सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Monday, October 11, 2010

The ultimate way for women दुनिया को किसने बताया की विधवा और छोड़ी हुई औरत का पुनर्विवाह धर्मसम्मत है ? - Anwer Jamal

सुज्ञ जी ! आपने अपने नाम के अर्थ के बारे में बताया अच्छा लगा। आप अच्छे ज्ञान को पाना चाहते हैं तो आपको ‘सम्यकदृष्टि‘ की ज़रूरत पड़ेगी। सम्यकदृष्टि के लिए ‘सम्यकबुद्धि‘ की ज़रूरत होगी। सम्यकबुद्धि पाने के लिए आदमी को पूर्वाग्रह छोड़ना पड़ता है।

1.आप अपना दिल निर्मल रखते हैं ऐसा आपने बताया लेकिन ‘ईश्वर‘ या ‘मुसलमानों के ईश्वर‘ के लिए दिल में मैल रखते हैं ?
आप ईश्वर को दोग़ला व्यवहार करने वाला बता रहे हैं ?
देखिए अपना कथन-
अब प्रश्न होता है, अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल को ही पूरी मानवता की किताब क्यों दी,अन्तिम इन्हें ही क्यो दी? मूसा, ईशा को को छोटे टुकडो में कौम लिमिटेड क्यों दी? ईशा को ही अन्तिम क्यों न बनाया। क्या वैर था ईशा आदि से? कुरआन की सुरक्षा तो अल्लाह खुद कर रहा है, और तौरेत, इंजिल आदि को बिगडने दिया?क्यों…क्या वे किताबें अल्ल्लाह को प्यारी नहिं थी?

या उस एडिशन में अल्लाह से चुक हुई थी, जो फ़ाईनल एडिशन निकालना पडा। और यह विशेष कौम के लिये नहिं तो भाषा अरबी ही क्यों पूरी मानवता के लिये?
अल्लाह का अरबी,कुराआन,मुहम्मद सल्ल से विशेष लगाव है? तो फ़िर आदम से लेकर ईशा तक के साथ दोगला व्यवहार क्यो?
क्या आपने कभी अपने तीर्थंकरों के लिए ‘दोग़ला‘ शब्द इस्तेमाल किया ?
ईश्वर के व्यवहार में ‘दोग़लापन‘ समझने वाले इस शब्द को अपने माननीय जनों के लिए इस्तेमाल नहीं करते। यह है उनका खुद का दोग़लापन।
सुज्ञ जी ! आप अपने लिए केवल 'ले लो' सुज्ञ जी के सवालों का भी नंबर , पर भी ऐतराज़ करते हैं और खुद इश्वर के बारे मन दोगला शब्द यूज़ करते हैं , निहायत दुःख की बात है .

2.मैं प्रतिप्रश्न क्यों करता हूं ?
आपने यह भी पूछा है। मैं प्रतिप्रश्न इसीलिए करता हूं कि आज का इनसान जानबूझ-बावला बना हुआ है। अपने और अपनी मान्यताओं के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है, अपने ग्रंथों में आये हुए युद्धों के बारे में कहता रहता है कि वे न्याय और मानवता के हितार्थ लड़े गए और कुरआन में आक्रमणकारी दुश्मनों को खदेड़ भगाने के आदेशों पर तुरंत आपत्ति जताने लगता है। एक पूरा ग्रंथ तो केवल ‘युद्ध के उपदेश‘ पर ही केन्द्रित है, उसे मानते हैं और कुरआन की चन्द युद्ध संबंधी आयतों पर ऐतराज़ करते हैं ?
आपके साथ भी यही समस्या है। आप ऋषभ देव जी से लेकर महावीर जी तक बहुत से आदमियों को तीर्थंकर मानते हैं। सभी जैन तीर्थंकर एक साथ नहीं आए बल्कि एक के बाद एक आए। जब किसी तीर्थंकर के जन्म लेने के लिए अनुकूल हालात बन गए होंगे या उनकी ज़रूरत होगी तभी उनका जन्म हुआ होगा। इसे समझा जा सकता है।

नबी मानव जाति के लिए आदर्श शिक्षक हैं
आप भी समझ सकते थे कि मानव जाति धरती के बहुत बड़े भाग पर फैली हुई है। हर जगह एक ही नबी का पहुंच सकना संभव नहीं था। सो बहुत से नबी आए, मानव जाति के सामने अपने अमल से मिसाल क़ायम की और लोगों को उसके अनुसार चलना सिखाया। जब मानव जाति उनके चरित्र को भुला बैठी तब फिर ईश्वर की ओर से नबी आया और भूला हुआ पाठ फिर याद दिलाया। जब लोगों को सुदूर देशों के रास्तों का पता चल गया और आवागमन के साधन भी विकसित हो गए तो फिर नबियों को दूसरे देशों तक भी भेजा गया। सबसे अंत में हज़रत मुहम्मद साहब स. को ईश्वर ने मानव जाति के लिए आदर्श और गुरू बनाकर खड़ा किया। ‘ईश्वर की योजना और आदेश का ज्ञान‘ आज उनके माध्यम से सारी जाति को पहुंच रहा है। उस ‘ज्ञान‘ का नाम कुरआन है।

कुरआन में क्या है ?
3. कुरआन में केवल हज़रत मुहम्मद साहब स. का ही ज़िक्र नहीं है बल्कि उनसे पहले आ चुके नबियों का भी ज़िक्र है और हज़रत मुहम्मद साहब स. अपनी हर नमाज़ में अल्लाह से यह दुआ अनिवार्य रूप से करते थे कि ‘दिखा और चला हमें सीधा मार्ग। उन लोगों का मार्ग जिन पर तेरा ईनाम हुआ।‘ (अलफ़ातिहा)
इसी दुआ को उन्होंने अपने मानने वालों को सिखाया और बताया कि ‘दुआ इबादत का मग़ज़ अर्थात सार है‘ और यह भी कहा कि ‘फ़ातिहा के बिना कोई नमाज़ नहीं‘।
ज़रा सोचिए कि जो मानव जाति के लिए आदर्श है वह ईश्वर से अपने पूर्व उसका ईनाम पाने वालों का रास्ता दिखाने-चलाने की दुआ कर रहा है। अगर वे सच्चे-अच्छे और आदर्श न होते तो क्या यह संभव था ?

