सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Saturday, March 6, 2010

श्री श्री रविशंकर जी और महापुरूषों का अपमान करने वाले दंभी आर्य आख़िर चाहते क्या हैं ? The black fire flag

आखि़र एक आर्य नफ़रत में इतना अन्धा क्यों हो जाता है कि वह उन महापुरूषों पर भी बेहूदा टिप्पणी करने लगता है जिनकी महानता का गान केवल देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में हो रहा है ? हिन्दू मुसलिम के बीच गिरती दीवारें और बढ़ता प्रेम देखकर इन्हें अपना अन्त क्यों दिखने लगता है? अपने ढहते हुए वर्चस्व को बनाये रखने की ख़ातिर कब तक ये लोगों को वर्ण व्यवस्था की ऊँचनीच की बेड़ियों में जकड़े रखने की नाकाम कोशिश करते रहेंगे ? http://satyagi.blogspot.com/2010/02/blog-post.html

आदरणीय आर्यबन्धु सौरभ आ़त्रेय जी ,


आपने मेरी पुस्तक ‘दयानन्द जी ने क्या खोजा, क्या पाया ?’ पर अपने विचार प्रकट किये

इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हालाँकि आपने बताया है कि आपके पास समय का अभाव है और ‘शायद ज्ञान का भी। शिष्टाचार का अभाव तो लेख से टपक ही रहा है। आपने करोड़ों लोगों के सम्मान के पात्र जनाब डा. ज़ाकिर नाइक को जोकर और चालाक लोमड़ी कहा और मुझे धूर्त, मूर्ख और कठमुल्ला की उपाधियाँ प्रदान कीं। इससे मेरा मान घटा नहीं अपितु बढ़ा है।

इस तरह के विशेषण तो दयानन्द जी सायण ,उव्वट और महीधर जैसे प्रकांड वेदज्ञों और नानक, कबीर और दादू जैसे संतों के लिए प्रयुक्त किया करते थे। ग़लत सोहबत में बैठने या ग़लत साहित्य पढ़ने से आदमी के विचार संक्रमित और व्यवहार दूषित हो ही जाते हैं।

आपकी हरेक धृष्टता मेरी नज़र में क्षम्य है क्योंकि मुझे आपसे प्रेम है। प्रस्तुत लेख के माध्यम से संवाद का यह प्रयास भी आपके प्रति प्रेम की ही उपज है।

आपने मुझे गुमनाम भी लिखा है और साथ ही मेरा नाम भी लिखा है। गुमनाम उसे कहा जाता है जिसका नाम अज्ञात हो। मेरा नाम पुस्तक पर अंकित है और आपको ज्ञात है सो मैं गुमनाम भी नहीं हूँ ।


आपने मेरी पुस्तक का प्रचार करने के कारण भाई उमर कैरानवी को सरफिरा कह दिया। सत्य सन्देश प्रचारकों को उनके समकालीन लोगों से अक्सर ऐसे वचन सुनने को मिले हैं।

चलिए हमें तो जो कहा सो कहा। अपनी श्रद्धा के केन्द्र स्वामी जी का नाम तो ठीक तरह सम्मान सूचक ‘शब्द सहित लिखा होता। मैंने भी उनके नाम के साथ ‘जी‘ लिखा है लेकिन आपने नहीं। भाई उमर कैरानवी ने आपको इस तरफ़ ध्यान दिलाया तो आपने ‘जी‘ तो लगा दिया लेकिन उनके नाम से पहले ‘शब्द मह्रिषी पर ध्यान नहीं दिया। अनायास ही सही लेकिन उपहास की स्थिति बन गई है । कृपया इसे भी दुरूस्त कर लें।


श्री श्री रविशंकर जी का अपमान क्यों ?
आपत्ति - “ मैंने रवि शंकर जी और जाकिर नाइक जी के यू ट्यूब पर एक डीबेट कांसेप्ट ऑफ़ गोड देखी और मुझे ये आश्चर्य हुआ कि रवि शंकर जी जिनको लोग श्री श्री रवि शंकर जी बोलते हैं जाकिर नाइक के कुतर्को का ढंग से उत्तर ही नहीं दे पाएए तभी मुझे अहसास हुआ इन हिन्दुओं के धार्मिक गुरुओं के ज्ञान और साहस का जो एक चालाक लोमड़ी से भी मात खा गए और न ही वो हिन्दुओं के दर्शन को जनता के सामने ढंग से रख पाए बल्कि जाकिर नाइक ने कुरान को अपने उलटे.सीधे कुतर्को से ईश्वरीय पुस्तक घोषित करके रवि शंकर जी को उसकी एक प्रति की भेंट दे दी”


