के बाद उनका नाम बनता है। चन्द्रमा उजाला देता है रात में जबकि लोग भटक रहे होते हैं अंधकार में। चन्द्रमा दिशा और रास्ता भी बताता है रात में। चन्द्रमा रौशनी देता है लेकिन यह रौशनी उसकी अपनी नहीं होती बल्कि वह स्वयं रौशनी लेता है सूर्य से। सूर्य अर्थात सविता जो कि परमेश्वर का नाम है और ‘राम‘ भी उसी का नाम है। नाम अपने अंदर पूरी कथा समाए हुए है। यह भी ‘राम नाम‘ की अद्भुत महिमा है।
राजा दशरथ के चार पुत्र थे।
1. रामचन्द्र 2. लक्ष्मण 3. भरत 4. शत्रुघ्न
क्या आपने कभी ग़ौर किया है कि रखने को तो नाम केवल ‘राम‘ भी रखा जा सकता था उनका जैसे ‘भरत‘ नाम भी एक पुत्र का उन्होंने रखा था। एक शब्द को छोड़कर दो शब्दों को योग क्यों रखा राजा दशरथ ने या जिस भी ज्ञानी ने उन्हें यह नाम सुझाया हो, उसने आसान नाम को छोड़कर जटिल नाम क्यों रखा ?
आज भी जनता अपने मुख-सुख के लिए उन्हें ‘राम‘ ही तो कहती है।
आज उनका नाम ‘रामचन्द्र‘ होने के बावजूद लोग श्रद्धा में अति करके उन्हें ईश्वर कह रहे हैं अगर उनका नाम ‘राम‘ ही होता तो फिर लोगों के भ्रमित होने की एक वजह और बढ़ जाती। इसीलिए राजा दशरथ को जिस भी ज्ञानी ने उनका नाम ‘रामचन्द्र‘ रखने की सलाह दी, उसकी सलाह बिल्कुल सही थी और उनके व्यक्तित्व के लिए यह नाम बिल्कुल उपयुक्त है। चन्द्र का आधार सूर्य है, रामचन्द्र जी का आधार परमेश्वर है। ईशमय जीवन, राममय जीवन ही जीवन है। रामचन्द्र जी का जीवन राममय था तभी वे ‘चराग़ ए हिदायत‘ बन सके।
एक भूल जिसे दुनिया में बार बार दोहराया गया
इस देश में हज़ारों ‘मलक सरिश्त‘ अर्थात निष्पाप और एक ईश्वर के प्रति समर्पित लोग हुए हैं, श्री रामचन्द्र जी को अल्लामा इक़बाल ने उन्हीं लोगों में से एक बताया है। बहुत बार ज़माने में ऐसा हुआ कि लोगों ने फ़रिश्तों और देवताओं को ईश्वर ही कह दिया। अपने राजाओं को ईश्वर कह दिया, अपने महापुरूषों को ईश्वर कह दिया। जो उनके प्रति श्रद्धावान थे उन्होंने अपनी श्रद्धा में अति की और ऐसा भी हुआ कि जो उनसे विपरीत मत रखते थे उन्होंने दुनिया भर के ऐब उनसे जोड़कर प्रचारित कर दिए, यहां तक कि उन्हें सामान्य आदमी जैसे चरित्र का समझना भी दुश्वार हो गया। श्री रामचन्द्र जी के साथ भी ज़माने ने यही किया। कुछ लोगों ने उन्हें ईश्वर का अवतार कह डाला और कुछ लोगों ने ग़लत फ़ैसलों और जुल्म को उनसे जोड़कर उनपर सितम कर दिया। अब जो साहित्य उपलब्ध है, उसमें ये दोनों बातें मौजूद मिलती हैं लेकिन कोई भी ‘अहले नज़र‘ इनसे परेशान नहीं होता क्योंकि उसे ज़माने के दस्तूर का पता होता है कि वह हमेशा से ‘मलक सरिश्त‘ लोगों के साथ यही तो करता आया है।
श्री रामचन्द्र जी का ज़माना बहुत पुराना है बल्कि ठीक से तय ही नहीं किया जा सकता है कि वे कब और किस जगह पैदा हुए थे ?
ज्ञान पाने के लिए चाहिए एक निष्पक्ष विवेचना
उन्हें समझने के लिए हम दूसरे ‘मलक सरिश्त‘ लोगों का इतिहास देखते हैं तो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी पर नज़र जाती है। उनके मानने वालों ने उन्हें ईश्वर का पुत्र और ईश्वर ही बना दिया और उनके विरोधियों ने उनपर ईशनिन्दा का इल्ज़ाम ‘साबित‘ कर दिया। (मरकुस, 14, 64)
उनका इतिहास लिखने वालों ने यही बातें उनके इतिहास में लिख डालीं। ऐसा केवल अति के कारण हुआ। एक वर्ग ने उनके साथ प्रेम करने में अति की और दूसरे वर्ग ने अपने लालच में उनसे नफ़रत में अति की। दोनों ही सच्चाई से दूर जा पड़े। लेकिन ‘अहले नज़र‘ जानते हैं कि सच्चाई वास्तव में क्या है ?
इतिहास के विकृत हो जाने से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की शान में कोई कमी नहीं आ जाती। वह तो वैसी ही रहती है लेकिन लोगों के ज्ञान की परीक्षा ज़रूर हो जाती है। परीक्षा ज्ञान के बल पर ही दी जा सकती है और सफल भी केवल ज्ञानी ही हो सकता है। पुस्तकों को मात्र पढ़ लेना ही ‘ज्ञान‘ नहीं होता। बहुत कुछ ‘बिटवीन द लाइन्स‘ होता है, उसे भी समझना होता है। ‘ज्ञान‘ एक ईश्वरीय वरदान है जिसके लिए सच्ची लगन और सतत् अभ्यास चाहिए, तथ्यों की निष्पक्ष विवेचना करने के लिए मन को तैयार करना पड़ता है, तब कहीं जाकर प्रकट होता है ‘ज्ञान‘।
मोमिन देखता है खुदा के नूर से
एक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ही क्या, आज किसी भी ‘मलिक सरिश्त‘ आदमी की जीवनी पढ़ लीजिए जिसे उनके मानने वालों ने ही लिखा हो, इस तरह की बातें आपको सब जगह मिल जाएंगी। ‘अहले नज़र‘ इनमें मौजूद ‘तत्व‘ को पहचानते हैं। वे पहचानने में भूल नहीं करते क्योंकि वे ‘खुदा के नूर‘ से देखते हैं।
हज़रत मुहम्मद स. ने फ़रमाया-‘इत्तक़ू फ़िरासतिल मोमिन फ़इन्नहु यन्ज़ुरू बिनूरिल्लाह‘ अर्थात ईमान वाले की पहचानने की सलाहियत से डरो क्योंकि वह ‘अल्लाह के नूर‘ से देखता है। अल्लाह का नूर है कुरआन, जो फ़ुरक़ान भी है अर्थात सही और ग़लत में फ़र्क़ करने वाली कसौटी, इसमें पिछली क़ौमों के हाल भी हैं और उनके आमाल भी। पिछले नबियों और नेक लोगों का ज़िक्र भी है और उनकी क़ौमों ने उनके जाने के बाद क्या किया ? यह सब भी उसमें मौजूद है और इसी के साथ यह बिल्कुल साफ़ साफ़ लिखा है कि हक़ीक़त क्या है ?, सत्य क्या है ?
कुरआन खुदा का नूर है
जिनके चिंतन का आधार परमेश्वर का ज्ञान हो वे सही और ग़लत में भेद करने की सलाहियत भी रखते हैं और सत्य की कसौटी भी और सबसे बढ़कर पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के रूप में एक आदर्श मार्गदर्शक भी जो खुद एक ‘मलिक सरिश्त‘ इन्सान थे। जो उन्हें नहीं जानता वह किसी ‘मलिक सरिश्त‘ को कभी उसकी सही हैसियत और उसके सही रूप में पहचान ही नहीं सकता। यह मानव जाति का सौभाग्य है ‘परमेश्वर का ज्ञान‘ कुरआन के रूप में सुरक्षित है और जो चाहे वह ‘परमेश्वर का प्रकाश‘ में चीज़ों को उनके वास्तविक रूप में देख सकता है।
शायरी के लिबास में हक़ीक़त का इज़्हार 
अल्लामा इक़बाल ने श्री रामचन्द्र की तारीफ़ में जो कुछ कहा है, उसे महज़ एक शायर की बड़ कहकर नहीं टाला जा सकता। जो लोग इक़बाल रह. से वाक़िफ़ हैं वे जानते हैं कि वे एक मोमिन थे और एक सच्चे आशिक़े रसूल भी। कुरआन उनकी चिंतन की बुनियाद था और उसी की तरफ़ वे लोगों को बुलाते रहे। अपने दौर के उतार चढ़ाव को वे हमेशा खुदाई उसूलों की रौशनी में देखा करते थे। शिया-सुन्नी और हनफ़ी-सलफ़ी सभी मस्लकों के आलिम अल्लामा इक़बाल के क़द्रदान हैं। मुसलमानों के साथ ही वे हिन्दुस्तान के हरेक तबक़े में लोकप्रिय हैं। पश्चिमी देशों में भी अल्लामा इक़बाल को खूब सराहना मिली और अब तक मिल रही है। यह नज़्म उनके शुरूआती दौर की रचना भी नहीं है। इन सब बातों के मद्दे नज़र इक़बाल के कथन की अहमियत को समझा जाना चाहिए। 
ईमान वाले ब्राह्मण थे अल्लामा इक़बाल
इक़बाल एक मोमिन तो थे ही, नस्ल से ब्राह्मण भी थे। बारीक बातों को समझने में एक ब्राह्मण को ख़ास क़ाबिलियत हासिल होती है। सदियों का इतिहास खुद उसके वुजूद में ही पैवस्त होता है। ‘ज्ञान‘ को समझने के लिए उसके अंदर एक ख़ास योग्यता होती है। अल्लामा इक़बाल एक ब्राह्मण की इल्मी क़ाबिलियत का खुला सुबूत हंै। उनकी क़ाबिलियत उनकी नज़्म के वज़्न को और भी ज़्यादा बढ़ा देता है। जो बात उन्होंने कही है उसे केवल इक़बाल ही कह सकते थे, किसी और के बस की बात भी नहीं है क्योंकि मामला निहायत नाजुक है। मामले की नज़ाकत को एक मोमिन और एक शायर बखूबी समझता है।
निष्कर्ष यह है कि यह नज़्म ‘शराबे हक़ीक़त‘ से लबरेज़ है। अगर इसके अर्थों पर ग़ौर किया जाए तो भारत में एक नई सुबह का आग़ाज़ हो सकता है।
नज़्म में पोशीदा है भारत के गौरव की वापसी का पूरा प्लान
खुद अल्लामा इक़बाल उस नई सुबह की पहली किरण हैं। उनकी शख्सियत के अंदर एक ब्राह्मण और एक मुसलमान एक साथ जमा हैं। हिन्दू चिंतन और इस्लामी गुणों को एक जगह कैसे जमा किया जाए ? इस पर एक लम्बे अर्से से विचार किया जा रहा है और बहुत से ‘गुरूओं‘ की कोशिशें भी कीं, जिनके कारण बहुत से मतों के संस्करण भी हिन्दुस्तानी समाज में ज़ाहिर हुए हैं लेकिन उनकी वजह से समाज में एकता नहीं आई बल्कि एक नया मत और बढ़ गया। इस काम को सबसे ज़्यादा खूबसूरती से अल्लामा इक़बाल ने अंजाम दिया है। उनकी वजह से कोई नया मत खड़ा नहीं हुआ। अल्लामा का यह एक ऐसा कारनामा है जिस पर अभी तक शायद किसी की नज़र नहीं गई है। इसे ज़ाहिर होने में शायद अभी वक्त लगेगा।
अल्लामा इक़बाल एक रामप्रेमी ब्राह्मण मुसलमान हैं, उनकी अनोखी शख्सियत भी वास्तव में ‘फ़र्द‘ है। उन्होंने इस नज़्म की शक्ल में उर्दू शायरी को एक बेमिसाल रचना दी है। यह रचना जब तक रहेगी तब तक वह उर्दू-हिन्दी और हिन्दू-मुस्लिम के दरम्यान उठने वाली दीवारों की बुनियाद को हिलाती रहेगी। यहां तक कि ये दीवारें आखि़रकार गिरेंगी और बिखरी हुई भारतीय जाति अपने ‘एकत्व‘ को जान ही लेगी। अपने गौरवमयी अतीत की वापसी के लिए छटपटाती भारतीय जाति के लिए यह नज़्म चराग़ ए हिदायत की हैसियत रखती है लेकिन इसे केवल ‘अहले नज़र‘ ही जान सकते हैं।