पिछले नबी भी सारी मानव जाति के लिए आदर्श हैं
4.अल्लाह कहता है कि ‘तुम्हारे लिए इबराहीम और उसके साथियों में अच्छा नमूना (आदर्श) है।‘ (कुरआन, 60, 4)
इसी के साथ उसने मुसलमानों को यह कहने की ताकीद की है कि ‘रसूल ईमान लाया है उस पर जो उसके रब की तरफ़ से उस पर उतरा है। और मुसलमान भी उस पर ईमान लाए हैं। सब ईमान लाए हैं अल्लाह पर और उसके रसूलों पर। हम उसके रसूलों में से किसी के दरम्यान फ़र्क़ नहीं करते।‘ (कुरआन, 2, 285)

सिर्फ़ नबी ही नहीं बल्कि उनका साथ देने वाले भी आदर्श होते हैं और मालिक से ईनाम पाते हैं। सभी नबी आपस में एक दूसरे को मानते हैं। पहले आने वाले नबी अपने बाद आने वाले नबियों की खब़र देते हैं और उनके बाद आने वाले नबी उनकी पुष्टि और समर्थन करते हैं और जिस काम को उन्होंने किया था उसे आगे बढ़ाते हैं और पूरा करते हैं। यही वजह है कि हज़रत मुहम्मद साहब स. ने अपने से पहले आ चुके तमाम नबियों की सच्चाई की पुष्टि की, उनके लिए दुआ की और करना सिखाया। पिछले नबियों की किताबों में आज भी हज़रत मुहम्मद साहब स. के आने की भविष्यवाणियां देखी जा सकती हैं।

फिर फ़र्क़ क्या है ?
फ़र्क़ यह है कि हम दिखाते हैं और वे छिपाते हैं। कुरआन में पिछले नबियों का ज़िक्र आया है हम तो सबको दिखाते हैं जबकि वे छिपाते हैं कि हमारे ग्रंथों में ‘मुहम्मद‘ स. का ज़िक्र मौजूद है। फ़र्क़ यह है कि कुरआन ‘सुरक्षित‘ है और वे अपनी किताबों में अपना इतिहास और दर्शन मिलाकर उसे विकृत कर बैठे हैं। अब वे उस नबी या ऋषि के आदर्श का अनुसरण भी नहीं कर रहे हैं जिसे मानने का वे ज़बानी दावा करते हैं क्योंकि अगर वे उनका अनुसरण करना भी चाहें तो नहीं कर सकते।
मिसाल के तौर पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और हज़रत मुहम्मद साहब स. के दरम्यान 600 साल से भी कम का फ़र्क़ है लेकिन ईसाई हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर अवतरित ईश्वर की वाणी को विकृत कर बैठे। उसमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को शराब पीते हुए और पिलाते हुए लिख दिया गया। (देखिए यूहन्ना, 2)

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के मुंह से कहलवा दिया गया कि ‘जितने मुझसे पहले आए, वे सब चोर और डाकू थे।‘ (देखिए यूहन्ना, 10, 7)

जबकि हज़रत ईसा अ. ने अपने से पहले आ चुके नबियों के बारे में कहा था कि ‘यह न समझो कि मैं धर्म-व्यवस्था या नबियों की शिक्षाओं को मिटाने आया हूं। मैं उनको मिटाने नहीं, परंतु पूरा करने आया हूं।‘ (देखिए मत्ती, 17 व 18)
यीशु ने उसे उत्तर दिया, ‘‘सब आज्ञाओं में यह मुख्य है : ‘हे इस्राएल सुन, हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही प्रभु परमेश्वर एक ही प्रभु है। तू प्रभु अपने परमेश्वर से से अपने सारे मन, अपने सारे प्राण, अपनी सारी बुद्धि और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करना।‘
(देखिए मरकुस, 12, 29 व 30)
अब अगर ईसाई भाई-बहन चाहें भी तो बाइबिल के आधार पर केवल एक प्रभु परमेश्वर की उपासना नहीं कर सकते जिसकी ईसा अ. सदा करते रहे। ईसा अ. से पहले आ चुके नबियों को मानने वालों की हालत और भी ज़्यादा ख़राब है। वेदों में मिलने वाले आर्य राजा इन्द्र आदि के क़िस्सों से भी इसकी पुष्टि होती है।

ईश्वर की दया से कुरआन का अवतरण
ऐसे में जबकि मानवता अपने ऊपर ‘ज्ञान‘ का दरवाज़ा ही बन्द कर चुकी थी तब उस मालिक ने केवल अपनी दया से लोगों के मार्गदर्शन के लिए हज़रत मुहम्मद स. को इस दुनिया में भेजा और कुरआन की सुरक्षा का प्रबंध कर दिया क्योंकि जगत का अंत अब क़रीब है और नया नबी अब कोई आएगा नहीं। अब केवल कुरआन सुरक्षित है, उसमें सच्चे मालिक का सही कलाम सुरक्षित है जो उसे नहीं मानता वह खुद को केवल हज़रत मुहम्मद साहब स. के अनुसरण से ही वंचित नहीं करता बल्कि उन नबियों-ऋषियों के अनुसरण से भी वंचित करता है जिनमें वह विश्वास का दावा करता है।

आचरण ही विश्वास का प्रमाण है और अब अपने ऋषियों के आदर्श के अनुसरण आचरण कर नहीं सकता क्योंकि आदर्श सुरक्षित ही नहीं बचे। प्रायः सारी मानव जाति आज हज़रत मुहम्मद साहब स. का अन्जाने में अनुसरण कर रही है। यह उसकी मजबूरी है लेकिन अगर इसी काम को वह ‘राज़ी-खुशी‘ कर ले तो इसी का नाम ईमान और नेक अमल हो जाएगा जिस पर उसे मालिक की तरफ़ से ईनाम मिलेगा दुनिया में भी और परलोक में भी।

