सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Monday, April 12, 2010

आप दहेज की मांग छोड़ दीजिए और फिर देखिए कि मुसलमानों के साथ हिन्दू लड़कियों के विवाह में कितनी कमी आती है ? Dowry .

हम जिस कायनात में रहते बसते हैं इसकी एक एक चीज़ नियम में बंधी है । कायनात की हर चीज़ परिवर्तनशील है लेकिन इसी कायनात की एक चीज़ ऐसी है जो कभी नहीं बदलती और वह है नियम , जिसका पालन हर चीज़ कर रही है । अपरिवर्तनीय नियमों की मौजूदगी बताती है कि नियम बनाने और उन्हें क़ायम रखने वाली कोई अपरिवर्तनशील हस्ती ज़रूर मौजूद है। इसी हस्ती को लोग हरेक भाषा में ईश्वर , अल्ला , गॉड , यहोवा और खु़दा वग़ैरह नामों से जानते हैं ।
प्रकृति और जीवों में जैसे जैसे चेतना और बुद्धि का विकास होता गया वैसे वैसे उसमें ज्ञान और सामथ्र्य का स्तर भी बढ़ता गया और मनुष्य में यह सबसे अधिक पाये जाने से वह स्वाभाविक रूप से सबसे ज़्यादा ज्ञान का पात्र ठहरा और जहां ज्ञान होता है वहां शक्ति का उदय खुद ब खुद होता है ।
प्रकृति की हरेक चीज़ तो नियम का पालन करने में मजबूर है लेकिन इनसान ज्ञान के कारण शक्ति के उस मक़ाम को पा चुका है कि चाहे तो वह नियम को माने और चाहे तो नियम की अवहेलना कर दे । नियम के पालन या भंग करने में तो वह आज़ाद है लेकिन नियम के विरूद्ध चलकर उसका नष्ट होना निश्चित है , यह भी कायनात का एक अटल नियम है और यह एक ऐसा नियम है कि यह इनसान पर ज़रूर लागू होता है । कोई भी इनसान न तो इसे भंग कर सकता है और न ही इसे बदल सकता है ।
इनसान केवल एक सामाजिक प्राणी ही नहीं बल्कि एक नैतिक प्राणी भी है ।
एक इनसान को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से जीवन गुज़ारने के लिए बहुत से साधनों की ज़रूरत पड़ती है । इन साधनों को वह प्राप्त भी करता है और दूसरों को देता भी है ।औरत की जिस्मानी बनावट मर्द के मुक़ाबले अलग है । बच्चे की पैदाइश और उसका पालन पोषण उसे एक मर्द से डिफ़रेन्ट बनाता है । शारीरिक रूप से वह मर्द के मुक़ाबले कमज़ोर भी पायी जाती है । खुद सारे मर्द भी जिस्मानी ताक़त में बराबर नहीं होते । लोगों का ज्ञान भी उनकी ताक़त में फ़र्क़ पैदा कर देता है । लोगों के हालात भी उनकी ताक़त को मुतास्सिर करते हैं। वह कौन सा विधान हो , जिसका पालन करते हुए अलग अलग ताक़त वाले सभी औरतों और मर्दों की सभी जायज़ ज़रूरतें उनके सही वक्त पर इस तरह पूरी हो जायें कि न तो उनकी नैतिकता प्रभावित हो और न ही उनमें आपसी नफ़रत से संघर्ष के हालात पैदा हों ?
इसी विधान का नाम धर्म है ।
सृष्टि के दीगर नियमों की तरह यह विधान भी स्वयं विधाता की तरफ़ से निर्धारित है । आदमी को आज़ादी है कि वह चाहे तो इस विधान को माने और चाहे तो न माने लेकिन न मानने की हालत में इनसानी सोसायटी का अन्याय और असंतुलन का शिकार होना लाज़िमी है । जहां अन्याय होगा तो फिर वहां नफ़रत और प्रतिकार भी जन्मेगा , जिसका फ़ैसला ताक़त से किया जाएगा या फिर छल और कूटनीति से । इनमें से हरेक चीज़ समस्या को बढ़ाएगी , शांति और नैतिकता को घटाएगी ।
इनसान अपने लिए विधान बनाने में न तो कल समर्थ था और न ही आज समर्थ है । विधाता के विधि विधान का पालन करने में ही उसका कल्याण है । पवित्र कुरआन यही बताता है । पवित्र कु़रआन ही मानवता के लिए ईश्वरीय विधान है , ईश्वर की वाणी है ।
यह एकमात्र सुरक्षित ईशवाणी है , ऐतिहासिक रूप से यह प्रमाणित है । यह अपनी सच्चाई का सुबूत खुद है । कोई मनुष्य इस जैसी वाणी बनाने में समर्थ नहीं है । यह अपने आपमें एक ऐसा चमत्कार है जिसे कोई भी जब चाहे देख सकता है ।
जैसे ईश्वर अद्वितीय है वैसे ही उसकी वाणी भी अद्वितीय है । यहां हमारे स्वदिल अज़ीज़ भाई प्रिय प्रवीण जी का एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि
प्रिय प्रवीण जी ! आप एक ज्ञानी आदमी हैं । इस तरह के छोटे मोटे सवाल तो आप खुद भी हल कर सकते हैं और आपकी पहुँच तो उस लिट्रेचर तक है जो बहुतों को देखने के लिए भी नसीब नहीं होता । शायद इस तरह के सवाल पूछकर आप या तो ब्लॉगर्स के ज्ञान का स्तर जांचना चाहते होंगे या फिर उनका स्तर कुछ ऊँचा उठाना चाहते होंगे ।
आपने ब्लॉगवाणी से तो कभी नहीं पूछा कि जब उसके शरीर और जिव्हा नहीं है तो उसे वाणी कहां से प्राप्त हो गयी ?
मनुष्य के आधार पर ईश्वर की कल्पना करने से ही इस तरह के सवाल जन्म लेंगे और जब इन्हें हल करने की तरफ़ बढ़ा जायेगा तो फिर एक के बाद एक बहुत से दर्शन जन्म लेंगे और ईश्वर के वुजूद संबंधी प्रश्नों का अंत तब भी न होगा और तब दर्शनों के चक्कर में पड़कर न्यायपूर्ण रीति से लोगों के हक़ अदा करने की शिक्षाएं भुला दी जाएंगी ।
पूर्व में , इसलाम को जब वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था , तब यही कुछ हुआ । ईश्वर के अस्तित्व के बारे में प्रश्न उठा कि वह कैसा है ?
क्या वह ऐसा है ? या फिर वह ऐसा है ?
उत्तर में नेति नेति इतना कहा गया कि निर्गुण ब्रह्म की कल्पना ने जन्म ले लिया । एक ऐसा अचिन्त्य और अविज्ञेय ईश्वर जिस तक इनसान की कल्पना भी पहुंचने में बेबस है । यह एक ठीक बात है लेकिन इनसान तो कुछ समस्याएं भी रखता है और उनमें वह ईश्वर की मदद भी चाहता है तो फिर सगुण ईश्वर की कल्पना को जन्म लेना ही था । तब न केवल इनसानों को बल्कि मछली , कछुआ और सुअर तक को ईश्वर का अवतार मान लिया गया । ईश्वर के गुणों को निश्चित करने के चक्कर में ही निर्गुण भक्ति धारा और सगुण भक्ति धारा का जन्म हुआ । प्रयोगशाला का विषय इनसानी जिस्म है । इसकी हरेक नस नाड़ी को चीर फाड़कर देखा जा सकता है और देखा जा भी चुका है लेकिन क्या इनसानी जिस्म की सारी गुत्थियां हल कर ली गयी हैं ?
नहीं ।
ईश्वर प्रयोगशाला का विषय नहीं है । वह आपकी बुद्धि का विषय है । आप बुद्धि से काम लेंगे तो आप जान जायंगे कि हां , ईश्वर वास्तव में है । आप प्रकृति की कोई भी चीज़ देखेंगे तो आप उसमें एक डिज़ायन और व्यवस्था पाएंगे और डिज़ायन और व्यवस्था तभी मुमकिन होती है जबकि बुद्धि , ज्ञान और शक्ति से युक्त एक हस्ती मौजूद हो । इनसान किस कमज़ोर हालत में पैदा होता है लेकिन यह इनसान भी आज इस बात में सक्षम है कि रेडियो और टेलीफ़ोन जैसी निर्जीव चीज़ों को ‘वाणी‘ दे दे ।
