सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Saturday, November 13, 2010
Hindu mariage ceremonies क्या एक दादा की औलाद की आपस में शादी हो सकती है ?
संघ आंदोलित है।
लेकिन भाई क्यों आंदोलित है ?
उसके एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के ख़िलाफ़ आतंकवाद के जुर्म में चार्जशीट दाख़िल कर दी गई है।
तो इसमें इतना बिफरने की क्या बात है ?
हमारी पत्रकार बहन के सरपरस्त इन्द्रेश जी बेगुनाह हुए तो छूट ही जाएंगे न ?
क्या संघ को देश के क़ानून पर , न्यायपालिका पर ज़रा भी ऐतबार नहीं है ?
अपनी छवि पर आंच आते ही बौखला उठा संघ आखि़र उन 22 नौजवानों के बंधक बने होने पर आंदोलित क्यों नहीं हुआ जो बेचारे 8 मई 2010 से ही सोमालिया के समुद्री डाकुओं की गिरफ़्त में हैं ?
देश की छवि पर आंच आती है तो आए अपनी बला से, बस अपनी छवि पर बट्टा नहीं लगना चाहिए, है न ?
लेकिन वह तो और भी ज़्यादा लग रहा है।
मोहन भागवत जी ने सोनिया जी पर बेतुका आरोप लगा डाला।
मुसीबत में अक्ल पहले साथ छोड़ देती है। उनके बयान से यही बात साबित हो रही है।
सोनिया जी विदेशी हैं, यह बात सही है लेकिन वह इस देश की कोई पहली विदेशी बहू तो हैं नहीं।
गांधारी खुद क़ंधार की थीं।
क्या कहा ?
क़ंधार तो आर्यवर्त का ही भाग था इसलिए वे विदेशी नहीं मानी जा सकतीं।
ठीक कहते हैं आप, मैं भी अफ़ग़ानिस्तान के आर्यों से आपके रक्त संबंध को ही याद दिलाना चाहता था।
अमेरिका तो आर्यवर्त में नहीं आता था, क्यों ?
कहते हैं कि आज का अमेरिका ही पुराणों का पाताल लोक है।
चलिए, अगर ऐसा ही है तो फिर मानना पड़ेगा कि बनियों के आदि पिता महाराजा अग्रसैन जी अपने सिंघल और जिंदल आदि 18 बेटों की बारात लेकर अमेरिका गए थे, अब से लगभग 5200 साल पहले। वहां से वे 18 विदेशी बहुएं लेकर आए। उनसे उनका वंश चला। सिंघल, जिंदल, मित्तल और अग्रवाल आदि 18 या 18 से भी ज़्यादा गोत्र उन बहुओं से ही चले। इन्हीं गोत्रों से उत्पन्न लोग आज संघ की रीढ़ हैं। विदेशी बहुओं का इतना बड़ा उपकार है देश पर, विशेषकर संघ पर लेकिन संघ फिर भी विदेशी बहू की तौहीन कर रहा है।
संघ तो संस्कार पर ज़ोर देता है, फिर यह बदतमीज़ी भरे आरोप लगाना कौन सा संस्कार है ?
अब एक बात यहां पर गोत्रों की भी हो जाए।
ज्ञानी लोग विराजते हैं नेट पर, कुछ काम की बात ही पता चल जाएगी।
पहली बात तो यह है कि क्या भारत देश जैसे विशाल देश में गुणवती लड़कियों का अकाल पड़ गया था जो महाराजा साहब को विदेश से बहुएं लानी पड़ीं ?
दूसरी बात यह है कि सिंघल, मित्तल, जिंदल और अग्रवाल आदि सभी महाराजा अग्रसेन के बेटे थे। जिंदल के बेटे का विवाह मित्तल की बेटी से क्यों हो जाता है ?
ये दोनों तो आपस में चाचा की औलाद होने से भाई बहन का रिश्ता रखते हैं। ये सभी तो एक दादा अग्रसैन की संतान हैं।
क्या एक दादा की औलाद की आपस में शादी हो सकती है ?
ऐसी ही शादी मुसलमान करें तो उन पर इल्ज़ाम क्यों लगाए जाते हैं ?
