सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Sunday, April 4, 2010

क्या मुसलमानों की उन बातों का भी विरोध किया जायेगा जिनकी प्रेरणा सीता माता दे रही हैं ? Pardah


जनाब सतीश सक्सेना जी ! सादर प्रणाम। आप वास्तव में आदरणीय हैं । आपने इस ब्लॉग को अपनी प्यार भरी नज़र से तब देखा था जबकि यह बिल्कुल नवजात था और इसका पंजीकरण भी कहीं नहीं था । आपका कलाम शीरीं और अन्दाज़ निहायत दिल पज़ीर है । मेरा नाम आपकी महकती ज़ुबान पर आया , इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

आपने मेरे लेख के बारे में अपना ख़याल तो ज़ाहिर कर दिया लेकिन आपने यह नहीं बताया कि मैंने बहन फ़िरदौस के लेख के साथ अन्याय कैसे कर दिया ?

आपको कुछ प्रमाण तो देना ही चाहिये था ताकि मैं अपनी ग़लती सुधार सकता ।

वे वस्त्र को बराई की जड़ मानती हैं और मैं सभ्यता का संस्कार । परदा धर्म का भी अंग है और भारतीय संस्कृति की परम्परा भी ।

सीता माता भी परदा करती थीं ।

इसी वजह से लक्ष्मण जी उन्हें वनवास से लौटने के बाद बहुत सी औरतों के दरम्यान अन्तःपुर में न पहचान सके जब वे श्री रामचन्द्र जी के आदेश की पूर्ति हेतु उन्हें फूलों की माला पहनाने के लिए गए थे । लौटकर उन्होंने श्री रामचन्द्रजी को बताया कि उन्होंने वन में पांव के अलावा सीता जी का कोई अंग खुला हुआ नहीं देखा । ( बाल्मीकि रामायण )

इसलामी परदा कोई नई रीत नहीं है बल्कि एक सनातन परम्परा है ।

सीता माता का परदा एक आदर्श परदा है जिसका पालन मुस्लिम करते हैं ।

क्या मुसलमानों की उन बातों का भी विरोध किया जायेगा जिनकी प्रेरणा सीता माता दे रही हैं ?

परदे का विरोध सीता माता का और एक सती का विरोध है , सत्य का विरोध है , धर्म का विरोध है । जो सती के धर्म का विरोधी है उसका विनाश तो निश्चित है ।

मैं मनुवंशी हूं ।

श्री रामचन्द्र जी मेरे पूर्वज हैं ।

उन्होंने हरेक सत्य विरोधी का दमन किया है और अब मैं भी यही कर रहा हूं ।

बहन ज्योत्स्ना जी ने भी उनके लेख को यथार्थ न मानकर व्यंग्य की संज्ञा दी है लेकिन क्या खुद लेखिका भी ऐसा ही मानती हैं ?उनके एक लेख का समर्थन हम अलल ऐलान कर चुके हैं , क्योंकि उनकी बात जायज़ थी लेकिन अब उनकी बात नाजायज़ थी तो हमने ऐलानिया ग़लत कह दिया । हमने तो उनके साथ न्याय किया है । अन्याय तो वे कर रही हैं अपने टिप्पणीकारों के साथ । देखिये बहन अन्जुम का बयान -
Anjum Sheikh said...
फिरदौस जी परदे का विरोध कर रही हैं और खुद ही अपने ब्लॉग के लिए परदे का इस्तेमाल कर रही हैं. मैंने उन्हें कल से कई कमेंट्स लिखे जिनमे से उन्होंने एक भी कुबूल नहीं किया.
April 4, 2010 3:06 PM
अब बताइये कि अन्याय कौन कर रहा है ?

42 comments:

VICHAAR SHOONYA said...

