सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Thursday, October 7, 2010
Utilty of christian rituals for children अगर बच्चा अपनी मासूमियत की वजह से स्वर्ग का अधिकारी है तो फिर उसे ईसा मसीह के नाम का बपतिस्मा लेकर क्या फ़ायदा होता है ? - Anwer Jamal
भाई राकेश लाल जी ! आपने कुरआन पढ़ना शुरू कर दिया है, बेशक यह आपकी एक बड़ी उपलब्धि है। आपके पास एक-दो हिन्दी किताबें भी हैं, जिनमें से आपने ‘पेस्ट‘ करके मेरी पिछली पोस्ट ‘वेस्ट‘ कर दी। आप ईसाईयत के प्रचारक हैं, मैं आपका उत्साह समझ सकता हूं। आप ब्लागिंग में नये हैं। यह भी ठीक है लेकिन उम्र तो आपकी ठीक-ठाक है। मैंने आपसे यह नहीं पूछा था कि कुरआन में ईसा मसीह अलैहिस्सलाम का ज़िक्र कहां-कहां आया है, बल्कि मैंने आपसे यह पूछा था कि
1. जिस कुरआन को मानने की दावत आप मुसलमानों को दे रहे हैं, क्या आप उस कुरआन को खुद भी मानते हैं ?
2. मुसलमान आवागमन को नहीं मानते और सभी बच्चों को पैदायशी तौर पर मासूम मानते हैं, आप बच्चों को क्या मानते हैं, मुसलमानों की तरह मासूम या ‘मूल पाप‘ का बोझ ढोने वाला दोषी ?
3. जिस बाइबिल को आप मानते हैं उसमें रोमन कैथोलिक बाइबिल से कुल कितनी किताबें कम हैं ?
आपसे ज़्यादा सवाल नहीं करूंगा।
पहले आप इन सवालों के जवाब दीजिए। फिर मैं आपको कुरआन पढ़ाऊंगा और आपको आपकी ‘पेस्ट‘ की हुई आयतों के अनुवाद के बारे में सही-सही बताऊंगा। आपने सिर्फ़ अनुवाद ‘पेस्ट‘ कर दिया न उसे पढ़ा और न ही उसे समझा।
आपने खुद पेस्ट किया कि ‘3 : 52 अल्लाह के नजदीक ईसा अ0 का जन्म ऐसा ही है जैसा हजरत आदम का जन्म।'
क- जब कुरआन में साफ़ आया है कि ‘ईसा की मिसाल आदम जैसी है।‘ तो आप खुद सोच लीजिए कि जब आदम खुदा नहीं हैं तो उनकी मिसाल वाला आदमी कैसे खुदा हो जाएगा ?
ख- कुरआन में आया है कि जन्नत में वही आदमी जाएगा जिसने अपनी ख्वाहिशें खुदा के हुक्म के अधीन कर दी होंगी, खुदा के हुक्म का पालन किया होगा, खुद को खुदा के प्रति समर्पित कर दिया होगा। ऐसे ही आदमी को मुस्लिम कहा जाता है, मुसलमान शब्द फ़ारसी में मुस्लिम अर्थात समर्पित के लिए ही बोला जाता है।
आपने कह दिया कि सारे मुसलमान जहन्नम में जाएंगे, ऐसा कुरआन कहता है। आपने एक ऐसी बात कह दी जिसे आज तक पत्रक छापने और बांटने वाले हिन्दुओं में से भी किसी ने न कहा बल्कि उल्टे उन्हें यह शिकायत है कि मुसलमान अपने अलावा किसी को जन्नत में जाने का पात्र क्यों नहीं मानता ?
ग- आप मानते हैं कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम मर चुके हैं। जो मर जाए वह खुदा नहीं होता। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की दोबारा आमद केवल इसीलिए होगी कि वे लोगों के ज़ुल्म और मारपीट की वजह से बेहोश हो गए थे, दूर से देखने वालों ने उनकी बेहोशी को मौत समझ लिया। वे ज़िन्दा थे जब गुफ़ा में उन्हें चादर लपेटकर रखा गया क्योंकि हज़रत यूनूस भी मछली के पेट में ज़िन्दा थे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने बताया था कि लोगों को मेरी सच्चाई के तौर पर ‘साइन आफ़ जोनाह‘ यानि कि हज़रत यूनुस का चिन्ह दिया जाएगा।
ये सारी बातें आपको धीरे-धीरे बताई जाएंगी। आप बिल्कुल ठीक जगह पर आ गए हैं। अब आप यहां से पीछा छुड़ाकर जाना भी चाहें तो आपको जाने नहीं दिया जाएगा। मैं बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हूं। मैं आपके आने से बहुत खुश हूं। बस आपसे एक विनती करना चाहूंगा कि आप कमेंट करने से पहले यह ज़रूर देख लिया कीजिए कि आपसे पूछा क्या जा रहा है ?