Tuesday, October 19, 2010

Ram in muslim poetry , first beam राम (नज़्म) - अल्लामा इक़बाल

लबरेज़ है शराबे हक़ीक़त से जामे हिन्द

सब फ़लसफ़ी हैं खि़त्ता ए मग़रिब के राम ए हिन्द

यह हिन्दियों के फ़िक्र ए फ़लक रस का है असर

रिफ़अ़त में आसमां से भी ऊंचा है बामे हिन्द

इस देस में हुए हैं हज़ारों मलिक सरिश्त

मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम ए हिन्द

है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़

अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द

ऐजाज़ उस चराग़ ए हिदायत का है यही

रौशनतर अज़ सहर है ज़माने में शाम ए हिन्द

तलवार का धनी था शुजाअत में फ़र्द था

पाकीज़गी में जोश ए मुहब्बत में फ़र्द था

                              -बांगे दिरा मय शरह

शब्दार्थ- लबरेज़-लबालब भरा हुआ, शराबे हक़ीक़त-तत्वज्ञान, ईश्वरीय चेतना, आध्यात्मिक ज्ञान, खि़त्ता ए मग़रिब-पश्चिमी देश, राम ए हिन्द-हिन्दुस्तान के अधीन ,‘राम‘ यहां फ़ारसी शब्द के तौर पर आया है जिसका अर्थ है आधिपत्य, फ़िक्र ए फ़लक रस-आसमान तक पहुंच रखने वाला चिंतन, रिफ़अत-ऊंचाई,बामे हिन्द-मक़ामे हिंद , मलिक सरिश्त-फरिश्तों जैसे चरित्र वाले , अहले नज़र-नज़र वाले यानि जिन्हें अंतर्दृष्टि प्राप्त है , इमाम ए हिन्द-हिनुस्तान का नायक ,ऐजाज़-चमत्कार ,चराग़ ए हिदायत-हिदायत का चराग़ यानि ईश्वरीय मार्ग दिखने वाला ,रौशनतर अज़ सहर-सुबह से ज्यादा रौशन ,शुजाअत-वीरता , पाकीज़गी-पवित्रता , फ़र्द-यकता, अपनी मिसाल आप

Sunday, October 17, 2010

The very first lesson of Ayodhya judgement मालिक का दरबार सजेगा तभी सबको इन्साफ़ मिलेगा - Anwer Jamal

परमेश्वर कहता है-
1. मालिकि यौमिद्-दीन
अर्थात मालिक है इन्साफ़ के दिन का।
                                      (अलफ़ातिहा, 3)
2. अलयौमा तुज्ज़ा कुल्लू नफ़्सिम बिमा कसबत
अर्थात आज के दिन हर जान को उसके किए का बदला दिया जाएगा। (मोमिन, 17)
3. यौमा ला युग़नी अन्हुम कैदुहुम शैअंव वला हुम युन्सरून
अर्थात वह दिन ऐसा होगा कि उनकी तदबीर से उनका कुछ काम न बन सकेगा और उनकी मदद भी कहीं से न की जाएगी। (तूर, 46)
4. हाज़ा यौमुल फ़स्ल जमअनाकुम वल अव्वलीन
अर्थात यह फ़ैसले का दिन आ गया है, हमने तुम्हें और तुमसे पहले लोगों को इकठ्ठा कर लिया है।                (मुर्सलात, 38)
5. वैलुयं-यौमैइज़िल्लिल मुकज़-ज़िबीन
अर्थात हमारी बात को झूठ मानने वाले उस दिन बड़ी ख़राबी (दुरावस्था) में होंगे। (मुर्सलात, 34)
6. लियौमिन उज्जिलत, लियौमिल फ़स्ल, वमा अदराका मा यौमुल फ़स्ल, वैलुयं यौमैइज़िल्लिल मुकज़-ज़िबीन
अर्थात किस दिन के लिए सबका मुक़द्दमा मुल्तवी था ?, फ़ैसले के दिन के लिए।
तुम्हें क्या मालूम कि फ़ैसले का दिन क्या होगा ?, झुठलाने वालों के लिए यह दिन सर्वनाश पूरी बर्बादी लाएगा। (मुर्सलात, 12-15)

अयोध्या विवाद पर अदालती फ़ैसला और जन प्रतिक्रियाएं
अयोध्या विवाद अदालत में लम्बित था। उसकी सुनवाई इतने बरसों तक चली कि अपील करने वाले और उसका जवाब देने वाले दोनों ही पक्षों के लोग चल बसे और उनके वारिसों ने उसका फ़ैसला सुना। दोनों ही पक्ष मुतमइन नहीं हैं फ़ैसले पर। रामलला पक्ष मानता है कि ज़मीन पर मस्जिद वालों का क़ब्ज़ा नाजायज़ है उन्हें एक तिहाई भी क्यों दिया जा रहा है ?
दूसरी तरफ़ मस्जिद वालों का कहना है कि मस्जिद पूरी तरह जायज़ तरीक़े से बनी है, उसमें मूर्ति रखे जाने के दिन तक लगातार नमाज़ अदा हो रही थी। उसमें नाजायज़ तरीक़े से मूर्तियां रख दी गईं और फिर इबादतख़ाने को इबादत से महरूम कर दिया गया। अगर मस्जिद नाजायज़ तरीक़े से बनी थी तो फिर मस्जिद के लिए एक तिहाई जगह भी क्यों दी जा रही है ?

फ़ैसला या इन्साफ़ ?
दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं। दोनों पक्षों की ज़ोर आज़माई अदालत में भी चली और अदालत के बाहर भी। माल भी लुटा और इज़्ज़तें भी, जान भी गई और आपस का यक़ीन भी गया। सब कुछ हुआ और फिर लगभग 60 बरस बाद फ़ैसला भी आया। फ़ैसला तो आ गया लेकिन दोनों ही पक्ष कहते हैं कि हमें ‘इन्साफ़‘ नहीं मिला।

इन्साफ़ होगा ‘इन्साफ़ के दिन‘
दुनिया में फ़ैसला ही होता है, इन्साफ़ नहीं। इन्साफ़ तो सिर्फ़ ‘इन्साफ़ के दिन‘ होगा। जब फ़ैसला करने वाला खुद ‘मालिक‘ होगा और वह अगले-पिछले तमाम लोगों को इकठ्ठा करेगा। वहां रामचन्द्र जी भी होंगे और वे लोग भी जो उनके जन्म लेने के समय मौजूद थे, अगर उन्होंने वास्तव में जन्म लिया था तो। वहां बाबर भी होगा और मीर बाक़ी भी और मस्जिद बनाने वाले कारीगर भी। तभी सही फ़ैसला होगा कि रामजन्म भूमि वास्तव में कहां थी ? और क्या मस्जिद बनाने के लिए किसी मन्दिर को तोड़ा गया ? या फिर मन्दिर बनाने के लिए मस्जिद तोड़ी गई ?
किसी ने मन्दिर लूटे तो क्यों लूटे ? किसी ने मस्जिद तोड़ी तो क्यों तोड़ी ?
किसी ने किसी की इज़्ज़त लूटी तो क्यों लूटी ? किसी को मारा तो क्यों मारा ?
उस दिन सिर्फ़ फ़ैसला ही नहीं होगा बल्कि ‘इन्साफ़‘ भी होगा। जो कि यहां हो नहीं सकता। किसी भी बलवे में मारे गए लोगों के वारिसों को आज तक यहां इन्साफ़ नहीं मिला। इन्साफ़ तो छोड़िए मारने वालों की शिनाख्त तक नहीं हो पाई।

दुनिया का दस्तूर है ‘माइट इज़ राइट‘
मुसलमानों को शिकायत है कि उनसे भेदभाव किया गया लेकिन ऐसा नहीं है। सन् 1984 के दंगों में तो उन्होंने उन्हें मारा था जिन्हें वे अपना अंग, अपना खून मानते हैं। वे आज तक न्याय की आस में भटक रहे हैं। वे दलितों को मारते आए, औरतों को जलाते आए उन्हें कब इन्साफ़ मिला ?
दलितों और औरतों को बचाने के स्पेशल क़ानून बनाए गए तो उनकी चपेट में फिर बेक़सूर लोग फंसे और वे जेल गए। सवर्णों को ही कब इन्साफ़ मिलता है यहां ?
क़ाबिलियत के बावजूद एक सवर्ण बाहर कर दिया जाता है और उससे कम क़ाबिल आदमी को ‘पद‘ दे दिया जाता है।

हर तरफ़ ज़ुल्म हर जगह सितम
जुल्म और सितम को सिर्फ़ हिन्दुओं या हिन्दुस्तान से देखकर जोड़ना खुद एक जुल्म है। कितने ही वैज्ञानिकों को ईसाईयों ने जला डाला, लाखों प्रोटैस्टेंट ईसाईयों को क़त्ल कर दिया गया। जुल्म को रोकने के लिए मालिक ने हमेशा अपने पैग़म्बर भेजे। लेकिन लोगों ने खुद उन पर भी जुल्म किया। उन्हें या तो क़त्ल कर डाला या फिर देश से निकाल दिया। जिन लोगों ने उन्हें माना, उन्होंने भी उनकी बात को भुला दिया, उनकी बात को न माना, हां उनके गीत-भजन गाते गाते उन्हें ईश्वर का दर्जा ज़रूर दे दिया। यह भी एक जुल्म है कि उनकी शिक्षाओं को ही बदल दिया। यह जुल्म सिर्फ़ मालिक के दूतों के प्रति ही नहीं है बल्कि खुद मालिक का भी हक़ मारा, उसपर भी जुल्म किया।

दावा इस्लाम का और तरीक़ा ज़ुल्म का ?
दुनिया के अंत में मालिक ने फिर दुनिया वालों पर अपनी दया की और अंतिम पैग़म्बर स. को भेजा कि वे लोगों को याद दिलाएं कि एक दिन ऐसा आनेवाला है जिस दिन कोई किसी की मदद न कर सकेगा, हरेक वही काटेगा जो कि उसने बोया होगा। इसलिए कल जो काटना चाहते हो, आज वही बोओ। लेकिन लोगों ने उन पर भी जुल्म किया और उनकी आल-औलाद पर भी। उनके साथियों पर भी जुल्म किया और उनके नाम लेवाओं पर भी और फिर जुल्म की इन्तेहा तो तब हो गई जब उनके नाम लेवाओं ने भी जुल्म करना शुरू कर दिया और इससे भी बढ़कर जुल्म यह हुआ कि जुल्म को ‘जिहाद‘ का नाम दे दिया गया और कहा गया कि हम कुरआन का हुक्म पूरा कर रहे हैं।
आज पाकिस्तान में मस्जिदों और दरगाहों में बम बरस रहे हैं। कौन बरसा रहा है ये बम ?

इस्लाम के खि़लाफ़ है आतंकवाद
कुरआन तो कहता है कि ‘जिहाद‘ करते हुए हरे-भरे पेड़ भी मत काटिए, सन्यासियों को मत मारिए और दूसरी क़ौमों के पूजागृहों को मत तोड़िए फिर ये कौन लोग हैं जो कहते हैं कि हमारा अमल धर्म है ?
कम मुसलमान हैं जो दहशतगर्दी को इस्लाम से जोड़ते हैं लेकिन फ़िरक़ों में बंटे हुए तो लगभग सभी हैं।
दीन को बांटोगे, खुदा के हुक्म को टालोगे तो फिर उसकी तरफ़ से मदद उतरेगी या अज़ाब ?

हक़ मारने वाले हक़परस्त कैसे ?
हक़ मारने का रिवाज भी आम है।
कितने मुसलमान हैं जो हिसाब लगाकर ज़कात देते हैं ?
ज़कात देने वाले तो फिर भी बहुत हैं लेकिन कितने मुसलमान हैं जो अपनी लड़कियों को जायदाद में वह हिस्सा देते हैं जो मालिक ने कुरआन में निश्चित किया है ?
हक़ मारना जुल्म है। अपनी ही औलाद का हक़ मारकर मर रहे हैं मुसलमान।
ज़ाहिरी तौर पर नमाज़, रोज़ा और हज कर भी रहे हैं तो सिर्फ़ एक रस्म की तरह। खुदा के सामने पूरी तरह झुकने की और बन्दों के हक़ अदा करने की भावना का प्रायः लोप सा है।
इन्सान पर खुद अपना भी हक़ है
इन्सान पर खुद अपनी जान का भी हक़ है कि अपनी जान को जहन्नम की आग से बचाए और इसके लिए खुद को हिदायत पर चलाए। इन्सान पर उसके पड़ौसी का भी हक़ है कि जैसा वह खुद को आग और तबाही से बचाना चाहता है वैसा ही उन्हें भी बचाने की ताकीद करे।
कितने मुसलमान हैं जो अपने पड़ोसियों को जहन्नम की आग से बचाने के लिए तड़पते हों ?
कितने मुसलमान ऐसे हैं जो अपने पड़ोसियों की हिदायत और भलाई के लिए दुआ करते हों ?