निराकरण - श्री श्री रविशंकर जी केवल हिन्दुओं के ही नहीं बल्कि मुसलमानों सहित विश्व मानवता के आदर के पात्र हैं। उनको यह आदर किसी आडम्बर या बहसबाज़ी की वजह से नहीं मिला बल्कि उनको यह सम्मान उनके ज्ञान और उनके मानवीय गुणों की वजह से प्राप्त हुआ है। यू ट्यूब पर उपलब्ध डिबेट ‘कॉन्सेप्ट ऑफ गॉड’ में दो विद्वान अपने अनुयायियों के सामने बात करते हैं और पूरा वार्तालाप प्रेमपूर्ण वातावरण में सम्पन्न होता है तो इसे श्री श्री रविशंकर जी की मात कहना अपनी कम अक्ली का सुबूत देना है। अगर कुछ बातें मानी जाने योग्य थीं तो क्या उनको भी श्री श्री रविशंकर जी न मानते जैसे कि बहुधा आर्यसमाजी बुंध नहीं मानते ? बस, सत्य पक्ष ग्रहण का यही वह दुर्लभ गुण है जो उन्हें अन्य लोगों से श्रेष्ठ बनाता है। सत्य स्वीकारता ही वह है जो साहस का धनी होता है ।


नफ़रत की आग भड़काने वालों के मन्सूबों पर पानी फेरने के लिए भी बड़ा साहस चाहिए। श्री श्री रविशंकर जी यही काम कर रहे हैं ।
निचय ही श्री श्री रविशंकर जी न सिर्फ निर्मल और निश्छल हैं बल्कि साहस की प्रतिमूर्ति भी हैं।

क्या ऐसे महान विद्वान के ज्ञान, विवेक और साहस पर उंगली उठाना और उनकी विद्वत्ता पर संदेह प्रकट करना उनका अपमान करना नहीं है ?


और उन पर वार करते करते ‘इन हिन्दुओं के गुरूओं’ कहकर आपने सभी को निशाने पर क्यों ले लिया आर्यश्री ?‘इन हिन्दुओं के गुरूओं’’ ‘शब्द कहने से तो ऐसा लगता है जैसे आप खुद को हिन्दुओं अलग कुछ और चीज़ समझते हैं ।


‘इन हिन्दुओं के गुरूओं’ के व्यक्तित्व पर आक्रमण करना आप जैसे लोगों की आदत भी है और मजबूरी भी क्योंकि जब तक ये लोग हैं तब तक दयानन्द जी के मनमाने वेदार्थ को हिन्दू समाज में स्वीकृति मिलने वाली नहीं है । आगे आपकी लेखनी ने स्वयं ही आपके दिल का हाल कह दिया है।


सब ग़लत और स्वामी जी सही ?

आपत्ति - सहस्रों वर्षों के पश्चात लगता है दयानन्द सरस्वती जी ने अनेक मतों का विश्लेषण करके जनता के आगे सत्य वैदिक दर्शन रखा है अन्यथा आधुनिक हिन्दू संत तो सभी मतों को समान शिक्षा वाले बताते - 2 नहीं थकते।निराकरण - सभी मनुष्यों का उद्देश्य है सुख-शान्ति और आनन्द की प्राप्ति। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हरेक मनुष्य सोच विचार करके अपने पसंद के मार्ग पर चलने के लिए आज़ाद है। जब तक बहुत से लोग रहेंगे और उन्हें विचार की स्वतन्त्रता रहेगी तब तक बहुत से मत भी रहेंगे और उनमें भेद भी रहेगा लेकिन मतभेद का यह अर्थ हरगिज़ नहीं है कि लोग एक दूसरे से नफ़रत करें और दुश्मनी बढ़ाएँ, दंगे करें और खून बहाएँ ।


