सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



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Monday, May 10, 2010

Towards the fragrance of Islam क्या इस्लाम की बात करने से बदबू फैलती है ?



ऐसे बदलते हुए हालात में भी मेरे लेख



जैसे ही कोई भी अपने लेख में "इस्लाम" का प्रचार करने की कोशिश करेगा, तत्काल उसकी नीयत पर शक किया जायेगा…। चाहे कैरानवी हों, सलीम हों या आप हों… कई राष्ट्रीय मुद्दों पर अच्छा लिख भी सकते हो, लेकिन जैसे ही आप लोग विभिन्न इस्लामी प्रचार लिंक, पुस्तकों के लिंक, हर बात को इस्लाम से जोड़ना आदि शुरु कर देते हो… पाठक बिदकने लगते हैं, नाक पर रुमाल रखकर निकल लेते हैं, कई लोग इसी वजह से आप लोगों से चिढ़ने लगे हैं।
हालांकि राष्ट्रवादी मानसिकता से ग्रस्त ‘मनुज‘ जी पहले ही कह चके हैं कि बाल ठाकरे जी भी राज ठाकरे और गिलानी की ही तरह देश के ग़द्दार हैं । इसके बावजूद हमने तो कभी उनपर शक नहीं किया और न ही हमने उनके कथन में बदबू की ही शिकायत की ।

इस्लाम तो सत्य है , अमृत है , आकर्षक है और सुगंध का भंडार भी । उसके नाम से अगर किसी को बदबू का अहसास होता है तो यह उसका निजी अनुभव है जिसका कारण खुद उसके अन्दर छिपा है ।जैसे कि कस्तूरी मृग दुनिया जहान में खुश्बू का स्रोत ढूंढता फिरता है जबकि उसका स्रोत खुद उसके अन्दर होता है ।

कुत्ते के काटे हुए रैबीज़ के शिकार मरीज़ भी पानी देखते ही चिल्लाने लगते हैं । उन्हें पानी में अपनी मौत दिखाई देने लगती है हालांकि पानी अमृत होता है ।

सांप के डसे हुए मरीज़ को भी नीम का ज़ायक़ा कड़वा नहीं लगता । इससे पता चलता है कि अगर आदमी मरीज़ हो तो उसे चीज़ें हक़ीक़त के उलट भी नज़र आ सकती हैं ।लेकिन उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है । हमें उम्मीद है कि जिस तरह वे वेद पुराण में कई बातों को अप्रासंगिक और बकवास स्वीकार कर चुके हैं , उसी तरह एक दिन वे अपनी बातों में से भी कुछ को अप्रासंगिक और बकवास मानकर उन्हें त्याग देंगे ।
आक़ा ए महाजाल ! आपने अपने ब्लॉग पर पैसा बटोर बॉक्स किस विधि से लगाया ? ज़रा हमें भी तो बताइये , हम भी लगाना चाहते हैं ।

Friday, May 7, 2010

Love Fasad 2 वफ़ा भी रास नहीं आती हिन्दू प्रेम दीवानों को


ज़हर खाकर प्रेमी और प्रेमिका ने दम तोड़ा गुलावठी । मोहल्ला करनपुरी कलेसर के युवक और युवती को एक साथ आम के बाग़ में देखकर एकत्र हुए लोगों ने जब उन्हें दबोचने की कोशिश की तो उन्होंने ज़हरीला पदार्थ खा लिया । काफ़ी दूर दौड़ने के बाद दोनों गिरकर बेहोश हो गए । उन्हें नर्सिंग होम ले जाया गया जहां युवती ने दम तोड़ दिया । जबकि युवक ने हापुड़ के ख़ान अस्पताल में अंतिम सांस ली ।
अमर उजाला , नई दिल्ली संस्करण , दिनांक 5-05-2010
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एक अन्य हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के अनुसार लड़की प्रजापति बिरादरी की थी जबकि लड़का दूसरी बिरादरी का था । दोनों में काफ़ी अर्से से प्रेम प्रसंग चल रहा था । दोनों के घरवालों ने दोनों को काफ़ी समझाया लेकिन इन प्रेम दीवानों पर उनके समझाने का कोई असर न हुआ और वफ़ा की राह में दोनों प्रेम दीवानों ने बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में अपनी जान हलाक कर दी ।
हिन्दू यंग ब्लड कहीं तो बेवफ़ाई का ज़ख्म खाकर तड़प रहा है और कहीं वफ़ा करके भी उन्हें साथ साथ जीना नसीब नहीं हो रहा है । वफ़ादार प्रेमियों के रास्ते में हिन्दू धर्म की आउट डेटेड रस्में दीवार बन रही हैं । कभी दोनों का विवाह इसलिये नहीं हो पाता कि दोनों एक ही बिरादरी या एक ही गांव के होते हैं और कभी उनका मिलन इसलिये नहीं हो पाता कि उन दोनों की जाति अलग अलग होती है ।
हिन्दू धर्म की रस्मों के कारण हिन्दू युवाओं को जीना मुश्किल और मरना आसान लगने लगता है और वे मौत को चुन लेते हैं । मृत्यु का वरण करते समय उन्हें परलोक में किसी सज़ा की चिन्ता भी नहीं होती जबकि एक मुसलमान कठिन हालात से घबराकर जब कभी मरने के बारे में सोचता भी है तो उसे परलोक में सज़ा का यक़ीन आत्महत्या से रोक लेता है ।
एक मुसलमान को यह यक़ीन होता है कि आत्महत्या करना एक ऐसा गुनाह है जिसकी सज़ा के तौर पर उसे क़ियामत तक ठीक उसी रीति से असंख्य बार मरने पड़ेगा जिस रीति से वह आत्महत्या करेगा । इससे पहले इस्लाम जज़्बात को भड़काने वाले नाच गाने देखना और लड़कियों से तन्हाई में मिलने पर ही पाबन्दी लगाकर सोसायटी में बिगाड़ के प्रेरक तत्वों के मूल पर ही प्रहार करता है। यही वजह है कि जहां इस्लामी नियम सोसायटी का दस्तूर हैं वहां इस तरह की जाहिलाना और जज़्बाती आत्महत्याओं का प्रतिशत हिन्दू सोसायटी के मुक़ाबले न के बराबर है ।