सिंघल का बेटा सिंघल की बेटी से तो विवाह नहीं करता लेकिन अपने चाचा की बेटी से कर लेता है और फिर मुसलमान पर हंसता है, क्यों हंसता है भाई ?
हंसना है तो हंसो लेकिन अपनी अक्ल पर कि चल रहे हैं मुसलमानों के ही तरीक़े पर और पता है नहीं।
पता न होना ही इस देश में हिन्दू मुसलमानों को दो किए हुए है।
अच्छा है जितनी जल्दी लोगों को पता हो जाए ताकि दुई की दीवार गिर जाए और हम सब उस एकत्व को पा लें जो कि हमारे दरम्यान वास्तव में है लेकिन जिसका हमें अहसास नहीं है।
बहरहाल संघ परेशान क्यों है ?
संघ जिस कारण भी परेशान हो, लगे हाथों उसे सोमालिया में बंधक पड़े नौजवानों का मुद्दा भी उठा लेना चाहिए। इससे एक तरफ़ तो बंधकों की समस्या हाईलाइट होगी और दूसरी तरफ़ जनता में उसकी छवि ऐसी बनेगी जैसे कि वह वास्तव में कोई राष्ट्रवादी संगठन हो।
वन्दे ईश्वरम् !
लेकिन भाई क्यों आंदोलित है ?
उसके एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के ख़िलाफ़ आतंकवाद के जुर्म में चार्जशीट दाख़िल कर दी गई है।
तो इसमें इतना बिफरने की क्या बात है ?
हमारी पत्रकार बहन के सरपरस्त इन्द्रेश जी बेगुनाह हुए तो छूट ही जाएंगे न ?
क्या संघ को देश के क़ानून पर , न्यायपालिका पर ज़रा भी ऐतबार नहीं है ?
अपनी छवि पर आंच आते ही बौखला उठा संघ आखि़र उन 22 नौजवानों के बंधक बने होने पर आंदोलित क्यों नहीं हुआ जो बेचारे 8 मई 2010 से ही सोमालिया के समुद्री डाकुओं की गिरफ़्त में हैं ?
देश की छवि पर आंच आती है तो आए अपनी बला से, बस अपनी छवि पर बट्टा नहीं लगना चाहिए, है न ?
लेकिन वह तो और भी ज़्यादा लग रहा है।
मोहन भागवत जी ने सोनिया जी पर बेतुका आरोप लगा डाला।
मुसीबत में अक्ल पहले साथ छोड़ देती है। उनके बयान से यही बात साबित हो रही है।
सोनिया जी विदेशी हैं, यह बात सही है लेकिन वह इस देश की कोई पहली विदेशी बहू तो हैं नहीं।
गांधारी खुद क़ंधार की थीं।
क्या कहा ?
क़ंधार तो आर्यवर्त का ही भाग था इसलिए वे विदेशी नहीं मानी जा सकतीं।
ठीक कहते हैं आप, मैं भी अफ़ग़ानिस्तान के आर्यों से आपके रक्त संबंध को ही याद दिलाना चाहता था।
अमेरिका तो आर्यवर्त में नहीं आता था, क्यों ?
कहते हैं कि आज का अमेरिका ही पुराणों का पाताल लोक है।
चलिए, अगर ऐसा ही है तो फिर मानना पड़ेगा कि बनियों के आदि पिता महाराजा अग्रसैन जी अपने सिंघल और जिंदल आदि 18 बेटों की बारात लेकर अमेरिका गए थे, अब से लगभग 5200 साल पहले। वहां से वे 18 विदेशी बहुएं लेकर आए। उनसे उनका वंश चला। सिंघल, जिंदल, मित्तल और अग्रवाल आदि 18 या 18 से भी ज़्यादा गोत्र उन बहुओं से ही चले। इन्हीं गोत्रों से उत्पन्न लोग आज संघ की रीढ़ हैं। विदेशी बहुओं का इतना बड़ा उपकार है देश पर, विशेषकर संघ पर लेकिन संघ फिर भी विदेशी बहू की तौहीन कर रहा है।
संघ तो संस्कार पर ज़ोर देता है, फिर यह बदतमीज़ी भरे आरोप लगाना कौन सा संस्कार है ?