सत्य का अंश हरेक मत में है । कहीं सत्य पूर्ण है और कहीं न्यून । कहीं तो यह सत्य संतुलित दशा में है और कहीं तत्वतः सत्यता होने के बावजूद असंतुलन पाया जाता है । असंतुलित से संतुलित और न्यून से पूर्ण सत्य तक पहुंचने के लिए सामाजिक ‘शांति और सद्भाव बनाये रखना आदमी की बुनियादी ज़रुरत है । भौतिक और बौद्धिक विकास के लिए भी ‘शांति बहुत ज़रूरी है । इसलाम का तो अर्थ ही ‘शांति है ।हरेक मत में सामाजिक ‘शांति के नियम प्रायः समान हैं । मनुष्यों का कर्तव्य है कि जो हितकारी शिक्षाएं सभी मतों में समान है उनका पालन करते हुए परस्पर प्रीतिपूर्वक सार्थक संवाद करें । खून खराबा और सामाजिक विघटन टालने के लिए हिन्दू संत ही नहीं बल्कि मुस्लिम विद्वान भी यही बताते हैं । क्या इस पर आपत्ति केवल नासमझी की बात नहीं है ?किसी के झूठ से हकी़क़त नहीं बदलती


आपत्ति- ...और वास्तविक वैदिक दर्शन के ज्ञान के प्रकाश को देखकर स्तब्ध और चमत्कृत हो जाता है और वास्तविक संतुष्टि उसको प्राप्त होती है ।निराकरण- कहां तो अपने देश में भी वैदिक व्यवस्था लुप्तप्रायः हो और कहां अचानक आदमी को स्वामी जी से पता चले कि सूर्य चन्द्रमा और समस्त तारों पर वैदिक व्यवस्था को मानने वाले आर्य रह रहे हैं । यह सुनकर किसकी मजाल है कि वह चमत्कृत और सन्तुश्ट न हो लेकिन यह सन्तुष्टि बिल्कुल झूठी होगी क्योंकि यह सब ‘शब्दछल के अलावा कुछ भी नहीं है । अपनी मान्यताओं को तिलांजलि क्यों दे बैठे ? दयानन्द जी के वैदिक मत का जो हश्र स्वयं उनके मानने वालों ने किया है वह भी सबके सामने है। स्वयं उनके मानने वालों मे ही क्यों भेद हुआ और क्यों गुट बने ? दयानन्द एंग्लोवैदिक कॉलेजों में वैदिक शिक्षा का नामोनिशान क्यों नहीं मिलता ? और आर्य समाज मंदिरों की वीरानी अपनी बदहाली की कहानी खुद ही कह रही है। आर्य समाज मन्दिरों के पुरोहित लोगों का भविष्य बांचते फिर रहे हैं और आर्य समाज के सभासद भी जन्म कुंडलियां बनवाने में पीछे नहीं हैं ।


अन्य मतों के संघर्ष का समाधान बताने वाले खुद कई मतों में बंटकर क्यों टकरा रहे हैं ? आर्य समाज की शिक्षाओं का डंका बजाने वालों के घरों में भी सुबह शाम यज्ञ हवन तो होता नहीं अलबत्ता पौराणिक देवताओं की पूजा नियमित रुप से होती है । आप लोग न तो विधवाओं और विधुरों को नियोग की प्रेरणा देते हैं और न ही वेदोक्त रीति से गर्भाधान संस्कार करके सम्भोग करते हो ।


आर्य ‘शूद्र समान कब होता है ?
दयानन्द जी तो हवनादि न करने वाले को ‘शूद्र के समान समाज से बहिष्कृत कर देने का फ़रमान जारी कर रहे हैं और दुख की बात यह है कि हवनादि से दूर ‘शूद्र समान त्याज्य यही लोग इसलाम के उन्मूलन की फ़िक्र में दुबले हुए जा रहे हैं। एक बार आदमी तनिक देखे तो सही कि जिस समाज के लिए वह सत्य और ईश्वर से टकरा रहा है उसकी मान्य पुस्तकों की नज़र में खुद उसकी औक़ात क्या है ? जिस आदमी को उसका ही समाज ‘शूद्र अर्थात मूर्ख घोषित कर दे तो फिर उसकी बात पर ध्यान देकर अपना समय कौन ख़राब करेगा ?