देखिये मैं आप लोगों का बेवजह विरोध नहीं करता पर आप अपने धर्म में इस्तेमाल होने वाले बुर्के की तरफदारी के लिए हिन्दू देवी देवताओं का सहारा नहीं लें। सीता जी पर्दा करती थी या कोई बुरका पहनती थी यह कहीं नहीं लिखा है। लक्ष्मण जी उन्हें नहीं पहचान पाए क्योंकि वो खुद आदर और सम्मान वश सीता जी की तरफ नहीं देखते थे। हिन्दू संस्कृति में कहीं भी पर्दा प्रथा नहीं है। और जहाँ है भी तो वो सिर्फ मुसलमानों के भारत में आने के पश्चात् शुरू हुयी है। भारत में जहाँ पर मुस्लिम अपनी जोर जबदस्ती नहीं दिखा पाए वहां पर अभी भी हिन्दू स्त्रियाँ पर्दा नहीं करती। मैं उत्तराखंड का हूँ । ओरंगजेब से बचने के लिए हिन्दुओं ने वहां शरण ली थी। हमारे यहाँ पर्दा प्रथा का नामोनिशान भी नहीं है। अतः अपनी कुप्रथा के बचाव के लिए हिन्दुओं का सहारा लेना बंद करें।

Anjum Sheikh said...

अनवर साहब, आपने जिस तरह सर्व-धर्म संभव का परिचय देते हुए यह लेख लिखा है, वाकई काबिल-ऐ-तारीफ है. एक मुसलमान इस नज़रिए से भी सोच सकता है, ऐसा तो मैंने सोचा भी था.

VICHAAR SHOONYA said...

मेरे ये विचार बिना किसी सोच के निकले है और मेरा गुस्सा अभी बाकि है। ये एक हिन्दू का गुस्सा है थोडा सम्हाल सम्हाल कर ही निकालता है क्योंकि हमारे धर्म का मूल ही अहिंसा है। हम सभी में इश्वर का अंश समझते है और इसलिए हमें कभी ये नहीं सिखाया गया की दुसरे के धर्म को कमतर समझो और अपने धर्म को सर्वोत्तम समझो। और यही भावना है की हम किसी से जबरदस्ती धर्मान्तरण करने को नहीं कहते हैं। हमारे धर्म में हिन्दू पैदा होते हैं बनाये नहीं जाते। हमारे धर्म में सिर्फ संस्कार दिए जाते है जिन्हें आप लोगो ने कितना समझा है वो मैं देख चूका हूँ। आज जो भी आपके ब्लॉग पर अनाप सनाप लिखता है वो मुझे तो कसाब की ही तरह से हाथ में रक्षा बांध और माथे पर टिका लगा कर आया हुआ कोई पाकिस्तानी छद्मवेशी ही लगता है । आप लोग कुछ अच्छ कार्य करे। अपने समाज के लोगो के उत्थान के लिए अपनी ताकत लगाये सभी के लिए अच्छा रहेगा।

MLA - Mohd Liaqat Ali said...

Kamaal ka lekh hai, Dr. Sahab. Bahut Khoob.

MLA - Mohd Liaqat Ali said...

इसलामी परदा कोई नई रीत नहीं है बल्कि एक सनातन परम्परा है ।

सीता माता का परदा एक आदर्श परदा है जिसका पालन मुस्लिम करते हैं ।

क्या मुसलमानों की उन बातों का भी विरोध किया जायेगा जिनकी प्रेरणा सीता माता दे रही हैं

Shah Nawaz said...

अनवर भाई, यह जो लोग कह रहे हैं कि पर्दा हिन्दू धर्म का अंग नहीं है, दर-असल अपने ही धर्म को नहीं जानते. दर-असल, यह परदे को गलत नज़रिए से देखते हैं और इसका गलत मतलब निकलते हैं. यह शायद भूल रहे की पर्दा ही मनुष्यों को जानवरों से अलग करता है.

एक परदा ही तो है, जो जानवर नहीं करते और अपने शरीर को बिना परदे के रखते हैं. वहीँ आज भी पूरी दुनिया के इंसान अपने शरीर का पर्दा करते हैं और छुपाने वाले अंगो को छुपाते हैं. बस फर्क सिर्फ इस बात का है, छुपाने वाले अंग हर एक की नज़र में अलग-अलग हैं.

जो परदे का विरोध कर रहे हैं मैं उनसे मालूम करना चाहता हूँ कि वह अपने शरीर का पर्दा क्यों करते हैं? क्यों पेंट-कमीज़ पहनते हैं?

