सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Friday, October 8, 2010

A dialogue with Mr. Mahak goyal and other well wishers 'हिन्दू जाति' और ‘हिन्दू धर्म‘ की खूबियां और उनका प्रभाव - Anwer Jamal

आपकी आपत्ति जायज़ है
@ मेरे अतुल्य और अमूल्य बंधु-ब्रदर ! आपकी टिप्पणी मिली और पता चला कि आपको मेरा शब्द-चयन पसंद नहीं आया। मुझे ‘हिन्दुओं की तरह‘ लिखने के बजाय ‘कुछ हिन्दुओं की तरह‘ लिखना चाहिए था। मैं आपको ध्यान दिलाना चाहूंगा कि मैंने अपने इन शब्दों में एक लिंक भी दिया था ताकि पढ़ने वालों को पता चल जाए कि मेरा आशय किन हिन्दुओं से है ?
सभी हिन्दू आवागमन को नहीं मानते, यह सच है। मेरे लिखने में अगर अस्पष्टता रह गई है तो मैं आपकी आपत्ति को जायज़ मानते हुए लेख को एडिट करके उसे आपकी मंशा के मुताबिक़ कर दूंगा।
मैंने ऐसा कब कहा कि आपको कुरबानी या किसी इस्लामी मान्यता पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए था ?
मैं तो चाहता हूं कि सवालों का गला नहीं घोंटा जाना चाहिए। जो सवाल मन में उठे उसे सामने रखा जाए ताकि जो उसे हल कर सकता है वह उसे हल कर दे। इस तरह सवाल हल होंगे तो ज्ञान बढ़ेगा और अज्ञान का अंधेरा अपने आप ही दूर हो जाएगा।
ईश्वर और धर्म एक है केवल नाम अलग हैं
सबका मालिक एक है, मानव जाति एक है। ईश्वर ने मानव जाति को सही-ग़लत की तमीज़ सिखाई। ईश्वरीय विधान का नाम ‘धर्म‘ है। हिन्दुस्तान में आया तो इसी धर्म को ‘हिन्दू धर्म‘ कह दिया गया, अरब में आया तो उसे ‘दीन ए अरबी‘ कह दिया गया। कुरआन में इसी को ‘इस्लाम‘ कहा गया और वैदिक साहित्य में धर्म को शांति का स्रोत बताया गया। ‘इस्लाम‘ का धात्वर्थ ही ‘शांति‘ है। मालिक शांति चाहता है और उसके बन्दे भी। जो नाहक़ शांति को भंग करे वह ‘शैतान‘ है। जो मानव जाति को बांटे और उसे आपस में लड़ाए वह शैतान है। हमें मालिक को भी पहचानना है और शैतान को भी। मालिक पर भरोसा करना है और शैतान से खुद को और लोगों को बचाना है ।
बेहतर भविष्य के लिए सुधार लाज़िमी है
मनुष्य चिंतनशील और प्रयोगधर्मी है। उसका हरेक विचार सही नहीं हो सकता। ग़लत विचारों से ग़लत कर्म पैदा होते हैं जिनसे समाज में अशांति और तबाही आती है। अपने और समाज के सामूहिक सुधार के लिए विचारों को परिष्कृत करना अनिवार्य है और इसके लिए हमें आपस में चर्चा-मंत्रणा करनी ही होगी। इसी से भारत एक शक्ति के रूप में उदित होगा। निकट भविष्य के हालात भारत के अनुकूल होंगे लेकिन अगर हम ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ न बन सके तो कोई फ़ायदा न हो सकेगा। समय आएगा और किसी और का चयन कर लिया जाएगा।
किसी भी बात पर खून-खराबा न किया जाए। विवादों को बैठकर बातचीत के माध्यम से सुलझाया जाए क्योंकि खून-खराबे के बाद भी आपस में ही बातचीत करनी पड़ती है। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे सर्वमान्य बातों को सभी आस्तिक-नास्तिक जनों को तुरंत मान लेना चाहिए और जिन बातों में मतभेद है उन पर सलाह-सुझाव लेते-देते रहें।
हिन्दू जाति की खूबियां और उनका प्रभाव
आप मुझे गुरू और गुरूतुल्य कहते हैं, यह आपकी खूबी है, आपकी ही नहीं बल्कि सारी हिन्दू जाति की खूबी है। आपमें विनय है, हिन्दू जाति में विनय है। जहां विनय होता है वहां ज्ञान और हरेक शुभ खुद ब खुद खिंचकर आ ही जाता है और आ भी रहा है। मैं गुरू नहीं हूं लेकिन आपसे आदर पाकर अच्छा लगता है। कोई गाली देता है, बुरा कहता है तो बुरा लगता है। मैं तारीफ़ और निंदा को समभाव से नहीं लेता बल्कि इन्हें इंजॉय करता हूं। दोनों के अपने-अपने रस हैं। जब हम बुरेपन को महसूस कर सकेंगे तब ही हम किसी अच्छेपन को समझने के लायक़ बनते हैं। मुझे बुरा कहने वाले भी मुझ पर उपकार ही करते हैं। वे मुझे कुछ देकर ही जाते हैं ।
मैं भी उन्हें कुछ देने की ही कोशिश कर रहा हूं। अपने जीवन में सत्य ढूंढा, मानवता के दुख-दर्द का कारण और उसका निवारण ढूंढा और पा भी लिया। कुछ पाने के लिए हमें कुछ खोना पड़ता है लेकिन पुरानी चीज़ों से हमें मोह हो जाता है। उन्हें छोड़ते हुए हमें दुख होता है।
ईश्वर तक पहुंचने का बेहतरीन ज़रिया हैं मां-बाप
जो कपड़े अनम ने पहने थे मैंने उन्हें फेंकने न दिया लेकिन मेरी वालिदा साहिबा ने कहा कि इन्हें नहर डाल दो, बच्ची बीमार थी। क्या तुम साइंस को भी नहीं मानते ?
मैंने अपनी वाइफ़ से कहा कि इन्हें पानी में उबाल लो, डिटौल से धो लो लेकिन फेंको नहीं। उन्होंने कहा कि अम्मी ने कहा है फेंकने के लिए, चाहती तो मैं भी नहीं। बहरहाल ‘मां के हुक्म‘ को पूरा करना पड़ा लेकिन उसके कपड़ों को फेंकते हुए उसे फेंकने का सा अहसास दुख देकर गया।
इनसान जज़्बात में जीता है। जज़्बात ही इनसान को कभी इनसान और कभी शैतान बनाते हैं। हमें अपने जज़्बात में संतुलन लाना होगा। अगर हम अपने मां-बाप का हुक्म मानते हैं तो हमें उन्हें रचने वाले मालिक का हुक्म मानना भी सीखना होगा। मां-बाप ईश्वर तक पहुंचने की बेहतरीन सीढ़ी अर्थात बेहतरीन माध्यम हैं। जिसने मां-बाप को छोड़ दिया उसे कोई ध्यान-ज्ञान और समाधि ईश्वर तक नहीं पहुंचा सकती।
परिमार्जन के लिए धन्यवाद
मुझे आपकी बात बुरी नहीं लगी। आपके टोकने से मेरे अंदर सुधार हुआ है। आगे भी टोकते रहें। दो भाई दो हाथों की तरह हैं। एक हाथ खुद को नहीं धो सकता। आपने मेरी कमी की तरफ़ ध्यान दिलाया और मैंने उसे दूर कर लिया। मैं आपका कृतज्ञ हूं। धन्यवाद
धर्म ईश्वर की ओर से होता है
जनाब सतीशचन्द गुप्ता जी की ओर से किसी ने मेरे कथन को उद्धृत करते हुए उस पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। दरअस्ल दुनिया बहुत से दार्शनिकों के दर्शन, कवियों की रचनाओं और लोक परंपराओं के समूह को हिन्दू धर्म के नाम से जानती है। मनुष्य की बातें ग़लत हो सकती हैं बल्कि होती हैं। इसलिए उन्हें मेरे कथन पर ऐतराज़ हुआ लेकिन मैं ईश्वर के उन नियमों को धर्म मानता हूं जो ईश्वर की ओर से मनु आदि सच्चे ऋषियों के अन्तःकरण पर अवतरित हुए। ईश्वर के ज्ञान में कभी ग़लती नहीं होती इसलिए धर्म में भी ग़लत बात नहीं हो सकती। ऋषियों का ताल्लुक़ हिन्दुस्तान से होने के कारण मैं उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहता हूं।
ऋषियों का चरित्र आदर्श होता है
ऋषि-व्यवस्था में कुछ बातें सब ज़मानों के लिए होती हैं और कुछ बातें विशेष परिस्थितियों के लिए। आज हमारे सामने भारतीय ऋषियों का जीवन चरित्र सुरक्षित नहीं है। इसी कारण आज हमें वैदिक साहित्य के वास्तविक मंतव्य को समझने में भारी कठिनाई आती है क्योंकि हम नहीं जानते कि कौन बात तात्कालिक हालात के लिए थी और कौन सी हर ज़माने में पालन करने योग्य ?
जो बातें तात्कालिक हालात के लिए थीं और आज अप्रासंगिक हो चुकी हैं, वे आज ग़लत लग सकती हैं लेकिन जब उनकी आवश्यकता थी तब वे ग़लत नहीं थीं। यह बात केवल ऋषि-व्यवस्था के लिए है। दार्शनिक और कवि लोग ऋषियों की श्रेणी में नहीं आते। इनकी बातें तभी मान्य हैं जबकि वे ऋषि-व्यवस्था के अनुकूल हों।
धर्म की जगह अब दर्शन का चलन आम है हिन्दू समाज में
हिन्दुओं के पास अब केवल दर्शन और काव्य है, ऋषि-व्यवस्था का लोप हो चुका है, धर्म का लोप हो चुका है। इसीलिए वे अब संस्कृति की बातें करते हैं या फिर दर्शन की। मैं धर्म के उसी सनातन स्वरूप को मानता हूं जो ईश्वरीय है और एक ही मालिक की ओर से हर देश-क़ौम में अलग-अलग काल में प्रकट हुआ। उसमें न कोई कमी कल थी जब उसे सनातन और वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था और न ही कोई कमी आज है जबकि उसे ‘इस्लाम‘ के नाम से जाना जाता है।
कमियां मनुष्य की ओर से हैं
कमियां हो सकती हैं मुफ़्तियों के फ़त्वों और इस्लाम की व्याख्या करने वालों के समझने और समझाने में। आलिमों के लिखे इस्लामी लिट्रेचर में भी कमियां देखने में आती हैं। ये कमियां मनुष्य के चिंतन की कमियां हैं, धर्म की नहीं। ईश्वर हर कमी और कमज़ोरी से पाक है और उसका धर्म भी। ‘हिन्दू धर्म में कोई भी बात ग़लत नहीं हो सकती‘ से मेरा आशय यही है कि मैं ग़लत बातों को ईश्वर की ओर से नहीं मानता, उन्हें धर्म का अंग ही नहीं मानता। दार्शनिकों की बातों को दुनिया हिन्दू धर्म मान बैठी है, उसे ‘हिन्दू दर्शन‘ कहा जाना चाहिए न कि ‘हिन्दू धर्म‘। दर्शन मनुष्य के मन से निकलता है। एक दार्शनिक की बात दूसरा दार्शनिक काटता आया है। एक दार्शनिक के लिए ईश्वर और आत्मा में आस्था रखना भी अनिवार्य नहीं है। भारत में भी नास्तिक दार्शनिक हुए हैं और उनके साहित्य को भी धार्मिक साहित्य में सम्मिलित कर लिया गया। धर्म के लोप होने से ही ऐसा संभव हो पाया। इसीलिए चारों तरफ़ हाहाकार मचा हुआ है।
धर्म से है मनुष्य का कल्याण
धर्म नहीं तो कल्याण नहीं। आओ धर्म की ओर, आओ कल्याण की ओर। इसी को अरबी में ‘हय्या अलल फ़लाह‘ कहते हैं। मस्जिदों से यही आवाज़ लगाई जाती है, सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि सब के लिए लेकिन सब तो वहां क्या जाते, मुसलमान भी कम ही जाते हैं और वहां जाने वाले भी अपने कर्तव्यों का पालन करने में सुस्ती दिखाते हैं।