इनसान ऐसे घर बना चुका है जिन्हें स्मार्ट हाउस कहा जाता है । यह घर अपने मालिक की ज़रूरतों को बिना उसके बयान किए समझ लेता है और संकेत मात्र से पूरा भी कर देता है । इनसान तो निर्जीव भी नहीं है । उसके अन्तःकरण में सर्वथा समर्थ परमेश्वर की ओर से वाणी का अवतरण तो किंचित भी ताज्जुब की बात न होना चाहिये । ख़ास तौर से तब जबकि इनसान खुद बिना किसी ज़ाहिरी सबब के दूसरे आदमी के मन में अपना पैग़ाम पहुंचाने में सक्षम है । इस विद्या को टेलीपैथी के नाम से जाना जाता है ।मुस्लिम सूफ़ियों , हिन्दू योगियों और बौद्ध साधकों के लिए यह एक मामूली सी बात है और आज पश्चिमी देशों में यह विद्या भी दीगर विद्याओं की तरह सिखाई जाती है । जब खुद इनसान ही बिना जिव्हा के अपना पैग़ाम दूसरे इनसानों तक पहुंचा सकता है तो फिर उस सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बारे में ही इसे क्यों असंभव मान लिया जाए ?
......................................................................................................................................................................एक प्रबुद्ध व्यक्ति के प्रश्न के जवाब के बाद एक वेबकृमि की इस चिन्ता पर क्या टिप्पणी की जाए कि लड़के लड़कियां अन्तरधार्मिक विवाह क्यों कर रहे हैं ?
नरगिस समेत बहुत सी फ़िल्मी हीरोइनों ने हिन्दू भाइयों से विवाह किया ।
क्या उन कलाकार मर्दों को किसी गुरूकुल या आश्रम से ऐसा करने का आदेश या मिशन दिया गया था ?
काम तो ऐसा प्रबल होता है कि जब इसका आवेग उठता है तो एक ऐसा व्यक्ति भी केवट की कन्या से नाव में , बीच पानी में ही बलात्कार कर बैठता है जिसे दुनिया ऋषि समझती थी । विश्वामित्र भी मेनका के वार से न बच पाए । मुरली की तान सुनकर तो सभी गोपियां अपने पति और बच्चों तक को बिसराकर अपने आशिक़ के पास भागा करती थीं । ऐसा पुराण बताते हैं लेकिन मैं इसे सत्य नहीं मानता , लेकिन जो लोग इसे सत्य मानते हैं उनके लिए यह प्रमाण बनेगा ।
शकुंतला ने दुष्यंत को अपना सर्वस्व सौंपने से पहले कब पिता की अनुमति ली थी ?
ज़्यादा लिखना मैं मुनासिब नहीं समझता क्योंकि इन प्रसिद्ध कथाओं को सभी जानते हैं ।प्रेम विवाह या गंधर्व विवाह प्राचीन भारतीय परम्परा है । कितनी ही मुस्लिम लड़कियां आज हिन्दुओं के घरों में बैठी गाय के गोबर से चौका लीप रही हैं । ठीक ऐसे ही कुछ हिन्दू लड़कियों ने मुसलमानों के साथ वक्त गुज़ारा । उन्हें बरता , परखा और फिर अपने क़ानूनी हक़ का इस्तेमाल करते हुए उनसे जीवन भर का नाता जोड़ लिया । जब औरत मर्द आपस में घुलमिलकर अंतरंग सम्बन्ध बनाएंगे तो यह स्थिति तो आएगी ही , मुस्लिम के साथ भी और ग़ैर मुस्लिम के साथ भी । इसमें हाय तौबा मचाने और इसलाम को बदनाम करने की क्या ज़रूरत है ?
इसलाम की तालीम तो मर्द के लिए यह है कि वह न तो औरत को तकने या घूरने का गुनाह करे और न ही वह औरत को छुए , चाहे औरत मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम । और अफ़सोस है ऐसी बहनों पर जो अक्ल के दुश्मनों की हां में हां मिलाकर उनकी भलसुगड़ाई बटोरना चाहती हैं ताकि उन्हें सामान्य मुसलमान न समझा जाए बल्कि उन्हें विशिष्ट चिंतक समझा जाए और उनकी तरक्क़ी होती रहे । आज माता की कथाएं सहेलियों को पढ़कर सुनाई जा रही हैं तो कल सास को भी सुनाई जाएंगी । कोई कुछ पढ़े और किसी को सुनाए या किसी हिन्दू के साथ ही घर बसाए , हमें कोई ऐतराज़ नहीं है । हमें तो ऐतराज़ इस बात पर है कि बहन जी अलगाववादी नामहीन लौंडे के ब्लॉग पर कह रही हैं कि इसलाम में किसी हिन्दू लड़की को मुसलमान करने पर 72 हूरों का लालच दिया गया है । हमें पवित्र कुरआन की हज़ारों आयतों और लाखों हदीसों में इस अर्थ की कोई एक भी आयत या सही हदीस दिखाईये वर्ना तौबा कीजिए । किसी भी बड़े मदरसे के आलिम का जायज़ा ले लीजिये , उसकी पत्नी पुश्तैनी मुसलिम घराने से ही मिलेगी । मौलवी साहिबान के घरों में तो कोई हिन्दू लड़की नहीं मिलेगी , हां उनकी तालीम से हटकर चलने वाले कलाकारों , नेताओं और पत्रकारों के घरों में ज़रूर हिन्दू लड़कियां ज़रूर मिल जाएंगी । हिन्दू लड़कियां मुसलमान लड़कों से ब्याह क्यों कर रही हैं ?
क्योंकि हिन्दू लड़कों के बाप तो अपने बेटों की ऊँची क़ीमत वसूलते हैं और हरेक लड़की के बाप में इतनी क़ीमत देने की ताक़त होती नहीं । अब लड़की करे तो क्या करे ?
आप दहेज की मांग छोड़ दीजिए और फिर देखिए कि मुसलमानों के साथ हिन्दू लड़कियों के विवाह में कितनी कमी आती है ?
मुसलमान से ब्याह करने के पीछे ख़तना भी एक बड़ा कारण है क्योंकि ख़तना के बाद लिंगाग्र कपड़े की रगड़ खाता है जिससे उसमें घर्षण के समय स्तम्भन का स्वभाव विकसित हो जाता है और वह अपनी प्रिया को पूर्ण संतुष्ट करने में सक्षम होता है ।मुसलमान भोजन में प्रायः वे चीज़ें खाता है जो भारद्वाज ऋषि ने भरत जी की सेना को उस समय परोसी थीं जब वे मेरे प्रिय श्री रामचन्द्र जी को वापस लाने के लिए निकले थे और उनका पता पूछने के लिए उनके आश्रम में एक रात के लिए ठहरे थे । आयुर्वेद भी उन्हें पुष्टिकारक मानता है । इससे भी मुसलमान ज़्यादा पुष्ट होकर अपनी प्रिया को ज़्यादा संतुष्ट करता है ।
लव जिहाद का भी चर्चा ख़ामख्वाह किया जाता है । ऐसा कोई जिहाद हिन्दुस्तान में नहीं चल रहा है । लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि जिहाद कोई भी हो , उसे लड़ने के लिए मज़बूत हथियार और अच्छी ट्रेनिंग की ज़रूरत पड़ती है । हरेक हिन्दू को देखना चाहिये कि लव जिहाद में काम आने वाला हथियार कौन सा है ?
और उसका हथियार कितना सक्षम है ?
उसने ट्रेनिंग किस गुरू से ली है ?
सन्यासियों से गृहस्थ धर्म की ट्रेनिंग लोगे तो फिर कुवांरी लड़कियां मुसलमानों की पनाह में आएंगी और शादीशुदा औरतें किसी इच्छाधारी का दामन थामेंगी । कारगिल हो या ताज़ा नक्सली हमला , हरेक चोट के बाद यही हक़ीक़त सामने आयी कि सैनिकों के हथियार भी वीक थे और उनकी ट्रेनिंग भी नाकाफ़ी थी । यही बात तथाकथित लव जिहाद के प्रकरण में है ।तुम्हारी लड़कियां अगर दूसरों के पास जा रही हैं तो यह तुम्हारी कमी और कमज़ोरी के कारण है । अपनी ‘वीकनेस‘ को दूर कीजिए , मुसलमानों को दोष क्यों देते हो ?