Dr. Ayaz ahmad said...

आपने परदे को बहुत अच्छी तरह साबित कर दिया अनवर भाई

Dr. Ayaz ahmad said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

इन लोगो की अक़्लो पर परदा पड़ गया इसलिए ये परदे को क्या समझेगेँ इनका तो एक ही इलाज है.....

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

जो नास्तिक हैं केवल वही असली धार्मिक हैं...बाकी सब पाखंडी हैं....
पूरा पोस्ट इस लिंक पर है...
http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/04/blog-post_506.html

राजीव तनेजा said...

विचारणीय पोस्ट

सतीश सक्सेना said...

डॉ अनवर जमाल,
मैंने कुछ बुनियादी बातों पर अपना स्पष्ट विरोध दर्ज करवाया था और दुबारा किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता मैं नहीं समझता हूँ ! कुछ समय से आपकी तकलीफ को, पूरी इज्ज़त देते हुए समझने की कोशिश कर रहा था अतः आपमें दिलचस्पी स्वाभाविक थी ! फिरदौस बहन का लेख मेरे विचार से एक सामान्य व्यंग्य था जिसमें उन्होंने हमारे देश में मुस्लिम लड़कियों के साथ, समाज की कुछ रूढ़िवादिता पर उंगली उठाई थी ! आप जैसे विद्वान् का , एक चटपटा शीर्षक के साथ फिरदौस के शब्दों को तोड़ मरोड़ कर यह कहना कि "वस्त्र बुराई की जड़ हैं " और वह भी फिरदौस की तरफ से , यह मेरे गले नहीं उतर सका और फलस्वरूप आपसे यह शिकायत की !

फिरदौस ने क्या कहा यह एक नादान बच्चा भी उस लेख को पढ़कर समझ जायेगा मगर फिर भी आपने हकीकत नज़रंदाज़ करते हुए,जानबूझ कर भीड़ इकट्ठा करने हेतु, फिरदौस पर आरोप लगाया है जिससे मेरे मन में आपकी छबि यकीनन खराब हुई है ! आपके द्वारा हमारे धर्म के बारे में लिखे कुछ लेख और यह नवीन घटना इस बात का संकेत देती है कि आप मात्र भीड़ इकट्ठा और अपनी तारीफ़ करवाने का शौक रखते हैं !

अनवर भाई! आपने, अपनी काबिले तारीफ़ बुद्धि के साथ, जो स्वयं रचित प्रभामंडल बना लिया है , उसको तोड़कर आपको सही रास्ता दिखाने की कोशिश करना, मेरे जैसे साधारण बुद्धि वाले इंसान के बस की बात नहीं और न ही मैं आपको सुधारने का प्रयत्न करने वाला हूँ !

हाँ आखिरी प्रार्थना अवश्य है कि अपनी विवेचना सिर्फ अपने धर्म के लिए रखें दूसरों की श्रद्धा के बारे में आपको कुछ भी बोलने से परहेज रखना चाहिए ! ऐसी बातों से केवल कडवाहट ही पैदा होती है, चाहे आप अपनी बात कहने में कितने ही ईमानदार क्यों न हों ! यही अपेक्षा मैं आपके विरोधियों से भी रखता हूँ
कृपया आगे कोई प्रश्न ना पूंछे क्योंकि नितांत सुर्ख़ियों में रहना आपके लिए आवश्यक हो सकता है मेरे लिए बिलकुल नहीं , और इस निरर्थक और जहरीली बहस से बचने के लिए, यह आवश्यक भी है !

PD said...

मुझ जैसे एक नास्तिक को ऐसे ब्लॉग कट्टर हिन्दू बनने के लिए प्रेरित करते हैं.. ऐसी प्रेरणा देने के लिए धन्यवाद..

sahespuriya said...

LAGE RAHO

Tarkeshwar Giri said...

Anwar ji main to kab e chilla raha hun ki, Haridwar chalo -Haridwar Chalo. kuch Dharm ki jankari prapt ho jayegi. aur lage hath Dimag bhi thanda ho jayega Ganga ji main nahate hi.