अब एक बात यहां पर गोत्रों की भी हो जाए।
ज्ञानी लोग विराजते हैं नेट पर, कुछ काम की बात ही पता चल जाएगी।
पहली बात तो यह है कि क्या भारत देश जैसे विशाल देश में गुणवती लड़कियों का अकाल पड़ गया था जो महाराजा साहब को विदेश से बहुएं लानी पड़ीं ?
दूसरी बात यह है कि सिंघल, मित्तल, जिंदल और अग्रवाल आदि सभी महाराजा अग्रसेन के बेटे थे। जिंदल के बेटे का विवाह मित्तल की बेटी से क्यों हो जाता है ?
ये दोनों तो आपस में चाचा की औलाद होने से भाई बहन का रिश्ता रखते हैं। ये सभी तो एक दादा अग्रसैन की संतान हैं।
क्या एक दादा की औलाद की आपस में शादी हो सकती है ?
ऐसी ही शादी मुसलमान करें तो उन पर इल्ज़ाम क्यों लगाए जाते हैं ?
सिंघल का बेटा सिंघल की बेटी से तो विवाह नहीं करता लेकिन अपने चाचा की बेटी से कर लेता है और फिर मुसलमान पर हंसता है, क्यों हंसता है भाई ?
हंसना है तो हंसो लेकिन अपनी अक्ल पर कि चल रहे हैं मुसलमानों के ही तरीक़े पर और पता है नहीं।
पता न होना ही इस देश में हिन्दू मुसलमानों को दो किए हुए है।
अच्छा है जितनी जल्दी लोगों को पता हो जाए ताकि दुई की दीवार गिर जाए और हम सब उस एकत्व को पा लें जो कि हमारे दरम्यान वास्तव में है लेकिन जिसका हमें अहसास नहीं है।
बहरहाल संघ परेशान क्यों है ?
संघ जिस कारण भी परेशान हो, लगे हाथों उसे सोमालिया में बंधक पड़े नौजवानों का मुद्दा भी उठा लेना चाहिए। इससे एक तरफ़ तो बंधकों की समस्या हाईलाइट होगी और दूसरी तरफ़ जनता में उसकी छवि ऐसी बनेगी जैसे कि वह वास्तव में कोई राष्ट्रवादी संगठन हो।
वन्दे ईश्वरम् !
Thursday, October 7, 2010
Utilty of christian rituals for children अगर बच्चा अपनी मासूमियत की वजह से स्वर्ग का अधिकारी है तो फिर उसे ईसा मसीह के नाम का बपतिस्मा लेकर क्या फ़ायदा होता है ? - Anwer Jamal
भाई राकेश लाल जी ! आपने कुरआन पढ़ना शुरू कर दिया है, बेशक यह आपकी एक बड़ी उपलब्धि है। आपके पास एक-दो हिन्दी किताबें भी हैं, जिनमें से आपने ‘पेस्ट‘ करके मेरी पिछली पोस्ट ‘वेस्ट‘ कर दी। आप ईसाईयत के प्रचारक हैं, मैं आपका उत्साह समझ सकता हूं। आप ब्लागिंग में नये हैं। यह भी ठीक है लेकिन उम्र तो आपकी ठीक-ठाक है। मैंने आपसे यह नहीं पूछा था कि कुरआन में ईसा मसीह अलैहिस्सलाम का ज़िक्र कहां-कहां आया है, बल्कि मैंने आपसे यह पूछा था कि
1. जिस कुरआन को मानने की दावत आप मुसलमानों को दे रहे हैं, क्या आप उस कुरआन को खुद भी मानते हैं ?
2. मुसलमान आवागमन को नहीं मानते और सभी बच्चों को पैदायशी तौर पर मासूम मानते हैं, आप बच्चों को क्या मानते हैं, मुसलमानों की तरह मासूम या ‘मूल पाप‘ का बोझ ढोने वाला दोषी ?
3. जिस बाइबिल को आप मानते हैं उसमें रोमन कैथोलिक बाइबिल से कुल कितनी किताबें कम हैं ?