‘मुहम्मद‘ स. के तरीक़ा रहमत का तरीक़ा है
हज़रत मुहम्मद स. को रसूल और आदर्श मानने का मतलब यही है कि हम उनके अमल के मुताबिक़ अमल करें। उनकी दुआओं को देखिए। वे उमर के लिए दुआ कर रहे हैं।
कौन उमर ?
वे उमर जो उनकी जान लेने के लिए घूम रहे हैं।
और एक उमर ही क्या वहां तो पूरी क़ौम ही उनकी जान लेने पर तुली हुई थी लेकिन उनकी हिदायत के लिए प्यारे नबी स. रात-रात भर खड़े होकर दुआ किया करते थे।
हज़रत मुहम्मद स. को इस दुनिया में कब इन्साफ़ मिला ?
लेकिन आपने हमेशा इन्साफ़ किया
इन्साफ़ ही नहीं बल्कि ‘अहसान‘ किया।

ज़ालिम दुश्मनों को माफ़ करने का बेमिसाल आदर्श
उनके प्यारे चाचा हम्ज़ा को क़त्ल करने वाले हब्शी और नफ़रत में उनका कलेजा चबाने वाली हिन्दा को क़त्ल करने से उन्हें किस चीज़ ने रोका ?
सिर्फ़ खुदा की उस रहमत ने जो कि खुद उनका मिज़ाज था।
उनके अलावा और कौन है जो अच्छे अमल का इतना ऊंचा और सच्चा नमूना पेश कर सके ?
इतिहास देखिए और मौजूदा दौर भी देख लीजिए। आपको ऐसा अमल कहीं न मिलेगा। इतिहास में न मिले तो शायरी में ही ढूंढ लीजिए। एक मुल्क की शायरी में नहीं सारी दुनिया के काव्यों-महाकाव्यों में देख लीजिए। कवियों की कल्पना भी ऐसे ऊंचे आदर्श की कल्पना से आपको कोरी मिलेगी जैसा कि पैग़म्बर मुहम्मद स. ने अपने अमल से समाज के सामने सचमुच साकार किया।

बेमिसाल माफ़ी, बेमिसाल बख्शिश का बेनज़ीर आदर्श
प्यार-मुहब्बत, रहमत-हमदर्दी, दुआ-माफ़ी, सब्र-शुक्र, इन्साफ़-अहसान, और खुदा की याद ग़र्ज़ यह कि कौन की खूबी ऐसी थी जो उनमें नहीं थी। उन्हें मक्का में क़त्ल करने के लिए हरेक क़बीले का एक नौजवान लिया गया। 360 जवान घर के बाहर क़त्ल के लिए जमा हो गए। उन्होंने मक्का छोड़ दिया लेकिन अपना मक़सद, मिज़ाज और तरीक़ा नहीं छोड़ा। बाद में जब मक्का फ़तह हुआ तब भी उन्होंने अपनी वे जायदादें तक न लीं जिन्हें उनसे सिर्फ़ इसलिए छीन लिया गया था कि वे उनकी मूर्तियों को पूजने के लिए तैयार न थे। सिर्फ़ उन्होंने ही नहीं बल्कि उनक साथियों ने भी नहीं लीं। इस धरती पर पहली बार ऐसा हुआ कि जब किसी विजेता ने अपने दुश्मनों की ज़मीन जायदाद पर क़ब्ज़ा नहीं जमाया बल्कि खुद अपनी जायदादें भी उन्हीं पर छोड़ दीं।

‘मार्ग‘ को ठुकराओगे तो मंज़िल कैसे पाओगे ?
इन्साफ़ का दिन आएगा तो उस दिन सिर्फ़ हिन्दुओं या सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों का ही इन्साफ़ न किया जाएगा बल्कि मुसलमानों के आमाल को भी देखा-परखा और जांचा जाएगा। मुसलमानों को चाहिए कि वे आज ही देख लें कि आज वे क्या बो रहे हैं ? क्योंकि उन्हें वही काटना है जो आज बो रहे हैं।
और हिन्दू भाई भी किसी ग़फ़लत में न रहें। मुसलमानों की बदअमली को मालिक के हुक्म से जोड़कर वे अपने हुनर का सुबूत तो दे सकते हैं लेकिन यह मालिक के संदेश के साथ सरासर अन्याय है, बुद्धि का दुरूपयोग है, ‘मार्ग‘ को ही ठुकरा दोगे तो फिर मार्ग कहां से पाओगे ?

मालिक का दरबार सजेगा तभी सबको इन्साफ़ मिलेगा
मुसलमानों से हिसाब ही चुकता करना है तो उसके लिए दूसरे बहुत तरीक़े हैं लेकिन उनकी नफ़रत में ‘सत्य‘ से मुंह मोड़ना तो हिन्दू धर्म में भी जायज़ नहीं है।
अयोध्या का फ़ैसला बता रहा है कि यह दुनिया मुकम्मल नहीं है और न ही यहां का फ़ैसला मुकम्मल है। दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाना चाहते हैं। जहां चाहे चले जाएं लेकिन वे दुनिया की प्रकृति को तो नहीं बदल सकते। मन्दिर-मस्जिद का फ़ैसला जो चाहे हो लेकिन उनके लपेटे आकर मरने वाले मासूमों को इन्साफ़ देना दुनिया की किसी भी अदालत के बस में नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें इन्साफ़ मिलेगा ही नहीं। उन्हें इन्साफ़ ज़रूर मिलेगा चाहे इसके लिए दुनिया की प्रकृति को ही क्यों न बदलना पड़े ?
चाहे इस धरती की गोद में सोने वालों को एक साथ ही क्यों न जगाया जाए ?
चाहे मालिक को खुद ही क्यों न आना पड़े ?
और उसे सामने आना ही पड़ेगा क्योंकि इतना बड़ा काम केवल वही कर सकता है।

इन्सान के काम में झलकता है मालिक का नाम
यही वह समय होगा जब आदमी वह पाएगा जिसके लायक़ उसने खुद को बनाया होगा।
जो थोड़े में ईमानदार रहा होगा उसे ज़्यादा दिया जाएगा और जिसने थोड़े को भी बर्बाद करके रख दिया होगा उसे और अवसर न दिया जाएगा।
आज ज़मीन पर उसका नाम लेने वाले, उसके नाम पर झूमने वाले बहुत हैं। बहुत लोग हैं जो खुद को नामधारी कहते हैं लेकिन सिर्फ़ ज़बान से उसका नाम लेना ही उसके नाम को धारण करना नहीं होता बल्कि उसके नाम को इस तरह अपने मिज़ाज में समा लेना कि अमल से छलकें उसके गुण, यह होता है ‘नाम‘ को धारण करना। फिर नाम ही नहीं उसके पैग़ाम को भी धारण करना होता है।

किसके पास है मालिक का पैग़ाम ?
जिसका दावा हो कि उसके पास है। उसकी ज़िम्मेदारी है कि बिना कुछ घटाए-बढ़ाए वह दुनिया को बताए कि यह है तुम्हारे मालिक का हुक्म, तुम्हारे लिए।
मेरे पास है मालिक का हुक्म पवित्र कुरआन की शक्ल में।
जो आज इसे लेने से हिचकेगा, कल वह मालिक को अपने इन्कार की वजह खुद बताएगा।
अगर आपके पास इससे बेहतर कुछ और है तो लाइये उसे और पेश कीजिए मेरे सामने।
दुनिया को बांटिए मत, इसे जोड़िए।

हर समस्या का एक ही समाधान
लोग परेशान हैं। दुनिया जुए, शराब, व्यभिचार और ब्याज से परेशान है। दुनिया भूख और ग़रीबी से परेशान है। छोड़ दी गईं औरतें और विधवाएं परेशान हैं। अमीर-ग़रीब सब परेशान हैं, वे अपनी समस्याओं का हल आज चाहते हैं।
जिसके पास मालिक की वाणी है उसके पास इन सबकी समस्याओं का हल भी है। मालिक की वाणी का यह एक मुख्य लक्षण है, जिस वाणी में यह पूरा हो, जिसमें कुछ घटा न हो, कुछ बढ़ा न हो, उसे मान लीजिए मालिक की वाणी और उसका हुक्म।
मिलकर चलना ही होगा
मिलकर सोचो, मिलकर मानो तो उद्धार होगा।
अदालत के फ़ैसले के बाद भी तो हिन्दू-मुस्लिम आज मिलकर ही सोच रहे हैं।
जनता चाहती है कि मिलकर सोचो।
मालिक भी चाहता है कि मिलकर सोचो।
मिलकर सोचो, मिलाकर सोचो।
अपने अपने ग्रंथ लाकर सोचो।
आज नहीं सोचोगे तो बाद में सोचना पड़ेगा।
दुनिया में नहीं सोचोगे तो परलोक में सोचना पड़ेगा।
बस अन्तर केवल यह है कि आज का सोचा हुआ काम आएगा और उस दिन का सोचना सिर्फ़ अफ़सोस करने के लिए होगा।

ईश्वर साक्षी है आपके कर्मों का
इन्साफ़ का दिन क़रीब है और मालिक तो आज भी क़रीब है।
वह साक्षी है आपके हरेक कर्म का, आपके हरेक विचार का।
उसे साक्षी मान लीजिए और निष्पक्ष होकर विचार करना सीख लीजिए।
जो ज्ञान आपके अन्तःकरण में है वह आप पर प्रकट हो जाएगा और जो ज्ञान दृश्यमान जगत में है वह भी आपको सुलभ हो जाएगा।
आपको वही मिलेगा जो आप ढूंढ रहे हैं।
क्या आपको क्लियर है कि आप क्या ढूंढ रहे हैं ?
क्या आप जानते हैं कि आप क्यों जी रहे हैं ?
क्या आप जानते हैं कि आप अपने हरेक कर्म के लिए उत्तरदायी हैं ?

परलोक में सफलता का लक्ष्य सामने रखते है सच्चे सत्कर्मी
क्या आप जानते हैं कि आपको परलोक में अपने कर्मों का फल भोगना ही होगा ?
यह दुनिया कर्म की दुनिया है और आने वाली दुनिया अंजाम की दुनिया है।
हमारा अंजाम क्या होने वाला है, यह हम जान सकते हैं अपने आज के कर्म देखकर।
लोग शिकायत करते हैं कि ‘आज नेक परेशान हैं और ज़ालिम मगन हैं।‘
इसे देखकर वे भी गुनाह पर दिलेर हो जाते हैं। हालांकि यही चीज़ बता रही है कि ज़रूर ऐसा होना चाहिए कि नेक लोगों को उनका वाजिब हक़ मिले। यहां नहीं मिल रहा है तो कहीं और ज़रूर मिलेगा।
नबियों और उनके नेक साथियों की ज़िन्दगियां देख लीजिए। उन्होंने कभी नेकी यह सोचकर नहीं की कि उनकी नेकियों का बदला उन्हें दुनिया में ही मिल जाए।
कर्मों का फल कब और कैसे मिलता है ?

परलोक के चिंतन मिटा देता है हरेक निराशा, हरेक पाप
इस बात का इन्सान के चरित्र-निर्माण में बहुत बड़ा दख़ल है। जो लोग इसे नज़रअन्दाज़ करके समाज से ईमानदारी और नैतिकता की उम्मीद करते हैं। वे मानवीय स्वभाव को नहीं जानते। ईश्वर ने मानव का स्वभाव ही ऐसा बनाया है कि वह पहले फल का विचार करता है तत्पश्चात उसे पाने के लिए वह मेहनत करता है। परलोक का सिद्धांत इन्सान के बहुत से सवालों को और समाज की सारी समस्याओं को हल करता है। इसीलिए परलोक का विश्वास हमेशा से धर्म का अंग रहा है। अब इसे अपने विचार और कर्म का अंग बनाने की भी ज़रूरत है।

‘सत्यमेव जयते‘ साकार होगा परलोक में
‘जो भी भले काम करके आया उसे उसकी नेकी का बेहतर से बेहतर बदला और अच्छे से अच्छा अज्र (बदला) मिलेगा और उस दिन की दहशत से उनको अमन में रखा जाएगा। और जो कोई भी अपने काले करतूत के साथ आएगा, ऐसों को औंधे मुंह आग में झोंक दिया जाएगा और कहा जाएगा कि तुम्हारे बुरे कामों की क्या ही भारी सज़ा से आज तुमको पाला पड़ गया है।
                                                                                  (कुरआन, 28, 89 व 90)
                                              अनुवाद कुरआन मजीद- मौलाना अब्दुल करीम पारीख साहब रह.