BUS AAPSE VINTI HAI KI AAP HINDU DEVI DEVTAWO KA EXAMPLE DENA BAND KARDE. APNE SAMAJ KO SHUDARE.

Dr. Ayaz ahmad said...

@विचार शून्य जी गुस्से मे आने से पहले अनवर जमाल साहब से रामायण मे सीता जी के परदे मे होने का सबूत तो माँग लेते

Dr. Ayaz ahmad said...

@सक्सेना साहब बहन फ़िरदौस मज़हब के बारे मज़ाक़ करने का क्या अधिकार है अब जब लेख लिखा है तो उस पर जवाब मे लेख तो आएगेँ ही इसमे अन्याय क्या आपने भी तो जवाब ही लिखा है ये तो ब्लागजगत क्या हर जगह चलता है

Amit Sharma said...

सवाल तो काफी है ,पर इन दो मुख्य सवालों का ज़वाब अभी दे दीजिए, क्योंकि विकार रहित तो दोनों घर एक ही साथ होने चाहिये ना.
इनके बाद जैसे जैसे समय मिलेगा जिज्ञासाओ को आपके सामने रखता रहूँगा.
१.हज यात्री जो सरकारी सब्सिडी से हज के किये जाते है.तो उनकी वह यात्रा मालिक के दर पे कुबूल है या रद्द है ?
२. और अगर कबूल है तो किस प्रकार है ,और रद्द है तो फिर इस विकार को दूर करने के लिए ब्लॉग पे पोस्ट कब लिख रहे है,और समाज में जाकर इस विकार को दूर करने के लिए अभियान कब चला रहे है ?
३.क्या आप मुसलमानों द्वारा खोले गए किसी अस्पताल (सिर्फ हकिम्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुसलमानों का ही इलाज होता हो )
या धर्मशाला (मुस्लिम मुसाफ्हिर्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुस्लिम ही ठहर सकतें हों ) या अन्य सेवा कार्यों का विवरण बतला सकतें हैं ,
की ऐसे सेवा कार्य देश में कहाँ कहाँ चल रहें हैं ?

Amit Sharma said...

सवाल तो काफी है ,पर इन दो मुख्य सवालों का ज़वाब अभी दे दीजिए, क्योंकि विकार रहित तो दोनों घर एक ही साथ होने चाहिये ना.
इनके बाद जैसे जैसे समय मिलेगा जिज्ञासाओ को आपके सामने रखता रहूँगा.
१.हज यात्री जो सरकारी सब्सिडी से हज के किये जाते है.तो उनकी वह यात्रा मालिक के दर पे कुबूल है या रद्द है ?
२. और अगर कबूल है तो किस प्रकार है ,और रद्द है तो फिर इस विकार को दूर करने के लिए ब्लॉग पे पोस्ट कब लिख रहे है,और समाज में जाकर इस विकार को दूर करने के लिए अभियान कब चला रहे है ?
३.क्या आप मुसलमानों द्वारा खोले गए किसी अस्पताल (सिर्फ हकिम्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुसलमानों का ही इलाज होता हो )
या धर्मशाला (मुस्लिम मुसाफ्हिर्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुस्लिम ही ठहर सकतें हों ) या अन्य सेवा कार्यों का विवरण बतला सकतें हैं ,
की ऐसे सेवा कार्य देश में कहाँ कहाँ चल रहें हैं ?

बैरागी said...

