सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Thursday, April 22, 2010

कृप्या महाजाल ब्लॉग के खि़लाफ़ कोई क़ानूनी कार्यवाही न की जाये । save yourself

… वेद-पुराण-कुरान पकड़कर नहीं बैठा रहता… क्योंकि उन "सभी धार्मिक किताबों" में कई बाते अप्रासंगिक हैं, बकवास हैं…। - महाजाल ब्लॉग के स्वामी ने मेरे ब्लॉग पर दिनांक 20.04.10 को यह टिप्पणी की । जिस समय वे यह टिप्पणी कर रहे थे , उस समय ब्लॉग जगत के प्रबुद्ध लोग सामाजिक सद्भावना के लिए परस्पर संवाद कर रहे थे । ऐसे समय उनका ऐसी घोर आपत्तिजनक टिप्पणी करना क्या ठीक था ?उन्होंने वेदादि की कई बातें अप्रासंगिक बता दीं लेकिन मेरे ब्लॉग के हिन्दू आलोचकों में से किसी ने भी यह नहीं कहा कि बकवास वेद की बातें नहीं बल्कि आप की सोच है । मुझ से अनथक शास्त्रार्थ करने वालों ने इन सज्जन को लताड़ पिलाना क्यों उचित न समझा ?
क्या मेरे कथन पर मुझसे इसलिए बहस की जाती है कि मैं एक मुसलमान हूँ और उससे भी ज़्यादा गंभीर बात कम लफ्ज़ों में कहने वाले महाजाल स्वामी को इसलिए नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है कि वह खुद को हिन्दू कहता है ?
एक से कथन पर दो लोगों के साथ दो बर्ताव क्यों ?
भाई अमित , क्या यह दो पैमानों से नापना नहीं कहलाएगा ?
सदभावना क़ायमी हेतु विचार विमर्श के दौरान उन्होंने मेरे ब्लॉग पर पवित्र कुरआन की कई बातों को अप्रासंगिक और बकवास क्यों बताया ?
नफ़रत के कूड़े पर महाजाल ब्लॉग जैसे बहुत से ब्लॉग कुकुरमुत्तों की तरह उगे हुए हैं । इसलाम धर्म और मुसलमानों की आलोचना का इनका शुग़ल बरसों पुराना है । ऐसे ही लोगों के बेबुनियाद आरोप और सवाल मुसलमानों को वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए मजबूर करते हैं । लेकिन क्योंकि मुसलमान सहिष्णु होने का दावा नहीं करते बल्कि अपनी सहन शक्ति के द्वारा अपना सहिष्णु होना साबित करते हैं । मुस्लिम ब्लॉगर्स ने कभी नफ़रत फैलाने वाले ऐसे वाहियात और असामाजिक ब्लॉग के खि़लाफ़ न तो कोई बहिष्कार की मुहिम चलाई है और न ही इनके खि़लाफ़ कोई क़ानूनी कार्यवाही की । इसे कहते हैं सच्ची सहिष्णुता ।
हम तो ‘निन्दक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय‘ में यक़ीन रखते हैं । हमारा विचार है कि महाजाल ब्लॉगस्वामी जैसे लोगों को पुलिस के हवाले करना अपनी असहनशीलता का परिचय देना है । ऐसे लोग समाज में बड़ी संख्या में हैं । सबको तो क़ानून के हवाले करके उनका विचार नहीं बदला जा सकता है। उनका विचार तो उनके सवालों का संतोषजनक जवाब देकर ही बदलना संभव है । बेहतर यह है कि वेद-पुराण पर उनकी मान्यता का खण्डन या मण्डन तो भाई अमित जी जैसे हिन्दू बुद्धिजीवी करें और पवित्र कुरआन पर उनके अनुचित आक्षेप का निराकरण भाई ज़ीशान और भाई सफ़त आलम जैसे मुस्लिम विद्वान करें ।
श्रीमान झा साहब से भी मेरा कहना है कि अपनी प्रोग्रेस को अभी अपने कंट्रोल में ही रखें कहीं ऐसा न हो कि वे जिसको बलि चढ़ाना चाह रहे हों , वह तो बच जाए और उनके ख़ेमे के ही कई भेड़िये बलि की भेड़ साबित हों । क़ानून हिन्दू मुसलमान नहीं देखता । उसका दरवाज़ा तो सबके लिए खुला हुआ है। प्रोग्रेस दूसरा भी कर सकता है ।
काव्य मंजूषा की यह सलाह सचमुच व्यवहारिक है ।

जहाँ तक हो सके आपसी प्रेम बनाये रखिये, एक दूसरे कि संस्कृतियों को हम और
अच्छी तरह समझने की कोशिश करें, एक दूसरे के धर्मों का आदर करें, उनकी अच्छाइयों को
अपनाने की कोशिश करें और अपनी बुराइयों को सुधारने की....विश्वास कीजिये हम एक
स्वस्थ समाज की रचना कर सकते हैं....यह बिल्कुल संभव है...बस ज़रुरत है थोड़ी
सहन-शक्ति, धैर्य और क्षमा की....आज और अभी से शुरू कीजिये ...सब ठीक हो जाएगा...सच
में.... http://swapnamanjusha.blogspot.com/2010/04/blog-post_22.html

45 comments:

सलीम ख़ान said...

ये ज़िन्दगी के मेले, दुनिया में कम ना होंगे


अफ़सोस हम ना होंगे

इक दिन पडेगा जाना क्या वक़्त, क्या ज़माना

कोई न साथ देगा सब कुछ यही रहेगा

जाएंगे हम अकेले, ये ज़िन्दगी...

दुनिया है मौज-ए-दरिया, कतरे की ज़िन्दगी क्या

पानी में मिल के पानी, अंजाम ये के फ़ानी

दम भर को सांस ले ले, ये ज़िन्दगी...

होंगी यही बहारें, उल्फत की यादगारें

बिगडेगी और चलेगी दुनिया यही रहेगी

होंगे यही झमेले ये ज़िन्दगी..

alvida bloging

kunwarji's said...

dr. sahaab............?

kunwar ji,

Aslam Qasmi said...

जब दिया गम बुतों ने खुदा याद आया
असल बात यह हे की इन लोगों को सिर्फ इस्लाम का मजाक उडाना था मगर जब इन्हें अनवर जमाल ने आइना दिखाना शुरू किया तो इन्हों ने कहा की किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाना ठीक नहीं परन्तु जब कोई इस्लाम के खिलाफ टिपण्णी करता हे तो उस समय यह नियम इन्हें भूल जाता हे ,ओर अनवर जी आप जब वेदों ओर पुरानों पर लिखेगें तो फिर यह लोग भावनाओं की दुहाई देते नज़र आएंगें

Amit Sharma said...