Thursday, October 14, 2010

Hunger free India क्या भूखों की समस्या और उपासना पद्धतियों में कोई संबंध है ? - Anwer Jamal

पाकिस्तान से पीछे है भारत
‘भारत में कमज़ोर बच्चों की तादाद सबसे ज़्यादा‘ यह शीर्षक एक समाचार का है जो दैनिक जागरण में दिनांक 13.10.10 को पृ. 24 पर प्रकाशित हुई। ख़बर में बताया गया है कि भुखमरी से लड़ने के मामले में भारत चीन और पाकिस्तान से भी पीछे है। वाशिंगटन स्थित अतंर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान द्वारा भुखमरी से लड़ने के मामले में 84 देशों में भारत का 67वां स्थान है। इस सूची में चीन नौवें और पाकिस्तान 52वें स्थान पर है।
भारत सबल है, सक्षम है और इसकी विकास दर भी पाकिस्तान से बेहतर है जबकि पाकिस्तान बदहाल है, आतंकी शिकंजे में जकड़ा हुआ और विदेशी क़र्ज़ में आकंठ से कुछ ज़्यादा ही डूबा हुआ भी है। अगर चीन की बात जाने दें तो भी यह सवाल खड़ा होता है कि पाकिस्तान और भारत दोनों देशों के नेता-जनता एक जैसे ‘चरित्र‘ के मालिक हैं, तब पाकिस्तान आगे क्यों और भारत पीछे क्यों ?
पाकिस्तान और भारत में आज भी है सांस्कृतिक एकता
विकास कार्यों में भारतीय नेताओं, अफ़सरों और ठेकेदारों की ही तरह पाकिस्तानी नेता, अफ़सर और ठेकेदार भी लेते हैं। विदेश में खाते भी दोनों ही तरफ़ के लोगों के हैं और दोनों ही तरफ़ के लोगों के नाम आज तक ‘डिस्क्लोज़‘ भी नहीं हुए। सरकारी बाबू भी दोनों ही तरफ़ रिश्वत लेते हैं। दीन-धर्म पर दोनों ही तरफ़ के लोग प्रायः नहीं चलते। मात्र कुछ कर्मकांडों को ही धर्म मान लिया गया है या फिर धर्म था भी तो उसे भी मात्र रस्म बना दिया गया।
पाकिस्तान राजनीतिक विभाजन के बावजूद सांस्कृतिक रूप से आज भी भारत का अभिन्न अंग है और बांग्लादेश भी लेकिन बात यहां पाकिस्तान की चल रही है। दोनों देशों की भाषा-संस्कृति आज भी एक है। कुछ लोग बताते हैं कि दोनों देशों में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है सिवाय इसके कि पाकिस्तान में मुसलमान बहुसंख्यक हैं जबकि भारत में बहुसंख्यक हिन्दू हैं और दोनों के ज़्यादातर लोगों के ‘चरित्र‘ में भी अधिक अंतर नहीं है। अलबत्ता एक अंतर वे भी मानते हैं जो अनेकता में एकता के दर्शन करते हैं। वे कहते हैं कि मुसलमानों की उपासना पद्धति ‘भारतीय उपासना पद्धति‘ से भिन्न है।
1. लेकिन क्या उपासना पद्धति का भूखों की भूख और आत्महत्या से कोई संबंध हो सकता है ?
2. क्या भारत की उपासना पद्धति भारत को पीछे धकेल रही है ?

क्या भूखों की समस्या और उपासना पद्धतियों में कोई संबंध है ?
संयोग से या फिर दैवयोग से इस सवाल का जवाब भी हमें इसी दिन और इसी समय मिल गया और वह भी एक ख़बर के ही माध्यम से। हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के पृष्ठ 11 पर अयोध्या की एक ख़बर यह भी छपी थी कि ‘हल नहीं होने देना चाहतीं बाहरी ताक़तें  : अंसारी‘। साथ में एक फ़ोटो भी छपा है जिसमें रामलला पक्ष के डा. रामविलास वेदान्ती जी के साथ हाशिम अंसारी साहब और गुजरात से आये तीन मुस्लिम धर्मगुरूओं ने एक बाल्टी पकड़े हुए हैं वे सभी सद्भावना की मिसाल पेश करते हुए सरयू नदी में दूध अर्पित कर रहे हैं।
पौराणिक और वेदांती लोग दूध-फल नदियों में बहाएंगे तो देशवासी क्या खाएंगे ?
ऐसे हालात में भारतीयों में भुखमरी और कुपोषण फैलना तो स्वाभाविक ही है।
भारतीय उपासना पद्धतियों के नाना रूप
आग और पानी को ज़्यादातर हिन्दू भाई देवता मानते हैं, नदियों को वे देवी मानते हैं। उनकी कृपा पाने के लिए वे उनकी पूजा करते हैं और उनकी पूजा में वे खाने-पीने की चीज़ें आग-पानी में डालते रहते हैं। ऐसा वे करोड़ों-अरबों वर्षों से करते आ रहे हैं, ऐसा उनका दावा है। इसी को वे भारतीय उपासना पद्धति कहते हैं। देवी-देवताओं को खुश करने के लिए वे सोना-चांदी भी भेंट करते हैं और कभी कभी तो वे बच्चों की बलि भी उन्हें चढ़ा देते हैं बल्कि कोई भक्त तो अपनी जीभ वग़ैरह खुद काटकर भी देवी को चढ़ा बैठता है। औघड़ और तांत्रिक तो देवी उपासना के नाम पर शराब पीकर मैथुन भी करते हैं और चिताओं से हिन्दुओं की जलती लाशें निकालकर भी खा जाते हैं। ये सब भी भारतीय उपासना पद्धति के अन्तर्गत गिनी जाती हैं।
अनेकता में एकता
पौराणिकों और वेदान्तियों की मज़ाक़ उड़ाने वाले वैदिक आर्य भाई भी ‘आग में घी‘ डालते हैं और साथ में नारियल आदि अन्य चीज़ें भी। इसे वे ‘यज्ञ‘ कहते हैं और बताते हैं कि ऐसा लगभग एक अरब सत्तानवें करोड़ साल से भी ज़्यादा समय से करते आ रहे हैं। आजकल ‘यज्ञ‘ करने का रिवाज काफ़ी कम हो गया है लेकिन वे चाहते हैं कि वे विश्व के लगभग 7 करोड़ लोगों में सभी को ‘आर्य‘ बना दें और सभी आर्य बनकर ‘यज्ञ‘ किया करें अर्थात खाने-पीने की चीज़ें खुद न खाकर अग्नि को अर्पित किया करें।

ग़रीब कैसे करे यज्ञ ?
ख़ैर विश्व ने तो उनकी बात सुनी नहीं लेकिन देश में कुछ लोगों ने ज़रूर उनकी बात मान ली। सारा देश उनकी बात मान नहीं सकता क्योंकि हरेक आदमी की प्रति व्यक्ति आय इतनी है नहीं कि वह दिन में दो बार इतना महंगा ‘यज्ञ‘ कर सके। ‘यज्ञ‘ केवल पैसे वाला आदमी ही कर सकता है और वे भी कभी-कभी ही करते हैं। अगर वे रोज़ यज्ञ किया करें तो फिर भारत 67वें स्थान से भी पीछे चला जाएगा, क्या इसमें संदेह की गुंजाइश है ?

धर्मगुरू बदल देते हैं उपासना पद्धति
भारत को विश्व का नेता और नायक बनाना है तो उसे आगे होना चाहिए और सारी दुनिया को उसके पीछे, पाकिस्तान को भी। भारतीय उपासना पद्धतियां उसे आगे आने नहीं दे रही हैं। भारतीय ‘गुरू‘ समय-समय पर उपासना पद्धति बदलते आए हैं। बौद्ध-जैन बंधुओं की मांग पर वे ‘वैदिक यज्ञ‘ बंद कर चुके हैं। अब अगर उन्हें फिर बताया जाए कि आग-पानी में अन्न-दूध बहाने-जलाने से देश में कंगाली और भुखमरी आ रही है तो वे ज़रूर इन कर्मकांडों को भी निरस्त कर देंगे, इसकी मुझे पूरी आशा है।

योग और नमाज़
वैसे भी आजकल योग की डिमांड बढ़ रही है और यह एक वैज्ञानिक पद्धति भी है लेकिन चूंकि पतंजलि ने अपने ग्रंथ में परमेश्वर का ज़िक्र नहीं किया। सो ईश्वर प्राप्ति के लिए इसका प्रयोग वैसा नहीं हो पा रहा है जैसा कि होना चाहिए। कुछ दूसरे ग्रंथों के आधार पर कुछ लोगों ने ईश्वर प्राप्ति के लिए इसका प्रयोग करने की कोशिश की लेकिन उन्हें भी सफलता नहीं मिली क्योंकि उनमें से ज़्यादातर ने सन्यास ले लिया। शंकराचार्य जी ने मां को छोड़ा था और दयानन्द जी ने तो माता-पिता दोनों को ही छोड़ दिया था। ईश्वर प्राप्ति की सीढ़ी होते हैं मां-बाप। जो मां-बाप को छोड़ता है वह ईश्वर तक पहुंचने के माध्यम को ही छोड़ बैठता है। इसके कुफल भी व्यक्ति और समाज के सामने आते हैं। स्वामी दयानन्द जी ने योग्य शिष्य न मिल पाने के पीछे यही कारण बताया है।

नमाज़ से परहेज़ क्यों ?
  • जब प्रचलित उपासना पद्धतियां जनकल्याण हेतु निरस्त कर दी जाएंगी तो फिर भारतीय जन क्या करेंगे ?
  • क्या वे नमाज़ अदा करेंगे ?
  • नमाज़ में क्या कमी है, सिवाय इसके कि उसे मुसलमान अदा करते हैं ?

लेकिन यह तो कोई कमी नहीं है।
‘गायत्री परिवार‘ के संस्थापक श्री राम शर्मा आचार्य जी ने ऐलानिया इस्लाम से ‘बंधुत्व‘ का गुण लिया है। अगर एक गुण लिया जा सकता है तो फिर दूसरा गुण लेने से कैसा परहेज़ और क्यों ?

नमाज़ से भुखमरी का ख़ात्मा मुमकिन है
नमाज़ एक ऐसी उपासना पद्धति है जिसमें अन्न-फल और दूध आदि की खपत बिल्कुल शून्य है। नमाज़ में कुरआन पढ़ा जाता है। जिसमें भूखों को खाना खिलाने की प्रेरणा दी जाती है और जो ऐसा नहीं करता उसे पाखण्डी और दीन का झुठलाने वाला बताया गया है।
क्या तुमने उसको देखा जो इन्साफ़ के दिन को झुठलाता है। बस यह वही है जो यतीम को धक्के देता है। और मिस्कीन को खाना नहीं खिलाता और किसी दूसरे को उसकी तरग़ीब (प्रोत्साहन) भी नहीं देता। (कुरआन, 107, 1-3)
इस तरह नमाज़ के माध्यम से न सिर्फ़ अन्नादि की बर्बादी रूकेगी बल्कि लोगों को भूख से लड़ते हुए इनसानों की मदद करने का हुक्म भी मिलेगा।

‘शिर्क‘ हराम है, फिर क्यों किया शिर्क ?
अयोध्या की ख़बर से केवल भारत की भुखमरी के कारण का ही पता नहीं चलता बल्कि भारत के मुसलमानों की दशा का भी पता चलता है। जनाब हाशिम अंसारी साहब की उम्र लगभग 90 साल है और बहुचर्चित बाबरी मस्जिद के मुक़द्दमे के वे पैरोकार भी हैं। उनकी ज़िन्दगी गुज़र गई मुक़द्दमेबाज़ी करते हुए लेकिन उन्हें यह पता न चल पाया कि एक मुसलमान का फ़र्ज़ क्या है ?