देखो समय क्या कह रहा है ?
जो समाज ईश्वर के नियमों को नहीं मानता और जीवन को खेल की तरह गुज़ारता है, धर्म की जगह संस्कृति और राष्ट्र को दे बैठता है उसके राष्ट्र में विदेशी आकर ‘मौज‘ करते हैं और
उसकी ‘मां‘ जैसी धरती पर ऐसी चीज़ें इतनी मात्रा में डाल देते हैं कि टॉयलेट भी अट जाते हैं। इस ज़िल्लत को न तो वे किसी से शेयर कर पाते हैं और न ही उन्हें इस ज़िल्लत से मुक्ति का कोई मार्ग ही नज़र आता है क्योंकि जो मार्ग होता है उसकी मज़ाक़ उड़ाना तो उनका मिशन होता है। समय उनकी मज़ाक़ उड़ाता है और वे फिर भी मालिक की शरण में नहीं आते।
अफ़सोस, हज़ार बार अफ़सोस।
1. जिस कुरआन को मानने की दावत आप मुसलमानों को दे रहे हैं, क्या आप उस कुरआन को खुद भी मानते हैं ?
2. मुसलमान आवागमन को नहीं मानते और सभी बच्चों को पैदायशी तौर पर मासूम मानते हैं, आप बच्चों को क्या मानते हैं, मुसलमानों की तरह मासूम या ‘मूल पाप‘ का बोझ ढोने वाला दोषी ?
3. जिस बाइबिल को आप मानते हैं उसमें रोमन कैथोलिक बाइबिल से कुल कितनी किताबें कम हैं ?
आपसे ज़्यादा सवाल नहीं करूंगा।
पहले आप इन सवालों के जवाब दीजिए। फिर मैं आपको कुरआन पढ़ाऊंगा और आपको आपकी ‘पेस्ट‘ की हुई आयतों के अनुवाद के बारे में सही-सही बताऊंगा। आपने सिर्फ़ अनुवाद ‘पेस्ट‘ कर दिया न उसे पढ़ा और न ही उसे समझा।
आपने खुद पेस्ट किया कि ‘3 : 52 अल्लाह के नजदीक ईसा अ0 का जन्म ऐसा ही है जैसा हजरत आदम का जन्म।'
क- जब कुरआन में साफ़ आया है कि ‘ईसा की मिसाल आदम जैसी है।‘ तो आप खुद सोच लीजिए कि जब आदम खुदा नहीं हैं तो उनकी मिसाल वाला आदमी कैसे खुदा हो जाएगा ?
ख- कुरआन में आया है कि जन्नत में वही आदमी जाएगा जिसने अपनी ख्वाहिशें खुदा के हुक्म के अधीन कर दी होंगी, खुदा के हुक्म का पालन किया होगा, खुद को खुदा के प्रति समर्पित कर दिया होगा। ऐसे ही आदमी को मुस्लिम कहा जाता है, मुसलमान शब्द फ़ारसी में मुस्लिम अर्थात समर्पित के लिए ही बोला जाता है।
आपने कह दिया कि सारे मुसलमान जहन्नम में जाएंगे, ऐसा कुरआन कहता है। आपने एक ऐसी बात कह दी जिसे आज तक पत्रक छापने और बांटने वाले हिन्दुओं में से भी किसी ने न कहा बल्कि उल्टे उन्हें यह शिकायत है कि मुसलमान अपने अलावा किसी को जन्नत में जाने का पात्र क्यों नहीं मानता ?