@ "मैं अधिकतर आजकल चल रहे हालातों पर लिखता हूं वेद.पुराण.कुरान पकड़कर नहीं बैठा रहता३ क्योंकि उन भी धार्मिक किताबों में कई बाते अप्रासंगिक हैंए बकवास हैं।"
काश मैं एक आँख वाला होता. आपकी इस बात से बिलकुल सहमत हूँ . उस माहौल में मैंने और किसी कि तरफ ध्यान भी नहीं दिया था.
बिना किसी पक्षपात के मैं (सबकी तरफ से नहीं) अपनी यह कमी तहे दिल से स्वीकार करता हूँ, कि क्यों मैं और कही भी वेद-विरुद्ध वमन नहीं देख पाया. आज शायद ये ही प्रचलन बन चुका है कि अगर अपने आपको आधुनिक,खुले विचारों वाला साबित करना है तो अपना जो भी परम्परागत है उसे बकवास करार दे दिया जाये. जिस तरह मेरे ही कई दोस्त कह जाते है कि "मेरा बाप तो सठिया गया है, कोई बात मानने को ही तैयार नहीं" बिना अपने पिता कि अनुभव-जन्य नाप-तौल को समझे बिना. हरिशंकर परसाई जी ने जिस तरह आत्मा के फोल्डिंग कुर्सी कि तरह होने कि बात कही थी . उसी तरह हम भी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यतों को भी अपने मन कि सुविधा अनुसार छांटने लगे है . खुद को जो सुहाया ,खुद कि छोटी बुद्धि में जो समाया बस वोह तो अच्छा बाकी सब बकवास .
आपने कल जो इस बात कि तरफ ध्यान दिलाया तभी तो मन से कराह उठी थी -
किसको कहे यहाँ हमराही अपना सभी पराये से लगते है
किस को ताकेगा तू "अमित" सभी तो बौराए से लगते है

मेरा तो ब्लोगिंग कर्म ही आपके कारण चालू हुआ था. ज्यों ज्यों आप आपे से बहार होते गए मुझे हर समय अपने पास पाते गए .
लेकिन आप भी तो यह विश्वास दिला दिजिये कि मोहब्बत कि राह के हमराही बनेंगे.

Shah Nawaz said...

"क़ानून हिन्दू मुसलमान नहीं देखता । उसका दरवाज़ा तो सबके लिए खुला हुआ है"

Kya baat likh di aapne Anwar Sahab! Yahi to mere desh ki khubi hai.... tabhi to yeh Hindustan kehlata hai, pakistan nahi. Bahut Khoob!

MLA - Mohd Liaqat Ali said...

Nice post Anwar Bhai. Mashallah

Aslam Qasmi said...

अमित जी
आप किर्पया कुरान पढए, आप पाएगें की अन्य धर्म पुस्तकों की भाति कुरान मैं एक भी बात अप्रासंगिक नहीं हे , कुरान कहता हे कि सरे इंसान काले हों या गोरे अमरीकी हों या चीनी इंसान होने मैं सब बराबर हें ,आज सारी दुनया इसे सही मानती हे , क्या यह अप्रासंगिक हे ? कुरान कहता हे कि दीन धर्म में अपनी अपनी पसं हे , तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन ओर मेरे लिए मेरा , आज सारी दुनिया इसी नियम को मानती हे किया यह अप्रासंगिक हे? कुरान कहता हे कि अपने माता पिता को उफ़ तक न कहो ओर उनसे आदर पूर्वक बात करो ,किया यह अप्रासंगिक हे?
परन्तु अमित जी यह भी आप को बतादुं कि फिर भी दुनिया मैं ऐसे लोग मोजूद हें जिन्हें कुरान मैं भी अपरासंगिक बाते दिखती हें उनमें से एक हें फिरदोस खान जी उनका सवाल हे कि इश्वर ने महिला को ईशदूत (नबी) क्यों नहीं बना या ,अच्छा होता कि वहयह ओर पूछती कि बच्चा ओरत ही क्यों जनती हे ,फिर हम भी उनसे प्रश्न करते कि निगाहें तीर काश आप ही को क्यों मिली हें ?अब हम उनके ब्लॉग पर टिपण्णी देते हें तो यह उसे पब्लिश नहीं करती .इस लिए हमें दूसरों के बलाग से ही काम चलाना पढ़ रहा हे ,

HAR HAR MAHADEV said...

nostologic and and antruthfull...have a good mind

tehseeldar said...

हम आपको ये बताना चाहते हैं कि आपके विचार पढ़ने के बाद से हमारा मन बहुत ही विचलित है और हम इस पर टिप्पणी करना चाहते हैं। लेकिन आज हमारी तबियत कुछ ठीक नहीं है फिर भी हम आपके लेख पर टिप्पणी करने की मंशा रखते हैं लेकिन तबियत हमारा साथ नहीं दे रही है। हम मन मसोसकर बैठे हैं कि किस तरह से आपके महान विचारों पर अपनी राय दें। दरअसल आपके लेख पढ़ने के बाद हम अपने आपको टिप्पणी करने से रोक ही नहीं पाते हैं लेकिन आज हमारी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है। फिर भी हम ये कहना चाहेंगे कि आप एक महान आदमी हैं जो काम महात्मा गांधी के बाद कोई नहीं कर सका वो आप कर रहे हैं। हम आपसे कहना चाहते हैं कि समानता की इस लौ को जलाये रखें, एक दिन आपको बड़ी कामयाबी मिलेगी। हम आपको बता दें कि हम लिखना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन हमारी तबियत ठीक नहीं है इसलिये हम ज़्यादा कुछ नहीं लिख पा रहे हैं। हालांकि हम लिखना बहुत कुछ चाहते हैं। हम आपसे एक बार फिर कहना चाहते हैं कि जो काम आपने शुरु किया है उसमें लगे रहे किसी से घबरायें नहीं। इस तरह के कामों में बाधा बहुत आती हैं लेकिन आप डरें नहीं। हम इस बारे में टिप्पणी बाद में करेंगे क्योंकि हमारी तबियत आज कुछ ठीक नहीं है।

DR. ANWER JAMAL said...

@ Amit ji , मेरे प्रिय अनुज ! मैं तो आप से पहले ही कह चूका हूँ कि मुझे आप से प्यार है . मैं तो इस लोक में ही नहीं परलोक के अमरधाम में भी आपको अपने साथ रखना चाहूँगा . मुझे आज आपके सत्य प्रेम और निष्पक्ष होने का यकीन आ गया है . भारत का भविष्य रौशन है , आपको देख कर मैं कह सकता हूँ .

Yamin M Khan said...

डॉ साहब हम आपकी कलम के मुरीद हैं लेकिन आपसे इल्तिजा करते हैं की चंद रोज़ के लिए ब्लौगिंग को मुल्तवी कर दें. फिरदौस बहन के उकसावे में आकर खुद को मीना कुमारी समझनेवाली एक शायर ने आपके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और हम नहीं चाहते की आपके ब्लौग पर कोई भी आंच आये.