व्यवस्था दुनिया ले रही है हज़रत मुहम्मद स. से
मिसाल के तौर पर वेदों में विधवा औरत के लिए पुनर्विवाह के बजाय ‘नियोग‘ आया है (सत्यार्थप्रकाश, चतुर्थसमुल्लास, पृ. 95-103)
और हज़रत ईसा अ. की ओर से इंजील में कहा गया है कि ‘मैं तुमसे कहता हूं, जो पति व्यभिचार को छोड़ और किसी कारण से , अपनी पत्नी को त्यागकर , दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह व्यभिचार करता है। और जो पुरूष उस छोड़ी हुई से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।‘
1. क्या मानव जाति आज वेद या इंजील की व्यवस्था का पालन कर सकती है ?
2. क्या विधवा औरत और त्यागी हुई औरत के लिए आदर्श व्यवस्था ‘पुनर्विवाह‘ नहीं है ?
3. किसने दी है औरत को पुनर्विवाह की व्यवस्था ?
हज़रत मुहम्मद स. सारी मानव जाति के लिए आदर्श हैं। उनका अनुसरण करना सहज है, उनकी शिक्षा व्यवहारिक है। यदि कोई इस बात से संतुष्ट न हो तो वह बताए कि तब सारी मानव जाति के लिए आज कौन आदर्श है और उसका चरित्र किस ग्रंथ में सुरक्षित है ?

आदमी की आत्मा सत्य की गवाही देती है
मैं इसलिए भी प्रतिप्रश्न करता हूं कि उसके जवाब में संबोधित व्यक्ति का दिमाग़ तुरंत सोचना शुरू कर देता है और उसके मन की गहराई में दबे हुए विचार उभरकर ऊपर आ जाते हैं। उनमें जो सटीक होता है उसे वह जान लेता है चाहे वह हमारे सामने न माने लेकिन मालिक तो दिलों का भी हाल जानता है। जानकर भी जो नहीं मानता उसे ही लोग जानबूझ-बावला बनना कहते हैं। केवल अपने हठ और अहंकार से ही आदमी इस हीन दशा को पहुंचता है।
आदमी को कुछ भी सम्यक हासिल नहीं हो सकता अगर उसे ‘सम्यक ज्ञान‘ नहीं है। सम्यक ज्ञान केवल ईश्वर ही दे सकता है और उसने बहुत बार दिया लेकिन लोगों ने उसकी क़द्र न की जैसी कि उसकी क़द्र करने का हक़ था। उसने फिर ‘कुरआन‘ के माध्यम से ‘सम्यक ज्ञान‘ दिया है। अब इस आखि़री मौक़े को गंवाना बुद्धिमानी नहीं है।

आपने पूछा है कि वेद, बाइबिल और कुरआन का भोजन मेन्यु क्या है ?
मैं आपको बताना चाहूंगा कि आयटम्स की संख्या तो बहुत लम्बी है लेकिन आप इतना जान लें कि इनके मेन्यु में ‘मांस‘ समान रूप से शामिल है।

धर्म का पालन ऐच्छिक नहीं बल्कि अनिवार्य होता है
जनाब राकेश लाल जी ! मैं संबोधित तो भाई सुज्ञ को कर रहा था लेकिन समझ आप भी गए होंगे, क्यों ?
आप धर्म को चाय-कॉफ़ी की तरह मामूली चीज़ मानते हैं क्योंकि वह आपको अभी तक प्राप्त ही नहीं हुआ है। मैं चाय और कॉफ़ी दोनों पीता हूं और कोई आदमी दोनों ही नहीं पीता। आप कहते हैं कि हरेक आदमी अपनी पसंद के मुताबिक़ चाय या कॉफ़ी की तरह किसी भी धर्म पर चल सकता है। आप अपनी बात को इंजील से प्रमाणित करें। है कोई प्रमाण ?
यीशु तो कहते हैं कि ‘मार्ग, जीवन और सच्चाई मैं ही हूं। बिना मेरे द्वारा पिता के पास कोई नहीं जा सकता।‘ (यूहन्ना, 14, 6)

मूर्तिपूजा का आग्रह क्यों ?
भाई रविन्द्र जी ! आपका हिन्दू धर्मग्रंथों से मोह भंग हो चुका है इसके बावजूद आप मूर्तिपूजा के पक्ष में बोलते रहते हैं। आपने कैरानवी साहब को संबोधित करके उनसे कहा है कि वे मुझे समझाएं कि ‘साधकों के लिए शुरू में ध्यान जमाने के लिए मूर्ति ज़रूरी है।‘ जैसे राकेश लाल जी को धर्म की प्राप्ति न हो सकी ऐसी ही हालत आपकी भी है। अगर आपको शुद्ध धर्म का ज्ञान होता तो आप जानते कि इनसान स्वयं एक जीवित मूर्ति है और उसका अपना वजूद ध्यान जमाने के लिए श्रेष्ठ है। इसमें बहुत से सूक्ष्म चक्र हैं। साधक उनपर भी ध्यान जमा सकता है। अपनी नाक के अगले हिस्से पर भी ध्यान जमा सकता है जैसा कि गीता (6, 13) में बताया गया है-
‘सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानकलोकयन्।‘
अर्थात नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए और किसी दिशा में न देखे।
इस तरह ध्यान जमाने के लिए एक श्रेष्ठ माध्यम भी मिल जाता है और इसकी इजाज़त भी है तब क्यों मूर्ति पर ही ध्यान लगाने का आग्रह किया जाए ?
जबकि मूर्ति पर तो चढ़ावे आदि चढ़ाए जाते हैं, उनपर कोई ध्यान तो जमाता ही नहीं और जब कोई ध्यान जमाएगा तो आंखें खुद-ब-खुद मुंद जाएंगी। बंद आंखों के लिए किसी मूर्ति का होना या न होना बराबर है, क्यों बात सही है कि नहीं ?

31 comments:

S.M.MAsum said...