मुसलमान होने के लिए हकीक़त की दुनिया में रहना ज़रूरी है
@ सुज्ञ जी ! आप की आलोचना का स्वागत है . आप जैसे लोग अभी हमारे बीच हैं यह हमारे लए सामान ए तसल्ली है.
१- मैंने बिना तर्क दिए कहीं नहीं कहा कि मांसाहार का विरोध न करें . बल्कि मैंने बताया है कि मांसाहार का विरोध क्यों न करें . प्रमाण भी दिए हैं अब हज और क़ुरबानी का वक़्त सामने है , बात उठेगी तो फिर दूंगा हालाँकि मैं पाचन प्रॉब्लम कि वजह से मांसाहार नहीं करता . मुसलमान होने के लिए गोश्त खाना ज़रूरी नहीं है लेकिन हकीक़त कि दुनिया में रहना ज़रूरी है . मानव जाति के लगभग ७ अरब सदस्यों का पालन बिना मांसाहार के संभव नहीं है.
२- मैं सभी तीर्थंकरों का आदर करता हूँ और जैन आचार्यों का भी. वर्तमान में होने वाले सर्वधर्म संवाद कि शुरुआत में जैन आचार्यों का बड़ा योगदान है . इससे ज्ञान बढ़ा , प्यार बढ़ा , देश आगे बढ़ा .
३- संबोधित व्यक्ति की मान्यताएं सामने रहें तो अपनी बात के लिए शब्द चयन आदि सटीक रहता है , बात को समझाना आसन रहता है .
४- मैं सवालों का सवागत करता हूँ . शिष्टता को बनाये रखें तो संवाद देर तक कायम रह सकता है . आपसे कभी भाषा आदि कि शिकायत नहीं आई . अन्य उद्दंड ब्लोगर्स से भी मैं आपकी मिसाल देकर विनती करता रहता हूँ , आप जानते ही होंगे .
@ कहाँ रह गए राकेश लाल जी ?
क्या सारा मैटर कल ही पेस्ट कर डाला ? अब इन सवालों के जवाब कौन देगा ?
@ रविन्द्र जी ! लीजिये हमने आपके कहने के मुताबिक भाई महक की बात मान ली है . हम आपकी लम्बी उम्र की दुआ मालिक से मांगते हैं . लगे रहिये , हमारे साथ बने रहिये .

55 comments:

सलीम ख़ान said...

ek achchhi post... anwar bhai aajkal aap mere blog ki galiyan bhool gayen hai shayed !

DR. ANWER JAMAL said...

@ ऐसा नहीं है सलीम भाई . आप दरगुज़र से काम लीजिये, कुछ वक़्त बाद आपको शिकायत न होगी. इंशा अल्लाह .

Anwar Ahmad said...

आपका कोई जवाब नहीं
लाजवाब हो

वन्दे ईश्वरम vande ishwaram said...

Nice post .
1-मुसलमान होने के लिए हकीक़त की दुनिया में रहना ज़रूरी है.
2-आओ धर्म की ओर, आओ कल्याण की ओर। इसी को अरबी में ‘हय्या अलल फ़लाह‘ कहते हैं। मस्जिदों से यही आवाज़ लगाई जाती है

Dr. Jameel Ahmad said...

ईश्वर तक पहुंचने का बेहतरीन ज़रिया हैं मां-बाप
Bilkul Sahi Kaha Aapne .

HAKEEM YUNUS KHAN said...

Where has gone Mr. Rakesh lal ?

RAKESH LAL said...

प्रिय भाई अनवर जमाल जी मेरा आशय किसी को अपमानित करने का कतई नही है। आप बहुत बड़े तर्क शास्त्री है। और मेरे भाई बातों का और तर्क या बहस का कभी अन्त नही है।

मेरे भाई किसी भी वस्तु को जब खाया जाता है तब उसका स्वाद पता चलता है। आपके तर्क करने से पता चलता है कि आपने किसी का भी स्वाद नही चखा है आप किसी के याने कि पूर्वजों के या कि सिर्फ और सिर्फ पढने के अनुसार आप तर्क करते है। जिसका कभी अन्त नही है।


मेरे कुछ सवाल है मैं आप से जानना चाहूंगा उनका आप मुझे जवाब दें मै आपकी सारी गलतफहमी दूर कर दूंगा।

1. ईसाई धर्म कब स्थापित हुआ।
2. आप जिस धर्म को मानते है वो कब स्थापित हुआ।
3. क्या आप मुहम्मद साहब को मान कर उनके पीछे चलते है।

Mahak said...