56 comments:

impact said...

मुस्लिम लड़के से हिन्दू लड़की इसलिए शादी करती है क्योंकि,
१. उसे पता है की मुस्लिम लड़का कभी दूसरी औरतों से नाजायज़ सम्बन्ध नहीं बनाएगा. क्योंकि उसके मज़हब में यह एलाऊ नहीं. अगर वह दूसरी जगह सम्बन्ध भी बनाएगा तो सीना तानकर सबके सामने निकाह करके. जबकि हिन्दू पति बीवी रखते हुए और कितनी जगह मुंह मारता है यह उस पति को भी पता नहीं होता.
२. मुस्लिम लड़का प्यार में कभी बिजनेस नहीं करता. जबकि हिन्दू लड़का प्यार भी करता है तो घर देखकर.
३. हिन्दू लड़कों के माँ बाप उसके बचपन से ही उसकी कीमत तय करने लगते हैं. और यही बात वह अपने लड़के के दिमाग में भरते हैं. अगर गलती से कहीं लड़का किसी लायक हो गया तो उसकी कीमत आसमान छूने लगती है और आम आदमी व लड़कियों की सामर्थ्य से बाहर हो जाती है. मजबूरी में वे दूसरे धर्म वालों की तरफ देखने लगते हैं.
४. हिन्दू लड़का लव स्टोरी में शादी से पहले ही लड़की के साथ सब कुछ कर गुजारता है, और फिर छोड़ छाड़कर निकल लेता है. जबकि मुस्लिम लड़का शादी से पहले इसे गुनाह समझता है.
5. हिन्दू लडकियां लटके झटके ज्यादा दिखाती हैं, क्योंकि उनका माहोल ही खुला होता है. नतीजे में भोले भाले मुस्लिम युवक आसानी से दाम में आ जाते हैं. क्योंकि उनके धर्म की लडकियां परदे में रहती हैं.
6. हिन्दू लडकियां अधिकतर शादी से पहले ही सारे करम कर चुकी होती हैं, और ये बात उनके खानदान वालों व मित्र मंडली को मालूम होती है, इसलिए हिन्दू लड़का तो कतरा कर निकल जाता है, लेकिन अनजान मुस्लिम लड़का फंस जाता है.
7. मुस्लिम लड़कों को उनके मज़हब से भटकाने के लिए भी दूसरे धर्म वाले अक्सर लड़कियों का सहारा लेते हैं. नतीजे में अक्सर शादी के बाद मुस्लिम होते हुए भी लड़का अपने धर्म के उसूलों से विमुख हो जाता है. ये दरअसल लव जिहाद नहीं बल्कि एंटी इस्लाम युद्ध है.
वजहें और भी हैं, लेकिन फिलहाल इतना ही.

Mohammed Umar Kairanvi said...

हिन्दू लड़कियां मुसलमान लड़कों से ब्याह क्यों कर रही हैं ?क्योंकि हिन्दू लड़कों के बाप तो अपने बेटों की ऊँची क़ीमत वसूलते हैं और हरेक लड़की के बाप में इतनी क़ीमत देने की ताक़त होती नहीं । अब लड़की करे तो क्या करे?

गुरू जी यहाँ आज ताबीज टांग रहा हूँ मुझे लगता है आज इसकी इधर आवश्‍यकता है बताना है कि नहीं?

आओ

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विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
(इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
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अल्‍लाह का
चैलेंज पूरी मानव-जाति को


अल्‍लाह का
चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता


अल्‍लाह का
चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं


अल्‍लाह का
चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार


अल्‍लाह का
चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में


अल्‍लाह
का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी


छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)
डायरेक्‍ट लिंक

Amit Sharma said...

जमाल साहब आपकी इस निहायती घटिया पोस्ट पे तो टिपण्णी नहीं करूँगा(क्योंकि अभी आपके चमचे आयेंगे वह साब क्या धांसू पोस्ट लिखी है कहते हुए)
पर एक गुजारिश जरूर है की अपने ब्लॉग का नाम जरूर बदल लें. क्योंकि वेद्कुरान नाम ना तो आपकी पोस्टों से मेल खाता है, और शायद उस भावना से जिसका आपने प्रचार किया था की ब्लॉग किस लिए शुरू कर रहे है.
और आपको अपनी बात कहने के लिए टट्टी पेशाब की नालियों (ख़तना,लिंगाग्र, स्तम्भन का स्वभाव, ‘वीकनेस) जैसे उधारनो की ही सहायता क्यों लेनी पड़ती है. (अब आप शिवलिंग और योनिपूजा की मत गाने लग जाना क्योंकि उस विषय पे भी आपको जवाब मिलेगा. आपके सड़े विचार उस विषय को बिना जाने मत बकने लगिएगा)

Amit Sharma said...
This comment has been removed by the author.
बवाल said...

हमारे बाज़ू से एक दूबे जी रहा करते हैं जी। उनके छोटे भाई से एक कट्टर मुसलमान लड़की ने ब्याह कर लिया। उसे मुसलमानों की मेहर की रस्म पसंद नहीं थी। कहती थी क्या हमारा जिस्म बिकाऊ है ? अब आप क्या कहिएगा ? सिवा इसके कि हमारी टिप्पणी हटा दीजिएगा । है ना ?

PARAM ARYA said...

बिलकुल खरी बात कही सुरेश जी ने और सोने पे सुहागा कि गवाही भी मिल गयी उसी समाज की बेटी से ! अब तेरी दाल न गलने वाली बेटे ! देश धरम वाला भी तेरी ख़त के पाए काटने आ गया है !

Himwant said...

आपके विचार सुन्दर हैं । कुछ संक्रमण ऐसे होते है जिनका ईलाज नही होता ।

ANAND JAIN said...

बेतुकी बकवास के लिए कितना टाइम है लोगों के पास ?

DR. ANWER JAMAL said...

बवाल जी ! मैंने आज तक किसी बदज़बान का भी कोई dialogue डिलीट नहीं किया . जिन लड़कियों को कन्यादान कि आदत पद चुकी हो उन्हें मैहर कि रस्म तो अजीब ही लगेगी . कहाँ तो दहेज़ देकर भी बाप को वर पक्ष के पैरों मैं अपनी पगड़ी रखनी पड़ती है और कहाँ लड़का लड़की का खर्च उठा सकता है यह दिखने के लिए उसे मैहर अदा करना पड़ता है . इसी से महिला आर्थिक रूप से भी मजबूत होती है . आप की सोम्य टिपण्णी के लिए धन्यवाद .

saleem khan said...

मुसलमान से ब्याह करने के पीछे ख़तना भी एक बड़ा कारण है क्योंकि ख़तना के बाद लिंगाग्र कपड़े की रगड़ खाता है जिससे उसमें घर्षण के समय स्तम्भन का स्वभाव विकसित हो जाता है और वह अपनी प्रिया को पूर्ण संतुष्ट करने में सक्षम होता है ।मुसलमान भोजन में प्रायः वे चीज़ें खाता है जो भारद्वाज ऋषि ने भरत जी की सेना को उस समय परोसी थीं जब वे मेरे प्रिय श्री रामचन्द्र जी को वापस लाने के लिए निकले थे और उनका पता पूछने के लिए उनके आश्रम में एक रात के लिए ठहरे थे । आयुर्वेद भी उन्हें पुष्टिकारक मानता है । इससे भी मुसलमान ज़्यादा पुष्ट होकर अपनी प्रिया को ज़्यादा संतुष्ट करता है ।
लव जिहाद का भी चर्चा

DR. ANWER JAMAL said...

@ अमित जी ! आप अपनी बहन को भगिनी क्यूँ कहते हो ? क्या भग के अलावा कोई और चीज़ आपको औरत में दिखाई नहीं देती ?

DR. ANWER JAMAL said...

@ जनाब उमर साहब ! आपकी लेखमाला ने मेरे लेख का मान और वज़न दोनों ही बाधा दिए .
@ impact जी ! आपकी दलीलें दमदार हैं .
@ परम जी ! ख़त के पाए से आपकी क्या मुराद है , मैं समझा नहीं .
@ हिमवंत जी ! धन्यवाद .

DR. ANWER JAMAL said...

@ जनाब उमर साहब ! आपकी लेखमाला ने मेरे लेख का मान और वज़न दोनों ही बाधा दिए .
@ impact जी ! आपकी दलीलें दमदार हैं .
@ परम जी ! ख़त के पाए से आपकी क्या मुराद है , मैं समझा नहीं .
@ हिमवंत जी ! धन्यवाद .

bharat bhaarti said...

हम ने भी एक बार आवने एक मुसलमान दोस्त से पूछा था के यार तुम ख़तना क्यॉनकराते हो ? कहने यार ज़रा शो सी आजाती हे आयार कोई बात नहीं

sahespuriya said...

डा० साहब, आपकी बात कड़वी है मगर सच भी है,शायद यही कड़वापन कुछ लोगो को हज़म नही होता, मगर बक़ौल मरहूम इक़बाल राजा ''सवाल ग़लत तो जवाब भी ग़लत''. अब लोग तर्कहीन सवाल करेंगे तो जवाब भी ऐसा ही मिलेगा,
अमित भाई ने हमको आपका चमचा कहा है, शुक्रिया चलो इसी बहाने से हम डा० साहब से कुछ तो क़रीब हुए, ज्ञानी लोगो का साथ मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए, फिर चाहे उनका चमचा बनकर या मुरीद बनकर ही सही, बस क़ुरबत मिल जाए.

sahespuriya said...

'गिरे' हुए और 'ठाकरे का हज्जाम' तो कूप मंडूक हैं, अच्छा है जूते भिगो कर पड़ रहे हैं इन ''बुधीजीवियो'' के

sahespuriya said...