Anonymous said...

श्रीमान झा साहब से भी मेरा कहना है कि अपनी प्रोग्रेस को अभी अपने कंट्रोल में ही रखें कहीं ऐसा न हो कि वे जिसको बलि चढ़ाना चाह रहे हों , वह तो बच जाए और उनके ख़ेमे के ही कई भेड़िये बलि की भेड़ साबित हों । क़ानून हिन्दू मुसलमान नहीं देखता । उसका दरवाज़ा तो सबके लिए खुला हुआ है । दूसरा भी प्रोगेस कर सकता है ।

सही कह रहे हो डाक्टर! ये झा आजकल कुछ ज्यादा ही उड़ रहा है.

DR. ANWER JAMAL said...

@ सलीम भाई ! आप दिल तोड़ने वाली बातें न कीजिये .

अजय कुमार झा said...

श्रीमान डा अनवर जमाल उर्फ़ असलम कासमी या उर्फ़ और भी कोई जो भी आप हों । ब्लोग्गिंग के ढाई साल के अपने लेखन के दौरान आज तक मैंने कभी किसी का नाम लेकर और बिना नाम लिए , बिना वजह न तो किसी पर आक्षेप किया है ,और न ही किसी को अपने ऊपर ऐसा करने का मौका दिया है । पिछले दिनों से बहुत कुछ होता देख रहा हूं , चाहता तो बहुत पहले ही बहुत कुछ कर चुका होता , और ऐसा भी नहीं है कि मैं किसी भी वजह से मजबूर हूं । क्यों नहीं किया इसकी भी ठीक ठीक वजह नहीं जानता , अब तलाशूंगा । आज आपने शायद पहली बार मुझे इंगित करते हुए अपनी पोस्ट में लिखा है , आपको क्यों ये लगा कि जो प्रोग्रेस की जा रही है वो आपके लिए है मैं नहीं जानता , और शायद आप ही बेहतर जानते होंगे । मुझे अपने मान मर्यादा की रक्षा करना बखूबी आता है । और हां आपने सच कहा कि कानून हिंदू मुसलमान नहीं देखता , मगर अपराध उसकी नज़रों से ज्यादा दिनों तक नहीं छिप सकता इतना तो जानता ही हूं मैं । आपकी पोस्ट पर किसी अनाम द्वारा मेरे लिए की गई टिप्पणी को प्रकाशित कर सहेज कर रखने को यही मानूं न कि आपकी सहमति है उसमें । और रही किसी गुट की बात , तो भेडिये किसी भी गुट के हों वे भेडिए ही रहते हैं और ऐसा ही गीदडों के लिए भी होता है । आगे आप जैसा चाहें , मैं तो अब भी वही कह कर जा रहा हूं कि work in progress ,चाहे तो आप भी बढा लें । लेकिन काम शायद मुश्किल निकले क्योंकि मैं आज तक इतनी अच्छी ब्लोग्गिंग कर नहीं पाया ॥

Dr. Ayaz ahmad said...

झा साहब महाजाल के बारे मे फिर भूल गये

Dr. Ayaz ahmad said...

सर हमे तो ब्लोगिँग मे अभी एक महीना ही हुआ है पर एसा टुच्चापन हमने कही नही देखा ख़ुद तो चाहे जो कहै पर जवाब सुनकर.................फिर कानून कारयवाही की धमकी

Dr. Ayaz ahmad said...

हम लोग तो यहाँ से अचानक गुज़रे और यहाँ पर आप बड़े बूढ़ो की मौजूदगी मे चल रहे इस्लाम के ख़िलाफ़ प्रोपेगेँडा को देख कर ठिठके बहुत अनाप शनाप लिखा जा रहा था और आप चुप रहकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई कर रहे थे

विश्‍व गौरव said...

वाह जी मुसलमान लिखे बेशक हिन्दू सद्गुणों की खान है महान राष्‍ट्रवादी साधुवादी महान हिन्‍दू चिन्‍तक कहे वेद-पुराण-कुरान ...... "सभी धार्मिक किताबों" में कई बाते अप्रासंगिक हैं, बकवास हैं…। कोई इस से पूछे वेदों में क्‍या बकवास है?

विश्‍व गौरव said...

वाह जी मुसलमान लिखे बेशक हिन्दू सद्गुणों की खान है महान राष्‍ट्रवादी साधुवादी महान हिन्‍दू चिन्‍तक कहे वेद-पुराण-कुरान ...... "सभी धार्मिक किताबों" में कई बाते अप्रासंगिक हैं, बकवास हैं…। कोई इस से पूछे वेदों में क्‍या बकवास है?

sahespuriya said...

जनाब डा० साहब पहले तो सलाम क़बूल कीजिए. रही बात मकड़ी के जालो की, इनका तो इक ही ऐजेंडा है किसी भी तरह अपने आपको ''बुधीजीवी'' साबित करना अब ज़ाहिर सी बात है इस मुल्क मैं अपने आप को ''देशप्रेमी'' साबित करने के लिए इस्लाम और मुसलमान से अच्छा कोन सा मुद्दा होगा. अब इस्लाम के खिलाफ़ लिखते लिखते ये साहब ‘देशप्रेम’ के नशे मैं इतने चूर हुए की अपनी सभ्यता और संस्कृति ही भूल गये.
हम भी यही चाहते है की इन साहब का ब्लॉग बंद ना हो, अगर बंद हो गया तो इनकी असलियत कैसे सामने आएगी ? यही तो इस देश के सबसे बड़े हमदर्द है?
खैर लानत भेजिए, रही बात धमकाने वालो की तो ज़रा हम भी तो देखे दूध के धुले हुए लोगो को ?
अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे...... आपके आने के बाद ही तो इन लोगो को अपनी शक्ल आईने मैं नज़र आई है,

sahespuriya said...

हमारी तो बस इतनी ही इलतजा है आपसे, अपना वक़्त इन ''बेवकूफ़ बुधीजीवियो' पर ना बर्बाद करे, ऐसे लोग तो हमेशा से रहे है क्या बिगाड़ लिया इन्होने?'
''इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद.''
और अगर कभी ज़रूरत पड़ी तो देखा जाएगा, अभी तो आपके उन रंगो का इंतेज़ार है, जो हमने नही देखे, शायराना अंदाज़ तो देख लिया.. ...
''यूँ तो साक़ी हर तरह की तेरे मयखाने मैं है
वो भी थोड़ी सी जो इन आँखों के पेमाने मैं है''

sahespuriya said...