कौन से काम मुसलमान के लिए करना जायज़ हैं और कौन से नाजायज़ ?
हाशिम जी को पता नहीं था तो मुस्लिम धर्मगुरूओं को बताना चाहिये था लेकिन ऐसा लगता है कि शायद उन्हें ऐसी बातें बताने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है कम से कम गुजरात से आने वाले मुस्लिम धर्मगुरूओं को तो बिल्कुल भी नहीं है। तभी तो वेदान्ती जी के साथ खड़े होकर बालकों के हिस्से का दूध नदी में बहा रहे हैं। पौराणिक रीति से सरयू नदी की पूजा कर रहे हैं।

सरयू में ही श्रीरामचन्द्र ने जलसमाधि ली थी। सरयू की पूजा के साथ ही उनकी पूजा भी अपने आप ही हो जाती है।

अयोध्या विवाद के पीछे दीन-धर्म नहीं बल्कि क़ब्ज़े की मानसिकता थी
जब मुसलमान (?) सरयू नदी की पूजा हिन्दुओं के साथ कर सकते हैं तो फिर रामलला की मूर्ति की पूजा क्यों नहीं कर सकते ?
अगर हिन्दू भाई यह सवाल पूछें तो उनका सवाल बिल्कुल जायज़ होगा और तब यही कहना पड़ेगा कि भाई ये लोग केवल ‘मालिकाना हक़‘ के लिए लड़ रहे थे, दीन-धर्म और सत्य-असत्य का मुद्दा था ही नहीं। हिन्दू लड़ रहे थे कि सैकड़ों साल बाद मौक़ा मिला है मुसलमानों को दबाने का, सो दबा लो मौक़ा हाथ से निकलने न पाए और मुसलमान इसलिए लड़ रहे थे कि अगर अब दब गए तो फिर हमेशा के लिए दबकर रह जाएंगे, सो सारी जान लड़ा दो। दोनों लड़े और लड़ते रहे। जब अदालत का फ़ैसला आया तो उसने दोनों को ही एकसाथ दबा दिया। अब दोनों दबे हुए एक साथ बैठे हैं और दबी जुबान में सलाह कर रहे हैं कि कैसे बने मन्दिर और कैसे बने मस्जिद ?
अगर मुसलमानों ने अपनी ज़िम्मेदारी समझी होती और उसे सही ढंग से अदा किया होता तो यह मंदिर-मस्जिद का झगड़ा ही पैदा न होता।

मुसलमान के लिए ईमान के साथ अमल भी लाज़िम है
‘शिर्क‘ हराम है। मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि वह कभी ‘शिर्क‘ न करे अर्थात एक मालिक के अलावा किसी और की उपासना न करे और उसके अलावा किसी और का हुक्म न माने। लोगों को उनका हक़ दे, उनके साथ जुल्म न करे। लोग उसके साथ जुल्म करें तो उसे बर्दाश्त करे, उस पर सब्र करे। अपने सताने वालों के लिए दुआ करे, उनका भला चाहे जैसे कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. करते थे।
मुसलमान को चाहिए कि खुद भी ‘ज्ञान‘ पर चले और समाज में भी ‘ज्ञान‘ की रौशनी फैलाए। ज्ञान आएगा तो अंधविश्वास खुद-ब-खुद चला जाएगा। मुसलमान के ज़िम्मे है कि जो चीज़ वह अपने लिए पसंद करे, वही अपने भाइ्र के लिए भी पसंद करे। मुसलमान वह है जो समाज के लिए नफ़ाबख्श हो और उसके हाथ और ज़बान से उसके पड़ौसी सुरक्षित हों। चाहे वे किसी भी मत के मानने वाले क्यों न हों। मुसलमान वह है जो सच्चा हो, अमानतदार हो, खुदा को याद रखने वाला और उसके हुक्मों को पूरा करने वाला हो। मुसलमान एक ईश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले को कहते हैं। कुरआन और हदीस में यही बताया गया है।

एक ईश्वर अल्लाह के सिवा कोई दूजा वंदनीय-उपासनीय नहीं है
‘ला इलाहा इल-लल्लाह‘ का अर्थ भी यही है कि एक परमेश्वर के सिवाय कोई वंदनीय-उपासनीय नहीं है। हरेक मुसलमान इसे जानता-मानता है। सूफ़ी भी इसी को जपते हैं लेकिन अफ़सोस कि हाशिम अंसारी जी के साथ सूफ़ियों जैसे लबादे पहने हुए लोगों ने भी ‘शिर्क‘ से रोकने या खुद बचने की कोई कोशिश नहीं की।

एक ईश्वर के प्रति निष्ठा और समर्पण है भारत की सनातन धरोहर
एकेश्वरवाद भारत की पुरातन और सनातन धरोहर है जिसे वेदान्ती जी चाहे व्यवहार में न लाते हों लेकिन जानते सब हैं। यही वह ज्ञान है जो आदि में विश्व को भारत ने दिया था और बाद में दर्शन और काव्य के तले दबकर रह गया है। अगर मुसलमान हिन्दू भाईयों को याद दिलाते तो वे हरगिज़ इन्कार न करते बल्कि स्वीकार करते क्योंकि एक तो इन्कार का भाव भारतीय मनीषा में है ही नहीं। यहां तो केवल स्वीकार का भाव है लेकिन कोई बताए तो सही। दूसरी बात यह है कि एकेश्वरवाद का जो पाठ उन्हें याद दिलाया जाएगा वह उनके लिए न तो नया है और न ही अपरिचित, बल्कि दरअस्ल वह उनकी दौलत है जो आज हमारे पास बतौर अमानत है। जिसकी अमानत है, उसे आप देंगे तो वह आपका अहसान मानेगा, बुरा हरगिज़ न मानेगा। अगर आपने उनकी अमानत उन तक नहीं पहुंचाई तो फिर खुदा आपसे भी छीन लेगा। यह उसका क़ायदा है। अयोध्या में नदी में मुसलमानों का दूध अर्पित करना इसी बात का प्रतीक है कि वे ‘तौहीद‘ (एकेश्वरवाद) का शऊर खोते जा रहे हैं और इसीलिए वे खुदा की मदद से महरूम भी होते जा रहे हैं।

कुरआन पर ध्यान देंगे तभी होगा कल्याण
आज लोग नमाज़ अदा कर रहे हैं, नमाज़ अदा करते-करते बूढ़े हो रहे हैं लेकिन कभी नमाज़ में सुने जाने वाले कुरआन पर ध्यान नहीं देते कि इसमें हमें हुक्म क्या दिया जा रहा है। सारी समस्याओं के पीछे यही एक वजह है। नदी की पूजा करने वाले भी अपनी फ़िक्र करें और खुदा के सामने सिर झुकाने वाले भी। मालिक के हुक्म को माने बिना उसे राज़ी करना असंभव है और उसे राज़ी किये बिना बदहाली दूर होने वाली नहीं।

अपने दुश्मन आप हैं हम
पहले कभी राजा-महाराजा दुश्मनों पर हमले किया करते थे वे दुश्मनों को कमज़ोर करने के लिए उनकी फ़सलों और उनके भंडारों में आग लगा दिया करते थे। अपनी खाद्य सामग्री में खुद ही बैठकर आग लगाना या उसे पानी में बहाना अपने आप से दुश्मनी करना है। यह एक सामान्य बुद्धि की बात है। दुश्मनों का काम हम खुद अपने साथ क्यों कर रहे हैं ?

वरदान का समय आ पहुंचा है
भारत को सबल और भारतीयों को चरित्रवान बनाना है तो उन्हें आध्यात्मिक मूल्य और ईश्वरीय व्यवस्था देनी ही होगी। आपके पास हो तो उसे अमल में लाओ वर्ना इस्लाम को ग़ौर से देखो। इसके नाम का संस्कृत में अनुवाद करके देखो। नमाज़ शब्द को देखो, इसकी क्रियाओं को देखो। आपको सबकुछ अपना ही लगेगा। पराया कुछ है ही नहीं। ‘चरैवेति-चरैवेति‘ का समय पूरा हुआ, अब मंज़िल क़रीब है। विजय समीप है।

शीश नवाओ केवल एक पालनहार को
धन्य है वह जो जान ले कि सबका मालिक एक है और मनुष्य उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना है जिसकी सेवा में उस मालिक ने सारी प्रकृति को लगा रखा है। प्रकृति मानव की सेवक है और मानव ईश्वर की ओर से इसका अधिपति है। धन्यवाद स्वरूप उसके लिए केवल एक परमेश्वर के सामने ही झुकना और उससे ही मांगना वैध और जायज़ है। वेद और कुरआन यही बताते हैं।

हम सब एक मन वाले हों
अयोध्या विवाद ने बता दिया है कि विवाद को केवल आपसी बातचीत से ही सुलझाया जा सकता है। कोई किसी को दबा तो सकता है लेकिन मिटा हरगिज़ नहीं सकता और जिसे दबाया जाएगा वह कसमसाता रहेगा। हम सब भारतीय एक मन हों, एक विचार हों और एक दूसरे की शक्ति बनें। आपस की शक्ति को एक दूसरे पर प्रयोग करके अपने और देश के भविष्य से खिलवाड़ न करें। आज मंदिर-मस्जिद पर बात हो रही है। ज़रूर होनी चाहिए लेकिन जिसके नाम पर मंदिर-मस्जिद बने हैं वह हमसे क्या चाहता है ?, अब इस पर भी बात होनी चाहिए। उसकी योजना और आदेश हमारे लिए क्या हैं ? यह भी पता लगाना चाहिए, तभी हम बनेंगे सच्चे अर्थों में धार्मिक और आध्यात्मिक। यही हमारी कमज़ोरी है लेकिन यही हमारी ताक़त भी बनेगी। जो चीज़ जिसकी कमज़ोरी होती है वही उसकी ताक़त भी होती है। यह एक सनातन सत्य सिद्धांत है।

Tuesday, October 12, 2010

What was the real mission of Christ मसीह का मिशन था ‘सत्य पर गवाही देना‘ - Anwer Jamal