मैं तो चाहता हूं कि सवालों का गला नहीं घोंटा जाना चाहिए। जो सवाल मन में उठे उसे सामने रखा जाए ताकि जो उसे हल कर सकता है वह उसे हल कर दे। इस तरह सवाल हल होंगे तो ज्ञान बढ़ेगा और अज्ञान का अंधेरा अपने आप ही दूर हो जाएगा।


आदरणीय ,प्रिय एवं गुरुतुल्य अनवर जी ,

अगर आज की पोस्ट के बारे में मेरे विचार पूछे जाएँ तो मैं बहुत हद तक आपकी आज की इस पोस्ट की बहुत सी बातों से सहमत हूँ और आपका धन्यवाद अदा करता हूँ की शब्द-चयन को लेकर मेरी आपत्ति का आपने सम्मान रखा और मेरे निवेदन को अपनी स्वीकृति दी ,बस मांसाहार और थोड़ा बहुत कुछ छोटी-२ बातों पर असहमति है परन्तु उस पर भी फिर कभी हम समय की भरपूर उपलब्धता होने पर चर्चा करेंगे ,आप तो जानते ही हैं की आपका और मेरा स्वभाव बिलकुल एक जैसा है

अभी के लिए तो अगर मेरे किसी भी शब्द से आपको दुःख पहुंचा हो तो पुन्हः क्षमां करें

आभार

महक

DR. ANWER JAMAL said...

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को मैं खुदा क्यों मान लूं जबकि वह खुदा के रसूल हैं ?
@ जनाब राकेश लाल जी ! हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को मैं सपने में देख चुका हूँ . किसी के लिए इस बात की अहमियत हो या न हो लेकिन एक ईसाई के लिए यह बात मायने रखती है .
१-आप आकर मुझे किसी चीज़ को मानने की दावत दे रहे हैं , आप कह रहे हैं कि मैं हज़रात ईसा अलैहिस्सलाम को ईश्वर मान लूं , खुदा मान लूं . तो क्या मुझे यह पूछने का हक नहीं है कि जीने-मरने वाले नबी को खुदा क्यों मान लूं ?
२-क्या आपने सोचा था कि हज़रत मरयम के बेटे को खुदा मैं ऐसे ही मान लूँगा ?
पहले आप मेरे सवालों के जवाब दीजिये , फिर आप जो पूछेंगे मैं आपको बताऊंगा .
३-आपने कुरआन खोलकर देखा नहीं और कह दिया कि "सारे मुसलमान जहन्नम में जायेंगे". मुझे बताइए कि कुरान पाक में कहाँ लिखा है ?
क्या आप अपने कहे को साबित नहीं करेंगे ?
४-"आपने कह दिया कि मैंने किसी को भी नहीं चखा" . अगर आपकी बात बिना हुज्जत मान लेता तो बेवकूफी करता और तब आप कहते कि "आप बड़े ज्ञानी (?) हैं , क्यों ?
५- मेरी नज़र में तो "धर्म" एक है , कई हैं ही नहीं .
6-भाई राकेश लाल जी ! कहाँ हाथ ड़ाल बैठे ? अब आपको बिना बताये नहीं जाने दिया जायेगा . ट्रिक यहाँ नहीं चलेगी . सीधे सीधे जवाब दीजिये . लोगों का entertainment खामख्वाह क्यों कर रहे हैं आप ?

Mahak said...

प्रिय सुज्ञ जी और रविन्द्र जी का भी धन्यवाद चर्चा में शामिल होने और अपने विचार रखने के लिए

हम सभी चर्चा की शालीनता और स्वस्थ-संवाद की परम्परा को बनाए रखेंगे यही मुझे हम सबसे उम्मीद है


महक

DR. ANWER JAMAL said...

@ मेरे अतुल्य और अमूल्य बंधु-ब्रदर !निष्पक्ष लोगों की आलोचना से मार्ग मिलता है , दुःख नहीं. आप मुझे मेरी कमियां बताते रहिये मैं आपका आभारी रहूँगा . आप आदर देते हैं तो इस दुनिया से उखड़ता हुआ दिल कुछ और जी लेना चाहता है वरना यहाँ रखा ही क्या है ? एक फ़क़त प्यार है जो हमें आज भी हासिल है , खुदा का शुक्र है .

RAKESH LAL said...

सूरए मरियम

और तुममे से कोई ऐसा नहीं जो जहन्नुम पर से होकर न गुज़रे (क्योंकि पुल सिरात उसी पर है) ये तुम्हारे परवरदिगार पर हेतेमी और लाज़मी (वायदा) है (71

RAKESH LAL said...

सूरए मरियम
और (अलहमदोल्लिाह कि) मुझको सरकश नाफरमान नहीं बनाया (32)
और (खु़दा की तरफ़ से) जिस दिन मैं पैदा हुआ हूँ और जिस दिन मरूँगा मुझ पर सलाम है और जिस दिन (दोबारा) ज़िन्दा उठा कर खड़ा किया जाऊँगा (33)

RAKESH LAL said...

प्रिय भाई अनवर जमाल जी मैने ऐसा कब कहा कि आप हज़रात ईसा अलैहिस्सलाम को ईश्वर मान लेें।

2. प्रिय भाई अनवर जमाल जी मुझे आप बतायें कि कोई डाक्टर थ्योरी पढ. कर बिना प्रेक्टिकल करे सर्जन बन सकता है। हम थ्योरी पढ़ कर सर्जन बन जायेंगें तो बेचारे जो बिमार हैं मरीज हैं जिन्हें आपरेशन की जरुरत है। उनका हाल बताने की जरुरत मै नही समझता हूं।
अगर आप स्वाद चख लेते तो यह बात आप नही करते।

3. दुनिया मे अनगिनत धर्म हैं और ईश्वर या भगवान हैं। और उनके मानने वाले हैं। आप अपने नजरिये से कैसा देखते है ये आप बोल रहे है।
मेरा मानना है कि सब धान पांच रुपये पसेरी या धड़ी नही बिकती है।
4. मै बे वजह कहीं हाथ नही डालता हूं। अगर आप ऐसे क्रोध मे आयेंगें तो दूसरे लोगों को क्या संदेश देंगें।
5. मैने अपने बिलाग में किसी भी मजहब या इंसान की निन्दा या आलोचना नही की है। मेरी आप से गुजारिश हैं कि अगर कोई गलती मुझसे हो गई है तो आप अल्लाह के नेक बन्दे हैं आप मुझे माफ कर दें। मुझे पूरी उम्मीद है कि आपने मुझे माफ कर दिया है।

safat alam taimi said...
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safat alam taimi said...

rakesh lal जी!
सब से पहले हम डा0 अनवर जमाल साहब को हार्दिक बधाई देते हैं कि उन्होंने इतना अच्छा लेख प्रस्तुत किया है। सच्ची बात यह है कि मैं उनके लेखों को बड़े शौक़ से पढ़ता हूं।
दूसरी बात यह कि सत्य एक इनसान की धरोहर होती है। वह व्यक्ति सत्य को कदापि नहीं पा सकता जो अपने पूर्वजों के रिती की ओर देखता हो...
इस दुनिया में मानव के लिए एक ही धर्म आया और अब तक वह धर्म सुरक्षित रूप में हमारे बिच पाया जा रहा है। ज़रूरत यह है कि अपनी खोल से ज़रा निकल कर इसकी खोज की जाए.... आज इस्लाम ही एक ऐसा धर्म है जो अल्लाह (तीन में का एक नहीं, या मानव रूप भी नहीं) तक हमें पहुंचा सकता है। उसके अतिरिक्त सब मानव के नाम से बनाए गए धर्म हैं। इस्लाम भी वैसा ही हो सकता था यदि इसमें मोहम्मद सल्ल0 को ईश्वर का पुत्र अथवा उसका रूप माना जाता तो... क्या कोई धर्म है जिसमें मानव की पूजा न की जा रही हो ... सिवाए इस्लाम के

S.M.MAsum said...

मां-बाप ईश्वर तक पहुंचने की बेहतरीन सीढ़ी अर्थात बेहतरीन माध्यम हैं। जिसने मां-बाप को छोड़ दिया उसे कोई ध्यान-ज्ञान और समाधि ईश्वर तक नहीं पहुंचा सकती। बहुत ही अच्छी बात कही अन्वेर साहब.

RAKESH LAL said...

प्रिय भाई परमेश्वर ने मूसा अलैहिस्सलाम को दस आज्ञायें दीं थीं जिसमें एक ही आज्ञा ऐसी है जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है।
‘‘तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिस से जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उस में तू बहुत दिन तक रहने पाए।।’’Exodus 20:12

RAKESH LAL said...

