सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Tuesday, October 1, 2013

क्या मनुस्मृति 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 52 हज़ार 9 सौ 76 वर्ष पुरानी है?

स्वयंभू मनु पहले मनुष्य हैं। सारी धरती पर बसने वाले मनुष्य उसी एक पिता की सन्तान हैं। उस पिता को मनु कहा जाता है। मनुष्य शब्द में मनु जी का नाम समाहित है। उनका नाम न आए तो मनुष्य अपनी पहचान भी न जान पाए। अंग्रज़ी में मनुष्य को मैन कहा जाता है। इसमें भी मनु के नाम के 3 अक्षर मौजूद हैं। हिब्रू और अरबी में उन्हें आदम कहा जाता है और उनकी औलाद को बनी आदम कहा जाता है। आदम नाम की धातु ‘आद्य’ संस्कृत में आज भी पाई जाती है। वास्तव में स्वयंभू मनु और आदम एक ही शख्सियत के दो नाम हैं।
संस्कृत में मनुस्मृति के नाम से उनकी शिक्षाओं का एक संकलन भी मिलता है लेकिन वास्तव में यह उनकी शिक्षाओं का संकलन नहीं है। यह जानने के लिए हमें इसके रचनाकाल पर विचार करना होगा।
स्वामी दयानन्द जी ने वेद की भांति मनुस्मृति को भी सृष्टि के आदि में हुआ माना है। सृष्टि के आदि विषय में स्वामी जी ने बताया है। जो कि ग़लत है।

¤ मनुस्मृति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ड्ढ पुराना मानना ग़लत है
‘यह मनुस्मृति जो सृष्टि के आदि में हुई है’ (सत्यार्थप्रकाश,एकादशसमुल्लास,पृ.187)

‘यह जो वर्त्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें (7) वैवस्त मनु का वर्त्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं। स्वायम्भव 1, स्वारोचिष 2, औत्तमि 3, तामस 4, रैवत 5, चाक्षुष 6, ये छः तो बीत गए हैं और सातवां वैवस्वत वर्त्त रहा है.’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17)

स्वामी जी ने बताया है कि एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगियां होती हैं। एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। सतयुग में 1728000 वर्ष, त्रेता में 1296000 वर्ष, द्वापर में 864000 वर्ष और कलियुग में 432000 वर्ष होते हैं। इन चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं। 71 चतुर्युगियों में कुल 306720000 वर्ष होते हैं। छः मन्वन्तर अर्थात 1840320000 वर्ष पूरे बीत चुके हैं और अब सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी चल रही है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लिखे जाते समय तक सातवें मन्वन्तर के भी 120532976 वर्ष बीत चुके थे। इस तरह स्वामी जी के अनुसार उस समय तक स्वयंभू मनु को हुए कुल 1960852976 वर्ष, एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष बीत चुके थे।
स्वामी जी ने जो काल स्वयंभू मनु का बताया है, उस समय धरती पर मानव सभ्यता नहीं पाई जाती थी। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। इसलिए मनु स्मृति को स्वयंभू मनु से जोड़ना ग़लत है। उसमें जो श्लोक मनु के नाम से कहे गए हैं, वास्तव में उन्हें किसी और ने उनके नाम से लिखा है। मनु स्मृति का स्वयंभू मनु से कोई संबंध ही नहीं है। यही कारण है कि मनु स्मृति से स्वयंभू मनु के धर्म का पता लगाना संभव नहीं है। पाठक उससे जिस वर्ण व्यवस्था का पता लगाएंगे, उसका पालन करना संभव नहीं है।
हालाँकि स्वामी दयानंद जी ने मनु स्मृति को प्रक्षिप्त मानकर उसके कुछ श्लोकों को नहीं माना है लेकिन उन्होंने उसके जिन श्लोकों को मनु का समझ लिया। वे भी प्रक्षिप्त हैं और बाक़ी का भी कुछ पता नहीं है कि उन्हें कब और किसने लिखा है?
इस सत्य को न जानने के कारण ही स्वामी जी ने मनु स्मृति की वर्ण व्यवस्था को धर्म समझ लिया और वह उसमें बताई गई ऊँचनीच और छूतछात के नियमों का कड़ाई से पालन करते रहे। इसी प्रक्षिप्त मनु स्मृति के आधार पर वह मानते हैं कि धर्म के अनुसार दासीपुत्र को मंत्री नहीं बनाया जा सकता। इन बातों को वह ऋषियों का धर्म बताते हैं। अन्याय की बात को धर्म बताकर वह लोगों को ऋषियों की और उनके धर्म की निंदा करने का अवसर देते हैं। यह बात वह क्यों न समझ पाए कि ये बातें मनु स्मृति में क्षेपक हैं?
इन बातों को हटा दिया जाए तो वैदिक धर्म और इसलाम में कोई मूलभूत अन्तर शेष नहीं रह जाता।

हमारा मक़सद स्वामी दयानन्द जी की ग़लती पकड़ना नहीं है बल्कि यह बताना है कि हम सबके आदि पिता के नाम से जो ग्रन्थ मशहूर है। उसमें उनके द्वारा कहे गए श्लोक नहीं हैं। उसमें कही गई बातों की ज़िम्मेदारी स्वयंभू मनु पर आयद नहीं होती।
दलित-वंचित बन्धु इस तथ्य पर दूसरों से ज़्यादा ध्यान देने की कृपा करें। अज्ञान के कारण अपने आदि पिता को अपमानजनक शब्द कहने से बचें और तलाश करें कि उनके नाम से मनुस्मृति किन लोगों ने किस काल में लिखी है?
सवर्ण भाईयों से विनती है कि वे हमारे इस प्रयास में हमारी मदद करें ताकि मनु का शुद्ध धर्म मानव जाति के सामने आ सके। उसी के पालन में हम सबका कल्याण और उद्धार है।
धर्म और अध्यात्म के नाम पर दुकानदारी और पाखण्ड अब ख़त्म होना ही चाहिए।
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इस पोस्ट पर विचार विमर्श देखने के लिए आप हमारा ब्लॉग ‘बुनियाद’ पर तशरीफ़ लाने की मेहरबानी करें।

5 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

कालीपद प्रसाद said...

आपके तर्क में दम है ,विचारनीय है. मनु यदि आदि पुरुष है तो उनका कोई धर्म नहीं रहा होगा l
नवीनतम पोस्ट मिट्टी का खिलौना !
नई पोस्ट साधू या शैतान

DR. ANWER JAMAL said...

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी! आपका आभार कि आपने माना ‘तर्क में दम’ है।
अथर्ववेद के 11वें कांड के 8वें सूक्त में स्वयंभू मनु की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया गया है कि उन्हें ब्रह्म से धर्म-अधर्म का ज्ञान भी प्राप्त हुआ था।
इसके लिए देखिए आप हमारी पोस्ट
देखिए मनु की उत्पत्ति और उनके विवाह का वर्णन, वेद में

Raj Mishra said...

Jamal anwar ji ..aap jo javab mil chuka hain aap ke kahne ka kya matlab hain duniya me manav ki utpati bus 7200 sal purani hain jaisa ki aap ka injil kah raha hain aadam k liye...

Raj Mishra said...

aap ne anwar jamal ji likha hain ki in tathyo ko hata de to koi mulbhut anter islam aur sanatan dharam me nahi rah jata rah jata hain anwar jamal ji ....bahut anter rah jata hain ...