राहत इंदौरी ने क्या खूब कहा है,
''चड़ी हुई है जो नदी उतर भी सकती है
जो बाट रही मौत मर भी सकती है''
''ज़रा सा लहजे को तब्दील करके देखा था
पता चला ये दुनिया तो डर भी सकती है''

Dr. Ayaz ahmad said...

वाह बहुत खूब आपने बहुत अच्छा जवाब दिया अनवर भाई चिपलूंकर की सारी शंकाए दूर हो गयी होगी क्योकि आपने ठोस सबूत पेश किए है

Amit Sharma said...

संस्कृत का भगः शब्द भज् धातु से बना है. जिससे बना है ईश्वर, सर्वशक्तिमान, दाता, प्रभु , सबको सबका हिस्सा देने वाला, सबका हिस्सा यानी भाग, अंश, आयु और प्रकारांतर से सबका भाग्यविधाता आदि के अर्थों वाला शब्द भगवान । भग शब्द के कई अर्थ हैं जिनमें एक वैदिक देवता, सूर्य, चंद्र और शिव भी हैं। भग का अर्थ होता है ऐश्वर्य, सम्पन्नता , सम्पत्ति, भाग्य आदि। ऐश्वर्य सौन्दर्य और लावण्य का भी हो सकता है।

"नानार्थक कोश" के अनुसार सौभाग्यवती स्त्री के लिए भगिनी शब्द का प्रयोग होता है।

भगिनी शब्द भगिन् शब्द से बना है। भगिन् शब्द का अर्थ फलना और फूलना है। सौभाग्यवती स्त्री से ही परिवार फलता-फूलता है। इसलिए भगिनी शब्द का अर्थ भाग्यवती, सौभाग्यवती होना एकदम सुसंगत है। वैभवशाली, भाग्यशाली और अपनी आन-बान और शान रखने वाली महिला के अर्थ में भी भगिनी शब्द का प्रयोग होता है। प्राचीन भारत में बहन के जन्म को सौभाग्य की निशानी समझा जाता था। इसलिए बहन को भगिनी कहा गया है।

लेकिन जिनकी बुद्धि,दृष्टि, २४ घंटे टट्टी पेशाब की नालियों में ही रमें रहते हो, वह कैसे इतने गहन अर्थों को समझ पायेंगे.

अनुनाद सिंह said...

हिन्दू यदि थोड़े समय के लिये 'जेहाद' का रास्ता अपना लें तो भारत से इस्लाम वैसे ही गायब हो जायेगा जैसे वैक्यूम क्लीनर से गंदगी।

Mahak said...

After reading Impact's comments one thing is clear that this idiot is one of those who think that their religion is supreme & other religions are bad.This Idiot don't know that every religion has good & negative points both & his religion is today one of the very big problem for the whole world.If I will start counting the negatives of islam then i don't know hom many pages like this will be rquired to mention them,So I
just want to show brother impact a mirror according to his stupid thoughts
१.उसे पता है की मुस्लिम लड़का कभी दूसरी औरतों से नाजायज़ सम्बन्ध नहीं बनाएगा. क्योंकि उसके मज़हब में यह एलाऊ नहीं. अगर वह दूसरी जगह सम्बन्ध भी बनाएगा तो सीना तानकर सबके सामने निकाह करके. जबकि हिन्दू पति बीवी रखते हुए और कितनी जगह मुंह मारता है यह उस पति को भी पता नहीं होता.

Yes I agree uske mazhab mein to is baat ki khuli permission hi de di
gayi hai ki apni biwi ki sautan ko seena taankar uski chaati par patak do aur wo bechaari kuch kar bhi nahin sakti,kare bhi to kya jab dharm hi itni besharmi se allow kar raha hai to bechaari akeli poore samaaj ke thekedaaron se kaise takkar mol le, ise se chaahe us bechaari ko kitna hi dukh pahunche uski feelings kitni hi hurt hon, lekin mard ki to vaasnaayein poori honi chaahiye chaahe ek se ho yaa char-2 se.Ab koi in besharmon se pooche ki agar tumhari aurat bhi aisa hi karna chaahe to kya tum usey permission doge aur agar nahin to kyon nahin ? Is sawaal par ye goonge ho jaate hain. Ab bataayein aurat aur mard mein itna fark kyon.Vaasna ki jo aag ek mard ko jalaati hai wo kya aurat ko kam jalaati hai.Lekin inke yahan to Aurat ko ek bachhe paida karne ki machine bhar samajh liya gaya hai jis se paida hone waale masoomon ko dhakel do jihad par aur kayam kar lo apna ekchatra rajya.

Mahak said...

२. मुस्लिम लड़का प्यार में कभी बिजनेस नहीं करता. जबकि हिन्दू लड़का प्यार भी करता है तो घर देखकर.
३. हिन्दू लड़कों के माँ बाप उसके बचपन से ही उसकी कीमत तय करने लगते हैं. और यही बात वह अपने लड़के के दिमाग में भरते हैं. अगर गलती से कहीं लड़का किसी लायक हो गया तो उसकी कीमत आसमान छूने लगती है और आम आदमी व लड़कियों की सामर्थ्य से बाहर हो जाती है. मजबूरी में वे दूसरे धर्म वालों की तरफ देखने लगते हैं.

mera bhai impact ye type karte samay ye bhool gaya ki hinduon mein jo galat parampara "Dahej" ke naam se hai wahi parampara musalmaanon mein "Mehar" ke naam se hoti hai,bas fark sirf itna hota hai ki ismein ladki ko paise na deker ladke ko paise dene hote hain.Matlab wahan par ladka kharida jaata hai to yahan par ladki kharidi jaati hai,Main to kehta hoon ki ye dono hi galat hain aur band honi chaahiye.Lekin hamare impact bhai ko kon samjhaaye, ab impact ji ka hi anusaran karte hue agar mein baat kahoon to baat kuch aise hogi

2.Hindu Ladki pyaar mein kabhi business nahin karti jabki Muslim Ladki shaadi aur pyaar dono hi karti hai to ghar dekhkar

3.Muslim Ladkiyon ke Maan-Baap Bachpan se hi uski keemat decide karne lagte hain aur yahi baat wey apni ladki ke dimaag mein bharte hain.Agar galti se ladki kisi layak ho gayi to uski keemat aasmaan choone lagti hai jaise ki abhi live example ki hi baat karein to dekhiye Sania Mirza aur Shoaib Malik ke nikaah mein sania ki kya keemat lagaayi gayi, poore 61 lakhs rupees.

Mahak said...

5. हिन्दू लडकियां लटके झटके ज्यादा दिखाती हैं, क्योंकि उनका माहोल ही खुला होता है. नतीजे में भोले भाले मुस्लिम युवक आसानी से दाम में आ जाते हैं. क्योंकि उनके धर्म की लडकियां परदे में रहती हैं.

ab iske baare mein kya kaha jaaye, jo log upar se dikatein hain khud
ko fakeer-sanyaasi aur andar unke ho vaasna poorti ki ichaayein to
isey kya kaha jaayega, isey sirf ek dhong kaha jaayega, mere dost
impact ne khud hi is point ka answer de rakha hai ki kyonki unke dharm ki ladkiyaan parde mein rehti hain to is wajah se muslim ladkon ki unhe nanga dekhne ki icha poori nahin ho pati aur unhe man masoos kar rehna padta hai

Mahak said...

agar muslim bhaiyon ko meri in baaton se dukh pahuncha ho to shama karein lekin bhai impact ne hamein aayena dikhaane par mazboor kar diya aur ek baat aur yaad rakhein ki jis tarah se in baaton ko sunkar aapko dukh hota hai usi prakar impact ji ki baatein sunkar hamein aur hamaare jaise karodon bhai-behno ko dukh hota hai

Hum to khud keh rahen hain ki har dharm mein achi aur buri paramparayein hai zaroorat hai to har unmey se achi baatein grehan karne ki aur buri baatein tyaagne ki.

Yaad rakhiye ki kuch logon ki galti ki wajaha se aap poori kaum ko galat nahin keh sakte.

zeashan zaidi said...

'लव जिहाद' जैसी आधारहीन चीज़ों को ब्लॉग पर लाकर सुरेश जैसे लोग पता नहीं अपने को बुद्धिजीवी सिद्ध कर रहे हैं या बुद्धू. वो अपनी लड़कियों से ही क्यों नहीं जाकर पूछ लेते की वो मुस्लिम लड़कों का इस (फर्जी) जिहाद में क्यों साथ दे रही हैं.

बवाल said...