प्रिय भाई सफत आलम जी खोज करने से क्या नही मिल सकता है इंसान खोज करते हुऐ चॉंद, मंगल, जैसे कई ग्रहों तक पहुंच गया है। ढूढने से क्या नही मिल सकता है। मगर खोज करने पर ही मुमकिन है।
मै बताना चाहता हूं कि मेरे पूर्वजों ने ईसाई धर्म ग्रहण किया था। पहले वे हिन्दू धर्म मानते थे। बचपन से मुझे ईसाई धर्म की शिक्षा मिली मै हिन्दू धर्म से अनभिग्य था। मेरे मन मे एक सवाल उठता था कि मेरे पूर्वजों ने क्यों ईसाई धर्म अपनाया था। मैने बहुत खोज करी और अपने लक्ष्य पर पहुंचा हूं। मैने बाइबल मे जो लिखा है या जो ईसा मसीह दो हजार वर्ष पहले कार्य किये हैं। क्या आज भी ईसा मसीह के नाम से हो काम हो सकते है।
खोज करना कोई बुरी बात नही है। मानव जीवन एक बार ही मिलता है जब तक हम जिन्दा हैं हमारे पास बहुत से मौके हैं जिस दिन हम मर जायेगें सब कुछ खतम हो जायेगा। तो हम अपनी कीमती जिन्दगी के लिये बेपरवाह क्यों रहें।

लिखा हुआ पढ़ कर या किसी से सुन कर मान लेने और प्रेक्टिकल या आजमा कर मानने में काफी फर्क है।

जावेद अख्तर साहब जी का शेर मुझे बहुत पंसंद है। इरादे नेक हों और हौसले बुलन्द हों तो मंजिलें आसान हो जाती हैं।

सुज्ञ said...

@१- मुसलमान होने के लिए गोश्त खाना ज़रूरी नहीं है लेकिन हकीक़त कि दुनिया में रहना ज़रूरी है . मानव जाति के लगभग ७ अरब सदस्यों का पालन बिना मांसाहार के संभव नहीं है.

॰ यह मेरी जानकारी में पहला अवसर है, मैने किसी भी दर्शन-शास्त्र में यह नहिं पाया कि उपदेशको द्वारा समस्त जगत के आहार की एकमुस्त सामुहिक चिंता की गई हो। फ़िर जब हम सात अरब मानव-जाति के आहार की आज चिंता करते है, तो संशय उत्पन्न होता है, सात अरब के महामूल्य प्राणों की चिंता तो हमें नहिं, और निकल पडे भविष्य का आहार नियोजित करने । कहते हैं जां है तो जहां है। पहले जिंदा रहना जरूरी है फ़िर जिंदा रहने के लिये आहार की।

@२- मैं सभी तीर्थंकरों का आदर करता हूँ और जैन आचार्यों का भी. वर्तमान में होने वाले सर्वधर्म संवाद कि शुरुआत में जैन आचार्यों का बड़ा योगदान है . इससे ज्ञान बढ़ा , प्यार बढ़ा , देश आगे बढ़ा .

॰अनवर साहब, सवाल यह नहिं है आप किसी का किसप्रकार आदर करते है, महापुरूष स्वयंमेव आदर योग्य है,हम साधारण मनुष्यों द्वारा अनादरित किये जाने पर भी उन्हे कोई फ़र्क नहिं पडता। उल्टा हमें पडता है कि अनादर से हम सत्य-ज्ञान से वंचित रहते है। वे तो मान में अपमान में निरपेक्ष ही रहेंगे।
सवाल यह है, कि जब भी आपको इस्लामी मान्यताओं पर पुछा जाता है कि ”ऐसा क्यों करते हो” तब कुराआन के संदर्भ से निराकरण करने की जगह हमेशा प्रतिप्रश्न ही करते है, इस तरह “ तुम्हारे में भी ऐसा क्यों है”

@३- संबोधित व्यक्ति की मान्यताएं सामने रहें तो अपनी बात के लिए शब्द चयन आदि सटीक रहता है , बात को समझाना आसन रहता है .

॰ मान्यताओं से हमारे मन में पूर्वाग्रह का आभास बनता है, जो तथ्य-आधारित चर्चा को गलत दिशा दे जाता है। सवालों के उत्तर जो सही है वही होने चाहिए, न कि व्यक्ति कौन है,किस तरह का है, उस आधार पर उत्तर बना कर दिये जाय।
@४- मैं सवालों का सवागत करता हूँ . शिष्टता को बनाये रखें तो संवाद देर तक कायम रह सकता है . आपसे कभी भाषा आदि कि शिकायत नहीं आई

॰हां मै स्वयं शिष्टता का सम्मान करता हूं, न केवल शब्दों की शिष्टता बल्कि मनोग्रंथियों की निर्मलता पर भी ध्यान देता हूं। शिष्ट व सौम्य भाषा में भी कोई हमारे मन पर अवशिष्ट विचारों का प्रक्षेप करे,मुझे पसंद नहिं।

Ravindra Nath said...

जमाल जी आपके बिंदुओ पर मेरी आपत्ति निम्न हैंः-

१- मानव जाति के लगभग ७ अरब सदस्यों का पालन बिना मांसाहार के संभव नहीं है.
क्या इसी तर्क पर शूकर मांस जायज है (उसका सेवन तो जिन्ना भी करते थे) और वैसे भी आज कल बडे बडे फार्मों मे शूकर को मक्के पर पाला जाता है मल पर नहीं।

२- मैं सभी तीर्थंकरों का आदर करता हूँ और जैन आचार्यों का भी. वर्तमान में होने वाले सर्वधर्म संवाद कि शुरुआत में जैन आचार्यों का बड़ा योगदान है . इससे ज्ञान बढ़ा , प्यार बढ़ा , देश आगे बढ़ा .
तो क्या इस आदर भाव के चलते आप जैन धर्मावलंबियों को इस्लाम स्वीकार करने हेतु बरगलाना छोड देंगे?

४- मैं सवालों का सवागत करता हूँ . शिष्टता को बनाये रखें तो संवाद देर तक कायम रह सकता है . आपसे कभी भाषा आदि कि शिकायत नहीं आई . अन्य उद्दंड ब्लोगर्स से भी मैं आपकी मिसाल देकर विनती करता रहता हूँ , आप जानते ही होंगे

मैं जानता हूँ कि मैं अपनी बात अधिकतर कठोर शब्दों मे रखता हूँ, कृपया हमारे मान्यताओं का मजाक बनाना बंद करें मैं भी कठोर बिना मतलब बात नही करता। अभी भी लिखा है "हिन्दुओं की तरह‘ लिखने के बजाय ‘कुछ हिन्दुओं की तरह" क्या इस बात को हम भी कह सकते है (महक भाइ के शब्दों को उधार ले रहा हूँ) कुछ मुसलमानों की तरह आतंकवादी, अच्छा लगता हो तो बोलियेगा, मैं इसका प्रयोग अपने हर टिप्पणी मे करूँगा।

Ejaz Ul Haq said...

@ राकेश लाल जी !
आप ने पहले लिखा था कि:-
मसीहा बिचवई है:-
सूरेःमरियमः 19ः67-70 आयत मे कुरान स्वयं कहती है या गवाही देती है कि हर एक मुसलमान और जिन्न और गुनहगार जहन्नम मे झोंका जायेगा और अल्लाह दोजख मे से धीरे धीरे उनके कामों के अनुसार निकालेगा और जिन्नो को और लोंगों को नरक मे घुटने के बल डालेगा। कुरान स्वयं बताती है और कहती है कि सब को नरक में जाना है

अब आप ने कुरआन खोल कर देखा तो आपको सूरए मरियम में यह आयात ही नहीं मिली इसीलिए अब आप यह कहने पर मजबूर हैं कि:
सूरए मरियम
और तुममे से कोई ऐसा नहीं जो जहन्नुम पर से होकर न गुज़रे (क्योंकि पुल सिरात उसी पर है) ये तुम्हारे परवरदिगार पर हेतेमी और लाज़मी (वायदा) है (71)

कमेन्ट - जहन्नम के ऊपर से गुज़रने का मतलब "गुज़रना" होता है, जहन्नम में डाला जाना नहीं होता ।

खुदावन्द यीशू मसीह की महानता
आप ने कहा कि :
कुरान मजीद का अध्ययन करने से यह पता लगता है कि प्रभू यीशू मसीह बहुत महान
हैं।

कमेन्ट- यहाँ आप ने साफ़ अल्फाज़ में खुदा के नबी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को खुदा कहा है फिर अपने कहे हुए से पीछे क्यों हट रहे हैं मिस्टर?