रही बात Progress की तो , यारो progress अपना ज्ञान बड़ाने मैं करो, प्यार मुहब्बत मैं करो, भेड़चाल मैं ना करो. इन ''बुधीजीवियो'' के पीछे लगने से सिर्फ़ खुवारी ही मिलेगी, इन के मकाड़जाल से निकलो अच्छा बनने की progress करो.

sahespuriya said...

Khamosh raaho mein tera saath chahiye,
Tanha hai mera hath,tera haath chahiye

Mahak said...
This comment has been removed by the author.
Mahak said...

Jamaal Bhaii

Shayad aap ye bhool gaye hain ki Suresh ji ki jis baat ka aap itna bada issue bana rahen hain wo aapne hi kai baar apne blogs ke dwaara kahi hai.Aapke aur Sabhi bloggers ki suvidha ke liye aapke hi dwara likhe hue kuch blogs yahan prastut kar raha hoon jo clearly is baat ka samathan karte hain ki "सभी धार्मिक किताबों में कई बाते अप्रासंगिक हैं, बकवास हैं…।"




1.
एक आदर्श आर्य के लिए जीवन में सोलह संस्कारों का पालन करना अनिवार्य है । उनमें से एक है गर्भाधान संस्कार । अब इसका पालन कोई कोई ज्ञानी टाइप ही करता है जबकि पहले इसका चलन अमीर आर्यों में आम था ।गर्भाधान संस्कार की दयानन्दी रीति”जिस रात गर्भाधान करना हो उस दिन हवन आदि करे और वहां निर्दिष्ट 20 मंत्रों से घी की आहुतियां दे। चारों दिशाओं में पुरोहित बैठें । इसके बाद घी दूध ‘शक्कर और भात मिलाकर छः आहुतियां अग्नि में डाले । तत्पश्चात आठ आहुतियां घी की दे । आठ आहुतियां घी की फिर दे । इसके बाद नौ आहुतियां दे । बाद में ताज़ा घी और मोहन भोग की चार आहुतियां दे । जो घी ‘शोष रहे उसे लेकर वधू स्नानागार में जाए और वहां पैर के नख से लेकर शिर पर्यंत सब अंगों पर मले । तत्पष्चात वह नहा धो कर हवन कुंड की प्रदक्षिणा करके सूर्य के दर्शन करे । बाद में पति उसके पिता पितामह आदि अन्य माननीय पुरुषों पिता की माता अन्य कुटुंबी और संबंधियों की वृद्ध स्त्रियों को नमस्कार करे । तत्पश्चात पुरोहितों को भोजन कराये और सत्कारपूर्वक उन्हें विदा करे । रात्रि में गर्भाधान क्रिया करे । जब वीर्य गर्भाषय में गिरने का समय आए तब दोनों स्थिर ‘शरीर प्रसन्नवदन मुख के सामने मुख नासिका के सामने नासिका आदि सब सूधा ‘शरीर रखे । वीर्य का प्रक्षेप पुरुष करे। जब वीर्य स्त्री के ‘शरीर में प्राप्त हो उस समय अपना पायु (गुदा) और योनींद्रिय को ऊपर संकुचित कर और वीर्य को खैंच कर स्त्री गर्भाशय में स्थिर करे । गर्भ स्थापित होने के दूसरे दिन सात आहुतियां दे । फिर ‘शांति आहुति देकर पूर्णाहुति दे ।” (संस्कार प्रकाश प्रथम संस्करण 1927 भाषा टीका संस्कार विधि )


कुछ विचारणीय प्रश्न
1- इस पूरी प्रक्रिया में औरत का तमाशा बनाकर रख दिया गया है । बेचारी को पहले तो चार पुरोहितों से एसे मंत्र सुनने पड़ते हैं जिनका अर्थ पता चलते ही कोई भी इज़्ज़दार औरत उन्‍हें कभी सुनना तक न चाहेगी। यहां अर्थ लिखकर हम किसी को ‘शर्मिन्दा नहीं करना चाहते । जिज्ञासु लोग ऋग्वेद 10/184/1-2 यजुर्वेद 1/27 तथा यजुर्वेद 19/76 देखकर स्वयं सच्चाई जान सकते हैं।
2- फिर बचा हुआ घी मलकर भी औरत ही नहाये और मुहल्ले या गांव भर में घूमकर बताती फिरे कि रात को वह क्या करने वाली है ? या उसके साथ क्या होने वाला है ? वृद्धजनों को नमस्कार भी वही क्यों करेे ? घी मलकर मर्द भी क्यों न नहाये और वह भी क्यों न उसके साथ गांव भर में घूमकर बड़ों का आशीर्वाद ले ?
3- इतने मेहमानों का खाना बनाने और उन्हें खिलाने में और फिर पूरे गांव का राउंड लेने में ही वधू के अंग प्रत्यंग इतने थक जाएंगे कि गर्भाधान के समय उसमें अपनी पायु (गुदा) सिकोड़ने का बल तक ‘शोष न बचेगा । अगर गर्भाधान के दिन पति पत्नी को रिलैक्स और फ्ऱी रखा जाता तो वे अपने फ़र्ज़ की अदायगी ज़्यादा ताक़त और ताज़गी के साथ बेहतर तरीके़ से कर सकते थे ।
4- इतना बड़ा आयोजन क्यों ज़रूरी समझा गया ? वैदिक धर्म में क्योंकि औरत अपने पति की अनुमति से गर्भाधान के लिए अन्य पुरूष के पास भी जा सकती है इसलिए पुरोहितों को बुलाकर उन्हें खिलाना पिलाना और कुनबे के बुज़ुर्गों को नमस्कार करने का विधान रखा गया । उनकी सम्मति पाने का यह एक तरीक़ा था । इसी तरीके़ की बदौलत लोग याद रख पाते थे कि किस बच्चे का बाप कौन है ? और तभी बच्चे का गोत्र वर्ण और कर्तव्य निष्चित किया जाता था।
5- अगर औरत के कोई सयानी औलाद हो या उसके रिश्तेदार भी इस मौके़ पर मौजूद हों तब वह औरत खुद को कितना असहज महसूस करती होगी ? और उसकी औलाद या रिश्तेदारों की क्या मनोदशा होती होगी ? या फिर सर्वत्र यही आचरण देखकर हो सकता है कि उनकी ग़ैरत ही मर जाती हो और वे इसके अभ्यस्त हों जाते हों ।

Mahak said...