आपने हमारी टीप के एवज में बजा फ़रमाया डॉ. साहब, मगर क्या कीजिएगा ? ये तो आप-हम सभी जानते हैं कि मेहर का हक़ औरत के बदन के उपभोग के एवज में अदा किया या बाँध(तय) पाया जाता है। खै़र।
आपके इन विश्लेषणों को अगर मज़हबी नज़रिए से न देखा जाकर, बौद्धिक या साहित्यिक नज़रिए से देखा जाए तो शाएद इनसे बहुत कुछ नैसर्गिक तार्किकता हासिल की जा सकती है।
आपका शुक्रिया जी।
फ़ीअमानिल्लाह।

EJAZ AHMAD IDREESI said...

बहुत बड़े गुरु हो भाई ; भीगा भीगा कर मारते हो

Shah Nawaz said...

लोगो के पास क्या "लव जिहाद" जैसी घटिया बातें सोचने के अलावा कोई और काम नहीं होता? हिन्दू लडकिया चाहे मुस्लिम लड़के से विवाह करे या मुस्लिम लड़कियां हिन्दू लड़के से, इसमें जिहाद वाली बात कैसे आ सकती है?

लेकिन कुछ लोगो को चर्चा में रहने के लिए कुछ न कुछ चाहिए. फिरदौस बहन ने जो 72 हूरों वाली बात बताई मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी को यह कहा गया हो कि ग़ैर-मुस्लिम से शादी करो तो 72 हरें मिलेगी या 10 हज का सवाब मिलेगा. कहीं की बात को कहीं और जोड़ना अच्छे व्यक्तित्व की निशानी तो कदापि नहीं कही जा सकती है.

आप कह रहे हैं कि प्रोत्साहन मिलता है और मैं कह रहा हूँ कि उलटे फटकार मिलती है. स्वयं मेरे परिवार में एक ऐसा ही विवाह हुआ है और मैं जानता हूँ कि हमें अपने ही मुस्लिम समाज के द्वारा कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा है. यहाँ तक कि हमें अपना पुराना घर बेचकर नई जगह घर लेना पड़ा.

जा कर किसी भी मौलवी से मालूम करो, कोई एक भी इसका समर्थन नहीं करेगा. और एक ही जवाब मिलेगा कि यह लोग जो प्यार के चक्कर में मुसलमान (लड़की हो या लड़का) बन रहे हैं इनका इस्लाम से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक नहीं है. आज प्यार नाम का नशा है, कल उतर जाएगा तब इनकी हालत देखना.

धर्म परिवर्तन आस्था का परिवर्तन होता है और ऐसी हालत का आस्था से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक नहीं होता है.

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय डॉ० अनवर जमाल साहब,

आपकी आज की पोस्ट दो भागों में है पहले भाग में जब आप ईश्वर के अस्तित्व और धर्म की आवश्यकता, सभी के लिये धर्मपालन की अनिवार्यता आदि पर चिंतन कर रहे हैं तो बहुत ही अच्छा लिखा है आपने... परंतु दूसरे भाग में जब आप लव जेहाद पर आई एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया जता रहे हैं तो आपके तर्क और भाषा कुछ निराश करती है... आवेश में भी संयम रहना चाहिये यह मैं मानता हूँ।

अब आते हैं मुद्दे पर...

"इनसान अपने लिए विधान बनाने में न तो कल समर्थ था और न ही आज समर्थ है ।"

एकदम गलत... बदलते समय,समाज, देश,काल और परिस्थतियों के अनुसार इंसान अपने लिये विधान बनाने में कल भी समर्थ था, आज भी है और कल भी रहेगा ! इसी काम के लिये हर मुल्क में विधायिकायें हैं।


"ख़ास तौर से तब जबकि इनसान खुद बिना किसी ज़ाहिरी सबब के दूसरे आदमी के मन में अपना पैग़ाम पहुंचाने में सक्षम है । इस विद्या को टेलीपैथी के नाम से जाना जाता है ।मुस्लिम सूफ़ियों , हिन्दू योगियों और बौद्ध साधकों के लिए यह एक मामूली सी बात है और आज पश्चिमी देशों में यह विद्या भी दीगर विद्याओं की तरह सिखाई जाती है ।"

यह 'टैलीपैथी' महज एक कपोल-कल्पना है, आप आज इसे कर के दिखाने वाले एक भी शख्स को दिखा नहीं सकते!

अब आता हूँ 'लव जेहाद' पर लिखे दूसरे भाग पर...

* ऐसा कुछ नहीं चल रहा यह मैं जानता हूँ क्योंकि जहाँ मैं आज रहता हूँ वहाँ आधी आबादी हिन्दू और आधी मुसलमान है... और मैंने कभी ऐसा नहीं सुना।
** एक उम्र ही ऐसी होती है जब हारमोनों का वेग ऐसा होता है कि व्यक्ति स्वत: ही सबसे नजदीक व सुलभ विपरीत लिंगी की ओर आकर्षित होता है... यदि यह आकर्षण विवाह में फलीभूत होता है तो इसे धर्म और जात के चश्मे से देखने का किसी को कोई हक नहीं।
*** खतना (Circumcision)यहूदी और इस्लाम में इसलिये है क्योंकि यह धर्म रेगिस्तान में अस्तित्व में आये, Glans- Penis के ऊपर चढ़ी चमड़ी (Prepuce) के नीचे एक स्राव जमा हो जाता है जिसे Smegma कहते हैं यह महिला के Genital tract के लिये व स्वयं पुरूष जननांग ले लिये Carcinogenic है, पानी की कमी थी नियमित स्नान-सफाई संभव नहीं थी... इसलिये खतना की परंपरा चली।
**** दैहिक संतुष्टि दे पाने के लिये सबसे जरूरी चीज है कि दोनों भागीदार अपनी-अपनी Sexuality में कितने Comfortable हैं और आपसी समझ कितनी है... अच्छी शराब की तरह समय के साथ यह चीज आती है किसी रिश्ते में, खतना का यहाँ कोई रोल नहीं।

आभार!

sleem said...

ha ha ha kya kootark diya he chshme vale toork ne ??? land ka agala footra katne se josh badhata he...vah bhai ved?? kapade ki ragad se stambhan badhta he....to too din bhar beth ke ke land ke kapada hi ragadta rahta hoga...???? muslmaano ki chachiya poore land ki khavaish karte huve alllaha ko pyaree ho jatee he ..kai chachiya is sookh ko paa bhi latee he ...unka moksh ho jata he....??? bhai b.t .bengan chachiyo ki choot ka maja ..vah

Mahak said...

Ab Impact ji zara aapke Gurudev Dr.Anwer Jamaal ji ki bhi khabar li jaaye. Jamaal Sahab Aa-Salaam-Walequm.Bade dinon se aapke blogs padh raha hoon,aaj aapse sanwaad staphit karne ka mauka mila hai, aapki tarkeshwar giri ji, amit sharma ji aur kairaanwi ji ki different issues par tarksheel debate padhkar kaafi acha lagta hai aur saath hi aap sabka ek doosre ko jo shaleenta se jawaab diye jaatein hain unse main bahut prabhavit hoon, aap chaaron hi log baatchit ka ek level rakhte hain aur usey kabhi bhi girne nahin dete haan khatti-meethi nok-jhonk kabhi kabhaar ho jaati hai lekin itna to chalta hi hai. Aadarniya Jamal Sahab, abhi tak aapke saare blogs ko padhkar main aapke baare mein is niskarsh par pahooncha hoon ki aap ek satyapriya person hain, aapne hindu granthon ki kamiyaan aur unki galat baatein present ki to unki jo achi baatein hain, jo mahaan baatein hain unka poora samaan bhi kiya, iske liye aapko bahut-2 dhanyavaad. Lekin janab, kabhi apne blog par muslim dharm ke negatives bhi to laaiye, mujhe aapka aisa ek bhi blog nahin dikha jinme aapne apne dharm ki kamiyon ko ujagar kiya ho,shayad isi karan aap par sandeh utpan ho jaatein hain aur charcha "Hindu vs Muslim" ka roop le leti hai,aasha hai ki aap in baaton par gaur karenge aur agar mujhse koi galti hui ho to usey shama karenge, aakhir aap, giri ji, amit bhai aur kairaanvi ji mere liye is blog jagat mein guru tulya jo hain, arey haan ek baat to aapse kehna bhool hi gaya, main aapse, giri ji se, amit ji se aur tarkeshwar ji se koi vishay prapt karna chahta hoon jispar mein apne blog mein likhoon aur aap sabka mujhe margdarshan prapt ho, badi besabree se prateeksha rahegi aapke reply ki,
dhanyavaad

Amit Sharma said...
This comment has been removed by the author.
Suresh Chiplunkar said...