What was the real mission of Christ  and who did complete it ?
ईसाई प्रचारक ख़ामोश क्यों हैं ?
जनाब राकेश लाल जी ने तो अब मेरे ब्लॉग पर ज़ाहिर होना ही छोड़ दिया। अब कुमारम जी के नाम से कोई आ रहा है और एक भाई भगवत प्रसाद मिश्रा जी और नमूदार हुए हैं लेकिन मेरे सवालों का जवाब इनमें से कोई भी नहीं दे रहा है। ये क्या जवाब देंगे ?
जवाब तो पादरी राकेश चार्ली जी भी न दे सके। आज पेश है उनसे मुलाक़ात और बातचीत का हाल। उम्मीद है पसंद आने के साथ-साथ आपका ज्ञान भी बढ़ेगा।
ईसाई पादरी आये मेरे घर
मुकेश लॉरेंस से मेरी मुलाक़ात महज़ एक इत्तेफ़ाक़ थी। वह एक कम्प्यूटर कम्पोज़िंग के बाद अपने काम का प्रूफ़ निकलवा रहे थे और मुझे भी अपनी बेटी अनम का एक फ़ोटो अपनी कार्ड ड्राइव से डेवलप कराना था। मैंने उनसे चंद मिनटों के लिए उनका काम रोकने की इजाज़त मांगी तो वे खुशदिली का इज़्हार करते हुए फ़ौरन तैयार हो गए। इसी दरम्यान मेरी उनसे बहुत मुख्तसर सी बातचीत हुई। उन्होंने मेरा मोबाईल नम्बर ले लिया। उन्होंने मुझे उर्दू के बेहतरीन शेर  भी सुनाए, जिन्हें किसी और मौक़े पर शायद लिख भी दिया जाए। मुकेश लॉरेंस एक बेहद नर्म मिज़ाज और मिलनसार आदमी हैं और एक अच्छा प्रचारक भी।
जब धर्म चर्चा करें तो अपने बच्चों को अपने साथ रखें
मेरी उनसे मुलाक़ात 28-08-10 को दिन में हुई और शाम को ही उनका फ़ोन आ गया कि अगर मैं उन्हें वक़्त दे सकूं तो वे पादरी साहब को लेकर मेरे घर आना चाहते हैं। मैंने कहा कि मुझे बेहद खुशी होगी, आप रोज़ा इफ़तार हमारे साथ करना चाहें तो इफ्तार के वक्त तशरीफ़ ले आयें वर्ना उसके थोड़ी देर बाद। उन्होंने इफ़तार के बाद साढ़े सात बजे आने के लिये कहा और वे दोनों अपने अपने दुपहिया वाहनों के ज़रिये 7.35 बजे शाम आ भी गये।
मैंने अपने बेटे अनस ख़ान को हिदायत की थी कि बेटे आज खुदा की मुक़द्दस किताब का इल्म रखने वाले दो लोग हमारे घर आ रहे हैं लिहाज़ा जब हमारी गुफ़तगू हो तो आप हमारे पास ही रहना और हमारी बात सुनना।
पादरी व्यवस्था के बजाय मौजज़े पर बल क्यों देते हैं ?
मुकेश लॉरेंस साहब ने पादरी साहब का नाम राकेश चार्ली बताया। वे मैथोडिस्ट चर्च से जुड़े हुए हैं। पादरी साहब जिस्म में थोड़ा हल्के से और उम्र में मुझसे कम थे। उनके अंदर भी मैंने नर्मी देखी।
मैंने उन्हें बाइबिल और नया नियम की प्रतियां दिखाईं। नया नियम को तो मैं पिछले 27 सालों से पढ़ता आ रहा हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे अगली मुलाक़ात में नया नियम की उर्दू प्रति देंगे।
मेरी कुछ शुरूआती बात सुनने के बाद वे बोले कि आदमी जब तक मौज्ज़े के ज़रिये ईमान का निजि अनुभव नहीं कर लेता, तब तक वह ईमान को वास्तव में नहीं समझ सकता।
सवाल का संतोषजनक जवाब देना ही ईसा अ.  का  मार्ग है
मैंने अर्ज़ किया-‘देखिये, हरेक का निजी अनुभव अलग हो सकता है। मेरा निजी अनुभव कुछ और हो सकता है और आपका निजी अनुभव कुछ और हो सकता है। इसलिए मेरा निजी अनुभव आपके लिए और आपका निजी अनुभव मेरे लिए दलील नहीं बन सकता। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के पास जब कभी यहूदी, फ़रीसी या सदूक़ी कोई भी सवाल लेकर आये तो उन्होंने हमेशा उन्हें ऐसे जवाब दिए जिससे उनकी बुद्धि संतुष्ट हो गई या फिर वे निरूत्तर हो गये। उन्होंने कभी किसी से यह नहीं कहा कि आप किसी चमत्कार या निजी अनुभव के द्वारा सच्चाई को पाने की कोशिश कीजिये।
चमत्कार तो शैतान भी दिखा सकता है लेकिन वह ईश्वरीय व्यवस्था पर नहीं चल सकता
चमत्कार तो लोगों ने मसीह के ज़रिये भी होते देखे और एंटी-क्राइस्ट के ज़रिये भी होते देखेंगे और न्याय दिवस के दिन कुछ ऐसे लोग भी मसीह को हे प्रभु , हे प्रभु कहते हुए उनके पास मदद पाने के लिए पहुंचेंगे जिन्होंने दुनिया में उनके नाम से लोगों को दुष्टात्माओं को निकाला होगा और अजनबी भाषाओं में कलाम किया होगा लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर भगा देंगे और कहेंगे कि हे पापियों मैंने तो तुम्हें कभी जाना ही नहीं। इसलिए सिर्फ़ चमत्कार ही पैमाना नहीं बन सकता बल्कि उसके साथ यह भी देखा जायेगा कि चमत्कार दिखाने वाला मसीह की तरह शरीअत का पाबंद है या नहीं। एंटी- क्राइस्ट शरीअत का पाबंद नहीं होगा यही उसकी सबसे बड़ी पहचान होगी।
इंजील के हुक्म को न मानने वाले ईसाई कैसे हो सकते हैं ?
मैं इंजील और मसीह में आस्था रखता हूं और आप भी। मैं कुरआन और हज़रत मुहम्मद स. में आस्था रखता हूं लेकिन आप नहीं रखते। सो हमारे आपके दरम्यान इंजील और मसीह कॉमन ग्राउंड है। इसलिए हम दोनों के लिए इंजील और मसीह अलैहिस्सलाम दलील बनेंगे। इनसे न तो मैं भाग सकता हूं और न ही आपको इनसे हटने की इजाज़त दूंगा।‘
पादरी साहब ने माना कि आपकी बात सही है।
मसीह के आने का मक़सद था व्यवस्था को पूरा करना, उस पर खुद चलना और लोगों को चलने की हिदायत करना
मैंने कहा-‘हम पाबंद हैं मसीह के क़ौल के, न कि उनके बाद के सेंट पॉल  आदि आदमियों के। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ‘यह न समझो कि मैं धर्म-व्यवस्था या नबियों की शिक्षाओं को मिटाने आया हूं। मैं उनको मिटाने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं तब तक धर्म-व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा। इसलिए जो मनुष्य इन छोटी सी छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़ेगा और वैसा ही लोगों को सिखाएगा कि वे भी तोड़ें तो वह स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा। परन्तु जो उन आज्ञाओं का पालन करेगा और दूसरों को उनका पालन करना सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान कहलाएगा।‘ (मत्ती, 5, 17-20)
अब आप बताईये कि सेंट पॉल ने किस अधिकार से शरीअत मंसूख़ कर दी ? वे कहते हैं कि ‘यीशु ने अपने शरीर में बैर अर्थात व्यवस्था को उसकी आज्ञाओं तथा नियमों के साथ मिटा दिया। (इफिसियों, 2, 15)
यूहन्ना के चेलों ने जब मसीह से उनके साथियों के रोज़ा न रखने की वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि ‘वे दिन आएंगे जब दूल्हा उनसे अलग कर किया जाएगा। उस समय वे उपवास करेंगे।‘ (मत्ती, 9, 15)
उन्होंने यह तो कहा कि वे अभी रोज़ा नहीं रख रहे हैं लेकिन कहा कि वे कुछ समय बाद रखेंगे। अस्ल बात यह थी कि मसीह धर्म प्रचार के लिए लगातार सफ़र करते रहे और मुसाफ़िर को इजाज़त होती है कि वह बाद में रोज़े रख ले।
उन्होंने हमेशा शरीअत की पाबंदी की बात की और कहीं भी उसे ख़त्म नहीं किया। सेंट पॉल ने शरीअत माफ़ कर दी ताकि रोमी और अन्य जातियां मसीह पर ईमान ला सकें। उन्होंने चाहे कितनी ही नेक नीयती से यह काम किया हो लेकिन उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार ही नहीं था।
मुसलमानों से सीखने की ज़रूरत है
आप देखते हैं कि हिंदुस्तान में कुछ लोग मुसलमानों द्वारा दी जाने वाली कुरबानी पर ऐतराज़ जताते हैं लेकिन मुसलमानों ने कभी उन्हें रिझाने की ग़र्ज़ से शरीअत को निरस्त घोषित नहीं किया। उनसे कहा जायेगा कि यह शरीअत ऐसी ही ठीक है आपका दिल चाहे कुबूल करके नजात पायें और आप इन्कार करना चाहें तो आपकी मर्ज़ी। पॉल को भी यही करना चाहिये था।
शरीअत कैंसिल करने के बाद फिर आप क्यों कहते हैं कि औरत चर्च में अपना सिर ढके ? यह हुक्म तो शरीअत का है और शरीअत को आप कैंसिल ठहरा चुके हैं।
जीवन को व्यवस्थित करने के लिए व्यवस्था ज़रूरी है
आदमी को जीने के लिये क़ानून दरकार है। उसे जायदाद का बंटवारा भी करना होता है और शादी-ब्याह और दूसरे सामाजिक मामले भी होते हैं। जब आपने शरीअत को कैंसिल कर दिया तो फिर आपने नेता चुने, उन्होंने आपके लिए क़ानून बनाये और आपने उन्हें माना। मैं पूछता हूं कि जब आपको क़ानून की ज़रूरत भी थी और आपको उसे मानना भी था तो फिर जो क़ानून खुदा ने मूसा को दिया था उसे मानते लेकिन आपने उसे छोड़ा और दुनिया के क़ानून को माना। आपने ऐसा क्यों किया ?
बाइबिल को एक से दो बना डाला
प्रोटैस्टेंट ने किस अधिकार से 7 किताबें जाली घोषित करके उन्हें बाइबिल से बाहर निकाल दिया ?
और फिर हर बीस साल बाद आप एक नया एडीशन ले आते हैं जिसमें हर बार पिछली बाइबिल के मुक़ाबले आयतें कम या ज़्यादा करते रहते हैं , ऐसा क्यों ?
आज चर्च की हालत यह हो रही है कि हम आये दिन अख़बारों में पढ़ते रहते हैं कि चर्च में समलैंगिक जोड़ों की शादियां कराई जा रही हैं। जबकि नबी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के ज़माने में समलैंगिकों पर खुदा का अज़ाब नाज़िल हुआ था।
पादरी साहब ने हामी भरी और मुकेश लॉरेंस भी पूरी दिलचस्पी से सुन रहे थे।
चर्च की धार्मिक रस्मों में शराब का प्रयोग क्यों ?
 मैंने कहा-‘आज चर्च में धार्मिक रस्म के तौर पर शराब पिलाई जा रही है। हज़रत मसीह पाक हैं और शराब नापाक। क्या कभी कोई नबी लोगों को शराब पिलाएगा ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘इंजील में हज़रत मसीह का एक चमत्कार लिखा है कि उन्होंने पानी को दाखरस बना दिया। मैंने कहा हो सकता कि दाखरस उस समय कोई शरबत वग़ैरह हो जिसे आज शराब समझ लिया गया हो ?
दाखरस ‘शराब‘ ही होता है
पादरी साहब बोले-‘लोग समझते हैं कि चर्च में वाइन पिलाई जाती है ऐसा नहीं है। दाखरस अंगूर का रस होता है। चर्च में वही रस पिलाया जाता है।
मैंने कहा-‘क्या उस रस में फ़र्मंटेशन होता है ?‘
उन्होंने कहा-‘हां‘
मैंने कहा-‘फ़र्मंटेशन के बाद रस से दो ही चीज़ें बनती हैं। एक एसीटिक एसिड यानि सिरका और दूसरे अल्कोहल यानि शराब। अब बताईये कि क्या वह रस सिरका होता है ?‘
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब वह दाखरस शराब ही होता है। किसी इबादतख़ाने में धर्म के नाम पर धार्मिक लोगों को शराब पिलाई जाये, इससे बड़ा अधर्म भला क्या होगा ?‘
पादरी साहब चुप रहे।
हज़रत मसीह ने जिसे हराम ठहराया उसे भी हलाल कैसे ठहरा लिया ?
मैंने कहा-‘यही हाल आपने खाने-पीने में हलाल-हराम का किया। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक बार बिना हाथ धोये खाना खाने लगे। यहूदियों ने ऐतराज़ किया कि आप बिना हाथ धोये खाते हैं ? तब उन्होंने जवाब दिया कि जो चीज़ बाहर से अन्दर जाती है वह नापाक नहीं करती बल्कि जो चीज़ अन्दर से बाहर आती है वह इनसान को नापाक करती है।‘
उनकी बात सही थी। हाथ की धूल इनसान की दिल को नापाक नहीं करती बल्कि दिल की नापाकी और गुनाह का बोल इनसान को नापाक कर देता है। इससे नसीहत यह मिलती है कि इनसान को गुनाह की बातें ज़बान से नहीं निकालनी चाहिये और अपने दिल को पाक रखना चाहिये। अगर सफ़र में कहीं बिना हाथ धोये खाना पड़ जाये तो दीन में इसकी इजाज़त है।