अब कुछ पूर्व संवाद के बारे में ...
आदरणीय वेद व्यथित जी , आप तो कह रहे थे कि मुसलमान ज्ञान को नकार रहे हैं विज्ञान को नकार रहे हैं । लेकिन जब हमने आपसे पूछा कि दयानन्द जी की मान्यतानुसार सूर्य चन्द्रमा और तारों पर सर्वत्र मनुष्यादि प्रजा का वास है और वहां की व्यवस्था भी इन्हीं चारों वेदों के अनुसार चल रही है । सत्यार्थप्रकाश , अष्टमसमुल्लास तो इस बात पर आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । दयानन्द जी का उद्धरण देखते ही सारी ज्ञान पिपासा ‘‘शान्त हो गई ? यह व्यक्ति पूजा नही तो क्या है ? या फिर ‘‘शायद आपको यक़ीन ही नहीं आया होगा कि दयानन्द जी जैसा ज्ञानी भी ऐसी बात कह सकता है ? यजुर्वेद का हवाला देकर भी आपके सामने हमने अपनी जिज्ञासा प्रकट की थी । उस अश्लील अनुवाद को बार बार लिखकर न तो हम आपको ‘शर्मिन्दा करना चाहते हैं और न ही किसी अन्य को । आपने व्यंग्य न किया होता तो ‘‘शायद हम प्रथम बार भी उसे न लिखते । क्योंकि हम वेदों का सिर्फ़ आदर ही नहीं करते बल्कि उनकी कल्याणकारी शिक्षाओं का पालन भी करते हैं। बहरहाल आपने सोचा होगा कि पहले पढ़कर देख लूं कि हक़ीक़त क्या है ?अब लगभग 96 घण्टे बीत चुके हैं । पूरे ब्लॉग जगत की निगाहें आपकी तरफ़ लगी हुई हैं । उपरोक्त दोनों विषयों के बारे में आपका ज्ञान क्या कहता है ? हम तो कल आपके लिए पलक पांवड़े बिछाए बैठे रहे लेकिन आप नहीं आए । आए बग़ैर तो आपका दिल नहीं माना होगा लेकिन आपने अपनी हाज़िरी को ज़ाहिर करना मुनासिब न समझा होगा ।आप जितना समय लेना चाहें ले लें और किसी से पूछना या लाना चाहें तो ले आयें लेकिन हमें जवाब ज़रूर दें । देखा मुसलमान ज्ञान के कितने क़द्रदान होते हैं ? अहंकार बुरा होता है । किसी का तिरस्कार करना तो और भी ज़्यादा बुरा होता है । आपको टक्कर लग चुकी है आशा है अब जीवन में किसी को कुछ कहने से पहले अपना अवलोकन ज़रूर कर लिया करेंगे , विशेषकर किसी मुसलमान को कुछ कहने से पहले।

अग्ने नय सुपथा राय अस्मान । {वेद}

32 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

सत्य का अंश हरेक मत में है । कहीं सत्य पूर्ण है और कहीं न्यून । कहीं तो यह सत्य संतुलित दशा में है और कहीं तत्वतः सत्यता होने के बावजूद असंतुलन पाया जाता है । असंतुलित से संतुलित और न्यून से पूर्ण सत्य तक पहुंचने के लिए सामाजिक ‘शांति और सद्भाव बनाये रखना आदमी की बुनियादी ज़रुरत है । भौतिक आौर बौद्धिक विकास के लिए भी ‘शांति बहुत ज़रूरी है । इसलाम का तो अर्थ ही ‘शांति है ।हरेक मत में सामाजिक ‘शांति के नियम प्रायः समान हैं । मनुष्यों का कर्तव्य है कि जो हितकारी शिक्षाएं सभी मतों में समान है उनका पालन करते हुए परस्पर प्रीतिपूर्वक सार्थक संवाद करें ।ं खून खराबा और सामाजिक विघटन टालने के लिए हिन्दू संत ही नहीं बल्कि मुस्लिम विद्वान भी यही बताते हैं । क्या इस पर आपत्ति केवल नासमझी की बात नहीं है ?किसी के झूठ से हकी़क़त नहीं बदलती

बेनामी said...

इस्लाम का शांति से कुछ नहीं लेना देना।
अपना एजेंडा स्पष्ट कर दो भाई, जैसे तैसे चाहे जैसे मोहमडन्स की संख्या बढ़ानी है और इसके लिए अपनाए गए कई रास्तों मे से एक के तुम राही हो।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सही बात को घुमा फिरा कर इस्लाम के समर्थकों की बुराइयों को ढांक कर दूसरे जाकिर नाइक का काम रहे हैं आप लोग.

फजीहत अली said...