अनवर साहब, बड़े दिनों बाद आपके ब्लाग पर आया।
आप, कैरानवी तथा आपके अन्य शिष्य हमारी बड़ी मदद कर रहे हैं… हम आपके लेख(?) अपने मित्रों खासकर "सेकुलरों" को अवश्य भेजते हैं, ताकि वे हमारी और आपकी लेखनी और टिप्पणियों के "अन्तर" को समझ सकें और खुद ही निर्णय कर सकें… कि असलियत क्या है।

आप ऐसे ही लिखते रहिये… ताकि "सेकुलरों" को "इस्लाम" समझाने में हमें आसानी हो… :)

naval said...

please batana qabar banane men kitna kharch aata he Chita ka kharch men batata hoon

स्वामी दयानंद सरस्वती ने दाह संस्कार की जो विधि बताई है वह विधि दफ़नाने की अपेक्षा कहीं अधिक महंगी है। जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है कि मुर्दे के दाह संस्कार में “शरीर के वज़न के बराबर घी, उसमें एक सेर में रत्ती भर कस्तूरी, माषा भर केसर, कम से कम आधा मन चन्दन, अगर, तगर, कपूर आदि और पलाष आदि की लकड़ी प्रयोग करनी चाहिए। मृत दरिद्र भी हो तो भी बीस सेर से कम घी चिता में न डाले। (13-40,41,42)
स्वामी दयानंद सरस्वती के दाह संस्कार में जो सामग्री उपयोग में लाई गई वह इस प्रकार थी - घी 4 मन यानी 149 कि.ग्रा., चंदन 2 मन यानि 75 कि.ग्रा., कपूर 5 सेर यानी 4.67 कि.ग्रा., केसर 1 सेर यानि 933 ग्राम, कस्तूरी 2 तोला यानि 23.32 ग्राम, लकड़ी 10 मन यानि 373 कि.ग्रा. आदि। (आर्श साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाषित पुस्तक, ‘‘महर्शि दयानंद का जीवन चरित्र’’ से) उक्त सामग्री से सिद्ध होता है कि दाह संस्कार की क्रिया कितनी महंगी है।

Mohammed Umar Kairanvi said...

@ चिपलूनकर जी ''सडांध भरी जगह'' पर आपका फिर से स्‍वागत है, नमस्‍कार


आपने 18 मार्च में लिखा थाः

मैं भी इस ब्लॉग पर आज अन्तिम बार ही आ रहा हूं, लेकिन सिर्फ़ भारतीय नागरिक को जवाब देने कि भाई साहब "समय नष्ट करने का शौक मुझे भी नहीं है"… मैंने गलती की जो इस सड़ांध भरी जगह पर आ गया… अब गलती सुधारता हूं… और अन्तिम नमस्कार…

http://vedquran.blogspot.com/2010/03/plain-truth-about-hindu-rashtra.html

Suresh Chiplunkar said...
भारतीय नागरिक जी, जानता हूं कि आप दोबारा यहाँ नहीं आयेंगे मेरा कमेंट पढ़ने, लेकिन फ़िर भी - जमाल साहब यहाँ जो दुर्गन्ध फ़ैला रहे हैं, असल में वह "हर्फ़-ए-गलत" नाम के ब्लॉग से लगी हुई मिर्ची है… उधर जाकर तो वे उस उम्मी की बातों का जवाब देंगे नहीं, लेकिन चिढ़कर इधर अपने ब्लॉग पर हिन्दुओं और वेदों को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं… इसे कहते हैं Frustration...

और अनवर जमाल इस ब्लॉग में जो भी लेख छाप रहे हैं असल में वह बरसों पूर्व हिन्दी पत्रिका "सरिता" में छपे लेखों की नकल मात्र हैं, शब्दों का थोड़ा फ़ेरबदल करके उसे ये अपने नाम से चेपे जा रहे हैं…।

हालांकि मैं भी इस ब्लॉग पर आज अन्तिम बार ही आ रहा हूं, लेकिन सिर्फ़ भारतीय नागरिक को जवाब देने कि भाई साहब "समय नष्ट करने का शौक मुझे भी नहीं है"… मैंने गलती की जो इस सड़ांध भरी जगह पर आ गया… अब गलती सुधारता हूं… और अन्तिम नमस्कार…

जमाल साहब यदि वाकई में ज्ञानी हैं तो हर्फ़-ए-गलत पर जाकर अपनी विद्वत्ता दिखायेंगे… इधर तो वे सिर्फ़ हिन्दुओं के खिलाफ़ अपनी भड़ास निकाल रहे हैं… :)
March 18, 2010 1:05 PM

मेरा देश मेरा धर्म said...

गुरूजी आपकी सेवा में विनीत शिष्यवत प्रणाम -

बी.कॉम थर्ड इयर के दिल्ली विश्वविद्यालय की परीक्षाएं आरम्भ हो गई हैं, इस कारण आपके ज्ञान प्रवाहित धारा का रसपान करने के बाद मेरे तुच्छ अंत:करण में जो जिज्ञासाएं उत्पन्न हो रहीं हैं उन्हें मैं आपके सामने रखने में अक्षम हूँ !

केवल दो प्रश्न !_=
(१) आप तो अपनी मृत्यु के बाद स्वर्ग चले जायंगे तक आपकी यह विरासत कौन संभालेगा और आपके द्वारा फैलाई ये गन्दगी कौन साफ़ करेगा ?

समय की कमी है बाकी बाद में !!

Suresh Chiplunkar said...

@ naval - आपने सही कहा कि (ग्रंथों के मुताबिक) चिता जलाने में खर्च ज्यादा आता है, इसीलिये तो हिन्दू अब धीरे-धीरे बिजली के शवदाहगृह की ओर शिफ़्ट हो रहे हैं (मजबूरी में ही सही)… इसी प्रकार गणेश विसर्जन भी कई लोगों ने घर में ही एक बाल्टी में विसर्जन करना शुरु कर दिया ही (नदियों के प्रदूषण को देखते हुए)। तात्पर्य यह कि हिन्दू वक्त, देश-काल-परिस्थिति के अनुसार अपनी परम्पराओं और मान्यताओं में बदलाव कर रहे हैं…। "थम गया पानी, जम गई काई, बहती नदिया ही साफ़ कहलाई" ये तो सुना (देखा) ही होगा आपने। हिन्दू धर्म एक बहती नदी है… बाकी के धर्म एक पुस्तक से चिपकी हुई "काई" के समान हैं, जो बदलते नहीं… इसीलिये सड़ांध बढ़ती जा रही है।

@ कैरानवी भाई - आपकी टिप्पणी का आधा जवाब तो ऊपर दे दिया है, आगे यह कि - कभीकभार इस सड़ांध वाली जगह पर यह देखने के लिये आना पड़ता है कि शायद यह जगह सुधर गई हो। लेकिन अफ़सोस… जैसा मैंने पहले छोड़ा था यह अब तक वैसी ही है…। फ़िर कुछ दिन बाद आकर देखूंगा कि सड़ांध कम हुई या नहीं… :) :)

Anonymous said...

अरे बाबा दलील का जवाब दलील से दो तुम्हारी दलीले हिन्दु धरम की तरह खोखली है

Amit Sharma said...

अल्‍लाह का
चैलेंज पूरी मानव-जाति को
अल्लहा के अनुयायी पूरी मानव जाती को चैलेंज ही तो करते आये है की "रह के बताओ तुम चैन से, हम नहीं रहने देंगे "
@अल्‍लाह का
चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता
-जो मारकाट की शिक्षा देवे(अगर उपलब्ध कुरान असल कुरान है तो) उसमे कौन सर खपाने बैठेगा,मानवता के विरुद्ध होने से तो यह खुद ही रद्द हो जाती है
@अल्‍लाह का
चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं
-शातिर दिमाग मारकाट की शिक्षा देने में क्यों विरोध का आभास होने देते (अगर मोहमद साहब की कुरान और इस कुरान में अंतर ना हो तो)
@अल्‍लाह का
चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार
-ठीक ही बात है "हवाई किताबे तो इतनी ही हो सकती थी (उपरवाले का शुक्रिया इतनी ही है )
@अल्‍लाह का
चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में
-अब कोई भी कुछ भी कह सकता है,मै भी किसीको उसकी जैवीय परम्परा साबित करने की चुनोती दे सकता हूँ
@अल्‍लाह
का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी
-कैसे रहेंगे अल्लहा के अनुयायी रहने देंगे तब ना,और यहूदी ही क्यों पूरी मानवता को ही चैन से नहीं रहने देंगे ये लोग.

मुझे शक है की वर्तमान में जिस किताब को पवित्र कुरआन कहा जाता है, वह ही असल कुरान है जिसे परमेश्वर ने श्रीमोहम्मद साहब पे नाजिल किया था. क्योंकि श्रीमोहम्मद साहब की जीवनी पढते हुए उल्लेख मिलता है की श्रीमोहम्मद साहब के जनाजे एन काफी कम लोग शामिल हुए थे. क्योंके उनके अनुयायी खलीफा पद की लड़ाई में उलझ गए थे. अब बताइए की जो अनुयायी आज तक उनके ऊपर शांति होने की प्रार्थना करते है, वोह उनकी पार्थिव देह को भी शांति से नहीं खाक कर सके. तोह जो लोग अपने मसीहा की लाश को ढंग से सम्मान नहीं दे पाए और सत्ता के लिए लड़ने लगे क्या उन्होंने सत्ता के लिए श्रीमोहम्मद साहब की शिक्षाओं की की हत्या करके कुरआन में सता प्राप्ति की सहायक आयतों का समावेश नहीं किया होगा.

http://27amit.blogspot.com/

नन्‍दू गुजराती said...

