सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



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Friday, May 7, 2010

Love Fasad 2 वफ़ा भी रास नहीं आती हिन्दू प्रेम दीवानों को


ज़हर खाकर प्रेमी और प्रेमिका ने दम तोड़ा गुलावठी । मोहल्ला करनपुरी कलेसर के युवक और युवती को एक साथ आम के बाग़ में देखकर एकत्र हुए लोगों ने जब उन्हें दबोचने की कोशिश की तो उन्होंने ज़हरीला पदार्थ खा लिया । काफ़ी दूर दौड़ने के बाद दोनों गिरकर बेहोश हो गए । उन्हें नर्सिंग होम ले जाया गया जहां युवती ने दम तोड़ दिया । जबकि युवक ने हापुड़ के ख़ान अस्पताल में अंतिम सांस ली ।
अमर उजाला , नई दिल्ली संस्करण , दिनांक 5-05-2010
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एक अन्य हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के अनुसार लड़की प्रजापति बिरादरी की थी जबकि लड़का दूसरी बिरादरी का था । दोनों में काफ़ी अर्से से प्रेम प्रसंग चल रहा था । दोनों के घरवालों ने दोनों को काफ़ी समझाया लेकिन इन प्रेम दीवानों पर उनके समझाने का कोई असर न हुआ और वफ़ा की राह में दोनों प्रेम दीवानों ने बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में अपनी जान हलाक कर दी ।
हिन्दू यंग ब्लड कहीं तो बेवफ़ाई का ज़ख्म खाकर तड़प रहा है और कहीं वफ़ा करके भी उन्हें साथ साथ जीना नसीब नहीं हो रहा है । वफ़ादार प्रेमियों के रास्ते में हिन्दू धर्म की आउट डेटेड रस्में दीवार बन रही हैं । कभी दोनों का विवाह इसलिये नहीं हो पाता कि दोनों एक ही बिरादरी या एक ही गांव के होते हैं और कभी उनका मिलन इसलिये नहीं हो पाता कि उन दोनों की जाति अलग अलग होती है ।
हिन्दू धर्म की रस्मों के कारण हिन्दू युवाओं को जीना मुश्किल और मरना आसान लगने लगता है और वे मौत को चुन लेते हैं । मृत्यु का वरण करते समय उन्हें परलोक में किसी सज़ा की चिन्ता भी नहीं होती जबकि एक मुसलमान कठिन हालात से घबराकर जब कभी मरने के बारे में सोचता भी है तो उसे परलोक में सज़ा का यक़ीन आत्महत्या से रोक लेता है ।
एक मुसलमान को यह यक़ीन होता है कि आत्महत्या करना एक ऐसा गुनाह है जिसकी सज़ा के तौर पर उसे क़ियामत तक ठीक उसी रीति से असंख्य बार मरने पड़ेगा जिस रीति से वह आत्महत्या करेगा । इससे पहले इस्लाम जज़्बात को भड़काने वाले नाच गाने देखना और लड़कियों से तन्हाई में मिलने पर ही पाबन्दी लगाकर सोसायटी में बिगाड़ के प्रेरक तत्वों के मूल पर ही प्रहार करता है। यही वजह है कि जहां इस्लामी नियम सोसायटी का दस्तूर हैं वहां इस तरह की जाहिलाना और जज़्बाती आत्महत्याओं का प्रतिशत हिन्दू सोसायटी के मुक़ाबले न के बराबर है ।

Wednesday, April 14, 2010

पत्नी के मन को भी तो समझो । उसे कोई प्रॉब्लम भी तो हो सकती है ? Falsehood of love jihad .