बेशक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम महान हैं और उन्हें कभी शैतान ने नहीं छुआ कुरआन यही बताता है , उसके बावजूद भी आप कुरआन को और उसके नियमों को क्यों नहीं मानते? इंजील की उस मिलावटी बात को सच क्यों मानते हो? जिसमें कहा गया है " फिर शैतान यीशु को एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया मत्ती (4 ,8 ) हमें बताया गया है कि शैतान तो उस इलाके से भी भाग जाता है जहाँ तक मसीह की नज़र पहुँचती है फिर यह कैसे संभव है कि शैतान मसीह को कहीं ले जाय और मसीह शैतान के पीछे- पीछे चले जाएँ ?

आपने लिखा है कि " दुनिया में बहुत सारे ईश्वर हैं"
कमेन्ट- कृपया इसके समर्थन में आप कुरआन या इंजील में से प्रमाण दीजिये, अगर आपने इन दोनों को या इन दोनों में से किसी एक को भी पढ़ा हो तो ?
आप ने दावा किया, अब आपको दलील भी देनी पड़ेगी। आपको बताना पड़ेगा जो आपसे पूछा जायगा, आपसे पूछा गया है कि

1-आप की बाइबिल में किताबों की संख्या रोमन केथोलिक की बाइबिल से कम हैं या बराबर ?
2- क्या आप " ओरिजिनल सिन" में विश्वास रखते हैं और मासूम बच्चों को पाप से जन्मजात तौर पर ही कलंकित मानते हैं.
आप बात को गोलमोल मत कीजिये सीधे -सीधे पिछली पोस्ट्स पर उठाये गए सवालों के जवाब दीजिये, आपसे न कोई नाराज़ है न ही आपको माफ़ी मांगने की ही ज़रुरत है, हम हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को प्यार करते हैं और उनसे प्यार करने वाले आप जैसे लोगों से भी प्यार करते हैं, आप जो कुछ कहना चाहें हम सुनने के लिए तैयार हैं लेकिन हमारे सवालों का आपको सटीक उत्तर देना होगा ।

धर्म और दर्शन में मूल अंतर

@ सुज्ञ जी !

दर्शन रचने वाले आदमी की द्रष्टि और ज्ञान सिमित होता है यह दार्शनिक केवल अपनी या अपने सिमित अनुयायियों के लिए ही चिंतन कर सकते हैं सारे जगत के पालन की चिंता इनका विषय नहीं होती क्योंकि ये सारे जगत के पालनहार नहीं होते जो सारे जगत का पालनहार है भरण पोषण का 'मार्ग' सबको सदा से वही दिखता आया है, वेद, बाइबिल और कुरआन देख लीजिये. आपको मानवजाती का मेन्यू मिल जायेगा ।

2- सत्य एक ही होता है लेकिन औरत मर्द बच्चा बूढ़ा और बीमार हरेक उसका पालन अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही करता है पहाड़ मैदान, टापू और रेगिस्तान की भौगोलिक दशाओं का भी मानव पर प्रभाव पड़ता है इसीलिए सत्य के पालन में इनसे भी बाधा और सुविधा पैदा होती रहती है सर्दी गर्मी और बरसात हर एक मौसम में आदमी का आचरण बदलता रहता है इससे पता चलता है कि अच्छा उपदेशक सत्य का उपदेश करते हुए संबोधित व्यक्ति की मानसिक और भौगोलिक परिस्तिथियों पूरा ध्यान रखता है. जो इन्हें नज़रअंदाज़ करता है वह लोगों को खामखाँ परेशान करता है ।

'इरफ़ान' मिल जाये, मार्ग मिल जाय तो इन्सान का जन्म सफल होजाता है,

@ सफत आलम साहब !

अस्सलाम अलैकुम , मैं आपकी समीक्षा को भी उतने ही चाव से पढ़ता हूँ जितना कि किसी सार्थक लेख को. इसीलिए आप नित्य टिपण्णी देने कि मेहेबानी करें ताकि हमें एक बावकार और बशिआर आदमी से रूहानी गिज़ा रोज़ाना मिलती रहे । 'इरफ़ान' मिल जाये, मार्ग मिल जाये तो इन्सान का जन्म सफ़ल होजाता है, हमें नेक बात बताइए सबको एक बनाइये, रब की तरफ बढाइये, आपसे यही दरख्वास्त है ।

सुज्ञ said...

एज़ाज साहब,
-धर्म और दर्शन की व्याख्या के लिये धन्यवाद;
लेकिन हमारी चर्चा धर्म के परीपेक्ष में थी, और मेरे दर्शन कहने का तात्पर्य भी धर्म से ही था।
मैं तो वेद, बाइबिल और कुरआन का ज्ञाता नहिं हूं, यह अन्तिम मानवजाति के तिनों ग्रंथ से मेनू आप प्रस्तूत कर देते तो ज्ञानार्जन हो जाता।
सम्पूर्ण जगत के भविष्यकालिन आहार के मेनू में वो क्या लिखते है?

DEEPAK BABA said...
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सुज्ञ said...

एज़ाज साहब,
-सत्य की मनमर्ज़ी विश्लेषण के लिये धन्यवाद;
"सत्य एक ही होता है" के क्या मायने होते है, इस वाक्य का वास्त्विक अर्थ क्या है,भावार्थ क्या है?
कृपया………

Tausif Hindustani said...

नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया हर बच्चा फितरते इस्लाम पर पैदा होता है बाद में वोह इसाई यहूदी वगैरह बन जाता है. मुसलमान नहीं बनता क्योंकि वह मुसलमान तो पहले से ही है . और इस्लाम धर्म आदम अलैहिस्सलाम से ही है और जितने नबी आये सभी ने इसी मज़हब की तरफ दावत दिया , इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है,
dabirnews.blogspot.com

Anwar Ahmad said...

nice post

@ कहाँ रह गए राकेश लाल जी ?
क्या सारा मैटर कल ही पेस्ट कर डाला ? अब इन सवालों के जवाब कौन देगा ? आपका डाक पता और फोन नंबर क्या है? मेहरबानी करके ज़रूर बताएं

@ महक जी !
महक जी के विचार और प्रयास प्राय: सार्थक हैं, चर्चा की सफलता के लिए सभी बधाई के हक़दार हैं । कभी समय मिले तो हापुड़ तशरीफ़ लायें ।

@ दीपक बाबा और तौसीफ हिन्दुस्तानी
खुशामदीद

सुज्ञ said...

एज़ाज साहब,
मानवजाति के तिनों ग्रंथ से अन्तिम मेनू आप प्रस्तूत कर दिजिये।
सम्पूर्ण जगत के भविष्यकालिन आहार के मेनू में वो क्या लिखते है?

सत्य एक ही होता है" के क्या मायने होते है, इस वाक्य का वास्त्विक अर्थ क्या है,भावार्थ क्या है?
कृपया………

zeashan zaidi said...

सुअर का मांस खाना क्यों मना है?
यकीनन हर चीज़ का एक कारण होता है। सुअर का मांस न खाने के पीछे भी कारण है। जैसा कि हमारे र्ध्माग्रन्थों में विदित है कि कुछ इंसानी नस्लों को अपनी नाफरमानी की वजह से खुदाई अज़ाब का सामना करना पड़ा और इसके नतीजे में वे कुछ जानवरों की शक्ल में बदल गये। अब इस्लाम में ऐसे जानवरों को खाने से मना किया गया है जिनकी शक्ल में वे इंसान बदले। जिस तरह इंसान का मांस खाना हराम है उसी तरह उन जानवरों का भी। कुरआन के अनुसार,
(बक़रा 2-65-66) और यकीनन तुम्हें उन लोगों का इल्म भी है जो तुम में से हफ्ता (शनिवार) के बारे में हद से बढ़ गये थे और हम ने भी कह दिया कि तुम ज़लील बन्दर बन जाओ। उसे हमने अगलों पिछलों के लिये इबरत का सबक बना दिया और परहेज़गारों के लिये नसीहत का।
(मायदा 5-60) (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तुम्हें अल्लाह के नजदीक सज़ा में इससे कहीं बदतर ऐब बता दूं। जिसपर अल्लाह ने लानत की हो और उसपर गज़ब ढाया हो और उनमें से किसी को बन्दर और सुअर बना दिया हो जो शैतान की परस्तिश करने लगे।
(7-166) फिर जिस बात से उन्हें रोका गया था जब उन लोगों ने उसमें सरकशी की तो हमने हुक्म दिया कि तुम ज़लील और धुत्कारे हुए बन्दर बन जाओ।
लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं कि आज के बन्दर वगैरा उन्ही इंसानों की नस्लें हैं। जो इंसान इन जानवरों की शक्ल में बदले थे वे तीन दिन से ज्यादा जिन्दा नही रहे थे। आज जो भी जानवरों की नस्लें हैं वे उन इंसानों से पहले मौजूद थे।

zeashan zaidi said...