एक बार फिर कई बेहतरीन जवाब अन्वेर साहब. आशा करता हूँ की लोग इन जवाबों से बहुत कुछ सीख जाएंगे. किसने दी है औरत को पुनर्विवाह की व्यवस्था ? सोंचना चहिये सभी को. इस्लाम मैं औरत को कितनी आज़ादी है सभी देख सकते हैं. देखिये चमगादड़ कैसी होती है.

DR. ANWER JAMAL said...

@ भाई मासूम साहब ! प्लीज़ मेरा नाम सही टाइप कर लिया कीजिये . कमेन्ट के लिए शुक्रिया .

S.M.MAsum said...

हिन्दू कानून पुस्तक मनुस्मृति के अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि - ''वे जो उनका मांस खाते हैं जो खाने योग्य हैं, कोई अपराध नहीं करते है, यद्यपि वे ऐसा प्रतिदिन करते हों क्योंकि स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के लिए पैदा किया है।'' (ख) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5 सूत्र 31 में आता है - ''मांस खाना बलिदान के लिए उचित है,
पवित्र कुरआन में कहा गया है- ''ऐ लोगो ! खाओ जो पृथ्वी पर है परंतु पवित्र और जायज़।'' (कुरआन, 2:168)

kumaram said...

अनवर जी पहले अध्ययन कर लें।
आप बिना प्रेक्टिकल किये डाक्टर कैसे बन गये मुझे तो आपकी डाक्टरेट पर शक है। एक भाई ने सही कहा था।

1. बाइबल के यहुन्ना 2 मे आया है यीशू ने दाखरस बनाया मतलब ताजे अंगूर का रस

2. शराब को दाखमधु कहते हैं।
यीशु ने उन से कहा, मटकों मे पानी भर दोः सो उन्हों ने उन्हे मुहांमुह भर दिया। यीशु ने उन से कहा, अब निकालकर भोज के प्रधान के पास ले जाओ।वे ले गए, जब भोज के प्रधान ने वह पानी चखा, जो दाखरस बन गया था, और नहीं जानता था, कि वह कहां से आया है, परन्तु जिन सेवकों ने पानी निकाला था, वे जानते थे तो भोज के प्रधान ने दूल्हे को बुलाकर, उस से कहा। John 2:7 to 9

kumaram said...

उत्तर नम्बर 2
जमाल जी पहले अध्ययन कर लें।

1.बाइबल बताती है कि पति पत्नी दोनो जिन्दा हैं चाहे भले अलग रहे विवाह बन्धन में बन्धे हैं अगर एक जन की मृत्यू हो जाये तभी विवाह से मुक्त हो सकतें हैं। विधवा से ब्याह कर सकतें हैं।
2. बाइबल में यीशू कहते हैं कि किसी कुवांरी या महिला को बुरी नियत से देख लेना भी व्यभिचार के बराबर पाप है।

kumaram said...

यीशु तो कहते हैं कि ‘मार्ग, जीवन और सच्चाई मैं ही हूं। बिना मेरे द्वारा पिता के पास कोई नहीं जा सकता।‘ (यूहन्ना, 14, 6)

यह बात बाइबल में ईसा मसीह ने चैलेंज के साथ कहा है।

कुरान षरीफ में भी यीषू के पाप का कहीं बयान नही आया है। कुरान बतलाती है कि मसीह मे राई के दाने के बराबर भी पाप नही था क्योंकि वह खुदा के वचन थे।

kumaram said...

डा0अनवर जमाल जी जरा गौर से पढ़े आधी लाइन पढ़ के कुतर्क करना आपके और धर्म के बारे में पहचान बता रहा है आप अपनी गलती छुपाने के लिये किस हद तक गिर सकते है।

आपको पता होगा अच्छे बच्चे के अन्दर जो अच्छे संस्कार पाये जाते है तो लोग उस बच्चे के मां बाप को धन्य कहते है। जहां से उसे अच्छे संस्कार मिलते है।
आपके धर्म से आपको कैसी शिक्षा मिली है आपके विचार बता रहे है।
यहुन्ना 10ः1से 12 और भी आगे बहुत कुछ लिखा है

मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जो कोई द्वार से भेड़शाला में प्रवेश नहीं करता, परन्तु और किसी ओर से चढ़ जाता है, वह चोर और डाकू है। परन्तु जो द्वार से भीतर प्रवेश करता है वह भेड़ों का चरवाहा है। उसके लिये द्वारपाल द्वार खोल देता है, और भेंड़ें उसका शब्द सुनती हैं, और वह अपनी भेड़ों को नाम ले लेकर बुलाता है और बाहर ले जाता है। और जब वह अपनी सब भेड़ों को बाहर निकाल चुकता है, तो उन के आगे आगे चलता है, और भेड़ें उसके पीछे पीछे हो लेती हैं; क्योंकि वे उसका शब्द पहचानती हैं।परन्तु वे पराये के पीछे नहीं जाएंगी, परन्तु उस से भागेंगी, क्योंकि वे परायों का शब्द नहीं पहचानती। यीशु ने उन से यह दृष्टान्त कहा, परन्तु वे न समझे कि ये क्या बातें हैं जो वह हम से कहता है।। तब यीशु ने उन से फिर कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि भेड़ों का द्वार मैं हूं। जितने मुझ से पहिले आए; वे सब चोर और डाकू हैं परन्तु भेड़ों ने उन की न सुनी। द्वार मैं हूंः यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा। चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं। अच्छा चरवाहा मैं हूं; अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है। मजदूर जो न चरवाहा है, और न भेड़ों का मालिक है, भेड़िए को आते हुए देख, भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है, और भेड़िया उन्हें पकड़ता और तिार बिार कर देता है। मजदूर जो न चरवाहा है, और न भेड़ों का मालिक है, भेड़िए को आते हुए देख, भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है, और भेड़िया उन्हें पकड़ता और तिार बिार कर देता है।

kumaram said...

आखरी उत्तर

क्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है?1 Corinthians 3:16

bhagvatprasad mishra said...