आपसे ज़्यादा सवाल नहीं करूंगा।
पहले आप इन सवालों के जवाब दीजिए। फिर मैं आपको कुरआन पढ़ाऊंगा और आपको आपकी ‘पेस्ट‘ की हुई आयतों के अनुवाद के बारे में सही-सही बताऊंगा। आपने सिर्फ़ अनुवाद ‘पेस्ट‘ कर दिया न उसे पढ़ा और न ही उसे समझा।
आपने खुद पेस्ट किया कि ‘3 : 52 अल्लाह के नजदीक ईसा अ0 का जन्म ऐसा ही है जैसा हजरत आदम का जन्म।'
क- जब कुरआन में साफ़ आया है कि ‘ईसा की मिसाल आदम जैसी है।‘ तो आप खुद सोच लीजिए कि जब आदम खुदा नहीं हैं तो उनकी मिसाल वाला आदमी कैसे खुदा हो जाएगा ?
ख- कुरआन में आया है कि जन्नत में वही आदमी जाएगा जिसने अपनी ख्वाहिशें खुदा के हुक्म के अधीन कर दी होंगी, खुदा के हुक्म का पालन किया होगा, खुद को खुदा के प्रति समर्पित कर दिया होगा। ऐसे ही आदमी को मुस्लिम कहा जाता है, मुसलमान शब्द फ़ारसी में मुस्लिम अर्थात समर्पित के लिए ही बोला जाता है।
आपने कह दिया कि सारे मुसलमान जहन्नम में जाएंगे, ऐसा कुरआन कहता है। आपने एक ऐसी बात कह दी जिसे आज तक पत्रक छापने और बांटने वाले हिन्दुओं में से भी किसी ने न कहा बल्कि उल्टे उन्हें यह शिकायत है कि मुसलमान अपने अलावा किसी को जन्नत में जाने का पात्र क्यों नहीं मानता ?
ग- आप मानते हैं कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम मर चुके हैं। जो मर जाए वह खुदा नहीं होता। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की दोबारा आमद केवल इसीलिए होगी कि वे लोगों के ज़ुल्म और मारपीट की वजह से बेहोश हो गए थे, दूर से देखने वालों ने उनकी बेहोशी को मौत समझ लिया। वे ज़िन्दा थे जब गुफ़ा में उन्हें चादर लपेटकर रखा गया क्योंकि हज़रत यूनूस भी मछली के पेट में ज़िन्दा थे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने बताया था कि लोगों को मेरी सच्चाई के तौर पर ‘साइन आफ़ जोनाह‘ यानि कि हज़रत यूनुस का चिन्ह दिया जाएगा।
ये सारी बातें आपको धीरे-धीरे बताई जाएंगी। आप बिल्कुल ठीक जगह पर आ गए हैं। अब आप यहां से पीछा छुड़ाकर जाना भी चाहें तो आपको जाने नहीं दिया जाएगा। मैं बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हूं। मैं आपके आने से बहुत खुश हूं। बस आपसे एक विनती करना चाहूंगा कि आप कमेंट करने से पहले यह ज़रूर देख लिया कीजिए कि आपसे पूछा क्या जा रहा है ?
देखो समय क्या कह रहा है ?
जो समाज ईश्वर के नियमों को नहीं मानता और जीवन को खेल की तरह गुज़ारता है, धर्म की जगह संस्कृति और राष्ट्र को दे बैठता है उसके राष्ट्र में विदेशी आकर ‘मौज‘ करते हैं और
उसकी ‘मां‘ जैसी धरती पर ऐसी चीज़ें इतनी मात्रा में डाल देते हैं कि टॉयलेट भी अट जाते हैं। इस ज़िल्लत को न तो वे किसी से शेयर कर पाते हैं और न ही उन्हें इस ज़िल्लत से मुक्ति का कोई मार्ग ही नज़र आता है क्योंकि जो मार्ग होता है उसकी मज़ाक़ उड़ाना तो उनका मिशन होता है। समय उनकी मज़ाक़ उड़ाता है और वे फिर भी मालिक की शरण में नहीं आते।
अफ़सोस, हज़ार बार अफ़सोस।
1. जिस कुरआन को मानने की दावत आप मुसलमानों को दे रहे हैं, क्या आप उस कुरआन को खुद भी मानते हैं ?