खाद्य सामग्री में आग लगाने से गर्भ ठहरने का कोई सम्बंध नहीं है । अतः यह अमीर लोगों का वैभव प्रदर्शन और आडम्बर मात्र है ।कहा जाता है कि दयानन्द जी जैसे महान ज्ञानी बिरले ही जन्मते हैं । यह बात भी गर्भाधान संस्कार को निरर्थक सिद्ध करती है क्योंकि दयानन्द जी के पिता ‘'''शैव थे । वैदिक आचार से हीन बल्कि धर्म विरुद्ध आचरण करने वाले दम्पत्ति को तो दयानन्द जैसा विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न पुत्र प्राप्त हुआ जबकि दयानन्द जी की सहस्रों वर्शों बाद बताई गई बिल्कुल सही रीति का पालन करके आर्यजन उनके तुल्य बच्चा भी पैदा न कर सके ।इससे सिद्ध होता है कि हवनादि से उत्पादन की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं होता ।कोई कह सकता है कि बच्चे के होने में पूर्वजन्मों के कर्म आधार बनते हैं । यदि यह सत्य है तो फिर सामग्री फूंकने का क्या फ़ायदा ?





2.
बृहदारण्यक उपनिषद , 6-4-7 के अनुसार
स्त्री यदि मैथुन न करने दे तो उसे उस की इच्छा के अनुसार वस्त्र आदि दे कर उसके प्रति प्रेम प्रकट करे । इतने पर भी यदि वह मैथुन न करने दे तो उसे डंडे या हाथ से ( थप्पड़ , घंूसा आदि ) मारकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे । यदि यह भी संभव न हो तो ‘मैं तुझे शाप दे दूंगाा , तुम्हें वंध्या अथवा भाग्यहीना बना दूंगा ‘ - ऐसा कहकर ‘इंद्रियेण‘ इस मंत्र का पाठ करते हुए उसके पास जाए । उस अभिशाप से वह ‘दुर्भगा‘ एवं वंध्या कही जाने वाली अयशस्विनी ( बदनाम ) ही हो जाती है ।
अब कहिये , क्या यही है गर्भाधान की सम्यक रीति ?
अरे भाई , क्यों देवताओं की तरह कामातुर हो रहे हो ?
पत्नी के मन को भी तो समझो । उसे कोई प्रॉब्लम भी तो हो सकती है ?
पहले अपनी पत्नी के मन को समझना सीखो । फिर वे न किसी इच्छाधारी के पास जायेंगी और न किसी मुसलमान के पास । तब आपके दिमाग़ से लव जिहाद का फ़र्ज़ी डर भी निकल जाएगा ।
कृप्या अपनी लड़कियों को बदनाम न करें , उन्हें अच्छी बातें सिखायंे ।
लेकिन आप अच्छी बातें सिखाएंगे किस किताब से ?
सब जगह तो उपरोक्त सामग्री भरी पड़ी है ।





3.एक धोबी की बात सुनकर राम सीता से अग्नि परीक्षा लेते हैं और सीता इसका बिना विरोध किये परीक्षा दे भी देती हैं । हालांकि बाद में वह अपमान बर्दाश्त नहीं कर पातीं और धरती में समा जाती हैं । पर यह सवाल सीता नहीं उठातीं कि जो नियम सीता पर लागू होता है वही राम पर क्यों नहीं ? राम भी तो सीता के बग़ैर रहे , उनके मन में भी तो किसी और स्त्री का स्मरण हो सकता है तो फिर वही अग्नि परीक्षा राम ने क्यों नहीं दी ?
...द्रौपदी बनकर वह थोड़ा स्वतन्त्र दिखाने की कोशिश ज़रूर करती है लेकिन वह कभी इस बात का विरोध नहीं करती कि कुंती के कहने मात्र से ही वह पाँचों पांडवों की पत्नी क्यों होगी ?






4.
वेद या ऋषि परम्परा का विरोध करना मेरा मक़सद नहीं है । और न ही आर्य जाति के मान को ठेस पहुंचाना मेरा उद्देश्य है । मैं खुद इसी महान जाति का अंग हूं क्योंकि मैं पठान आर्य ब्लड हूं । इसलिये भी इसकी उन्नति में बाधक तत्वों को दूर करना मेरा परम कर्तव्य है ।
मैं वेद में आस्था रखता हूं और पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमम (अर्थात उन पर ‘शांति हो ) की तरह महर्षि मनु को भी सच्चा ऋषि मानता हूं लेकिन वेद में भी उसी प्रकार क्षेपक मानता हूं जिस प्रकार स्वामी जी ने मनु स्मृति आदि में माना है । वर्ण व्यवस्था , नियोग और नरमेध आदि यज्ञों को वेदों में क्षेपक और आर्य जाति की उन्नति में बाधक मानता हूं । पूर्व कालीन ऋषियों के अविकारी वैदिक धर्म को पाना और जन जन तक पहुंचाना ही मेरे जीवन का उद्देष्य है । वैदिक धर्म के विकारों को दूर करने के बाद वैदिक धर्म और इसलाम में कोई मौलिक मतभेद ‘शोष नहीं बचता ।

Mahak said...

Ab aap khud hi bataayiye ki ye saari baatein kya aaj ke samay mein अप्रासंगिक nahin हैं, बकवास nahin हैं…।Aur phir aapne to khud hi apne in blogs mein inhe ek vikaar aur उन्नति में बाधक kaha hai phir Suresh ji ki baat par itna ho-halla kyon. Suresh ji to aapki kahi hui baaton ka hi samarthan kar rahen hain aur unhone keval kuran ke liye hi nahin balki sabhi dharmik kitaabon mein,grathon me jo galat baatein hain, jo kamiyaan hain unhe bakwaas aur aprasaangik kaha hai.
Mujhe lagta hai ki ise se to aapko khush hona chahiye ki wo aapki hi kahi hui baat ko maan rahen hain.

Aapke lekh ko padhkar mujhe thoda aisa bhi lagta hai ki aapko objection shayad is baat par hai ki jab aapne in baaton ko vikaar aur उन्नति में बाधक kaha to kai hindu bhaiyon ne aapse debate ki aur kuch ne aapko apshabd aur galiyaan bhi di lekin jab Suresh ji ne unhi baaton ko अप्रासंगिक Aur बकवास kaha to un logon ne unse us prakar ki debate aur apshabd unhe nahin kahe. Kya main sahi samajh raha hoon jamaal bhaii.

Agar haan to phir aapse kehna chahoonga ki main bhi ek hindu hoon lekin aap mujhe dekh sakte hain ki mujhe aapki jo bhi baat sahi lagi to maine aapka hamesha samarthan kiya aur jo galat lagi us par apna virodh jataaya.Aur aisa hi mere jaise bahut se hindu bhaiyon ne kiya.
Ab thode se galat log to har dharm mein hai unki wajah se hum apne beech ki prem ki door ko kamzor kar len to ye thik nahin hoga.

Ho sakta hai ki aap mujhse ye poonche ki mahak bhaii aap to sahi logon mein se the to phir aapne suresh bhaii ki baat ka virodh kyon nahin kiya ?
To iske jawaab mein jamaal bhaii main ye bataana chaahoonga ki main bhi khud bhi aapki aur suesh ji ki is baat se sehmat hoon ki "सभी धार्मिक किताबों" में कई बाते अप्रासंगिक हैं, बकवास हैं…।" Phir is par virodh jataane ka to sawaal hi paida nahin hota.