भाई मै बहुत बेसबरी से इन्तजार कर रहा था आप दूसरे पेज पर आ गये तो मै मजबूर हो गया।

भाई मै बहुत समय से इन्तजार कर रहा था कि आप पूछे गये सवालों बतायेगें। कई दिनांे से मेरा मन बेचैन था मैने सोचा चलो मै ही पूछ लेता हूं

अनवर जी क्या ये बात नीचे जो लिखी है सही लिखी है।
अगर यह बात सही है तो ऐसे में क्या होगा मुझे रास्ता बतांयें।

इब्ने सऊद कहते हैं कि हजरत मोहम्मद ने फरमाया है कि जब जहन्नम मे दाखिल होंगें और हजरत मोंहम्मद किसी को भी नजात नही दे सकते हैं कयामत के रोज मोहम्मद साहब कहेंगें कि ऐ कुरैष के लोगो ऐ अबद मुनाफ बेटों, ऐ अब्बास मुतालिब के बेटों, ऐ मेरी फूफी, मै तुमको खुदा से और कयामत के अजाब से नही बचा सकता हंू तुम अपनी फिक्र आप ही कर लो। ऐ मेरी बेटी फातिमा तू मेरे माल से सवाल कर सकती हो, परन्तु मै तुमको खुदा से नही बचा सकता हूं। तुम अपनी फिक्र आप ही कर लो। तब मोहम्मद साहब के मित्र अबुहुरेरा पूछते हैं कि ऐ असल्लम हजरत मोहम्मद क्या आप भी नही बच सकते, तब उन्होने कहा बेषक मै भी नही बच सकता। बुखारी सफा 702

Ejaz Ul Haq said...

आप चाय पी रहे हैं या कॉफ़ी या wine ?
@ kumaram !

कुमारम जी आप बहन हैं या भाई ?
हमें तो आपकी शक्ल नज़र न आई ,
प्रोफाइल आपका मिला नहीं
लिखा हुआ भी सो कुछ दिखा नहीं ।
1 . डाक्टर साहब की डाक्टरी पर तो चाहे शक करलो, लेकिन उनकी बात को ग़लत न समझो, क्योंकि अंग्रेज़ी अनुवाद भी डाक्टर साहब की बात को प्रमाणित करता है ।
when the wine hade given out , Jesus'mother said to him " they have no wine left " john 2,3 दाखरस और दाखमधू के शब्दों से हिंदी बोलने वालों में भ्रम फैलता है, न भरम में ख़ुद पड़ो न ही दूसरों को डालो पोस्ट पढ़ो खुद निकलो और दूसरों को भी निकालो ।
2 . त्यागी हुई औरत क्या करे ? पति के पास जा नहीं सकती, किसी और को बुला नहीं सकती और इंजील के मुताबिक दूसरी शादी भी रचा नहीं सकती ।
@ कहाँ रह गए राकेश लाल जी ?
आप चाय पी रहे हैं या कॉफ़ी या फिर कुमारम बनकर आप ही टिपण्णी फरमा रहे थे ? आइये और बताइए सौ बुराइयों की जड़ को हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने जायज़ बताया है या नाजायज़ ?
@ सुज्ञ जी !
मेन्यु मांग रहे थे आप अब तो मिल गया आपको साफ़-साफ़ ?

Anwar Ahmad said...

@ kumaram masih !
आपके लम्बे कमेन्ट में भी यह पंक्ति साफ़ देखी जा सकती है "जितने मुझ से पहिले आए; वे सब चोर और डाकू हैं"
यीशु से पहले कौन कौन आया उनके नाम बताओ ?

Aslam Qasmi said...

वाह दोस्‍त आज तो और दिनों से अधिक (140) पाठक आए परन्‍तु आपकी पोस्‍ट शानदार होने के कारण चुपके से निकल ले रहे हैं

बधाई

islam said...

bhai koi mujhe bhi in topics pe discuss karna sikha de , main yaha comments to kar sakta hu lekin mujhe jawab kaise milenge plz.
tell me @ my email adrees islamuddinansari84@gmail.com

Ravindra Nath said...

जमाल तुमने लिखा है कि सुज्ञ जी के पास सम्यक दृष्टि और बुद्धि का साथ ही वो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, क्योंकि वो तुम्हारी बात बिना तर्क के स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, पर इसी प्रकार उनकी बात को न मानने का हठ किए बैठे तुम इन सब दोषों से मुक्त हो, मुझे पसंद आया तुम्हारा यह घमण्ड, इसे बनाए रखो।

सुज्ञ जी ने तो कभी अपने तीर्थंकरों हेतु दोगला शब्द का प्रयोग नही किया है पर तुमने हिन्दु देवी देवताओं के लिए किन किन शब्दों का प्रयोग किया है अपने पुराने ब्लोग पलट कर देख लो फिर मुझे बताओ कि तुमको इस पर एतराज क्यों हो रहा है, मैं भी प्रारम्भ से कह रहा हूँ, कोइ भी टिप्पणी किसी के मान बिन्दु पर नही, पर या तो तुमको हिन्दी समझ नही आती या समझना नही चाहते।

मैने कभी नही कहा कि मेरा हिन्दू धर्मग्रंथों से मोह भंग हो चुका है, गलत बोलना तो खैर तुम्हारी फितरत मे है, मैने लिखा था कि मेरा धर्मग्रन्थों से मोहभंग हो चुका है और इसमे कुरान भी आती है, (मेरे पास कुरान कि एक प्रति है जिससे मैने पहले कुछ references डाले थे) वस्तुतः मेरा मोह भंग सबसे पहले इस्लाम के कुरान से ही हुआ, जो धर्म ग्रन्थ अपने अनुयायियों को सही और गलत मे भेद करना न सिखा सके उनको आतंकवाद के पथ पर जाने से न रोक सके उन धर्म ग्रन्थ पर से मेरा क्या किसी भी सभ्य इंसान का विश्वास उठ जाएगा, बाकियों की बात मैं नही करता।
मेरी हालत तो तुमसे बहुत अच्छी है क्योंकि मैं एक किताब का गुलाम हो कर नही रहा, मुझे तो अगर इस्लाम का महिलाओं को सम्पत्ति मे हिस्सा देना अच्छा लगा तो उसको सराहा, और अगर उनकी गवाही ½ की बात खराब लगी तो उसे लताडा, इसी प्रकार अगर मै हिन्दु धर्म के लचीलेपन का कायल हूँ तो वर्णाश्रम के वर्तमान स्वरूप का घोर विरोधी भी। तो मैं तुमसे कहीं उच्च स्थान पर हूँ क्योंकि मै सही के साथ हूँ, किताब के साथ नही।