2. मुसलमान आवागमन को नहीं मानते और सभी बच्चों को पैदायशी तौर पर मासूम मानते हैं, आप बच्चों को क्या मानते हैं, मुसलमानों की तरह मासूम या ‘मूल पाप‘ का बोझ ढोने वाला दोषी ?
3. जिस बाइबिल को आप मानते हैं उसमें रोमन कैथोलिक बाइबिल से कुल कितनी किताबें कम हैं ?
आपसे ज़्यादा सवाल नहीं करूंगा।
पहले आप इन सवालों के जवाब दीजिए। फिर मैं आपको कुरआन पढ़ाऊंगा और आपको आपकी ‘पेस्ट‘ की हुई आयतों के अनुवाद के बारे में सही-सही बताऊंगा। आपने सिर्फ़ अनुवाद ‘पेस्ट‘ कर दिया न उसे पढ़ा और न ही उसे समझा।
आपने खुद पेस्ट किया कि ‘3 : 52 अल्लाह के नजदीक ईसा अ0 का जन्म ऐसा ही है जैसा हजरत आदम का जन्म।'
क- जब कुरआन में साफ़ आया है कि ‘ईसा की मिसाल आदम जैसी है।‘ तो आप खुद सोच लीजिए कि जब आदम खुदा नहीं हैं तो उनकी मिसाल वाला आदमी कैसे खुदा हो जाएगा ?
ख- कुरआन में आया है कि जन्नत में वही आदमी जाएगा जिसने अपनी ख्वाहिशें खुदा के हुक्म के अधीन कर दी होंगी, खुदा के हुक्म का पालन किया होगा, खुद को खुदा के प्रति समर्पित कर दिया होगा। ऐसे ही आदमी को मुस्लिम कहा जाता है, मुसलमान शब्द फ़ारसी में मुस्लिम अर्थात समर्पित के लिए ही बोला जाता है।
आपने कह दिया कि सारे मुसलमान जहन्नम में जाएंगे, ऐसा कुरआन कहता है। आपने एक ऐसी बात कह दी जिसे आज तक पत्रक छापने और बांटने वाले हिन्दुओं में से भी किसी ने न कहा बल्कि उल्टे उन्हें यह शिकायत है कि मुसलमान अपने अलावा किसी को जन्नत में जाने का पात्र क्यों नहीं मानता ?
ग- आप मानते हैं कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम मर चुके हैं। जो मर जाए वह खुदा नहीं होता। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की दोबारा आमद केवल इसीलिए होगी कि वे लोगों के ज़ुल्म और मारपीट की वजह से बेहोश हो गए थे, दूर से देखने वालों ने उनकी बेहोशी को मौत समझ लिया। वे ज़िन्दा थे जब गुफ़ा में उन्हें चादर लपेटकर रखा गया क्योंकि हज़रत यूनूस भी मछली के पेट में ज़िन्दा थे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने बताया था कि लोगों को मेरी सच्चाई के तौर पर ‘साइन आफ़ जोनाह‘ यानि कि हज़रत यूनुस का चिन्ह दिया जाएगा।
ये सारी बातें आपको धीरे-धीरे बताई जाएंगी। आप बिल्कुल ठीक जगह पर आ गए हैं। अब आप यहां से पीछा छुड़ाकर जाना भी चाहें तो आपको जाने नहीं दिया जाएगा। मैं बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हूं। मैं आपके आने से बहुत खुश हूं। बस आपसे एक विनती करना चाहूंगा कि आप कमेंट करने से पहले यह ज़रूर देख लिया कीजिए कि आपसे पूछा क्या जा रहा है ?
देखो समय क्या कह रहा है ?