मुहमद साहब के पास १ नोकर था जैद नाम का
मुहमद साहब उसे अपने बेटे की तरह प्यार करते थे और उसकी (जैद ) की दूसरी शादी "जैनब" से हुई थी "जैनब" कुरैशी खानदान की थी व् मुहमद भी कुरैशी खानदान के थे इस तरह जैनब मुहमद की फुफेरी जाति "बहन" थी
१ दिन मुहमद जैद के न होने पर उसके घर जा पंहुचा चिक ( परदे ) की आड में जैनब बैठी थी उसने रसूल (जो उसका ससुर भी था) की आवाज सुनी तो जल्दी से उसे भीतर लाने का प्रबंध करने लगी
मुहमद की निगाह उसके सुन्दर बदन पर पड़ी बस फिर क्या था ??
दिल पर १ बिजली सी गिर पड़ी व् मुहँ से निकला आह सुभान अल्ला तू कैसे - कैसी खूबसूरती की कारीगरी करने वाला है ?
जैनब ने ये शब्द सुने और दिल ही दिल में पैगेम्बर के दिल पर कब्जा प् जाने की खुशी जताई जैद से शायद उसकी न बनती थी बस फिर हो गया फुफेरी जाति "बहन" से मिलन ????
जब जैद घर आया तो जैनब ने उसे सारा किस्सा बताया फिर क्या था वह मुहमद के पास गया व् जैनब को तलाक देने व् उसे अपनाने की बात कहने लगा
चाहे कुछ भी हो था तो ये गुनाह ही व् ऐसा नही था की मुहम्मद अपने गुनाह न जानता था बल्कि वह जनता था कि अगर उसकी बेहुद गियाना नज़र जैनब पर न पड़ती तो ये दिन - दहाड़े ये अंधेर न होता अतं जो हुआ अब जो हो गया सो हो गया अब आगे देखो आगे मुहमद के मोमिनों पर खासकर उनकी बीबियो पर कन्ट्रोल के लिए पवित्र कुरान में ये आयत लिखी



ऐ मोमिनों रसूल के मकान में न जाओ जब तुम्हे कुछ पूछना हो तो परदे की आड में पूछो यह तुम्हारे व् उनके दिलो के लिए बेहतर होगा यह मुनासिब नहीं की तुम रसूल के दिल को दुखाओ और न यह कि उनके बाद उनकी बीबियो से शादी करो रसूल की बीबिया मोमिनों की माएं (माँ ) है " सुरह अखराब रकूब ५ "

औरते अकसर १०- १० शादिया कर लेती थी जिन्होंने २ -२ खाविन्द किये
उनकी तादात बहुत कम थी जो अपने पति को बुढा होते देखती या दूसरे से उसकी आखं लड़ जाती तो वह मक्के सरीफ की सेवा में हाज़िर होती और मामला फैसला करा अपने पहले पति को छोड देती और किसी दूसरे से जो जवान व् खूबसूरत हो तो उसके साथ निकाह कर लेती
तो इन पर कंट्रोल करने के लिए हमारे प्यारे मुहम्मद साहब ने पर्दा चालू करवाया


@ Shah Nawaz
अनवर भाई, यह जो लोग कह रहे हैं कि पर्दा हिन्दू धर्म का अंग नहीं है, दर-असल अपने ही धर्म को नहीं जानते.

अब तुम मुसलमान हमें हिंदू धरम सिखाओगे

हाहाहा हाहाहा
पहले अपना रसूल को तो जान लो


चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
बलिहारी जाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

सदा बहार सजीला है रसूल मेरा
हो लाखपीर रसीला है रसूल मेरा
जहे जमाल छबीला है रसूल मेरा
रहीने इश्क रंगीला है रसूल मेरा

चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
बलिहारी जाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

किसी की बिगड़ी बनाना है ब्याह कर लेंगे
बुझा चिराग जलाना है ब्याह कर लेंगे
किसी का रूप सुहाना है ब्याह कर लेंगे
किसी के पास खजाना है ब्याह कर लेंगे

चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
बलिहारीजाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

बैरागी said...

चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
बलिहारी जाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

सदा बहार सजीला है रसूल मेरा
हो लाखपीर रसीला है रसूल मेरा
जहे जमाल छबीला है रसूल मेरा
रहीने इश्क रंगीला है रसूल मेरा

चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
बलिहारी जाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

किसी की बिगड़ी बनाना है ब्याह कर लेंगे
बुझा चिराग जलाना है ब्याह कर लेंगे
किसी का रूप सुहाना है ब्याह कर लेंगे
किसी के पास खजाना है ब्याह कर लेंगे

चमन में होने दो बुलबुल को फूल के सदके
बलिहारीजाऊँ मै तो अपने रसूल के सदके

Anonymous said...

खुद 1601 रानियाँ रखकर और कुवारियों के साथ लीलाएं रचाकर चले हैं दूसरो को रंगीला कहने.

Amit Sharma said...