ब्लॉग के ज़रिये हम दिलों के बीच मौजूद दीवारों को गिरा सकते हैं । हमारे लेखन का मक़सद भी यही है लेकिन कुछ लोगों का मक़सद यह है कि उन ख़ताओं के लिए भी ज़िम्मेदार भी मुसलमानों को ठहराओ , जिनके गुनाहगार वास्तव में वे खुद हैं ।
किसी हमदर्द के समझाने से मैं शांत हो गया था । मैंने ऐलान 3 दिन के लिए किया था लेकिन मैंने और ज़्यादा मोहलत दी ।
लेकिन मेरी इस ख़ामोशी के अंतराल में एक विषपुरूष ने पूरी पोस्ट क्रिएट कर दी कि मुसलमान संगठित तरीक़े से हिन्दू लड़कियों को मुसलमान बना रहे हैं ।
बताइये , ऐसा क्यों किया गया ?
क्या ऐसे आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला कभी समाप्त हो पाएगा ?
क्या ऐसे में मुझे जवाब देना चाहिये था या फिर मैं चुप लगा जाता ?
कोई हिन्दू भाई इसका उचित जवाब देता तो शायद मैं चुप रह जाता लेकिन मजबूरन मुझे इन आरोपवादियों को सच्चाई बतानी पड़ी और उसमें मैंने जानबूझकर वेदों का नाम तक नहीं लिया ।
वेदों का नाम नहीं लिया तो भाई अमित शर्मा बिगड़ गये बोले कि आपने अपने ब्लॉग का नाम वेद कुरआन क्यों रखा ?
इस ब्लॉग पर आप ख़तना , लिंगाग्र, स्तंभन और वीकनेस का ज़िक्र क्यों कर रहे हैं ?
आप अपने ब्लॉग का नाम बदलिए ।
मैं तो अमित शर्मा जी के अन्दर बिल्कुल मुल्ला मौलवियों जैसी शर्मो-हया देखकर दंग ही तो रह गया ।
सोचता रहा कि क्या जवाब दूं ?
क्या इन्होंने सचमुच वेद नहीं पढ़े ?
अगर पढ़े हैं तो लिंगाग्र जैसे नॉर्मल वर्ड्स पर इस तरह लजाने का नाटक क्यों कर रहे हैं ?
अगर कोई समस्या समाज में मौजूद है और उसका समाधान भी है , तो उसका ज़िक्र क्यों न किया जाएगा ?
हमने तो संक्षिप्त में ज़िक्र किया है , लेकिन कोर्स में तो पूरी संरचना दी गई है जिसे सभी भाई बहन पढ़ते हैं और मां बाप ऊँची फ़ीस देकर पढ़ाते हैं और खुश होते हैं कि हमारे बच्चे विज्ञान पढ़ रहे हैं ।
क्या हमारे पूर्वज कुछ कम वैज्ञानिक थे ?
जिस लिंग की संरचना और कार्यों पर पश्चिमी वैज्ञानिक आज प्रकाश डाल रहे हैं उसकी विवेचना तो हमारे मनीषी हज़ारों या अरबों साल पहले ही कर चुके हैं ।
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते ,
सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः
ऋग्वेद 10-86-17
अर्थात वह मनुष्य मैथुन करने में सक्षम नहीं हो सकता , जिस के बैठने पर लोमयुक्त पुरूषांग बल प्रकाश करता है । वही समर्थ हो सकता है , जिसका पुरूषांग दोनों जांघों के बीच लंबायमान है ।
हमने तो वेदों में आर्य नारी को भी ‘ार्माते लजाते हुए नहीं देखा -
उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथाः ,
सर्वामस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका ।
ऋग्वेद 1- 126- 7
अर्थात मेरे पास आकर मुझे अच्छी तरह स्पर्श करो । यह न जानना कि मैं कम रोमवाली अतः भोग के योग्य नहीं हूं । मैं गांधारी मेषी ( भेड़ ) की तरह लोमपूर्णा ( रोमों से भरी हुई ) और पूर्ण अवयवा ( जिसके अंग पूर्ण यौवन प्राप्त हैं ) हूं ।
अफ़सोस श्री अमित शर्मा जी के हाल पर । मुझे तो लगता है कि उन्होंने शायद आज तक गर्भाधान संस्कार भी न किया होगा अन्यथा वे इस मन्त्र को ज़रूर जानते । सनातन धर्म पुस्तकालय , इटावा द्वारा 1926 में छपवाई गई ‘ ‘षोडष संस्कार विधि‘ के अनुसार गर्भाधान संस्कार में यह मन्त्र लेटी हुई पत्नी की नाभि के आसपास हाथ फेरते हुए 7 बार पढ़ा जाता है ।
ओं पूषा भगं सविता मे ददातु रूद्रः कल्पयतु ललामगुम ।
ओं विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।
आसिंचतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ..
ऋग्वेद 10-184-1
अर्थात पूषा और सविता देवता मुझे भग ( स्त्री की योनि ) दें , रूद्र देवता उसे सुन्दर बनाए । विष्णु स्त्री की योनि को गर्भ धारण करने योग्य बनाए , त्वष्टा गर्भ के रूप का निश्चय करे , प्रजापति वीर्य का सिंचन करे और धाता गर्भ को स्थिर करे ।
देखा अमित जी ! आप तो मात्र वेदों की भावना को आत्मसात न कर पाने के कारण शर्मा रहे थे वर्ना ऐसी कोई बात नहीं है और न ही मुझे अपने ब्लॉग का नाम ही बदलने की ज़रूरत है ।