तुमने नाक पर ध्यान जताने को बताया है, जरा अकल से बोलो कि कितनों के लिए यह संभव है, तुमने किया है कभी? रही बात मुर्ती के सम्मुख आँख बद होने की और उसके अप्रासंगिक होने की तो अगर तुमने अकल के साथ मेरी टिप्पणियां पढी हो तो मैने भी साकार को माद्धयम बताया है लक्ष्य नही, बता सकते हो कि तुम्हारी यह बात मेरे तर्क को कैसे काटती है?

मैं भी अब कुमरन की बात को थोडा सोचने पर मजबूर हो रहा हूँ - "मुझे तो आपकी डाक्टरेट पर शक है"

Ejaz Ul Haq said...

अज्ञान दूर होता है कुरआन से

@ रविंदर जी !
अगर इंजक्शन थोडा टाईट लग जाये तो मरीज़ को पूरा हक है डाक्टर पर झुंझलाने का कुमारम जी की और आप की शिकायतों में दम लगता है।

१. कुरआन के प्रति आपको मोह कब और क्यों पैदा हुआ था ? कृपया इस सवाल का जवाब दीजिये। मोह था भी या नहीं ?

२. अज्ञान दूर होता है कुरआन से जो कुरआन पढ़ लेता है समझ कर, वह तो यही कहता है।

स्वामी श्री लक्ष्मीशंकराचार्य जी का अनुभव भी यही है कि इस्लाम आदर्श है आतंक नहीं।

३. जो स्वामी जी को भी न माने तो वह यह बताये कि क्या वह उनसे ज़्यादा ज्ञानी है ?

bhagvatprasad mishra said...

आदरणीय भाई अनवर जमाल जी आप लोग न जाने कहां चाय काफी मे उलझ गये हैं। आप मेरी तरफ ध्यान नही दे रहे हैं। मै लगातार दो दिनो से आपके उत्तर के इंतजार मे बैठा हूं।

Tarkeshwar Giri said...

श्रीमान अनवर जी और सभी ब्लोगेर महोदय एंड महोदाया जी ,



घर चाय बनाते समय अगर चीनी ज्यादे हो जाय या दाल में नमक ज्यादे हो जाय तो उसे फेंकते नहीं हैं , बल्कि उसे सुधारने कि कोशिश करते हैं।

धर्म समाज से बनता हैं ना कि समाज धर्म से , इसलिए अगर समाज के अन्दर कोई बुराई फ़ैल जाये तो उस बुराई को दूर करना चाहिए न कि पूरा का पूरा समाज को दूर करने पे लग जाएँ।



अगर भारतीय समाज में कोई बुराई फैली हैं तो उसे दूर करते आप , आप लोगो ने तो पूरा का पूरा विदेशी समाज ही देशी लोगो पर ठोंक दिया हैं।



ये तो कायरता हुई न। आपने घर कि बुरी आदते दूर करने कि बजाय दुसरे घर कि बुरी आदतों को अपना बना लिया और आपस में ही लड़ने लगे।

सुज्ञ said...

अनवर साहब,
॰ “सुज्ञ जी ! आप अपने लिए केवल 'ले लो' सुज्ञ जी के सवालों का भी नंबर , पर भी ऐतराज़ करते हैं
॰॰॰ अनवर साहब यह प्रतिक्रिया कोई मेरे ‘अपमान’ से प्रेरित नहिं थी। क्योंकि मै आपसे मुखातिब था, आप मात्र एज़ाज़ साहब द्वारा दिये गये समाधान को स्वीकृति दे सकते थे, जैसे अभी इस वाक्य पर दे रहे है। मेरी जिज्ञासा का वहीं समाधान हो जाता।
भ्रांति-निवारण की जगह चर्चा को ठेला सा जाता है तो वितंडा लगना स्वभाविक है।
उपर का कथन भी आपका नहिं एज़ाज़ साहब का था, जिस पर आपने बडी तीव्र प्रतिक्रिया दी। अतः समाधान के लिये मुझे आप दोनो के कथन पर सम्म्लित विचार करना चाहिए।
मुझे एज़ाज़ साहब के कथन” जमाल साहब ! 'ले लो' सुज्ञ जी के ( सवालों ) का भी नंबर, राकेश मसीह जी को भी थोड़ा रेस्ट मिल जायेगा” से लगा था कि मैं जबर्दस्ती आपकी चलती चर्चा को अवरोधित कर रहा हूं।
पर चुकिं पोस्ट मुझे भी संबोधित थी, मै रूक न पाया। अब भी मुझे उस वाक्य से कोई एतराज़ नहिं है।

Ravindra Nath said...

Ejaz Ul Haq - अगर इंजक्शन थोडा टाईट लग जाये तो मरीज़ को तुरंत मालूम चल जाता है कि डॉक्टर किसी medical college से पढ कर इस क्षेत्र मे नही आया है अपितु शहर मे किसी दूसरे डॉक्टर के यहाँ compounder का काम करके गांव आ गया है और अपने अधूरे ज्ञान से सभी मरीजो को यमलोक भेजने की पूरी तैयारी मे है।

१. कुरान पढने की जिज्ञासा ओसामा के द्वारा अमरीका पर आक्रमण के पश्चात हुई, जानना चाहता था कि आखिर दुनिया मे सच मे ऐसी भी कोई विचारधारा है जो धर्म के नाम पर निर्दोषॉ के वध का समर्थन करता है।

२. सच मेरा अज्ञान दूर हो गया कुरान पढ कर और मैं जान गया कि हाँ दुनिया मे ऐसे भी धर्म हैं जो धर्म के नाम पर निर्दोषों की बलि मांगते हैं।

स्वामी जी को मानना या न मानना मेरा अपने विवेक पर है, जिस दिन स्वामी जी से मिलूंगा उनसे जरूर पूछूंगा कि वो दुनिया भर मे इस्लाम के द्वारा किए गये विध्वंस पर क्या विचार रखते हैं। तत्पश्चात ही मैं बताउंगा कि वो मुझसे ज्यादा ज्ञानी हैं या मैं उनसे।

सुज्ञ said...