@राकेश लाल जी,
एक मुस्लमान होकर हम हज़रत ईसा (अ.) को भी मानते हैं, हज़रत मूसा (अ.) को भी और दूसरे नबियों को भी. फिर हमें ईसाई बनने की ज़रुरत क्यों?

RAKESH LAL said...

मेरे प्रिय भाई आपको गलतफहमी हो रही है कि मै आपको ईसाई बनाने की कोशिश कर रहा हूं। मैने तो कहीं नही लिखा की आप ईसाई बन जायें या ईसा पर ईमान लायंे। मै बादशाह औरंगजेब नही हंू।
शायद आप लोंगों की बातों से मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरी लिखी हुई बातें आप लोंगों को हजम नही हुईं है।

मुझे चाय अच्छी लगती है कॉफी नही अच्छी लगती है। आपको चाय अच्छी नही लगती है। आपको कॉफी ही अच्छी लगती है।
तो आप कॉफी पीजिये । मुझे चाय अच्छी लगती है मै चाय पीता हूं।

मगर मुझे आप क्रमशः हर लेख का जवाब जरुर देवें

DR. ANWER JAMAL said...

@ राकेश लाल जी ?
क्या सारा मैटर कल ही पेस्ट कर डाला ? अब इन सवालों के जवाब कौन देगा ? आपका डाक पता और फोन नंबर क्या है? मेहरबानी करके Janab Anwar Ahmad Sahab ko ज़रूर बताएं.
Please come to the points.
A- आप बच्चों को क्या मानते हैं, मासूम या दुष्ट पापी ?
मेरे प्यारे भाई राकेश लाल जी ! आपने पहले ऐतराज़ जताया था कि पवित्र कुरआन में हज़रत ईसा मसीह का नाम ग़लत तरीक़े से आया है। फिर उसके बाद आपने कुरआन पाक की बहुत सी आयतें पेश कीं जिनमें हज़रत ईसा मसीह की पवित्रता और सच्चाई का बयान आया है। आपने उन आयतों को पेश करके मुसलमानों से अपील की है कि वे कुरआन की आयतों को मान लें।
मुझे इस संबंध में यह कहना है कि
1. जब आप मानते हैं कि पवित्र कुरआन में हज़रत ईसा मसीह का नाम ग़लत तरीक़े से आया है तो आप क्यों चाहते हैं कि मुसलमान उन्हें मान लें ?
2. अगर आप चाहते हैं कि मुसलमान कुरआन में आये हज़रत ईसा मसीह के बयान को सही मान लें तो फिर आप पर लाज़िम है कि आप खुद भी उसे मान लें। क्या आप मानते हैं ?
3. यदि आप कुरआन को नहीं मानते तो फिर आप क्यों चाहते हैं कि मुसलमान उसे मान लें जिसे आप खुद नहीं मानते ?
4. आप इंजील , गॉस्पल को मानते हैं लेकिन आपने मुसलमानों से नहीं कहा कि वे इंजील को मान लें, क्यों नहीं कहा ?
5. अब आपको यह जानकर बेहद खुशी होगी कि मुसलमान चाहे वह अमल में कितना ही कमज़ोर क्यों न हो तब भी कुरआन को पूरा सत्य मानता है और उसमें आये हज़रत ईसा के बयान को भी मानता है।
6. इससे भी ज़्यादा खुशी आपको यह जानकर होगी कि मुसलमान इंजील को भी पवित्र और सच्चा मानता है और ज़बूर व तौरात आदि को भी।
7. हज़रत ईसा मसीह हिब्रू भाषा बोलते थे लेकिन आज इंजील की सबसे पुरानी प्रति हिब्रू में नहीं पाई जाती। असली इंजील कहां है ?
8. एक वेद के चार वेद बन चुके हैं ठीक ऐसे ही एक इंजील की चार इंजीलें कैसे बन गईं ?
9. एक ही घटना को अलग-अलग इंजील में बिल्कुल जुदा क्यों लिखा गया जैसे कि हज़रत ईसा मसीह की वंशावली। मत्ती 1, 1 और लूका 3, 24 में हज़रत ईसा मसीह तक उनके पूर्वजों के नाम और पीढ़ियों का अंतर क्यों हैं ?
10. मुसलमान मानते हैं कि इंजील में ईसाई भाईयों ने मिलावटें की हैं, क्या आप उनकी इस बात को सही मानते हैं या ग़लत ?
11. प्रोटेस्टेंट मत वाले बाइबिल से 7 किताबें ‘जाली‘ कहकर निकाल दीं। क्या उन्होंने सही किया ?
11. आप रोमन कैथोलिक बाइबिल को उन 7 किताबों सहित ठीक मानते हैं या 7 किताबों कम वाली प्रोटेस्टेंट बाइबिल को , या फिर आपकी बाइबिल इन दोनों से ही अलग है ?
12. एक सवाल यह है कि आप मेरे ब्लॉग पर आते हैं और अपना ऐतराज़ जताकर या निमंत्रण देकर चले जाते हैं लेकिन मेरे किसी सवाल का जवाब आप नहीं देते क्यों ?
13. आप जवाब नहीं देंगे तो हम आप से संवाद कैसे कर पाएंगे ?
14. अब दुनिया बहुत होशियार हो गई है। वह किसी भी बात को केवल इसीलिए नहीं मान लेगी कि किसी ने किसी किताब या सिंद्धात को ईश्वर की ओर से कह दिया है। अब दुनिया दावे को पहले परखना चाहती है। क्या आप इस परीक्षा के लिए तैयार हैं ?
15. आप बच्चों को क्या मानते हैं, मुसलमानों की तरह मासूम या हिन्दुओं की तरह जन्मजात पापी ?
B- आपने मेरे ब्लॉग पर आकर हज़रात ईसा अ. को बिचवाई मानने के लिए कहा है और अब आप मना कर रहे हैं . आपकी याददाश्त कमज़ोर है या आप झूठ बोल रहे हैं ?
देखिये अपनी बात और सोचिये सही जवाब ?
1- जब मनुष्य का पुत्रा अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्ग दूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिहांसन पर विराजमान होगा।और सब जातियां उसके साम्हने इकी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा।और वह भेड़ों को अपनी दहिनी ओर और बकरियों को बाई और खड़ी करेगा।
2- खुदावन्द मसीह जो अल्लाह के रुह थे और वचन कलमा थे, दुनिया मे इस लिये आये कि सलीब पर बलिदान कुर्बान होकर हमारा नजात देने वाला हो जाये।
3- खुदावन्द मसीह इन्सान बन कर दुनिया मे आये कि खोये हुओं को ढूढे और उनका उद्धार करें खुदावन्द यीशू मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पायेगा। प्ररितों के काम 16 : 31 ।

Ejaz Ul Haq said...

@Ravindra ji !
भारत में बनेगा, रावण का भव्य मंदिर ?
1- अनिल कौशिक कहते हैं कि कि रावण की अच्छाइयों को समाज के सामने लाया ही नहीं गया। रावण प्रकांड पंडित और महान शिव भक्त था। वह अलौकिक शक्तियों का स्वामी भी था। उसकी मौत के समय खुद भगवान राम ने लक्ष्मण को उससे शिक्षा लेने के लिए भेजा था.
2- रावण मंदिर समिति के अध्यक्ष अनिल कौशिक ने कहा कि अब रावण के गुणों को लोगों के बीच लाया जाएगा। इस काम के लिए रावण की ससुराल मेरठ को चुना है। मय नामक दानव के नाम पर पहले इस जगह का नाम मयराष्ट्र था। मय की पुत्री मंदोदरी से रावण का विवाह हुआ था। मेरठ जिले की सरधना तहसील में भव्य रावण मंदिर का निर्माण करने के लिए भूमि पूजन किया जा चुका है।

abhishek1502 said...
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abhishek1502 said...

मैं इस ब्लॉग पर आना नही चाहता थे पर सलीम के ब्लॉग में पूछे गए प्रश्न का उत्तर ढूढने यहाँ आना पड़ा और मुझे जवाब नही मिला है .
और यहाँ जो चर्चा चल रही है तो मैं एक बात अपनी भी रखना चाहूँगा .
पूरी कुरान पढ़ लीजिये सारी मुस्लिम किताबे देख लीजिये मोहाम्द जी वो पहले व्यक्ति होंगे जो जन्नत में प्रवेश करेंगे और फिर वो ईश्वर से अपने अनुयायियों के लिए प्रार्थना करेंगे .
पर प्रभु ईशा मसीहा जी कहते है की जब मुझ पर विश्वाश रखने वाला हर व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश पा लेगा तब मैं प्रवेश करूँगा अर्थात सब को तार कर ही वे स्वर्ग में प्रवेश करेंगे .
अब पाठक स्वयं तय कर ले की इस्लाम और ईसईयत में मुख्य अंतर क्या है .
यहाँ तो मोहम्मद साहब खुद ही जन्नत में प्रबेश के लिए लाइन में सबसे आगे खड़े है . फिर उनके मानने वालो का चाहे जो हो .वो तो प्रबेश पा जायेंगे .
वही ईशु जी अभिवावक की तरह अपने मानने वालो के बाद सबसे अंतिम होंगे .