ग- आप मानते हैं कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम मर चुके हैं। जो मर जाए वह खुदा नहीं होता। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की दोबारा आमद केवल इसीलिए होगी कि वे लोगों के ज़ुल्म और मारपीट की वजह से बेहोश हो गए थे, दूर से देखने वालों ने उनकी बेहोशी को मौत समझ लिया। वे ज़िन्दा थे जब गुफ़ा में उन्हें चादर लपेटकर रखा गया क्योंकि हज़रत यूनूस भी मछली के पेट में ज़िन्दा थे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने बताया था कि लोगों को मेरी सच्चाई के तौर पर ‘साइन आफ़ जोनाह‘ यानि कि हज़रत यूनुस का चिन्ह दिया जाएगा।
ये सारी बातें आपको धीरे-धीरे बताई जाएंगी। आप बिल्कुल ठीक जगह पर आ गए हैं। अब आप यहां से पीछा छुड़ाकर जाना भी चाहें तो आपको जाने नहीं दिया जाएगा। मैं बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हूं। मैं आपके आने से बहुत खुश हूं। बस आपसे एक विनती करना चाहूंगा कि आप कमेंट करने से पहले यह ज़रूर देख लिया कीजिए कि आपसे पूछा क्या जा रहा है ?
देखो समय क्या कह रहा है ?
जो समाज ईश्वर के नियमों को नहीं मानता और जीवन को खेल की तरह गुज़ारता है, धर्म की जगह संस्कृति और राष्ट्र को दे बैठता है उसके राष्ट्र में विदेशी आकर ‘मौज‘ करते हैं और
उसकी ‘मां‘ जैसी धरती पर ऐसी चीज़ें इतनी मात्रा में डाल देते हैं कि टॉयलेट भी अट जाते हैं। इस ज़िल्लत को न तो वे किसी से शेयर कर पाते हैं और न ही उन्हें इस ज़िल्लत से मुक्ति का कोई मार्ग ही नज़र आता है क्योंकि जो मार्ग होता है उसकी मज़ाक़ उड़ाना तो उनका मिशन होता है। समय उनकी मज़ाक़ उड़ाता है और वे फिर भी मालिक की शरण में नहीं आते।
अफ़सोस, हज़ार बार अफ़सोस।
Monday, May 24, 2010
Mother ख़ाक जन्नत है इसके क़दमों की सोच फिर कितनी क़ीमती है मां ?

मां
ज़िन्दगी भर मगर हंसी है मां
दिल है ख़ुश्बू है रौशनी है मां
अपने बच्चों की ज़िन्दगी है मां
ख़ाक जन्नत है इसके क़दमों की
सोच फिर कितनी क़ीमती है मां
इसकी क़ीमत वही बताएगा
दोस्तो ! जिसकी मर गई है मां
रात आए तो ऐसा लगता है
चांद से जैसे झांकती है मां
सारे बच्चों से मां नहीं पलती
सारे बच्चों को पालती है मां
कौन अहसां तेरा उतारेगा
एक दिन तेरा एक सदी है मां
आओ ‘क़ासिम‘ मेरा क़लम चूमो
इन दिनों मेरी शायरी है मां
जनाब क़ासिम नक़वी साहब की पैदाइश ज़िला बुलन्दशहर के क़स्बा शिकारपुर से है । आपकी सुसराल मेरे पास के ज़िले ख़ास मुज़फ़्फ़रनगर में है और वे रहते अलीगढ़ में हैं । वे नौजवान हैं और उर्दू अदब की एक बेनज़ीर शख्सियत हैं । मैं एडिशनल एस पी साहब के आफ़िस में बैठा हुआ था कि वे आ गये और मुझे इन्वाइट करते हुए बोले कि 13 जून को उनकी बहन का निकाह है और मुझे आना है । खुद उनके निकाह में मैं बहुत दूर से मशक्क़त उठाकर पहुंचा था सो जाना तो अब भी लाज़िमी है क्योंकि वे फ़न ए शायरी में मेरे उस्ताद हैं । मैंने ‘मां‘ पर उनके अशआर सुने थे तब से ही उन्हें नोट कर लेना चाहता था और वह मौक़ा मालिक ने आज बख्शा था ।मां के ताल्लुक़ से उनके कुछ अशआर ‘रवासी अदब‘ के भी हैं जिन्हें मैं भाई ज़ीशान की ख़ातिर लिखना चाहता था लेकिन उन्होंने मना कर दिया और बोले कि इसे आम फ़हम ही रहने दो । तभी उन्हें किसी ने बुला लिया और वे एस.एस.पी. साहब को इन्वाइट करने के लिए चले गए ।
मैं किस ज़िले का रहने वाला हूं ?
और मेरी मुलाक़ात जनाब क़ासिम साहब से किस ज़िले के पुलिस मुख्यालय में हुई?
यह एक ऐसी पहेली है जिसे कोई अपरिचित कभी हल नहीं कर सकता । हां Man कर सकता है क्योंकि वह मुझसे मिल चुका है ।
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