अनवर साहब,

विरोधाभाषी (दोगली) वाणी तीर्थंकरो की हो ही नहिं सकती, अतः केवल आपको समानता दर्शाने के लिये कैसे कह दूं। उनकी विद्यमानता में ही कई प्रश्न आते थे, जो विरोधाभाष प्रतीत होते थे, पर तिर्थंकर तत्काल समभाव से समाधान प्रस्तूत कर देते थे, जो आज भी संरक्षित है। “साँच को नहिं आंच”
किसी भी (धर्म के) देव ईश्वर प्रभु का अपमान मैं आशातना पाप मानता हूं, और हम साधारण मनुष्यो द्वारा सर्वशक्तिमान का मात्र ‘दोगले’ (विरोधाभाष) शब्द (प्रश्नातिरेक) से अपमान हो, असम्भव है“साँच को नहिं आंच”
साधारण मनुष्य (जो मैं हूं) तो अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिये ईश्वर पर आरोप मढता ही है, अब उनका फ़र्ज़ बनता है जिन्होंने ईश्वर को जान लिया, वे तथ्यपूर्ण जवाब देकर ईश्वर पर आरोप न लगने दे। ईश-भक्ति का तकाज़ा है, हमारा ईश्वर राग-द्वेष मुक्त होकर सर्वज्ञ रूप उभरे। (अपमान हो गया अपमान हो गया, बस अब चुप, बात खत्म, ऐसा व्यवहार कौन करता है, आप समझदार है।) “साँच को नहिं आंच”

Ejaz Ul Haq said...

हिमाचल और कश्मीर से घट कर नहीं हैं आप

@ सुज्ञ जी !


आपके निर्मल हृदय से निकले उदगार,

देख, अच्छा लगा, आभार,

१. तीर्थंकरों की वाणियों में विरोधाभास नहीं है और वे आपके पास सरंक्षित भी हैं . इतना बड़ा खज़ाना आप दबाये बैठे हैं कम से कम हमें देते न तो दिखा ही देते. मानव कल्याण के लिए इतना फ़र्ज़ तो आपका बनता ही है ?

२. आपके आने से हमारी सभा में ताज़गी और रवानी आती है, इसलिए आपका हम स्वागत सदा करते हैं. अरुणाचल और कश्मीर से भी ज़्यादा बढ़कर आप अखंड हिस्सा हैं हमारे बौधिक परिवार का. आप आइये हमारे ब्लॉग पर, हमारे घर में, स्वर्ग में , और उससे पहले आप बने हुए ही हैं हमारे दिल में ।

Most Welcome

भारतीय संस्कृति मानती है कि मौत का समय निश्चित है

@ रविंदर जी !


१. आपकी बात से पता चला कि आपको कुरआन के प्रति मोह था ही नहीं बल्कि मात्र जिज्ञासा थी जो पूर्वाग्रह की वजह से गुमराही में बदल गयी । इसके निराकरण के लिए स्वामी जी से जल्दी मिलिये ।

२. किस देवी का अपमान कर दिया डा. साहब ने बताएं ?

३. आपने कहा कि डा. साहब गाँव में रहते हैं, और भारत की आत्मा भी गांव में ही बस्ती है। जहाँ आत्मा है वहीं परमात्मा भी है, तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि डा. साहब परमात्मा तक पहुँचने का साधन हैं ?

४. भारतीय संस्कृति मानती है कि मौत का समय निश्चित है डा. आदि तो मात्र ज़रिया हैं .जिसकी मौत नहीं आई उसे तो अर्जुन भी न मार पाये, क्या यह बात सही है ?

हो सकता है कि आप कोई ईसाई पंडत हो ?

@ भगवत प्रसाद मिश्रा जी !


१. हमने सुना है कि मनु स्मृति के अनुसार यदि कोई शुद्र किसी ब्रह्मण को उपदेश करे तो उसकी ज़बान काट ली जाये, ऐसा कहा गया है, इस डर के कारण किसी कि हिम्मत नहीं पढ़ रही होगी ।

२. आपका प्रोफाइल भी फ्रॉड लोगों जैसा है बल्कि है ही नहीं. हो सकता है कि आप कोई ईसाई पंडत हो ? कुमारम भी राकेश जी के मुंह से 'पीने' चले गये ? शायद दोनों के मुंह एक हैं या दोनों में नाम मात्र का ही भेद है ?

सुधरने के लिए आदर्श शिक्षा कौन देगा बताइए ?

@ तारकेश्वर गिरी जी !

१. समाज बदलता रहता है क्या धर्म भी बदलता रहता है ?

२. सुधरने के लिए आदर्श शिक्षा कौन देगा बताइए ?

सुज्ञ said...

एज़ाज साहब,

व्यंग्य से कह रहे है न ?
@@ "मेन्यु मांग रहे थे आप अब तो मिल गया आपको साफ़-साफ़ ?"

साफ़-साफ़!!!!?

कैसे भी बहस जीतने का अहमक भाव्………
लेकिन सोचना……।
ईश्वर सब जानता है उसने क्या आदेश दिये है। और क्यों

Dr. Ayaz Ahmad said...

बहुत खूब !

सुज्ञ said...

एज़ाज साहब,

मै कटाक्ष से व्यथित नहिं होता।

बहस जीतना चाहते है न आप??????

भले जीतिए, धर्म हारना न चाहिए!!(धर्म का अर्थ बस धर्म, आपवाला या मेरेवाला नहिं)

Tarkeshwar Giri said...