जो समाज ईश्वर के नियमों को नहीं मानता और जीवन को खेल की तरह गुज़ारता है, धर्म की जगह संस्कृति और राष्ट्र को दे बैठता है उसके राष्ट्र में विदेशी आकर ‘मौज‘ करते हैं और
उसकी ‘मां‘ जैसी धरती पर ऐसी चीज़ें इतनी मात्रा में डाल देते हैं कि टॉयलेट भी अट जाते हैं। इस ज़िल्लत को न तो वे किसी से शेयर कर पाते हैं और न ही उन्हें इस ज़िल्लत से मुक्ति का कोई मार्ग ही नज़र आता है क्योंकि जो मार्ग होता है उसकी मज़ाक़ उड़ाना तो उनका मिशन होता है। समय उनकी मज़ाक़ उड़ाता है और वे फिर भी मालिक की शरण में नहीं आते।
अफ़सोस, हज़ार बार अफ़सोस।
Friday, May 7, 2010
Love Fasad 2 वफ़ा भी रास नहीं आती हिन्दू प्रेम दीवानों को

ज़हर खाकर प्रेमी और प्रेमिका ने दम तोड़ा गुलावठी । मोहल्ला करनपुरी कलेसर के युवक और युवती को एक साथ आम के बाग़ में देखकर एकत्र हुए लोगों ने जब उन्हें दबोचने की कोशिश की तो उन्होंने ज़हरीला पदार्थ खा लिया । काफ़ी दूर दौड़ने के बाद दोनों गिरकर बेहोश हो गए । उन्हें नर्सिंग होम ले जाया गया जहां युवती ने दम तोड़ दिया । जबकि युवक ने हापुड़ के ख़ान अस्पताल में अंतिम सांस ली ।
अमर उजाला , नई दिल्ली संस्करण , दिनांक 5-05-2010
........................
एक अन्य हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के अनुसार लड़की प्रजापति बिरादरी की थी जबकि लड़का दूसरी बिरादरी का था । दोनों में काफ़ी अर्से से प्रेम प्रसंग चल रहा था । दोनों के घरवालों ने दोनों को काफ़ी समझाया लेकिन इन प्रेम दीवानों पर उनके समझाने का कोई असर न हुआ और वफ़ा की राह में दोनों प्रेम दीवानों ने बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में अपनी जान हलाक कर दी ।
हिन्दू यंग ब्लड कहीं तो बेवफ़ाई का ज़ख्म खाकर तड़प रहा है और कहीं वफ़ा करके भी उन्हें साथ साथ जीना नसीब नहीं हो रहा है । वफ़ादार प्रेमियों के रास्ते में हिन्दू धर्म की आउट डेटेड रस्में दीवार बन रही हैं । कभी दोनों का विवाह इसलिये नहीं हो पाता कि दोनों एक ही बिरादरी या एक ही गांव के होते हैं और कभी उनका मिलन इसलिये नहीं हो पाता कि उन दोनों की जाति अलग अलग होती है ।
हिन्दू धर्म की रस्मों के कारण हिन्दू युवाओं को जीना मुश्किल और मरना आसान लगने लगता है और वे मौत को चुन लेते हैं । मृत्यु का वरण करते समय उन्हें परलोक में किसी सज़ा की चिन्ता भी नहीं होती जबकि एक मुसलमान कठिन हालात से घबराकर जब कभी मरने के बारे में सोचता भी है तो उसे परलोक में सज़ा का यक़ीन आत्महत्या से रोक लेता है ।
एक मुसलमान को यह यक़ीन होता है कि आत्महत्या करना एक ऐसा गुनाह है जिसकी सज़ा के तौर पर उसे क़ियामत तक ठीक उसी रीति से असंख्य बार मरने पड़ेगा जिस रीति से वह आत्महत्या करेगा । इससे पहले इस्लाम जज़्बात को भड़काने वाले नाच गाने देखना और लड़कियों से तन्हाई में मिलने पर ही पाबन्दी लगाकर सोसायटी में बिगाड़ के प्रेरक तत्वों के मूल पर ही प्रहार करता है। यही वजह है कि जहां इस्लामी नियम सोसायटी का दस्तूर हैं वहां इस तरह की जाहिलाना और जज़्बाती आत्महत्याओं का प्रतिशत हिन्दू सोसायटी के मुक़ाबले न के बराबर है ।
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Falsehood of love jihad,
Hindu marriage act,
आत्महत्या,
इस्लाम,
परलोक,
मुसलमान,
हिन्दुस्तान
Sunday, May 2, 2010
जाति या वर्ण का विचार न कर , सबके प्रति समान भाव-बन्धुत्व का प्रदर्शन-यही इस्लाम की महत्ता है , इसी में उसकी श्रेष्ठता है । - Swami Vivekanand

स्वामी विवेकानन्द जी को यदि भारतीय संस्कृति मनीषियों का सिरमौर कहा जाये तो कुछ अनुचित न होगा । उनका कथन है कि पैग़म्बर साहब ने अपने जीवन के दृष्टान्त से यह दिखला दिया है कि मुसलमान मात्र में सम्पूर्ण साम्य एवं भ्रातृ-भाव रहना चाहिये । उनके धर्म जाति , मतामत , वर्ण , लिंग , आदि पर आधारित भेदों के लिए कोई स्थान न था ।
तुर्किस्तान का सुल्तान अफ्ऱीक़ा के बाज़ार से एक हब्शी गुलाम ख़रीदकर ज़ंजीरों में बांधकर अपने देश में ला सकता है । किन्तु यदि यही गुलाम इस्लाम को अपना ले और उपयुक्त गुणों से विभूषित हो तो उसे तुर्की की शहज़ादी से निकाह करने का भी हक़ मिल जाता है । मुसलमानों की इस उदारता के साथ ज़रा इस देश (अमेरिका) में हब्शियों (नीग्रो) एवं रेड इंडियन लोगों के प्रति किये जाने वाले घृणापूर्ण व्यवहार की तुलना तो करो ।
हिन्दू भी और क्या करते हैं ?