‘जो बाहर से अन्दर जाता है वह नापाक नहीं करता‘ इस उसूल को इतना एक्सपैंड क्यों कर लिया कि सुअर और हराम जानवर खाना भी जायज़ कर बैठे ? हराम-हलाल की जानकारी देने के लिए मसीह ने यह बात नहीं कही थी। हराम-हलाल जानना था तो शरीअत से मालूम करते, जिसकी पाबंदी मसीह ने जीवन भर की, उनकी मां ने की। क्या कभी मसीह अलैहिस्सलाम ने सुअर खाया ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब आप सुअर खाना कहां से जायज़ कर बैठे ?‘
वे चुप रहे।
हज़रत ईसा अ. की जान के दुश्मन यहूदियों की साज़िशें
मैंने कहा-‘हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम प्रतीकात्मक भाषा बोलते थे और दृष्टांत देते थे क्योंकि यहूदी हमेशा उनकी घात में रहते थे कि उनके मुंह से कोई बात पकड़ें और उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सज़ा दिलायें। यहूदियों ने धर्म को व्यापार बना दिया था। इबादतख़ानों को तिजारत की मंडी बनाकर रख दिया था। मसीह ने उनकी चैकियां इबादतख़ानों में ही उलट दी थीं और उन्हें धिक्कारा था। (मरकुस, 11, 15)
मसीह की मौजूदगी उनकी नक़ली दीनदारी की पोल खोल रही थी और उनके लिए अपनी चैधराहट क़ायम रखना मुश्किल हो रहा था। इसीलिए एक बार वे एक व्यभिचारिणी औरत को पकड़कर मसीह के पास लाये कि इसे क्या सज़ा दी जाये ? ताकि अगर मसीह शरीअत के मुताबिक़ सज़ा सुनाये तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके उन्हें सज़ा दिलायें और अगर वे उसे माफ़ कर दें तो उन्हें नबियों की शरीअत मिटाने वाला कहकर पब्लिक में उन्हें मशहूर करें।
हज़रत मसीह अ. ने ऐसी बात कही कि यहूदियों की सारी साज़िश ही फ़ेल हो गई। उन्होंने कहा कि ‘तुम में जो निष्पाप हो, वही पुरूष सबसे पहिले इसको पत्थर मारे।‘ (यूहन्ना, 8, 8)
यह सुनकर किसी ने उस औरत को पत्थर न मारा। इस मौक़े पर भी मसीह अलैहिस्सलाम ने यहूदी चैधरियों और उनके पिछलग्गुओं को आईना दिखा दिया और ऐलानिया उन्हें गुनाहगार ठहरा दिया।
मसीह की हिकमत के सामने निरूत्तर हो गये साज़िश करने वाले
ऐसे ही एक बार उनसे साज़िशन पूछा गया कि क़ैसर को कर देना कैसा है ? ताकि अगर वे शरीअत के मुताबिक़ क़ैसर को कर देने से मना करें तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सैनिकों के हवाले कर सकें और अगर वे कर देने के लिये कहें तो वे उन्हें शरीअत के खि़लाफ़ अमल करने वाला ठहरा सकें।
इस बार भी इन दुष्टों को मुंह की खानी पड़ी। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उनसे एक सिक्का लेकर पूछा कि ‘यह मूर्ति और नाम किसका है ?
उन्होंने कहा-‘कै़सर का।‘
तब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बोले कि‘ जो क़ैसर है वह क़ैसर को दो और जो खुदा का है वह खुदा को दो।‘ (मरकुस, 12, 16 व 17)
मसीह की तरह उनका कलाम भी बुलंद है उनके कलाम को उनके शिष्य ही नहीं समझ पाते थे
हज़रत मसीह का कलाम बहुत बुलंद है, इतना ज़्यादा बुलंद कि बहुत बार उनके साथ रहने वाले वे लोग भी उनके कहने की मुराद नहीं समझ पाते थे जिन्हें कि ख़ास तौर पह खुदा की तरफ़ से आसमानी बादशाहत के रहस्यों की समझ दी गयी थी, और एक वजह यह भी थी कि वे सभी आम समाज से आये थे।
‘उन बारहों को यीशु की एक भी बात समझ में नहीं आई। यीशु की बात का अर्थ उनसे छिपा रहा। जो कहा गया था, वह उनकी समझ में न आया।‘ (लूका, 18, 34)
हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की बातों में छिपी चेतावनियों को यहूदी आलिम बखूबी समझते थे क्योंकि वे नबियों की किताबें पढ़ने की वजह से नबियों के अन्दाज़े-कलाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे लेकिन मसीह के प्रेरितों की समझ उस दर्जे की न थी। यही वजह है कि प्रेरितों को अक्सर मसीह से पूछना पड़ा कि हे गुरू आपके कहने का तात्पर्य क्या है ?
जब मसीह ने खुदा के कलाम को बीज की मिसाल देकर समझाया तब भी प्रेरितों को उनसे पूछना पड़ा कि वे कहना क्या चाहते हैं ? (मरकुस, 4, 10-12)
परमेश्वर को ‘पिता‘ कहने का वास्तविक अर्थ
मसीह ने खुदा को पिता कहकर पुकारा क्योंकि इस्राइली जाति में आने वाले नबी खुदा को अलंकारिक रूप से बाप कहकर संबोधित करते आये थे। उन्हीं नबियों की तरह मसीह ने भी खुदा को पिता कहा लेकिन लोगों ने अलंकार को यथार्थ समझ लिया और मसीह को खुदा को ऐसा ही बेटा ठहरा दिया जैसा कि आम इनसानों में बाप-बेटे का रिश्ता होता है। मसीह ने खुद को आदम का बेटा भी कहा है। यहां वे यथार्थ ही कह रहे हैं। मसीह को इंजील में पवित्रात्मा का बेटा, दाऊद का बेटा और यूसुफ़ बढ़ई का बेटा भी कहा गया है। यूसुफ़ को उनकी परवरिश करने की वजह से उनका बाप कहा गया है, दाऊद के वंश से होने के कारण दाऊद को उनका बाप कहा गया और पवित्रात्मा ने मसीह को अपना पु़त्र उनकी रूहानी खूबियों की वजह से कहा।
पवित्र इंजील में पांच लोगों के साथ उनके बाप-बेटे के रिश्ते का ज़िक्र आया है। हमें हरेक जगह उसकी सही मुराद को समझना पड़ेगा, अगर हम सत्य को पाना चाहते हैं तो, वर्ना अगर हम हरेक जगह बाप शब्द का एक ही अर्थ समझते गये तो फिर हम सच नहीं जान पाएंगे।
परमेश्वर के लिए पिता शब्द कहना अलंकार मात्र है, उसे लिटेरल सेंस में लेना ऐसी ग़लती है जिसकी वजह से ईसा मसीह को पहले खुदा का बेटा मान लिया गया और फिर उन्हें खुदा ही मान लिया गया। उन्हीं से दुआएं मांगी जाने लगीं जबकि वे खुद ज़िन्दगी भर खुदा से दुआएं मांगते रहे और अपनी दुआओं के पूरा होने पर खुदा का शुक्र बुलंद आवाज़ में अदा करते रहे ताकि कोई उनके ज़रिये से होने वाले चमत्कार देखकर कन्फ़्यूज़ न हो जाये और उन्हें खुदा न समझ बैठे।
मुर्दे को ज़िन्दा करने वाला खुदा है, मसीह अ. तो खुदा से ज़िन्दगी के लिए दुआ किया करते थे
उन्होंने लाजरस को आवाज़ दी और लाजरस अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया, ज़िन्दा होकर तब भी मसीह ने खुदा का शुक्र अदा किया और कहा कि तू सदा मेरी प्रार्थना सुनता है। (यूहन्ना, 11, 42)
इसका मतलब लाजरस को ज़िन्दा करने के लिए मसीह ने खुदा से दुआ की थी और खुदा ने उनकी दुआ कुबूल कर ली थी। लाजरस का ज़िन्दा होना खुदा के हुक्म से था।
यहां से यह भी पता चलता है कि मसीह की दुआ हमेशा सुनी गई। इसलिये यह नामुमकिन है कि मसीह की आखि़री रात की दुआ न सुनी गई हो। जब मसीह तन्हाई में जाकर घुटने टेककर खुदा से दुआ करते हैं कि ‘हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले। तो भी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूर्ण हो ?‘ (लूका, 22, 42)
खुदा ने हज़रत ईसा अ. की हर दुआ कुबूल की
मसीह ने ऐसा मौत के डर से नहीं कहा बल्कि उन्हें मालूम था कि उनके इन्कार के बदले में इन्कारी अज़ाब का शिकार होंगे और उन्हें मसीह मानने वाले अभी कच्चे हैं, उन्हें कुछ समय और चाहिये। मसीह की कोई दुआ कभी रद्द नहीं हुई, यह दुआ भी रद्द नहीं हुई लिहाज़ा मौत का कटोरा खुदा ने उनके सामने से हटा लिया और उन्हें जीवित ही आसमान पर उठा लिया। उन्हें सलीब पर चढ़ाया तो ज़रूर गया लेकिन सलीब पर उन्हें मौत नहीं आई। वे सलीब पर बेहोश हो गए। दूर से देखने वालों ने समझा कि वे मर गए। यह लोगों की सोच थी न कि हक़ीक़त। (लूका, 23, 49)
जो कहे कि मार्ग, जीवन और सच्चाई मैं ही हूं। (यूहन्ना, 14, 6) जो साक्षात जीवन हो उसे मौत आ भी कैसे सकती थी ? जबकि उसने खुदा से मौत का कटोरा अपने सामने से हटाने की दुआ भी की हो (मरकुस, 14, 36) और उसकी दुआ मालिक ने कभी रद्द न की हो। (यूहन्ना, 11, 42)
हज़रत ईसा अ. को मौत नहीं आई, वे ज़िन्दा हैं
मसीह को जब सलीब से उतारा गया तो वे बेहोश थे न कि मुर्दा। उन्हें यूसुफ़ अरमतियाह ने गुफ़ानुमा एक क़ब्र में रखा। उनके बदन पर मारपीट की चोटों के भी ज़ख्म थे और उस भाले का भी जो सिपाहियों ने चलते-चलते उन्हें मारा था और खून और पानी उनके बदन से निकला था (यूहन्ना, 19, 34) जोकि खुद उनकी ज़िन्दगी का सुबूत है।
तीसरे दिन मरियम मगदलीनी उनकी क़ब्र पर पहुंची लेकिन उनकी क़ब्र ख़ाली थी। हज़रत ईसा ने उसे संबोधित किया-‘हे नारी ! तू क्यों रो रही है ? तू किसे ढूंढ रही है ? (यूहन्ना, 20, 15) तो वह उन्हें पहचान नहीं पाई, वह उन्हें माली समझी। तब ईसा अलैहिस्सलाम ने खुद को उस पर ज़ाहिर किया तब वह उन्हें पहचान पाई। उन्होंने उसे खुद को छूने से रोक दिया क्योंकि वे ज़ख्मी थे। यहां यह भी क़ाबिले ग़ौर है कि उन्होंने मरियम से कहा कि मुझे मत छू ; क्योंकि मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया हूं। (यूहन्ना, 20, 17)
और सलीब पर अपने साथ टंगे हुए एक डाकू से कहा था कि ‘मैं तुझसे सच कहता हूं, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा । (लूका, 23, 43)
ख़ैर खुदा ने मसीह की दुआ सुन ली और उन्हें आसमान पर उठा लिया जहां से वे दोबारा तब आयेंगे जब कि खुदा उन्हें भेजना चाहेगा।
पादरी साहब और लॉरेंस मेरी बात को दिलचस्पी और ग़ौर से सुन रहे थे।
खुदा ने मसीह अ. को सलीब पर मरने के लिए भेजा ही नहीं था
खुदा ने मसीह को सलीब पर मरने के लिए नहीं भेजा था और न ही खुद मसीह की मर्ज़ी थी कि वे सलीब पर मरें। इसीलिए उन्होंने खुदा से ‘दुख के कटोरे‘ को हटाने की दुआ की। वे सलीब पर मरें, ऐसा तो यहूदी चाहते थे। उन्हें डर था कि अगर उन पर ईमान लाने वालों की तादाद इसी तरह बढ़ती रही तो रोमी उन्हें बाग़ी समझेंगे और उनकी जगह और जाति पर क़ब्ज़ा कर लेंगे। इसलिए वे कहते थे कि ‘हमारी भलाई इस बात में है कि हमारी जाति के लिए एक मनुष्य एक मरे और सारी जाति नष्ट न हो।‘ (यूहन्ना, 11, 50)
साज़िश में कही गयी मसीह के दुश्मनों की बात उनपर ईमान लाने वालों का अक़ीदा कैसे बन गई ?
आपने कैसे मान लिया कि लोगों को पैदाइशी गुनाह से मुक्ति दिलाने के लिए मसीह एक बेऐब मेमने की मानिन्द सलीब पर कुर्बान हो गए ?
ईसा अ. बच्चों को मासूम और स्वर्ग का हक़दार मानते थे न कि जन्मजात पापी
मसीह ने कभी बच्चों को पैदाइशी गुनाहगार नहीं माना। एक बार लोग अपने बच्चों को उनके पास लाये ताकि वे उनपर अपना हाथ रखें और बरकत की दुआ दें। पर चेलों ने उनको डांटा। यह देखकर मसीह ने नाराज़ होकर उनसे कहा कि ‘बच्चों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो; क्योंकि परमेश्वर का राज्य ऐसों का ही है। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जो कोई परमेश्वर के राज्य को छोटे बच्चे के समान ग्रहण न करे, वह उस में कभी प्रवेश करने न पाएगा।‘
यीशु ने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी। (मरकुस, 10, 14-16)
मसीह ने तो अपने साथियों से कहा कि वे खुद को बच्चों की मानिन्द बनायें हालांकि वे महीनों से उनके साथ थे और उन्होंने मसीह के ज़रिये होने वाले चमत्कार भी देखे थे और उन्हें ‘ईमान का निजी अनुभव‘ भी था। उन्होंने बच्चों से नहीं कहा कि वे उनके साथियों की मानिन्द बनें। अगर बच्चे पैदाइशी गुनाहगार होते तो वे अपने साथियों को उनकी मानिन्द बनने की नसीहत हरगिज़ न करते।