Aapne hamein jo "Garbhadhan Sanskar" blog ke through bataaya tha usmey main aapse bhi poori tarah sehmat hoon ki haan hamaare ved ya granth mein agar is tarah ki koi baat hai to wo poori tarah se galat hai aur usey nahin manna chaahiye.

Main hamesha kehta hoon ki har dharm mein bahut si baatein hain, kuch sahi to kuch galat.Hamara farz ye banta hai ki hum unme se achi baaton ko grehan karen aur buri ka tyaag.Agar Suresh ji ne un buri baaton ko अप्रासंगिक Aur बकवास kaha hai aur aapne unhe Vikaar aur उन्नति में बाधक kaha hai to ismey kya galat kaha hai ?

Agar meri kisi baat se aapko dukh pahuncha hai to mujhe shama karen lekin kya karein mere liye bhi satya kehna utna hi zaroori hai jitna aapke liye
Dhanyavaad

प्रवीण शाह said...

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@ आदरणीय अनवर जमाल साहब व प्रिय दोस्त अमित शर्मा जी,

लीजिये मैं भी यहाँ पर साफ-साफ और खुले तौर पर कह रहा हूँ कि:-

सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में बहुत सी ऐसी बातें लिखी गई या बताई गई हैं जो उस युग के मनुष्य की अवैज्ञानिक धारणाओं, सीमित सोच, सीमित ज्ञान (या अज्ञान), तत्कालीन देश-काल की परिस्थितियों व लेखक के अपने अनुभवों या मजबूरियों पर आधारित हैं, आज के युग में इन मध्य युगीन या उससे भी प्राचीन बातों की कोई प्रासंगिकता या उपयोग नहीं रहा, यह सब बातें आज आदमी की कौम को जाहिलियत व वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं व इन सब बातों को आप बेबुनियाद-बेकार-बकवास की श्रेणी में रख सकते हैं और अब समय आ गया है कि धर्माचार्यों को अपने अपने ग्रंथों की विस्तृत समीक्षा कर इन बातों को Disown कर देना चाहिये।

मैं यहाँ पर किसी की भावनाओं को दुखा नहीं रहा एक हकीकत बयां कर रहा हूँ... ब्लॉग जगत में जो भी चाहे इस टिप्पणी पर मेरे विरुद्ध जो चाहे कार्यवाही कर सकता है...क्योंकि...

"क़ानून आपके धार्मिक विश्वास नहीं देखता । उसका दरवाज़ा सबके लिए और दिमाग हर सचाई के स्वीकार के लिये खुला है।"

आभार!

Amit Sharma said...

@ जमाल साहब मैने आपसे पहले भी कहा था कि जहाँ तक आप प्रेम फैलाते हुए कदम बढाएंगे वहीँ मुझे भी हम कदम पायेंगे.
लेकिन यह ध्यान रखियेगा कि प्रेम कि दावत देते समय यह आग्रह बिलकुल ना हो कि ......... आप समझ रहे है मेरी बात को !

@ महक जी और प्रवीन जी आज के समय में तो मेट्रो कल्चर में बूढ़े माँ-बाप भी अप्रासंगिक से ही है. और आने वाले समय में जब आप और बुजुर्ग हो जायेंगे तब उस पीढ़ी के लिए आप भी और ज्यादा अप्रासंगिक हो जायेंगे. और आपही लोगो के हिसाब से आप का निपटारा किस प्रकार होना चाइये ये समझ सकते है . बाकि तो आप बड़े है आप ज्यादा जानते है

Shah Nawaz said...

@ प्रवीण शाह
प्रवीण जी मैं आपकी बातों से बिलकुल सहमत नहीं हूँ. जो ज्ञान हर युग में प्रासंगिक हों वही तो धर्म है वर्ना वह साधारण ज्ञान कहलाता है. धर्म एक ईश्वरीय ज्ञान होता है और ईश्वर का ज्ञान सदा के लिए होता है. यह तो मनुष्य का ज्ञान है, जो एक अरसे बाद गलत साबित हो जाता है. ईश्वर का ज्ञान तो वही है जो कभी गलत साबित हो ही ना पाए. यह तो हो सकता है कि कोई धार्मिक बात हमारे समझ में ना आए, परन्तु यह नहीं हो सकता कि ईश्वरीय बात गलत हो जाए. इसलिए अगर कोई बात समझ में ना आए तो यह सोचना कि वह बात ही गलत है और यह सोच कर ज्ञानी पुरुषों से प्रश्न ही ना करना बेवकूफी है. इसलिए हर धर्म में कहा गया है कि ज्ञान का प्राप्त करना मनुष्य का फ़र्ज़ है.
धर्मग्रंथो में लिखी गई बाते अगर आज के युग के लिय अप्रासंगिक होती, तो आज भी वैज्ञानिक उनको खागालने में नहीं लगे होते? आज पूरी दुनिया योग की तरफ भाग रही है, अध्यात्म की और लौट रही है. पुरे विश्व में वह लोग जो किसी खुदा को नहीं मानते थे, आज आस्तिक बन रहे हैं. तो इसके पीछे हमारे धर्माचार्यों की मेहनत और उनकी मेहनत के फलस्वरूप ईश्वर की ओर से दिया हुआ ज्ञान ही है. बस ज़रूरत है उस ज्ञान को आत्मसात करने की.
अगर आप विज्ञान को देखोगे तो पाओगे कि कितनी ही बातें धार्मिक ग्रंथो से ली गई हैं. जो बातें अबसे हजारों वर्ष पहले महापुरुष लोगो को बता कर गए, आज जाकर विज्ञान उनको सिद्ध कर रहा है. आखिर कहाँ से उन महापुरुषों के पास इतना ज्ञान आया? आज अगर इन्टरनेट पर सर्च करोगे तो हजारों ऐसी रिसर्च मिल जाएंगी, क्या वह सब की सब गलत हैं?
आप कह रहे हैं कि धार्मिक बातें इन्सान को जाहिलियत और वैमनस्य की ओर धकेल रही हैं, और मेरा दावा है कि सिर्फ और सिर्फ धार्मिक बातें ही इंसान को जाहिलियत और वैमनस्य से रोक सकती हैं. यह जो जाहिलियत और वैमनस्य फ़ैलाने वाले लोग हैं, असल में यह अपने धर्म का पालन करने वाले लोग है ही नहीं, बल्कि धर्म का इस्तेमाल करने वाले लोग हैं. इन्हें आप धर्म के व्यापारी कह सकते हैं, जो कि अपने फायदे के लिए धार्मिक ग्रंथो को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं. मेरा मानना है कि इन लोगो को हलके में नहीं लेना चाहिए, यह पूरी एक मुहीम है और इसके पीछे कोई बहुत बड़ा संगठन काम कर रहा है.
जिसका मकसद अपना उल्लू सीधा करने के लिए लोगो को बेवक़ूफ़ बनाना हो सकता है. क्योंकि वह लोग जानते हैं, कि जिन्हें अपने धर्म के बारे में जानकारी नहीं है, उन्हें ही बेवक़ूफ़ बनाया जा सकता है. और इस समस्या से निजात पाने का तरीका भी यही है, कि पुराने ढर्रे पर ना चलकर लोगों को जागरूक बनाया जाए. धर्म की सही शिक्षाओं को सामने लाया जाए, ताकि अन्धकार दूर हो.
या फिर यह भी हो सकता है कि कैसे लोगो को उनके धर्म से दूर ले जाया जाए. ज़रा सोचिये क्यों नहीं पश्चिम के धर्मों के बारे में गलत बातें सामने आती? क्यों सिर्फ हमें ही निशाना बनाया जाता है?
रही बात समीक्षा की तो लोगो के द्वारा की जा रही अनावश्यक समीक्षा की वजह से ही तो सारा फसाद फ़ैल रहा है. मेरे विचार से तो समीक्षा उसकी की जानी चाहिए है जिसकी कोई बात गलत साबित हो.