खुद मियाँ फजीहत औरों को नसीहत

sohail said...

kamal he !
sanatan dharma ya vedic dharma ke naween sanskaran ko arbi bhasha me islam kehte hain.
agar apko hindu dharma ke naween sanskaran islam se koi aapatti he to aap dharm pustak padh kar khud satye kyin nahi jaan lete.
logo ke bahkawe me na aayen apni aqal lagayen, kyonki marna mujhe bhi he aur aap ko bhi.
har koi itni baat to janta hi he
ki ishwer ek he.jab ishwer ek he to dharma bhi ek hi he. aur dharma ki isthapna ke liye avtar purush bhi aate hein. ab aap kewal ye check karen ki sanatan dharma ki punah esthapna ke liye jab kalki avtar mohammed sahab aaye to unhone koi nayee baat keh di jo sanatan dharma ki manyetaon ke khilaf ya virudh thi ya wohi baat he kewal bhasha ka anter he.
haan magar mohammed sahab dwara punah isthapit sanatan dharma ko janne ya check karne se pahle aapko sanatan dharma ki jaankarihoni zaroori he warna aap kaise check karenge. to bhai santan dharma ko jano. tabhi islam samajh me aayega.

Anonymous said...

es blog se to yahi lagta hai ki, musalmano quran chhod deni chahiye or VED and Geeta Ko padni chahiye, kyonki isme jabardasti quran ko VEdo se jodne ka kaam kar rahe, Ved Ki kitab us samay likhi gayee thii , musalmaan naam kii koi cheese nah thee. Dr Anvar kaa ek hi maksad hai Ved ko quran se jodna or Naphrat bhare islam dharm ko hindu dharm se jodna. Jo sachai se koso dooooor hain

Aslam Qasmi said...

nice post

विश्‍व गौरव said...

bhhot badhiya

muk said...

बेकार की बातों में समय गंवा रहे हो कहीं आश्रम खोल लो या नया कोई धर्म चालू कर दो

Anonymous said...

abe Ved ki baat Kar raha he ya quran ki, tu he kidhar ved ki taraf ya quran ki taraf,,ghantal bana ke rakh diya

mansoob said...

islam ko nafrat bhara dharm kehne walo se ye kehna chahta hun ki ek baar ISLAAM ka antim granth QURAAN padd kar to dekh lo phir tumhe kuch kehne ka adhikaar banta hai,internet par be wjah waqt barbaad karte rehte ho,quraan ko padh kar dekhoge to bahut kuch paaoge.

बेनामी said...

@ मनसूब
पढ़ कर ही कह रहा हूँ। तुम्हारी बात "antim granth QURAAN" ही बहुत कुछ कह जाती है। जब अंतिम हो गई तो सारे द्वार बन्द हो गए क़यामत तक। यही अंतिम बात और अंतिम पैगम्बर ही तो इस्लाम को नफरत भरा बनाते हैं।

ali said...

chachaa tum jaise taalibaani hi islaam ko badnaam kar rahe hai.

Anonymous said...

Mansoob Sahab Namaskar,
Quran mein yehi baten bahut hai naphrat phalane ke liye...
1. allah ke alawa doosra koi GOD nahi hain
2. Kewal allah kii pooja karo
3. Jo allaha ki poja nahi karte vo KAFIR hain.
4. KAAPHIR ko maro
5. Islam dhamr ko jabardasti phailo, jo islam dharm main convert nahi hota uska sir kaat do(Jaise abhi talibaan ne do sikhon ka SIR kaat diya thaa,Aurangeb ne bhee yahee kiya, bahut hinduao ko maar diya , kyonki unhone dharm nahi badla, India mein saare musalmaan pahle hindu the)

Jabki Hindu dharm saare dharmo bhaaichaara phailata hain

DR. ANWER JAMAL said...

Islam apne ander khud phelne taqat rakhta hai . pls see
http://my.opera.com/sunofislam/blog/

DR. ANWER JAMAL said...

कहीं सत्य पूर्ण है और कहीं न्यून । कहीं तो यह सत्य संतुलित दशा में है और कहीं तत्वतः सत्यता होने के बावजूद असंतुलन पाया जाता है । असंतुलित से संतुलित और न्यून से पूर्ण सत्य तक पहुंचने के लिए सामाजिक ‘शांति और सद्भाव बनाये रखना आदमी की बुनियादी ज़रुरत है । भौतिक और बौद्धिक विकास के लिए भी ‘शांति बहुत ज़रूरी है । इसलाम का तो अर्थ ही ‘शांति है ।हरेक मत में सामाजिक ‘शांति के नियम प्रायः समान हैं । मनुष्यों का कर्तव्य है कि जो हितकारी शिक्षाएं सभी मतों में समान है उनका पालन करते हुए परस्पर प्रीतिपूर्वक सार्थक संवाद करें । खून खराबा और सामाजिक विघटन टालने के लिए हिन्दू संत ही नहीं बल्कि मुस्लिम विद्वान भी यही बताते हैं । क्या इस पर आपत्ति केवल नासमझी की बात नहीं है ?किसी के झूठ से हकी़क़त नहीं बदलती

gulshan said...