JAI HO MATA KI, JAI HO BHARAT MATA KI, AUR JAI HO BHARAT MATA KE SAPUTO KI

bhagvatprasad mishra said...

एजाजुल हक जी आपने मुझे ईसाई पंडित कैसे कह दिया मै आपके धर्म मे आस्था रखता हूं हम कुरान शरीफ के बारे में नही जानते है कहते है कि अरबी मे लिखी हुई है।

पिछली पोस्ट पढ़ रहा तो ये लिखा हुआ आया -
इब्ने सऊद कहते हैं कि हजरत मोहम्मद ने फरमाया है कि जब जहन्नम मे दाखिल होंगें और हजरत मोंहम्मद किसी को भी नजात नही दे सकते हैं कयामत के रोज मोहम्मद साहब कहेंगें कि ऐ कुरैष के लोगो ऐ अबद मुनाफ बेटोंए ऐ अब्बास मुतालिब के बेटोंए ऐ मेरी फूफीए मै तुमको खुदा से और कयामत के अजाब से नही बचा सकता हंू तुम अपनी फिक्र आप ही कर लो। ऐ मेरी बेटी फातिमा तू मेरे माल से सवाल कर सकती होए परन्तु मै तुमको खुदा से नही बचा सकता हूं। तुम अपनी फिक्र आप ही कर लो। तब मोहम्मद साहब के मित्र अबुहुरेरा पूछते हैं कि ऐ असल्लम हजरत मोहम्मद क्या आप भी नही बच सकतेए तब उन्होने कहा बेषक मै भी नही बच सकता। बुखारी सफा 702

तब मैने जमाल जी से पूछा कि ये जो लिखा है बो सच है कि गलत
और आपे मुझे इसाई पंडित कह दिया। पूंछना गलत काम है क्या।

DR. ANWER JAMAL said...

ध्यान जमाने के लिए बेजान मूर्ति एकमात्र साधन नहीं है
@ सुज्ञ जी ! इंसान को जिंदा रहने के लिए खाना पीना और चलना फिरना अनिवार्य है, यह एक सत्य है जिसे सभी मानते हैं लेकिन हरेक आदमी इसका पालन अपनी रीती नीति से करता है . बरसात , गर्मी और सर्दी के मौसम में भी आदमी का आचरण बदल जाता है . रेगिस्तान और मैदान की परिस्थितियों का भी आदमी के आचरण पर असर पड़ता है . सत्य एक ही रहता है केवल उसके अनुपालन की रीति बदल जाती है . आप चाहते तो इस मामूली सी बात को खुद ही समझ सकते थे .
@ रविन्द्र जी ! मैं क्या हरेक नमाज़ी बंदा सजदे में अपनी नाक पर ही दृष्टि रखता है और मालिक का ध्यान करता है . ध्यान जमाने के लिए बेजान मूर्ति एकमात्र साधन नहीं है तो इस पर अनावश्यक ज़ोर क्यों ?

man said...

मेरी माँ

S.M.MAsum said...

असलम कासमी साहब@, हर इंसान अपने अमाल का ज़िम्मेदार हुआ करता है. जैसा खून वैसी बोली. मेरा निवेदन है की, गलिओं वाले मेसेज अपने ब्लॉग से निकाल दिए जाएं और anonymous कमेन्ट disable कर दें . इस समाज मैं हर तरह के लोग हैं.कहां तक इन सब झमेलों मैं पडेंगे?सलीम साहब सत्य के ऊपर भावनाएँ और श्रधा काम करती है. लेकिन सत्य तो फिर सत्य ही होता है. एक ऐसा विडियो जिसे सबको देखना चहिये है? अगर हां तो बताएं अवश्य..

Ravindra Nath said...

@Ejaz Ul Haq:- १. मैं अचंभित हूँ कि किस प्रकार लोग भ्र्म की दुनिया मे जीते हैं, मैने कब कहा कि मेरा कुरान पर मोह था, न था न है और अब उसको पढने के पश्चात होने की कोई संभावना भी नही। मेरा पूर्वाग्रह दूर करने के प्रति अपनी ऊर्जा न लगाओ, हो सके तो वह वातावरण बनाओ जिससे तुम्हारे लो अनायास ही धर्म के नाम पर व्यर्थ मे अपने प्राणों की आहुति न दें, स्वयं भी जिएं दूसरों को भी जीने दें।

२. देवी के अपमान की बात फिर से मुझे तुम्हारे गुरुजी के सृष्टि के उत्पन्न होने की theory पर ले जाती है जहाँ निर्लज्जता पूर्वक तुम लोगो ने श्रीमद्भावत पुराण को उद्ध्र्त किया झूठा।

३. मैने यह नही कहा कि डा गांव मे रहते हैं, मैने कहा कि डा गांव के लोगो को ठगते हैं, comment ज्यादा ही कडवा है पर क्या करूँ जब इंजक्श्न टाइट लगता है तो यह तो सब समझ जाते हैं कि सामने वाला qualified बंदा नही है। तो ऐसा आदमी परमात्मा से मिलाएगा या जर्क भेजेगा थोडा शंशय रहता है।

४. भारतीय संस्कृति के विविध आयाम हैं उसमे से एक इसे मानता है कि मृत्यु निश्चित समय पर आती है तो दूसरा मानता है कि कर्म ही सब को नियंत्रिन करता है, अर्थात कर्म के अनुसार भाग्य बदलता रहता है। महर्षि चार्वाक ने तो भाग्य को पूर्णतः खारिज किया हुआ है, अतः आप किस आयाम की बात कर रहे हैं जरा स्पष्ट करें।

मुझ पर ईसाइ पंडित होने का आरोप लगाने वाले हो सकता है कि तुम विदेशी ताकतो के जरिया हो हम लोगो को आपस मे लडाने के लिए।

Ejaz Ul Haq said...

@ रविंदर जी !
यह बात आपके लिए नहीं थी, मैंने भगवत प्रसाद मिश्र जी को कहा है इसाई पंडत,
@ मिश्र जी !
आप को क्यों न समझा जाये इसाई पंडत , बताओ तो सही ?