http://shnawaz.blogspot.com

Mahak said...

@Amit Sharma Ji

Aap jaise gyaani vyakti se aise agyaan ki aasha na thi. Maine ya Praveen Shah ji ne kahan likha hai ki boodha hona aaj ke metro culture mein aprasangik hai. Maaf kijiye ye aapki maansikta ho sakti hai ki har boodhe vyakti ko aap aaj ke liye aprasangik maane lekin aisa hum ya phir main to bilkul nahin maanta.
Aapki tippani(comment) ko padhkar ye bhi lagta hai ki aapne meri aur praveen ji ki post dhyaan se nahin padhi ya phir jaldi mein padhi hai ya phir poori nahin padhi.
Usmey Dharmik Kitaabon ya Granthon ki har ek baat ko nahin nakara gaya hai lekin unmey jo baatein galat hain sirf unka virodh kiya gaya hai.Aur we bahut saari hain jinme se kuch to main jamaal bhaii ki posts ke dwaara yahan de bhi chuka hoon.
Lekin aap jaise log agar un kuprathaon ya phir kureetiyon se jude rehna chaahte hain to koi kya kar sakta hai.
Jara in baaton ko justify karenge

1.Pati ki Mrityu par Patni ko uski chita ke saath hi jala diya jaata tha, kya ye aprasangik aur galat nahin hai yaa aap bhi Bhabhi ji ko
apne saath is tarike se ishwar ke ghar le jaana pasand karenge.

2.
"Dhol,Ganwaar,Shudra aur Naari
Ye sab Taadan ke Adhikaari

Ye baat Ramayan mein likhi gayi hai, zara justify karenge ki ye kis prakar se prasangik hai
Keh rahen hai ki Jo ganwaar hai, Shudra ha aur Naari hai inka janam hi maar khaane ke liye hua hai. Bataaiye jo naari nar ko janam deti hai uske liye kya deserving bataaya gaya hai.Aisi hi objection ganwaar aur Shudra ke case mein bhi hai.Mujhe samajh nahin aata ki hum kisi ke saath janm se hi aisa bhed-bhav kaise kar sakte hain ki tum brahman ho isliye tumhara darja (level) uncha hai, tum sabse shraisth (best) ho aur tum shudra ho,tumhara darja (level) neecha hai aur tum neech prani ho,Sirf isliye ki hamaare granthon mein aisa likha hai .Aap ab bhi nahin samjhe to main aapko bata doon ki main Untouchability ki baat kar raha hoon jiska aapke granth poora samarthan karte hain.Ab kijiye apne vedon ki is baat ko justify ki ek shudra vyakti ka sparsh karne se ek brahman ya uski koi vastu kaise apavitra ho jaati hai.Aapko shayad maloom na ho lekin inhi baaton ka faayda uthakar un gareeb logon par in so-called unchi jaatiyon ke logon dwara kitne atyachaar kiye jaate hain.Meri baat pa aapko yakeen nahin hoga to phir Mahatma Gandhi ki jeevani mein unki Bihaar yatra ka prasang zaroor padh lein. Jinhe neechi jaat or caste ke log kaha jaata hai kya unke haath mein tha is caste mein ya us caste mein janam lena phir unke saath itna bada bhed-bhaav kyon.Bahut se gaanvon mein aaj bhi unhe well se paani bharne ka adhikaar nahin hai aapke in vedon ke gyaan ke kaaran.

Aur kya aap tayaar hain garbhadhaan sanskar ko follo karke apni santaan ke janam ke liye jiska khulasa anwer bhaii ne apni post ke through kiya tha.

Aisi hi bahut si baatein hain lekin abhi thoda samay ki kami hai.

Main ye bilkul nahin keh raha hoon ki Vedon ki sabhi baatein galat hain.Main khud Vedon ka,Upnishadon ka samaan karta hoon lekin sirf unhi baaton ka jo sahi hain.

Maine pehle bhi kaha tha aur phir wahi keh raha hoon ki har dharm mein bahut si baatein hain, kuch sahi to kuch galat.Hamara farz ye banta hai ki hum unme se achi baaton ko grehan karen aur buri ka tyaag.

Suresh Chiplunkar said...

प्रवीण शाह जी एवं Mahak जी, आपने कई उदाहरण दिये। मैं भी यही कह रहा हूं कि वेदों और "अन्य सभी" धार्मिक ग्रन्थों में उस समय के मुताबिक काफ़ी बातें लिखी गई थीं, जिन्हें हिन्दुओं ने कभी का पीछे छोड़ दिया और आगे बढ़ गये… लेकिन कई लोग अब भी वहीं बैठे हैं और किसी किताब में लिखे प्रत्येक शब्द को अन्तिम सत्य माने हुए हैं…। अब क्या किया जा सकता है।

कश्मीर (जो हमारा है) से हिन्दुओं के सफ़ाये पर ज़बान नहीं खुलती, क्योंकि तब "असली चेहरा" उजागर होने का खतरा है… लेकिन फ़िलीस्तीन (जिससे हमारा कोई लेना-देना नहीं) के मुद्दे पर जमकर छाती कूटेंगे…। पाकिस्तान, मलेशिया, ब्रिटेन आदि देशों में इस्लाम के नाम पर क्या हो रहा है, यह बताने की कोशिश करो तो इस्लाम-विरोधी बताते हैं और इन्हें बुरा लग जाता है…।

यहाँ तक कि एक सज्जन, इंसान के सबसे स्वामीभक्त प्राणी कुत्ते को पालना भी धर्मग्रन्थों के मुताबिक हराम बता देते हैं और एक लम्बी पोस्ट डाल देते हैं, जानबूझकर महफ़ूज़ का फ़ोटो लगाकर।

फ़िर डॉक्टर साहब वेदों की कोई कालातीत बात उठाकर फ़िलॉसफ़ी भरा लेक्चर झाड़ देते हैं…। विश्व और भारत में राजनैतिक-सामाजिक स्तर पर क्या चल रहा है, इससे कोई मतलब नहीं।

सतत "पीछेदेखू" लोगों से कोई क्या और कैसे बहस करे…

Anonymous said...