परमेश्वर का मेमना बचा लिया गया
दूसरी बात मेमने की कुरबान होने के बारे में है। ओल्ड टेस्टामेंट में है कि मेमना बचा लिया गया। मेमना प्रतीक है मसीह का। जब मेमने के बारे में आया है कि उसे बचा लिया गया तो इसका मतलब यही है कि मसीह को बचा लिया गया। धर्मशास्त्र में भी आया है कि ‘मैं दया से प्रसन्न से होता हूं बलिदान से नहीं।‘ (मत्ती, 12, 7)
न तो कोई बच्चा पैदाइशी गुनाहगार होता है और न ही मसीह सलीब पर लोगों के पापों के प्रायश्चित के तौर पर कुरबान होने के लिए भेजे गए थे और न ही वे सलीब पर मरना चाहते थे और न ही वे सलीब पर मरे।
मसीह का मिशन क्या था ?
मसीह का मिशन था लोगों को शैतान की गुलामी और गुनाहों की दलदल से निकालना। इसके लिए वे चाहते थे कि लोग दीनदारी का दिखावा न करें बल्कि सचमुच दीनदार बनें। इसीलिए उन्होंने कहा कि ‘हे पाखंडी शास्त्रियों और फ़रीसियों , तुम पर हाय ! तुम पोदीने, सौंफ़ और ज़ीरे जैसी छोटी-छोटी वस्तुओं का दसवां अंश देते हो। परन्तु तुम ने धर्म-व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, दया और विश्वास को छोड़ दिया है। तुम्हें चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अन्धे अगुवों, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊंट को निगल जाते हो। (मत्ती, 23, 23 व 24)
यहां पर भी मसीह ने शरीअत को कैंसिल नहीं किया बल्कि लोगों को डांटा कि वे शरीअत के अहम हुक्मों पर अमल नहीं कर रहे हैं।
मसीह का मिशन था ‘सत्य पर गवाही देना‘
वे कहते हैं कि ‘मैंने इसीलिए जन्म लिया और इसीलिए संसार में आया हूं कि सत्य पर गवाही दूं।‘ (यूहन्ना, 18, 37)
उन्होंने कहा कि ‘हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो और मुझसे सीखो। (मत्ती, 11, 28 व 29)
मसीह का जूआ लादने के लिए ज़रूरी था कि जो जूआ उन पर पहले से लदा है वे उसे उतार फेंके, लेकिन जो फ़रीसी वग़ैरह इन ग़रीब लोगों पर अपना जूआ लादे हुए थे वे कब चाहते थे कि लोग उनके नीचे से निकल भागें।
‘तब फ़रीसियों ने बाहर जाकर यीशु के विरोध में सम्मति की, कि यीशु का वध किस प्रकार करें। (मत्ती, 12, 14)
नक़ली खुदाओं की दुकानदारी का ख़ात्मा था मसीह का मिशन
नबी के आने से नक़ली खुदाओं की खुदाई का और उनके जुल्म का ख़ात्मा होना शुरू हो जाता है, इसलिये इनसानियत के दुश्मन हमेशा नबी का विरोध करते हैं और आम लोगों को भरमाते हैं।
तब नबी का उसके देश में निरादर किया जाता है, उसे उसके देश से निकाल दिया जाता है और यरूशलम का इतिहास है कि वहां के लोगों ने बहुत से नबियों को क़त्ल तक कर डाला।
मसीह के साथ किया गया शर्मनाक बर्ताव और उन्हें क़त्ल करने की नाकाम कोशिश भी उसी परम्परा का हिस्सा थी।
मसीह का मिशन, खुदा का मिशन था और खुदा के कामों को रोकना किसी के बस में है नहीं
आखि़रकार जब मसीह के काम में रूकावट डाली गई और उन्हें ज़ख्मी कर दिया गया तो उन्हें कुछ वक्त के लिए आराम की ज़रूरत पड़ी। मालिक ने उन्हें दुनिया से उठा लिया, सशरीर और ज़िन्दा। लेकिन उनके उठा लिए जाने से खुदा का मिशन तो रूकने वाला नहीं था। सो मसीह ने दुनिया से जाने से पहले कहा था कि ‘मैं तुमसे सच कहता हूं कि मेरा जाना तुम्हारे लिए अच्छा है। जब तक मैं नहीं जाऊंगा तब तक वह सहायक तुम्हारे पास नहीं आएगा। परन्तु यदि मैं जाऊंगा तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा। जब वह आएगा तब संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा।‘ (यूहन्ना, 16, 6-8)
‘मुझे तुमसे और भी बहुत सी बातें कहनी हैं। परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा तब तुम्हें सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताएगा। वह मेरी महिमा करेगा , क्योंकि जो मेरी बातें हैं, वह उन्हें तुम्हें बताएगा।
                                                                       (यूहन्ना, 16, 12-14)
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की भविष्यवाणी पूरी हुई और दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. तशरीफ़ लाए। उन्होंने गवाही दी कि ईसा कुंवारी मां के बेटे थे और मसीह थे। खुदा के सच्चे नबी थे, मासूम थे। वे ज़िन्दा आसमान पर उठा लिए गए और दोबारा ज़मीन पर आएंगे और मानव जाति के दुश्मन ‘दज्जाल‘ (एंटी क्राइस्ट) का अंत करेंगे।
हज़रत मुहम्मद स. ने खुदा के हुक्म से हज़रत ईसा अ. के काम को ही अंजाम तक पहुंचाया है
जो बातें मसीह कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए, वे सब बातें पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने दुनिया को बताईं और उन्होंने संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर किया।
आज ज़मीन पर 153 करोड़ से ज़्यादा मुसलमान आबाद हैं। हरेक मुसलमान सिर्फ़ उनकी गवाही की वजह से ही ईसा को खुदा का नबी और मसीह मानते हैं। मरियम को पाक और उनकी पैदाइश को खुदा का करिश्मा मानते हैं। क्या मसीह के बाद दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. के अलावा कोई और पैदा हुआ है जिसने मसीह की सच्चाई के हक़ में इतनी बड़ी गवाही दी हो और खुदा की शरीअत को ज़मीन पर क़ायम किया हो ?
‘सत्य का आत्मा‘ हैं हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
अगर आप इसके बावजूद भी हज़रत मुहम्मद स. को ‘सत्य का आत्मा‘ नहीं मानते तो फिर आप बताएं कि ‘सत्य का आत्मा‘ कौन है, जिसे मसीह ने जाकर भेजने के लिए कहा था ?
उनके अलावा आप किसे कह सकते हैं कि उसने सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताया है ?
क्या एक ईसाई के लिए इंजील के खि़लाफ़ अमल करना जायज़ है ?
ख़ैर , हो सकता है कि हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई पर मुतमईन होने में आपको कुछ वक्त लगे लेकिन जिस इंजील पर आप ईमान रखते हैं, उसके खि़लाफ़ अमल करने का आपको क्या हक़ है ?
इंजील के खि़लाफ़ न तो मैं अमल करना चाहता हूं और न ही आपको करने दूंगा।
बहुत बार ऐसा होता है कि जो बात ज्ञानियों से पोशीदा रह जाती हैं, उन्हें मालिक बच्चों पर खोल देता है। (मत्ती, 11, 25)
ज्ञानी में ज्ञान का अहंकार भी आ जाता है और उसे लगता है कि सभी ज़रूरी बातें जो जान लेनी चाहिए थीं उन्हें वह जान चुका है। ज्ञान के उसकी प्यास ख़त्म हो जाती है। प्यास ख़त्म तो समझो तलाश भी ख़त्म और नियम यह है कि ‘जो ढूंढता है वह पाता है।‘
जो ढूंढता है वह पाता है
बच्चे स्वाभाविक रूप से ही जिज्ञासु होते हैं और पक्षपात उनमें कुछ होता नहीं। सत्य को जानने के लिए यही दो आवश्यक शर्तें हैं, जो बच्चे पूरी कर देते हैं और ज्ञानी पूरी कर नहीं पाते। बच्चे ढूंढते और वे पा लेते हैं क्योंकि वे पाने की शर्तों पर खरे उतरते हैं।
मैं भी एक बच्चा ही हूं। मुझे कुछ मिला है। आप इसे देख लीजिये। आपको जंचे तो ठीक है वर्ना क़ियामत के रोज़ मसीह खुद बता देंगे कि उनके किस क़ौल का क्या मतलब था ?
तब बहुत से लोग उनके पास आएंगे और उनसे कहेंगे कि हमने तेरे साथ खाया-पीया था और तूने हमारे बाज़ारों में उपदेश दिया था।, लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर कहेंगे कि हे कुकर्म करने वालो, तुम सब मुझसे दूर रहो। (लूका, 13, 27)
जीवन की सफलता के लिए ‘सत्कर्म‘ ज़रूरी है
इसीलिए मैं कहता हूं कि बिना सत्कर्म के सिर्फ़ मौज्ज़े और चमत्कार किसी की सच्चाई को परखने का सही पैमाना नहीं है। सत्कर्म का पैमाना केवल ‘व्यवस्था‘ है। यही मसीह की शिक्षा है। चमत्कार तो मसीह ने भी दिखाए और एंटी-क्राइस्ट भी दिखाएगा, लेकिन दोनों में फ़र्क़ यह होगा कि मसीह आये थे जो जो शरीअत को क़ायम करने और मसीह आएगा शरीअत को मिटाने के लिए। सही-ग़लत की पहचान का सही पैमाना शरीअत है, इसमें किसी को कभी धोखा नहीं हो सकता।
खुदा का हुक्म और मसीह की मर्ज़ी दो नहीं, बल्कि एक है
‘मसीह में जीने‘ और ‘खुदा में जीने‘ का मतलब भी यही है कि खुदा की मर्ज़ी और मसीह के तरीक़े में जीना। खुदा की मर्ज़ी और मसीह का तरीक़ा दो नहीं हैं बल्कि ‘एक‘ है। इसीलिए मसीह कहते हैं कि ‘मैं और पिता एक है।‘
खुदा की मर्ज़ी ही मसीह का तरीक़ा है और मसीह के तरीक़े का नाम ही शरीअत है। लोगों की आसानी के लिए शरीअत की तकमील ही मसीह के आने और जाने का मक़सद थी। अब मसीह जिस्मानी ऐतबार से हमारे दरम्यान नहीं हैं लेकिन उनका तरीक़ा हमारे सामने आज भी है। अगर आप मसीह में जीना चाहते हैं तो आपको उनके तरीक़े में जीना होगा। जिस तरह उन्होंने दिन गुज़ारा उस तरह आपको दिन गुज़ारना होगा और जिस तरह उन्होंने रात गुज़ारी उस तरह आपको रात गुज़ारनी होगी। जिस खुदा की उन्होंने इबादत की उसी खुदा की इबादत आपको करनी होगी और जिस खुदा से घुटने टेककर वे दुआ मांगा करते थे उसी खुदा से आपको दुआ मांगनी होगी। तब जाकर आप मसीह के तरीक़े को पा सकेंगे और मसीह में जी सकेंगे।
मसीह ने ज़िन्दगी भर केवल एक ईश्वर की उपासना की है, न तीन की और न ही दो की
यह नहीं कि मसीह तो ज़िन्दगी भर अपने पैदा करने वाले खुदा की इबादत करते रहे, उसी से दुआ मांगते रहे और दुआ पूरी होने पर उसी का शुक्र अदा करते रहे और सभी इस बात के गवाह भी हैं, लेकिन अब आप उनके तरीक़े के खि़लाफ़ खुदा को छोड़कर मसीह की इबादत करने लगें और उन्हीं से दुआएं मांगने लगें और शुक्र भी उन्हीं का अदा करने लगें और कोई पूछे तो आप कह दें कि मसीह ने कहा है कि ‘मैं और पिता एक हैं।‘
 भाई ! उनका कहना बिल्कुल सही है लेकिन उनके कहने को उनके करने के साथ जोड़कर तो देखिए।
जब उन्होंने कहा कि मैं और पिता एक हैं, तो क्या वे खुद अपनी इबादत करने लगे थे या मुसीबतों में खुद से ही दुआएं किया करते थे ?
अब उनके शिष्यों को देखिए कि उनके शिष्यों ने उनके मुंह से यह सुनकर क्या किया ?
क्या उनमें से किसी ने कभी खुदा के अलावा किसी की इबादत की ?
या उन्होंने मसीह से कभी घुटने टेककर दुआएं मांगी ?
हालांकि उन्होंने मसीह से सुना कि ‘जो कुछ पिता का है वह सब मेरा है‘ और ‘स्वर्ग और धरती का अधिकार मुझे दे दिया गया।‘ इसके बावजूद भी जब कभी किसी ने मसीह को उत्तम कहा तो उन्होंने यही कहा कि ‘तू मुझे उत्तम क्यों कहता है ? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर।‘ (मरकुस, 10, 18)
‘तू अपने प्रभु परमेश्वर को प्रणाम कर और केवल उसी की उपासना कर। (लूका, 4, 8)
आखि़री विनती
पादरी राकेश चार्ली साहब और भाई मकेश लॉरैंस साहब से और भी काफ़ी बातें हुईं जिन्हें किसी और वक्त पेश किया जाएगा। मैं नहीं जानता कि इन बातों को उन्होंने कितना माना ? और कितना उन पर विचार किया ?
यही बातें अब मैं आपके सामने रखता हूं। आपको जो बात सही लगे उसे ले लीजिए और जो बात ग़लत लगे मुझे उसके बारे में बता दीजिए ताकि मैं उसे सही कर लूं। मैं आपका शुक्रगुज़ार रहूंगा।