क्या 'हिन्दू शब्द भारत के लिए समस्या नहीं बन गया है?
आज हम 'हिन्दू शब्द की कितनी ही उदात्त व्याख्या क्यों न कर लें, लेकिन व्यवहार में यह एक संकीर्ण धार्मिक समुदाय का प्रतीक बन गया है। राजनीति में हिन्दू राष्ट्रवाद पूरी तरह पराजित हो चुका है। सामाजिक स्तर पर भी यह भारत के अनेक धार्मिक समुदायों में से केवल एक रह गया है। कहने को इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय माना जाताहै, लेकिन वास्तव में कहीं इसकी ठोस पहचान नहीं रह गयी है। सर्वोच्च न्यायालय तक की राय में हिन्दू, हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, लेकिन हमारे संविधान में यह एक रिलीजन के रूप में दर्ज है। रिलीजन के रूप में परिभाषित होने के कारण भारत जैसा परम्परा से ही सेकुलर राष्ट्र उसके साथ अपनी पहचान नहीं जोडऩा चाहता। सवाल है तो फिर हम विदेशियों द्वारा दिये गये इस शब्द को क्यों अपने गले में लटकाए हुए हैं ? हम क्यों नहीं इसे तोड़कर फेंक देते और भारत व भारती की अपनी पुरानी पहचान वापस ले आते।

हिन्दू धर्म को सामान्यतया दुनिया का सबसे पुराना धर्म कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि दुनिया में ईसाई व इस्लाम के बाद हिन्दू धर्म को मानने वालों की संख्या सबसे अधिक है। लेकिन क्या वास्तव में हिन्दू धर्म नाम का कोई धर्म है? दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे डॉ. डी.एन. डबरा का कहना है कि 'हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे नया धर्म है..........

http://navyadrishti.blogspot.com/2009/12/blog-post_31.html

Anonymous said...

are jamal ye kya kamaal kiya teri post pe comment kyo nahi dikh rahi 2 ko chodke jine teri maari gayi h

Mahak said...

Jamaal Sahab Aa-Salaam-Walequm.Bade dinon se aapke blogs padh raha hoon,aaj aapse sanwaad staphit karne ka mauka mila hai, aapki tarkeshwar giri ji, amit sharma ji aur kairaanwi ji ki different issues par tarksheel debate padhkar kaafi acha lagta hai aur saath hi aap sabka ek doosre ko jo shaleenta se jawaab diye jaatein hain unse main bahut prabhavit hoon, aap chaaron hi log baatchit ka ek level rakhte hain aur usey kabhi bhi girne nahin dete haan khatti-meethi nok-jhonk kabhi kabhaar ho jaati hai lekin itna to chalta hi hai. Aadarniya Jamal Sahab, abhi tak aapke saare blogs ko padhkar main aapke baare mein is niskarsh par pahooncha hoon ki aap ek satyapriya person hain, aapne hindu granthon ki kamiyaan aur unki galat baatein present ki to unki jo achi baatein hain, jo mahaan baatein hain unka poora samaan bhi kiya, iske liye aapko bahut-2 dhanyavaad. Lekin janab, kabhi apne blog par muslim dharm ke negatives bhi to laaiye, mujhe aapka aisa ek bhi blog nahin dikha jinme aapne apne dharm ki kamiyon ko ujagar kiya ho,shayad isi karan aap par sandeh utpan ho jaatein hain aur charcha "Hindu vs Muslim" ka roop le leti hai,aasha hai ki aap in baaton par gaur karenge aur agar mujhse koi galti hui ho to usey shama karenge, aakhir aap, giri ji, amit bhai aur kairaanvi ji mere liye is blog jagat mein guru tulya jo hain, arey haan ek baat to aapse kehna bhool hi gaya, main aapse, giri ji se, amit ji se aur tarkeshwar ji se koi vishay prapt karna chahta hoon jispar mein apne blog mein likhoon aur aap sabka mujhe margdarshan prapt ho, badi besabree se prateeksha rahegi aapke reply ki,
dhanyavaad

zeashan zaidi said...

@Impact
सुरेश चिपलूनकर ने निस्संदेह एक घटिया और तर्कहीन पोस्ट लिखी है, लेकिन उसके जवाब में आप ने भी मेरे विचार में कुछ सही नहीं लिखा. अगर सुरेश ने लव जिहाद जैसा इलज़ाम लगाया तो जवाब में हिन्दुओं पर ऊँगली उठा दी जाए, ये तो सही नहीं. अच्छे बुरे तो हर जगह होते हैं. और चिपलूनकर जैसी कुत्सित मानसिकता के तो कुछ ही लोग हैं जिन्हें प्यार में भी जिहाद दिखाई दे रहा है.

Anonymous said...

सुरेश चिपलूनकर एक निहायत ही घटिया,साम्प्रदायिक और अज्ञानी आदमी है जो नेट पर बिखरे हुए कचरे का हिंदी अनुवाद करके अपने ब्लॉग पर छाप देता है,हर चीज में षड़यंत्र खोजता है,लेकिन ब्लॉग पर लिखने के अलावा उसने आज तक ऐसा कोई काम नहीं करा जिससे हिंदुत्व का भला हो सके या इस्लाम को ख़तम करा जा सके.उसे सिक्के का एक पहलू ही दिखाई देता है,मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियों के साथ शादी करते है उसे तो लव जेहाद कहता है पर उन हिन्दू लडको को क्या कहेगा जो मुस्लिम लड़कियों से शादी करते हैं.उसे सुखी जीवन व्यतीत करते हुए वो जोड़े नहीं दिखाई देते हैं जिन्होंने बिना धर्मपरिवर्तन करे शादी करी है,अभी तक धर्म को समझा नहीं है उसने.ओने वे ट्रेफिक की बात तो करता है लेकिन उसे भी साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखते हुए.

सलीम ख़ान said...

अपनी ‘वीकनेस‘ को दूर कीजिए , मुसलमानों को दोष क्यों देते हो

DR. ANWER JAMAL said...

मैं तो अमित शर्मा जी के अन्दर बिल्कुल मुल्ला मौलवियों जैसी शर्मो-हया देखकर दंग ही तो रह गया ।
सोचता रहा कि क्या जवाब दूं ?
क्या इन्होंने सचमुच वेद नहीं पढ़े ?
अगर पढ़े हैं तो लिंगाग्र जैसे नॉर्मल वर्ड्स पर इस तरह लजाने का नाटक क्यों कर रहे हैं ?
अगर कोई समस्या समाज में मौजूद है और उसका समाधान भी है , तो उसका ज़िक्र क्यों न किया जाएगा ?
हमने तो संक्षिप्त में ज़िक्र किया है , लेकिन कोर्स में तो पूरी संरचना दी गई है जिसे सभी भाई बहन पढ़ते हैं और मां बाप ऊँची फ़ीस देकर पढ़ाते हैं और खुश होते हैं कि हमारे बच्चे विज्ञान पढ़ रहे हैं ।
क्या हमारे पूर्वज कुछ कम वैज्ञानिक थे ?
जिस लिंग की संरचना और कार्यों पर पश्चिमी वैज्ञानिक आज प्रकाश डाल रहे हैं उसकी विवेचना तो हमारे मनीषी हज़ारों या अरबों साल पहले ही कर चुके हैं ।
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते ,
सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः
ऋग्वेद 10-86-17
अर्थात वह मनुष्य मैथुन करने में सक्षम नहीं हो सकता , जिस के बैठने पर लोमयुक्त पुरूषांग बल प्रकाश करता है । वही समर्थ हो सकता है , जिसका पुरूषांग दोनों जांघों के बीच लंबायमान है ।
हमने तो वेदों में आर्य नारी को भी शर्माते लजाते हुए नहीं देखा -
उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथाः ,
सर्वामस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका ।
अर्थात मेरे पास आकर मुझे अच्छी तरह स्पर्श करो । यह न जानना कि मैं कम रोमवाली अतः भोग के योग्य नहीं हूं । मैं गांधारी मेषी ( भेड़ ) की तरह लोमपूर्णा ( रोमों से भरी हुई ) और पूर्ण अवयवा ( जिसके अंग पूर्ण यौवन प्राप्त हैं ) हूं ।
अफ़सोस श्री अमित शर्मा जी के हाल पर । मुझे तो लगता है कि उन्होंने शायद आज तक गर्भाधान संस्कार भी न किया होगा अन्यथा वे इस मन्त्र को ज़रूर जानते । सनातन धर्म पुस्तकालय , इटावा द्वारा 1926 में छपवाई गई ‘ ‘षोडष संस्कार विधि‘ के अनुसार गर्भाधान संस्कार में यह मन्त्र लेटी हुई पत्नी की नाभि के आसपास हाथ फेरते हुए 7 बार पढ़ा जाता है ।
ओं पूषा भगं सविता मे ददातु रूद्रः कल्पयतु ललामगुम ।
ओं विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।
आसिंचतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ..
ऋग्वेद 10-184-1
अर्थात पूषा और सविता देवता मुझे भग ( स्त्री की योनि ) दें , रूद्र देवता उसे सुन्दर बनाए । विष्णु स्त्री की योनि को गर्भ धारण करने योग्य बनाए , त्वष्टा गर्भ के रूप का निश्चय करे , प्रजापति वीर्य का सिंचन करे और धाता गर्भ को स्थिर करे ।
देखा अमित जी ! आप तो मात्र वेदों की भावना को आत्मसात न कर पाने के कारण शर्मा रहे थे वर्ना ऐसी कोई बात नहीं है और न ही मुझे अपने ब्लॉग का नाम ही बदलने की ज़रूरत है ।