झा को खाली भोंकना आता है
वो कुछ उखाड़ नहीं सकता
खुद को ब्लॉगवूड का हीरो समझता है पर है असल में जीरो
खुद ही माहोल ख़राब करता है फिर खुद ही चिल्लाता है
आपने बहुत सही किया इसे यहाँ लपेटकर

Mahak said...

Chodiye Chiplunkar Ji

Kuch nasamajh logon ki baaton ko dil par mat lijyega.Sach bolne waale vyakti ke saath hamesha aisa hi hota hai.Usey jaan-boojhkar galat kaha jaata hai, usmey heen bhawana daalne ki koshish ki jaati hai lekin aap to jaante hi hain ki

"Sach aur Sahas hai jiske mann mein,Anth mein jeet usi ki rahe"

Ab aap Jamaal Bhaii ka hi example lein, jab unhone ye blog shuru kiya tha aur Hindu dharm ki galat baaton ko ujagar karna shuru kiya tha to un par bhi bahut sawaal uthaaye gaye the, unhe bhi kamzor karne ki koshish ki gayi thi lekin kya unhone sach bolna band kiya nahin balki wo in baaton se aur strong hue.Hamein bhi unse inspiration leni chaahiye

Mohammed Umar Kairanvi said...

जमाल साहब, चुल्‍लु भर पानी में डूब मरना वाली कहावत आपने सुनी होगी, नहीं सुनी तो दुसरी बात सुनिये आपको ताज्‍्जुब होगा कि इस पोस्‍ट का लिंक ब्‍लागवाणी हाटलिस्‍ट से हटा दिया गया है,
ज‍बकि पढे गये लिस्‍ट में लिंक है उससे पता चलता है 99 पाठकों ने पढा, 25 से अधिक कमेंटस किये गये

चिटठाजगत की तरफ मामला ठीकठाक है, उधर बहुत कम शिकायत का मौका मिलता है

इसमें किसकी जीत किसकी हार है आप स्‍वयं समझ सकते हैं

Dr. Ayaz ahmad said...
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पंकज सिंह राजपूत said...

""पढ़-लिख के गोबर"" इस शब्द का क्या अर्थ होता है ?

नहीं पता कोई बात नहीं !!

मेरे हिसाब - किताब से यहाँ जितने कमेन्ट करने आये हैं ना तो उनमे से किसी ने वेद पढ़े ना ही कोई धर्म ग्रन्थ पढ़ा है और ना ही कुरान या बाइबल, यहाँ तक की ये अनवर जमाल साहब भी निरे कोरे हैं ज्याद समझना और समझना मुझे आता नहीं ना ही मेरे पास इतना वक़्त है की मैं अपने आप को सर्वज्ञ समझने वालों को समझा सकूं की वे हैं तो आखिर कुँए के मेंढक ही !! सभी ने कहीं से थोडा बहुत कुछ ना कुछ पढ़ा होगा और उसी के बल पर स्वयं को महाज्ञानी समझ बैठे हैं !!

बस एक छोटा सा सवाल और - बंदरिया अपने बच्चे को अपने पेट से चिपका के क्यों रखती है? और यदि बच्चा मर जाता है तब बंदरिया क्या करती है ?

!!! बस एक ही जय-जय भारत !!!

सोच रहा था एक पोस्ट ही बना दूं इस पर क्या कहूं वक़्त की कमी आड़े आ जाती है ! कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम !!

Dr. Ayaz ahmad said...

अच्छी पोस्ट

impact said...
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sleem said...

वन्देमातरम अमीत भाई साहब ....अजमेर a.b.v.p से हो के भी jaipur के बन रहे होयार
ये कोई बात नहीं ....जय श्री राम भाई

Anonymous said...

डॉ अनवर जमाल साहब
आपका ब्लॉग देखकर ख़ुशी हुई... आपकी बातें तो काफी समय से सुनते आये हैं ... जो की अपने आप में बहुत ही तार्किक होती है और समझदार के लिए इशारे के सामान होती हैं... मुद्दा कोई भी हो.. बहस और चर्चा अच्छी होती है ... एक दुसरे के विचारों का आदान प्रदान ही दिमाग की खिड़की खोल देते हैं और कई बार हनें आलोचकों की निशान्दही पर हमें अचानक ही वोह कुछ मिल जाता है जिसकी तलाश में हमें मुद्दतें गुज़र चुकी होती हैं...
जब कोई समझना चाहता है तो उसके लिए एक इशारा ही काफी होता है लेकिन अगर कोई यह ठान कर बैठे की मुझे समझना समझाना नहीं बल्कि बहस बराय बहस है तो यकीनन वाणी में कटुता आने लगती है...
बहरहाल यह जान कर ख़ुशी हुई की आप अपनी बात जिस तार्किक अंदाज़ से बोलकर समझाते रहे हैं उस से कहीं अच्छे अंदाज़ में आप लिक्खकर भी पाश कर सकते हैं ...
..ऑफ़कोर्स यु आर ऐ गुड ब्लॉगर.....

तमकीन फैयाज़a

DR. ANWER JAMAL said...

thanks to Mr. Tamkeen Fayyaz and others .

Dr. Ayaz ahmad said...

भाई गिरी जी रतनपाल जीविचारशुन्य जी बैगणी जी आपने अभी तक कोई कमेँट नही दिया क्या आप लोग भी कमेँट् करने से पहले मज़हब देखते है

Dr. Ayaz ahmad said...

हम तो हर गलत बात के विरोधी है चाहे वह कोई कह रहा हो जब हमारी बहन ने गलती की हमने उसे भी बताया और जब चिपलुँकर साहब ने गलती की तो भी त्वरित प्रतिक्रिया दी आप भी बताएँ कि आप चिपलुँकर जी से सहमत है या असहमत आप मज़हब ना देखे ब्लकि सही गलत देखे जिस तरह अनवर भाई ने हमेशा सच का साथ दिया है आप भी दे और मिसाल कायम करे

DR. ANWER JAMAL said...

मिस्टर अजय ! आपको मेरे ब्लॉग पर अपना नाम नज़र कहां आ गया भाई ?