भाई अमित जी को तो इसमें भी खोट निकालना था और बताना था कि महान तो केवल हम हैं । सो उन्होंने हमें इल्ज़ाम दे डाला -
हम गर्भाधान संस्कार करतें है,तो वोह भी हमारा एक सम्यक रीती से निभाया जाने वाला धार्मिक संस्कार है. लेकिन आप जिस परम्परा का अनुगमन करतें है वहाँ काम, वासना की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाता है ,और उसके आवश्यक संस्कार के रूप में लिंगाग्र को कपडे से रगड़कर स्थंबन का स्वाभाव विकसित किया जाता है, ताकि चार चार प्रियतमाओं सहित खुद की भी वासना पूर्ति हो सके.

बृहदारण्यक उपनिषद , 6-4-7 के अनुसार
स्त्री यदि मैथुन न करने दे तो उसे उस की इच्छा के अनुसार वस्त्र आदि दे कर उसके प्रति प्रेम प्रकट करे । इतने पर भी यदि वह मैथुन न करने दे तो उसे डंडे या हाथ से ( थप्पड़ , घंूसा आदि ) मारकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे । यदि यह भी संभव न हो तो ‘मैं तुझे शाप दे दूंगाा , तुम्हें वंध्या अथवा भाग्यहीना बना दूंगा ‘ - ऐसा कहकर ‘इंद्रियेण‘ इस मंत्र का पाठ करते हुए उसके पास जाए । उस अभिशाप से वह ‘दुर्भगा‘ एवं वंध्या कही जाने वाली अयशस्विनी ( बदनाम ) ही हो जाती है ।
अब कहिये , क्या यही है गर्भाधान की सम्यक रीति ?
अरे भाई , क्यों देवताओं की तरह कामातुर हो रहे हो ?
पत्नी के मन को भी तो समझो । उसे कोई प्रॉब्लम भी तो हो सकती है ?
पहले अपनी पत्नी के मन को समझना सीखो । फिर वे न किसी इच्छाधारी के पास जायेंगी और न किसी मुसलमान के पास । तब आपके दिमाग़ से लव जिहाद का फ़र्ज़ी डर भी निकल जाएगा ।
कृप्या अपनी लड़कियों को बदनाम न करें , उन्हें अच्छी बातें सिखायंे ।
लेकिन आप अच्छी बातें सिखाएंगे किस किताब से ?
सब जगह तो उपरोक्त सामग्री भरी पड़ी है ।