सवाल तो काफी है ,पर इन दो मुख्य सवालों का ज़वाब अभी दे दीजिए, क्योंकि विकार रहित तो दोनों घर एक ही साथ होने चाहिये ना.
इनके बाद जैसे जैसे समय मिलेगा जिज्ञासाओ को आपके सामने रखता रहूँगा.
१.हज यात्री जो सरकारी सब्सिडी से हज के किये जाते है.तो उनकी वह यात्रा मालिक के दर पे कुबूल है या रद्द है ?
२. और अगर कबूल है तो किस प्रकार है ,और रद्द है तो फिर इस विकार को दूर करने के लिए ब्लॉग पे पोस्ट कब लिख रहे है,और समाज में जाकर इस विकार को दूर करने के लिए अभियान कब चला रहे है ?
३.क्या आप मुसलमानों द्वारा खोले गए किसी अस्पताल (सिर्फ हकिम्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुसलमानों का ही इलाज होता हो )
या धर्मशाला (मुस्लिम मुसाफ्हिर्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुस्लिम ही ठहर सकतें हों ) या अन्य सेवा कार्यों का विवरण बतला सकतें हैं ,
की ऐसे सेवा कार्य देश में कहाँ कहाँ चल रहें हैं ?

zeashan zaidi said...

@Amit Sharma
१.हज यात्री जो सरकारी सब्सिडी से हज के किये जाते है.तो उनकी वह यात्रा मालिक के दर पे कुबूल है या रद्द है ?
हज के लिए Affordability शर्त है. अगर कोई Subsidy की वजह से affordable हो जाता है तो कोई बुराई नहीं.? यहाँ पढ़ें. वैसे भी एयर इण्डिया ने हज कराने में अपनी मोनोपोली बना रखी है तो सब्सिडी देनी ही पड़ेगी. या फिर वह दूसरी एयर लाइनों के लिए रास्ता खोलकर यात्रियों को मोलभाव का मौका दे.
क्या आप मुसलमानों द्वारा खोले गए किसी अस्पताल (सिर्फ हकिम्खाना नहीं जहाँ सिर्फ मुसलमानों का ही इलाज होता हो.
कृपया लखनऊ का इराज़ मेडिकल कालेज व हॉस्पिटल देखें.

विशाल said...

please batana qabar banane men kitna kharch aata he Chita ka kharch men batata hoon

स्वामी दयानंद सरस्वती ने दाह संस्कार की जो विधि बताई है वह विधि दफ़नाने की अपेक्षा कहीं अधिक महंगी है। जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है कि मुर्दे के दाह संस्कार में “शरीर के वज़न के बराबर घी, उसमें एक सेर में रत्ती भर कस्तूरी, माषा भर केसर, कम से कम आधा मन चन्दन, अगर, तगर, कपूर आदि और पलाष आदि की लकड़ी प्रयोग करनी चाहिए। मृत दरिद्र भी हो तो भी बीस सेर से कम घी चिता में न डाले। (13-40,41,42)
स्वामी दयानंद सरस्वती के दाह संस्कार में जो सामग्री उपयोग में लाई गई वह इस प्रकार थी - घी 4 मन यानी 149 कि.ग्रा., चंदन 2 मन यानि 75 कि.ग्रा., कपूर 5 सेर यानी 4.67 कि.ग्रा., केसर 1 सेर यानि 933 ग्राम, कस्तूरी 2 तोला यानि 23.32 ग्राम, लकड़ी 10 मन यानि 373 कि.ग्रा. आदि। (आर्श साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाषित पुस्तक, ‘‘महर्शि दयानंद का जीवन चरित्र’’ से) उक्त सामग्री से सिद्ध होता है कि दाह संस्कार की क्रिया कितनी महंगी है।

SHAZY said...