यदि तुम्हारे देश का कोई धर्म-प्रचारक (मिशनरी) भूलकर किसी ‘सनातनी‘ हिन्दू के भोजन को स्पर्श कर ले तो वह उसे अशुद्ध कहकर फेंक देगा । हमारा दर्शन उच्च और उदार होते हुए भी हमारा आचार हमारी कितनी दुर्बलता का परिचायक है !किन्तु अन्य धर्मावलंबियों की तुलना में हम इस दिशा में मुसलमानों को अत्यन्त प्रगतिशील पाते हैं । जाति या वर्ण का विचार न कर , सबके प्रति समान भाव-बन्धुत्व का प्रदर्शन-यही इस्लाम की महत्ता है , इसी में उसकी श्रेष्ठता है ।
( विवेकानन्द साहित्य , सप्तम खंड , पृष्ठ 192 , प्रकाशक : अद्वैत आश्रम , 5 डिही एण्टाली रोड , कलकत्ता - 14 )
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खान-पान के नियमों की अवहेलना करने वाले अपने मत से भी अनभिज्ञ वासनाजीवियों के लिए यह बात आश्चर्यजनक हो सकती है कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. के शरीर से निकलने वाले पसीना आदि भी सुगन्धित होता था । जबकि शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों में सुगन्ध का पाया जाना कोई असंभव बात नहीं है । आप किसी भी आयुर्वेदिक या प्राकृतिक चिकित्सक से इस बात की पुष्टि कर सकते हैं । गायत्री परिवार के संस्थापक श्री राम शर्मा आचार्य जी ने अपने ग्रन्थों में बताया है कि कई भारतीय सन्तों को भी यह सिद्धि प्राप्त थी । यह कोई बहुत मुश्किल या असंभव बात नहीं है अगर आप चाहें तो आप यह प्रयोग खुद पर भी करके देख सकते हैं । इसका आसान तरीक़ा यह है कि आप एक बार मानवता के आदर्श पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. के खान-पान , शौच , शुद्धि , उपासना और सोने जागने का विवरण पढ़कर उसका अनुसरण करके देख लीजिये । आपका पूरा वुजूद महक उठेगा और आपके वुजूद से जो कुछ निकलेगा वह भी सुगन्धित ही होगा । यह मेरा वादा भी है और मेरा दावा भी क्योंकि यह मेरा ईमान भी है और स्वयं मेरा निजि अनुभव भी । ध्यान रहे कि हज़रत मुहम्मद साहब स. ने कभी पेट भर नहीं खाया , कभी लहसुन जैसी बदबू पैदा करने वाली चीज़ नहीं खाई और उनके चेहरे पर सदैव मुस्कान रहती थी चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों ! मुस्कुराहट के फ़ायदे अब वैज्ञानिकों ने जगज़ाहिर कर ही दिये हैं । यह विषय एक पूरी पोस्ट चाहता है ।नेट की सुविधा घर पर उपलब्ध होने के बाद इस पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जाएगा ।
इन्शाअल्लाह !
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श्री राम शर्मा आचार्य
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