impact said...

जीशान जैदी साहब. आपकी बात जाएज़ है. लेकिन मैं क्या करून, जब सुनता हूँ की कोई लायेक मुसलमान लड़का गैर मुस्लिम लड़की के लड़के झटके में फंस गया तो बड़ा दुःख होता है.हमारी कौम की अच्छी नेक लडकियां बूढी हो जाती हैं और शर्म उन्हें कुछ करने की आज़ादी नहीं देती और उनका हक आज़ाद गैर मुस्लिम लडकियां ले उडती हैं. ऊपर से चिप्लूकर जैसे सस्ते बुद्धिजीवियों का लव जिहाद जैसा इलज़ाम और झेलिये. अर्थात हम ही को लूटा और हम ही को लुटेरा बना दिया. यही गैर मुस्लिम लडकियां फिरदौस जैसी लायेक मुस्लिम लड़कियों का हक चबाती हैं. या फिर संगीता बिजलानी बनकर नूरीन जैसी वफादार बीवियों को घर से बाहर निकलवा देती हैं. अब क्या फिरदौस जी का महफूज़ मियाँ के साथ जोड़ नहीं बन सकता, एक अगर लफ़्ज़ों की शहजादी है तो दूसरा लफ़्ज़ों का शहजादा. लेकिन संभावना इसी की है की महफूज़ मियाँ भी किसी गैर मुस्लिम के चक्कर में लगे हों (ये केवल संभावना है.) और किसी बेचारी मुस्लिम लड़की का हक इन्तिकाल फरमा रहा हो.

Suresh Chiplunkar said...

कैरानवी भाई, जैसे अनवर आपके गुरु हैं, वैसे ही मेरे भी गुरु ने कहा है कि "जब लोग तुमसे जलने लगें, जब लोग तुम्हें गालियाँ देने लगें, जब लोग तुम्हारे नाम से कपड़े फ़ाड़ने लगें…, तर्क-वितर्क करने की बजाय ऊलजलूल लिखने लगें, तथ्य-रिपोर्ट-सबूत देने की बजाय खामखा की हाँकने लगें… तब समझ जाओ कि तुम लोकप्रिय हो रहे हो…"। इधर आई हुई कुछ टिप्पणियाँ यही साबित कर रही हैं…।
धन्यवाद अनवर साहब, ऐसे ही लिखते रहें।

Anonymous said...

Main pahli baar is blo par aaya hoon. Sirf yahi kahna chahta hoon ki jisne bhi ye shuru kiya hai, uska maqsad do dharmon ko paas lana to bilkul nahin lagta. Woh to kisi bhi tarah se muslim dharma ki buraiyon ko achchai sabit karna chahta hai. Iske liye agar tark ka sahara nahin pata to hindu dharm ki kisi burai se comparison karke use sahi sabit karta hai. Iss admi ko hindu dharm ki jankari nahin hai bus thoda sa kitabi gyan, woh bi apne matlab ke liye, hai

DR. ANWER JAMAL said...

@ महाराष्ट्रवासी मेरे देश बन्धु ! आप कई बार इस ब्लॉग पर आए , आपका शुक्रिया . अभी आपकी लोकप्रियता और बढ़ेगी लेकिन कभी सोचियेगा कि हम अपने बच्चों के रस्ते में कोण से और कितने कांटे बो कर जा रहे हैं ? आत्मा आपके भी है और मालिक को जवाब आप भी देंगे और मैं भी . ईश्वर इस समय भी साक्षी है . कुछ लुच्चों कि वजह से साडी कौम पर कीचड़ उछालना कितना जायज़ है ?
@ अमित जी ! अगर लड़की को वैदिक काल में इतनी ही भाग्यवान मानते थे तो लोग अपनी प्रार्थना में लड़की के बजाय लड़का क्यूँ मांगते थे ?
और मैंने तो भग का कोई अर्थ क्लेअर ही नहीं किया था , फिर आप नाराज़ क्यूँ हुए ? वैसे क्या भग का अर्थ योनि भी होता है ?

bharat bhaarti said...

कई दिन से बहस हो रही हे , लो जिहाद की, मैं हिन्दू भाइयों से कहना चाहता हूँ के परेशांन न हों अरे भाई हमारी बहने तो हमारा ही कार्य कर रही हें , जो इन का अच्छा लड़का होता हे उसे ही ले उडती हे

HAR HAR MAHADEV said...

achhaa chaachha ye batavo ki toomaharee aurte sooparee kyo chabatee raharee he ...?? mene suna he is se choot tight rahatee he...kyoki moorgiyo ke choojo jese nikalane ke baad bhangaar bhosdee ko suparee se tight karte he...kuraan ke kis hadees me likha he...kya pigmber ne aisa kaha kya?????? or chachaa ye batavo ki toomaharee aurate sadko per namaaj kyo nahee padha saktee he ,,yaa ghar me hi parectice kartee he...??? chacha ek baat aur batavo ki kale boorke se do ankhe kyaa ghooratee rahatee he...poora la..to nahee??????chachaa sawal kai kiye jawab ek kaa bhi nahee??? please chachhha koochh to btavo///

Anonymous said...

चिपलूनकर जी, लोकप्रिय तो ठग नटवर लाला भी था उसके बारे में भी लोग उलुल जुलूल लिखते थे बिना किसी तथ्य के क्योंकि किसी को नहीं पता था की उसने कितने की ठगी करी है.

DR. ANWER JAMAL said...

@ HAR HAR MAHADEV JI ! बृहदारण्यक उपनिषद , 6-4-7 के अनुसार
स्त्री यदि मैथुन न करने दे तो उसे उस की इच्छा के अनुसार वस्त्र आदि दे कर उसके प्रति प्रेम प्रकट करे । इतने पर भी यदि वह मैथुन न करने दे तो उसे डंडे या हाथ से ( थप्पड़ , घंूसा आदि ) मारकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे । यदि यह भी संभव न हो तो ‘मैं तुझे शाप दे दूंगाा , तुम्हें वंध्या अथवा भाग्यहीना बना दूंगा ‘ - ऐसा कहकर ‘इंद्रियेण‘ इस मंत्र का पाठ करते हुए उसके पास जाए । उस अभिशाप से वह ‘दुर्भगा‘ एवं वंध्या कही जाने वाली अयशस्विनी ( बदनाम ) ही हो जाती है ।अब कहिये , क्या यही है गर्भाधान की सम्यक रीति ?

DR. ANWER JAMAL said...

@ महक जी ! आपकी बात बिलकुल दुरुस्त है . मैं सभी ऋषियों का सम्मान करता हूँ लेकिन उनके बारे में फैला दी गयी हैं . मैं मुस्लिम समाज की कुरीतियों पर भी लिखूंगा और थोडा सा लिखा भी है .
http://vedquran.blogspot.com/2010/03/submission-to-allah-real-god.html
मैं मुस्लिम आलिमों के जिन विचारों से सहमत नहीं उनको भी लिखूंगा लेकिन देसी हमलावरों से तो फुर्सत मिले .
आप बुज़ुर्ग है , आप कोई ऐसा विषय चुनें जिस से हिन्दू मुस्लिम दोनों समाज की बदगुमानियां दूर हों और पिता मनु की सारी औलाद एक परिवार की तरह देश और विश्व का मार्गदर्शन करे .

vivek said...

Muslims are the most ignorant of their own religion because all their books and interpretations are written in a language which is not so common for the persons following this religion. I think muslims as well as hindus must see a site dedicated to the bad and evil of ISLAM.. please visit. http://islam-watch.org/