thanks again for showing the right image of truth.aur haan vichaar shoonya saab se kehna chahoonga ke ki dr saab hindu devi devta ka sahara nahi le rahe balki ye swabhavik baat hai ki jab kisi ko kuch samjhana ho to usi ki kitab se ya usi ke tarike se samjhaya jata hai taki use samajhne main aasani ho ye theek aisa hai jaise ke kisi ne kabhi meat na khaya aur wo uska taste poonche to aap kaise batayenge ya to kahaenge kha kar dekh lo ya koi kareeb ki cheez talash karenge jise wo samajhta ho to phir aap kahaenge ki khathal ki tarah hota hai is tarah aap uski samajh ke kareeb ho jate hai.theek isi tarah aapke hisaab se bataya jata hai varna directly humne batana shuru kiya to aap kahaenge ke islamic hai aur satya to satya hai ise kisi sahare ki zaroorat nahi lekin ye sabhi insaano ki bhalai ke liye taki log samjhen ki lashman ji ne sita mata ko kyun aankh uthakar nahi dekha kunki wo unka aadar karte the aur sita mata apna aadar karvati thi apni sharm-o-haya ke zariye isiliye ye parda partha hai kyunki ishvar ko pata tha aane wale daur main har koi sita mata aur laxman ji jaisa nahi hai .Aur haan aap jo bhi hai bairagi saab bachho ki tarah ek hi khilone se khelna tayag do bade ho jao ek sawal ka jab jawab mil jaye to use baar baar repeat karne koi asatya satya nahi ban jata.

Amit Sharma said...
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Amit Sharma said...

http://27amit.blogspot.com/

क्या हिन्दू धर्म एक पंथ(रिलिजन) है?


जब अंग्रेजी राज की जड़ें भारत में जमने लगी.तब उन्होंने हिन्दु धर्मांतरण की सोची.पर उन्होंने इस बात को समझा की हिन्दुओ के सीधे धर्मांतरण का विरोध होगा. इसलिए दुसरे प्रभावकारी उपाय सोचे गए. मैकाले-मैक्समुलर की मुखियागिरी में हिन्दुधर्म में तथाकथित नैतिक सुधार ,स्कूलों में इंग्लिश मीडियम से पढाई के जरिये मातृभाषा से कटाव , और सबसे बड़ा तथा हिन्दुधर्म की जड़ो पे सीधा व मारक वार करने वाला उपाय था हिन्दू-धर्मशास्त्रों का भ्रामक-भाष्य करना उनमे उलटे सीधे श्लोक डालकर प्रिंट करके हिन्दुओं के हाथों में सौंपकर हिन्दू मन को ग्लानी से भर देना की देखो तुम्हारे धर्मशास्त्रों में कितना अनर्गल लिखा है. क्योंकि अगर किसी घर को बर्बाद करना है तो उसका सीधा सा उपाय है की घर के बच्चों को उनके माता पिता के लिए उलजलूल भड़काते रहो,बच्चा माता-पिता की अवज्ञा करने लगेगा, बस हो गया घर का सत्यानाश. आश्चर्य तो यह है की मैक्समूलर को हिन्दू हितैषी बताया गया है जबकि हकीकत में वह हिन्दुधर्म का सबसे बड़ा दुश्मन था .

सलीम ख़ान said...

यहाँ पूर्वी समाज के ठेकेदारों और बहन फिरदौस के अवसरवादी हिमायती तत्व कहाँ चले गए ???

सलीम ख़ान said...

यहाँ पूर्वी समाज के ठेकेदार और बहन फिरदौस के अवसरवादी हिमायती तत्व कहाँ चले गए ???

sleem said...

aakhir hamara dharam green coulor me hame hi bata raha b.t. bengan

sleem said...

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नन्‍दू गुजराती said...

क्या 'हिन्दू शब्द भारत के लिए समस्या नहीं बन गया है?
आज हम 'हिन्दू शब्द की कितनी ही उदात्त व्याख्या क्यों न कर लें, लेकिन व्यवहार में यह एक संकीर्ण धार्मिक समुदाय का प्रतीक बन गया है। राजनीति में हिन्दू राष्ट्रवाद पूरी तरह पराजित हो चुका है। सामाजिक स्तर पर भी यह भारत के अनेक धार्मिक समुदायों में से केवल एक रह गया है। कहने को इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय माना जाताहै, लेकिन वास्तव में कहीं इसकी ठोस पहचान नहीं रह गयी है। सर्वोच्च न्यायालय तक की राय में हिन्दू, हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, लेकिन हमारे संविधान में यह एक रिलीजन के रूप में दर्ज है। रिलीजन के रूप में परिभाषित होने के कारण भारत जैसा परम्परा से ही सेकुलर राष्ट्र उसके साथ अपनी पहचान नहीं जोडऩा चाहता। सवाल है तो फिर हम विदेशियों द्वारा दिये गये इस शब्द को क्यों अपने गले में लटकाए हुए हैं ? हम क्यों नहीं इसे तोड़कर फेंक देते और भारत व भारती की अपनी पुरानी पहचान वापस ले आते।