रही बच्चे की बात तो भूख और प्यास तो हर जीव को लगती है फिर फिर अगर वो रोता है तो ये उस की अभिवयक्ति है .ये उस का स्वभाव है जो ईश्वर का दिया हुआ है .बाल्यावस्था ,किशोरावस्था ,तरुण अवस्था , इन सब अलग अलग अवस्थाओ में उन का स्वाभाव भी अलग अलग होता है .

PARAM ARYA said...
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PARAM ARYA said...

९९- जो अद्वैत सत्य ईश्वर है.- यो० प० १७, आ० ३
( समीक्षक ) जब अद्वैत एक ईश्वर है तो ईसाईयों का तीन कहना सर्वथा मिथ्या है . ॥ ९९ ॥
इसी प्रकार बहुत ठिकाने इंजील में अन्यथा बातें भरी हैं. सत्यार्थ प्रकाश पृष्ट ४१४, १३वां समुल्लास
परम विचार - यह देखो ऋषि का चमत्कार. इसे कहते हैं गागर में सागर. यह थोड़े से शब्द तेरी पूरी पोस्ट पे भारी हैं.
पादरी तूने क्या चखा है यह तेरे उत्तर से स्पष्ट हो जायेगा. तेरे पे ज्ञान की आत्मा उतरती हो तो दे इसका जवाब.

Ravindra Nath said...

@Zeeshan zaidi:- आपने लिखा है "कुछ इंसानी नस्लों को अपनी नाफरमानी की वजह से खुदाई अज़ाब का सामना करना पड़ा और इसके नतीजे में वे कुछ जानवरों की शक्ल में बदल गये। अब इस्लाम में ऐसे जानवरों को खाने से मना किया गया है जिनकी शक्ल में वे इंसान बदले। जिस तरह इंसान का मांस खाना हराम है उसी तरह उन जानवरों का भी।"

फिर आगे आप लिखते हैं - "कुरआन के अनुसार, (बक़रा 2-65-66) और यकीनन तुम्हें उन लोगों का इल्म भी है जो तुम में से हफ्ता (शनिवार) के बारे में हद से बढ़ गये थे और हम ने भी कह दिया कि तुम ज़लील बन्दर बन जाओ।" मतलब बन्दर भी मना

आगे आप फरमाते हैं - "इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं कि आज के बन्दर वगैरा उन्ही इंसानों की नस्लें हैं। जो इंसान इन जानवरों की शक्ल में बदले थे वे तीन दिन से ज्यादा जिन्दा नही रहे थे। आज जो भी जानवरों की नस्लें हैं वे उन इंसानों से पहले मौजूद थे।" मतलब बंदर खा सकते हैं, फिर सुअर क्यों नही

दूसरी बात जैसे आपके रसूल ने कुछ लोगो को बंदर बनाया, हमारे महापुरुषों ने हर जानवर मे किसी न किसी इंसान को रूप बदल कर कभी न कभी डाला है, तो आप अगर इस सिद्धांत पर चलें तो कम से कम हमारे लिए तो 'जिस तरह इंसान का मांस खाना हराम है उसी तरह उन (सभी) जानवरों का भी।'



@Ezaj ul haq:- जी हमे अच्छी तरह मालूम है कि कुछ लोग रावण के भक्त हैं, रावण ही क्यों, वीरप्पन की भी पूजा होती है, जाइए उसके गांव वहां मंदिर बना हुआ है उस नर पिशाच का, इन सब पर समाज का आज कल कोइ बल चलता नही, और जब तक वोट की बात न हो शासन कुछ करता नहीं। आज भी लोग जिन्ना और औरंगजेब और हिटलर की प्रशंसा करते हुए मिल जाएगें तो क्या कुछ लोगो के कारण वो सही करार दे दिए जाएगे?

Ejaz Ul Haq said...

@ ravindra ji ! रावण प्रकांड पंडित और महान शिव भक्त था। वह अलौकिक शक्तियों का स्वामी भी था। उसकी मौत के समय खुद भगवान राम ने लक्ष्मण को उससे शिक्षा लेने के लिए भेजा था.
???

zeashan zaidi said...

रवीन्द्र नाथ जी,
इस्लाम में उन सभी जानवरों का खाना मना है जिनकी शक्ल में कुछ इंसानों को बदला गया. इनमे बन्दर, सुवर, गिद्ध, कव्वा, गधा, कुत्ता, बिना छिलके की मछलियाँ वगैरह शामिल हैं. ऐसे चार सौ जानवरों की किस्में ज़मीन पर हैं और तीन सौ पानी में.

zeashan zaidi said...

मुझे आपके धर्म की जानकारी नहीं लेकिन मेरा अंदाजा है की यही जानवर आपके ग्रंथों में भी मिलते होंगे जिनकी शक्ल में इंसान परिवर्तित हुए.

safat alam taimi said...

इस धरती पर ईश्वर, परमेश्वर, अल्लाह का नाम लेते तो सब हैं परन्तु उसे पहचानते बहुत कम लोग हैं। कहीं उसे "मानव रूप" दे दिया गया है तो कहीं उसे "तीन में का एक" मान लिया गया है। क्या ही अच्छा होता कि क़ुरआन की सूरः इख्लास का अध्ययन कर लिया जाता जिसमें ईश्वर के पाँच गुण बताए गए हैं
(1) वह एक है।
(2) उसको किसी की आवश्यकता नहीं पड़ती।
(3) न उसके पास संतान है।
(4) न उसके पास माता पिता है।
(5) न उसका कोई भागीदार है।

क्या यह गुण घरती पर पाए जाने वाले किसी महान गुरू में पाए जाते हैं, जो पैदा हुए हों, और एक समय बिता कर चल बसे हों ? कोई है जो इस तथ्य पर चिंतन मनन करे।

Ravindra Nath said...

@Ejaz ul Haq - हाँ रावण एक विद्वान व्यक्ति था और हमारे यहाँ ज्ञान की प्राप्ति के लिए कोई बंधन नही है, अतः श्री राम जी ने लक्ष्मण जी को रावण से ज्ञान प्राप्ति के लिए भेजा था, अन्यथा यहाँ तो ऐसी ऐसी जातियां हैं जो कि ज्ञान सागर तक्षशिला और नालंदा को सिर्फ इसलिए जला देते है क्योंकि उनकी मान्यता है कि सारा ज्ञान सिर्फ उनके धर्म ग्रन्थ मे है और बाकि सब अनावश्यक है।

@Zeashan Zaidi - हमारे यहाँ ऐसा कहते हैं कि सभी जीव एक दूसरे योनियों मे जन्म लेते रहते हैं अतः हम सभी जिवों मे मनुष्यों की भांति जीव देखते हैं।

विश्‍व गौरव said...

बन्‍दर वाली बात कुरआन में गुजरी हुई बात याद दिलती हैः

और याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम एक ही प्रकार के खाने पर कदापि संतोष नहीं कर सकते, अतः हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो कि हमारे वास्ते धरती की उपज से साग-पात और ककड़ियाँ और लहसुन और मसूर और प्याज़ निकाले।" और मूसा ने कहा, "क्या तुम जो घटिया चीज़ है उसको उससे बदलकर लेना चाहते हो जो उत्तम है? किसी नगर में उतरो, फिर जो कुछ तुमने माँगा हैं, तुम्हें मिल जाएगा" - और उनपर अपमान और हीन दशा थोप दी गई, और अल्लाह के प्रकोप के भागी हुए। यह इसलिए कि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते रहे और नबियों की अकारण हत्या करते थे। यह इसलिए कि उन्होंने अवज्ञा की और वे सीमा का उल्लंघन करते रहे॥2:61॥

निस्संदेह, ईमानवाले और जो यहूदी हुए और ईसाई और साबिई, जो भी अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया और अच्छा कर्म किया तो ऐसे लोगों का उनके अपने रब के पास (अच्छा) बदला है, उनको न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे -॥2:62॥

और याद करो जब हमने इस हाल में कि तूर पर्वत को तुम्हारे ऊपर ऊँचा कर रखा था, तुमसे दृढ़ वचन लिया था, "जो चीज़ हमने तुम्हें दी हैं उसे मजबूती के साथ पकड़ो और जो कुछ उसमें हैं उसे याद रखो ताकि तुम बच सको।"॥2:63॥

फिर इसके पश्‍चात भी तुम फिर गए, तो यदि अल्लाह की कृपा और उसकी दयालुता तुम पर न होती, तो तुम घाटे में पड़ गए होते॥2:64॥

और तुम उन लोगों के विषय में तो जानते ही हो जिन्होंने तुममें से 'सब्त' के दिन के मामले में मर्यादा का उल्लंघन किया था, तो हमने उनसे कह दिया, "बन्दर हो जाओ, धिक्कारे और फिटकारे हुए!"॥2:65॥

फिर हमने इसे सामनेवालों और बाद के लोगों के लिए शिक्षा-सामग्री और डर रखनेवालों के लिए नसीहत बनाकर छोड़ा॥2:66॥

मेरा देश मेरा धर्म said...