sach hai bhai ji solah aane sach hai . satya par chalo lekin chupchap nahin balki satya par bat karte hue chalo .

Anonymous said...

अपने "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत कब उठाएंगे?
रोज कहीं न कहीं किसी न किसी बाबा की असलियत पर लानत मलानत करनेवाले अपने "भगवानों" की खोज-खबर कब लेंगे?

रोज मीडिया पर नामी-गिरामी तथाकथित संतों, बाबाओं तथा स्वघोषित भगवानों की पोल खुलते देख कुछ साल पहले की एक बात याद आ रही है।

पंजाब की भी परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा की व्यवस्था होती रही है, धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया है। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा यहां भी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए हैं।

कुछ वर्षों पहले पंजाब के कपूरथला जिले के एक "गांव" में जाने का मौका मिला था। वहां कुछ देखने सुनने को तो था नहीं सो गांव के किनारे स्थित मठ को देखने का फैसला किया गया। शाम का समय था। मठ में काफी चहल-पहल थी। मैं वहां पहली बार गया था तो मेरे साथ भी कौतुहल वश कुछ लोग थे। मंदिर का अहाता पार कर जैसे ही वहां के संतजी के कमरे के पास पहुंचा तो ठगा सा रह गया। उस ठेठ गांव के मठ के वातानुकूलित कमरे की धज ही निराली थी। सुख-सुविधा की हर चीज वहां मौजूद थी। उस बड़े से कमरे के एक तरफ तख्त पर मोटे से गद्दे पर मसनद के सहारे एक 35-40 साल के बीच का नाटे कद का इंसान गेरुए वस्त्र और कबीर नूमा टोपी लगाए अधलेटा पड़ा था। नीचे चटाईयों पर उसके भक्त हाथ जोड़े बैठे थे। मुझे बताया गया कि बहुत पहुंचे हुए संत हैं। बंगाल से हमारी भलाई के लिए यहां उजाड़ में पड़े हैं। बंगाल का नाम सुन मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पूछा कि कौन सी भलाई के काम यहां किए गये हैं, क्योंकि मुझे गांव तक आने वाली आधी पक्की आधी कच्ची धूल भरी सडक की याद आ गयी थी। मुझे बताया गया कि मठ में स्थित मंदिर में चार कमरे बनाए गये हैं, मंदिर का रंग-रोगन किया गया है, मंदिर के फर्श और दिवार पर टाईल्स लगाई गयीं हैं, मंदिर के हैंड पम्प पर मोटर लगाई गयी है। मुझे उनके कमरे और "भलाई के कामों" को देख उनके महान होने में कोई शक नहीं रहा। इधर साथ वाले लोग मुझे बार-बार संतजी के चरण स्पर्श करने को प्रेरित कर रहे थे पर मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैंने आगे बढ कर बंगला में संत महाशय से पूछा कि बंगाल से इतनी दूर इस अनजाने गांव में कैसे आए? मुझे बंगाली बोलते देख जहां आसपास के लोग मेरा मुंह देखने लगे वहीं दो क्षण के लिए संत महाशय सकपका से गये, पर तुरंत सम्भल कर धीरे से बोले कि बस ऐसे ही घूमते-घूमते।

मैं पूछना तो बहुत कुछ चाहता था पर वहां के माहौल और उनके प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा को देख कुछ हो ना पाया और मन में बहुत सारे प्रश्नों को ले बाहर निकल आया। बाहर आते ही पिछवाड़े की ओर कुछ युवकों को "सुट्टा" मारते देख मैंने साथ के लोगों से पूछा कि ये "चिलमिये" कौन हैं तो जवाब मिला यहां के सेवादार हैं।

मन कुछ अजीब सा हो गया। रोज टी. वी. पर बाबाओं की पोल खुलते देख उनकी लानत-मलानत करने वाले अपने "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत कब उठाएंगे, भगवान ही जाने।

मनुज said...