हिन्दू धर्म को सामान्यतया दुनिया का सबसे पुराना धर्म कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि दुनिया में ईसाई व इस्लाम के बाद हिन्दू धर्म को मानने वालों की संख्या सबसे अधिक है। लेकिन क्या वास्तव में हिन्दू धर्म नाम का कोई धर्म है? दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे डॉ. डी.एन. डबरा का कहना है कि 'हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे नया धर्म है..........

http://navyadrishti.blogspot.com/2009/12/blog-post_31.html

मेरा देश मेरा धर्म said...

क्या श्री कृष्ण और मोहम्मद की तुलना हो सकती है ?

यदि हो सकती है तो कैसे ?

यदि कोई ज्ञानी यह करने में समर्थ हो तो दया करके करे !

! ! ! बस एक ही धुन जय-जय भारत ! ! !

मेरा देश मेरा धर्म said...

क्या नन्‍दू गुजराती भारत के लिए समस्या नहीं बन गया है? ?

मेरा देश मेरा धर्म said...

आज सुबह -सुबह आस्था चैनेल किस - किस ने देखा ?

Aslam Qasmi said...

jo parde ki mukhalfat karahe hen r kia we chah te hen ki unki bahin betion ka yun hi balatkar hota rahe ? islam men parda kewal is lie he taki behnon ki izzat mahfooz rahe

bharat bhaarti said...

हमारे धर्म के लोगों की यही तो मुसीबत हे की वे अपने बारे मैं कुछ भी सुनना नही चाह ते

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यहां आकर टिप्पणी करने से अच्छा है कि इनका जबाव अपने ब्लाग में दें... की अक्ल में कुछ आने वाला नहीं..
पीडी जी शायद अब आपको स्पष्ट हो रहा होगा कि धर्मनिरपेक्षी कौन है वास्तव में.
कट्टर से कट्टर हिन्दू भी इन जैसे उदारवादियों से लाख गुना अधिक अच्छा है...
भला हो महफूज जी, फौजिया जी और फिरदौस जी जैसे सच्चे मुस्लिमों का..

Ravindra Nath said...

अनवर जी धन्यवाद कि आप सती के मार्ग का अनुसरण करना चाहते हैं, अब जरा यह भी बता दे कि आप गोकुशी प्रतिबन्ध के सती माता के दिखाए मार्ग के लिए कब ब्लॉग लिखेंगे|अथवा आप मान लीजिये कि आप पाखंड से भरा खेल खेल रहे हैं जहाँ पर मीठा मीठा तो गप्प कर कड़वा कड़वा थू| और जब ऐसा होगा तो ध्यान रखे, कडवाहट ही बढ़ेगी|

nitin tyagi said...

सीता माता भी परदा करती थीं ??????????????????????
पहले रामायण का पूरा ज्ञान प्राप्त करो |सीता जी राम जी को स्वम्बर में सबके सामने माला पहना कर बताया है की भारत में हम कितने सभ्य थे |नारी को नर के बराबर दर्ज़ा दिया जाता था |उसकी इच्छा का पूरा ध्यान रखा जाता था |
वैसे मैं एक बात बता दो की हिन्दू सिर्फ रामायण तक सिमित नहीं हैं ,राम का जन्म खुद हिन्दू घर में हुआ यानि के राम जी के पैदा होने से पहले भी हिन्दू थे |
पहले आप रामायण का संपूर्ण अध्यन करे फिर कोई प्रतिक्रिया दे |

SKAaustralia said...

Can anyone explain Raam, Sita and Laxman as an aspect of our Atma (Soul) not as human beings.