पाचन प्रॉब्लम कि वजह से मांसाहार नहीं करता . मुसलमान होने के लिए गोश्त खाना ज़रूरी नहीं है लेकिन हकीक़त कि दुनिया में रहना ज़रूरी है . मानव जाति के लगभग ७ अरब सदस्यों का पालन बिना मांसाहार के संभव नहीं है. =======================================

वैसे जमाल साहब आपका जन्म होने के बाद पालन कैसे हुआ होगा उस टाइम तो आप मांस नहीं न खा पाते होंगे !!!!

एक ठो विचारणीय तथ्य है -

प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर
तुलसी चिंता क्यों करें भज ले श्री रघुवीर !!!!

तो जमाल चिंता क्यों करे !-
भज ले किसी प्यारे को - रोटी की चिंता क्यों !!!
रोटी तो वो रह कीमत पर देगा ये उसका वादा है तुझसे !!!

पर बोटी के लिए मेहनत करनी ही पड़ती है ---------------

chandra said...

SATYA ISWAR HAI AUR NYAY DHARM HAI. ISLAM AUR HINDUISM EK HAI. ISLAM KEWAL ISLEYE ALAG HAI KI O KEWAL ARAB AUR ARBI BHASA KO MANATA HAI. ALLAH O AKABR KAHE TO MUSLMAN. ISWAR SABSE MAHAN HAI KAHE TO HINDU. HINDU KO IBADAT KARNE KE LIYE SANSKRIT BHASHA JARURI NAHI HAI LEKIN MUSLMAN KO IBADAT KARNE KE LIYE ARAB DESH AUR ARBI BHASHA NIHIYAT JARURI HAI.

chandra said...

ALLAH HAS 99 NAME IN KURAN, UNLIMITED NAMES IN ALL OVER WORLD. ONLY GOD IS TRUE. VED-PURAN, KURAN, BIBLE AND AVESTA ETC. NOT A WORD OF GOD. SEVERAL IYATE IN KURAN, SEVERAL SLOKES IN VED-PURAN AND SEVERAL PARAGRAPHS IN BIBLE ARE FALSE. WHY GOD SAY THAT TYPES OF SENTANCES.

chandra said...

MEN MUST HONOUR GOD ONLY. THEE ONLY ALMIGHTY.BE HUMEN. MAKE INSAN. DO NOT MAKE HINDU, MUSALMAN, ISHAI AND YAHUDI ETC.

chandra said...

BLOGGER IS NOT INSAN. HE IS EITHER HINDU OR MUSLMAN.

DR. ANWER JAMAL said...

@ चंद्रा जी ! अगर मनुष्य का मार्गदर्शन परमेश्वर ने अपनी वाणी के द्वारा न किया होता तो इंसान को आज किसी नैतिक मूल्य में यक़ीन न होता। यह सच है कि वेद और बाइबिल में संग्रहीत ईश्वाणी में मिलावट पाई जाती है और इसी कारण जगत के अंत से पहले परमेश्वर ने कुरआन को अवतरित किया है ताकि अगर हक अपने विचार और कर्म में सुधार और संतुलन क़ायम कर लें तो प्रकृति का संतुलन ठीक हो जाए। बाहर की दुनिया को हमारे कर्म प्रभावित करते हैं और कर्मों के पीछे हमारी नीयतें और नीतियें होती हैं। नीयत पाक हो, नीति ठीक और संतुलित हो तो समाज से हरेक जुर्म का सफ़ाया मुमकिन है।
पवित्र कुरआन में आज तक कोई मिलावट नहीं हो सकी है।
यह एक ऐतिहासिक सत्य है।
आप खुद भी इस चमत्कार को देख सकते हैं। कुरआन के अवतरण से ही आज तक लाखों कुरआन को ज़बानी याद करने वाले लोग हर देश में मौजूद हैं। जिन्हें हाफ़िज़े कुरआन कहा जाता है। इसके अलावा ख़लीफ़ाओं के ज़माने में लिखी गई कुरआन की प्रतियों में कई आज भी विश्व के अलग अलग म्यूज़ियम में रखी हैं।
पवित्र कुरआन में एक अद्भुत गणितीय योजना भी आज सामने आई है। एक अनपढ़ व्यक्ति तो क्या विश्व के सारे वैज्ञानिकों के लिए भी ऐसी गणितीय योजना बनाना असंभव है।
http://islamdharma.blogspot.com/2010_05_01_archive.html

drshyam said...

जमाल जी आपका कथन ---"उसमें न कोई कमी कल थी जब उसे सनातन और वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था और न ही कोई कमी आज है जबकि उसे ‘इस्लाम‘ के नाम से जाना जाता है।---"
---जमाल जी...वैदिक धर्म क्या आज इस्लाम में परिवर्तिति होगया है...आप के कथन से तो ऐसा ही लगता है....वैदिक धर्म तो आज भी वहीं है, आज उसे इस्लाम के नाम से थोडे ही जाना जाता है...यह गलत स्टेटमेन्ट है...
--वैसे तो इस टिप्पणी पुराण में इतना ज्यादा घपला होगया है कि सिर -पैर कुछ भी नहीं रह गया है मुझ मासमझ के लिये, समझ ने के लिये......
--परन्तु आपके उपरोक्त कथन से लगता है कि आपके ..पुस्तकें-शास्त्र-वेदादि-धर्म-दर्शन--के पठन-->मनन-->मन्थन--->अन्तस्थ/स्वीकरण प्रक्रिया में कहीं कमी है जिससे शब्दों/तथ्यों/वाक्यों / कथ्यों के वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते और अच्छा मन्तव्य होते हुए भी भ्रान्तियों को जन्म दे देते हैं और आरोपों को भी....
---आप क्यों अपने बारे में विग्यापन करना चाह्ते हैं ? इससे वेस्टेड-इन्टेरेस्ट कू बू आने लगती है.....आप बस अपना काम करते रहिये

chandra said...

DR. SAHAB YOU CAN SEE www.diesm.com and i DO NOT INTERESTED KNOW ABOUNT QURON. I AM ONLY INTERESTED FOR ONLY ALLAH. ARE ALLAH KNOW ONLY ONLY ARBI LANGUAGE. I PRAY AT LEAST SIMILAR WORD IN HINDI AS WLL AS MUSLIM IN ARBI. WHAT DIIFENCE BETWEEN ME AND YOU.

chandra said...

NAITIKATA AAJ MANUSYO ME PAHALE KI TULNA ME JYADA HAI. VED, QURON AUR BIBLE KA KOYEE YOGDAN NAHI HAI. VED, BIBLE AUR QURON KE VAJAH SE DANGE HO RAHE HAI. NAITIKATA TO KABIR,SAI BABA, GURU NANAK AUR ANEK SANT AISE HUYE HAI JISNE BATAYA KI ALLAH AND ISWAR EK HAI, USKE HAJARO NAME HAI.

chandra said...

THE NAME OF ALLAH, ISWAR ONLY IS MOST MERCIFULL AND BEFICIARY. DO NOT DISCUSS ON VED,PURAN, BIBLE QURON ETC.

chandra said...

DR, ANWAR SAHAB AAP APNI LEKHANI ME SUDHAR KIJIYE. HINDU, MUSLIM, ISHAI, YAHUDI ETC DHARM NAHI HAI. AADMI DWARA BANAYA GAYA GIROH HAI. GIROH KO DHARM KA NAME TO KRIPYA MAT DIJIYE. JO INSAN SATYA AUR NYAY PAR ADIG HI O HI KEWAL DHARMATMA HAI OR DHARM KA JANKAR HAI. AAP TO SHIRF "GIROH" KE JANKAR HAI