जाकिर नाइक कितने सम्मान के पात्र हैं , इस के लिए ज़रा इस पोस्ट पर और उसमे दिए गए यूट्यूब लिनक्स पर भी गौर फरमाईये
http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/02/zakir-naik-islamic-propagandist-indian.html

Bharat Swabhimaan Manch said...

जमाल तू कहाँ हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में दिमाग खपा रहा है. तुम तो आतंक मचाओ हूर मिलेगी.

sleem said...
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DR. ANWER JAMAL said...

@ Sleem ji
agar aap pehle sachmuch musalman hote to apna naam likhna to dhang aa gaya hota.
mujhe to aap hindu bhi nahin lagte
kyunki koi bhi hindu itna to bewaquf nahin hai ki dekh kar bhi sahi na likh sake.
age se main aise ghalat sawal ka jawab nahin dunga.
kai sawal behuda hone ki wajah se byun hi chhod bhi rakhe hain.

sleem said...
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sleem said...
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sleem said...
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sleem said...
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sleem said...

chachha javab nahi diya to samjhoonga aap gyani he

sleem said...

chachha javab nahi diya to samjhoonga aap gyani he

sleem said...
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sleem said...
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Anonymous said...

ANWAR JI AAP KE PASS TO GYAN HAI PAR KON SA AAP KO AUR AAP KE LEKH SE HUM KO PATA CHAL JATA HAI JAHA TAK DR JAKIR KA SAWAL HAI WO INSAN JO INDIA MAIN PAIDA HUA USE INDIA SE BADA SAUDIA LAGTA HAI AUR AAP APNE GYAN SE MUJHE RASHTA DIKHAYE 1)AAP MUSLIM BHAI KI 4 GANG HAI 1)MAR PIT LADAI JHAGDA KAR DHARAM FAILANE WALA 2)HINDU KE BHAGWAN KO APNA BATA KAR YA PAGAMBER KO KALIK BATA KAR 3)HINDU KI DHARMIK SACHI AASHTHA KO GALAT BATAKAR 4)ISLAM KO SACH DHARAM BATAKAT KRIPA MUJHE YE BATAYR MERE KUCH SAWAL HAI 1) KURAN MAIN LIKHA HAI KI ALLAH NE KAHA BABA ADAM KO PRANAM KARO AUR SAITAN NE NAHI KIYA AUR ALLAH USKA KUCH BIGAD NAHI PAYA KYA YAHI TAKAT HAI ALLAH KI 2) SAITAN KO KISNE BANAYA ALLAH NE TO KIS KI GALTI HUI 3)KURAN MAIN HAI KI HUMNE KAHA HO HA AUR HO GAYA JAB SAB MUSLIM ALLAH KE SIVA KISI AUR KO NAHI MANTE TO ALLAH NE KIS KO KAHA HO JA AUR WO KAFIR HO GAYA 5) HUMNE KAHA PURA SANSAR ALLAH NE 6 DIN MAIN BANAYA AUR YE BATAYE KI KYA AGAR ALLAH KE PASS TAKAT HOTA TO DUNIYA BANANE MAIN 1 SECOND BHI LAGTA LAGTA HAI DAYANAND JI KA ITNA PRABHAV HUA TUM LOGO PAR KI PAGAL HO GAYE HO JAHA TAK AAP KA SAWAL HAI KI DAYANAND JI NE SABHI KA KHANDAN KIYA TO UNHONE SIRF PAKHAND KA KHANDAN KIYA JAHA TAK KABIR KI BAAT HAI UNHONE YE KAHA KI KOI INSAN PHOOL SE NA TO JANAM LE SAKTA HAI NA MAR SAKTA HAI PHOOL KI BHOTIKI ALAG HAI AUR MANUSH KI AUR DAYANAND JI NE AAJ TAJ NANAKDEV JI KE KOI BAAT KA KHANDAN NAHI KIYA APNE MAN SE ADD MAT KAR LO SATYARTH PRAKASH PADHO AUR JIVAN KO UCHA BANAO JAI HIND

KHURSHID IMAM said...

Very good reply by Anwer bhai. Its a fact that almost every Aryasamaji is abusive, full of filthy words and uncultured in behavior.
Instead of talking sensible they indulge in abuse and lies. I congratulate anwer bhai for such excellent reply to aryasamajis. I hope they will take some note and return to real sanatan dharam i.e. islam.