सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Wednesday, March 10, 2010
वेदों में कहाँ आया है कि इन्द्र ने कृष्ण की गर्भवती स्त्रियों की हत्या की ? cruel murders in vedic era and after that
इसलाम का अर्थ है ‘ ‘शान्ति ‘ ,ईश्वर का आज्ञापालन , ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण । जो आदमी इस मौलिक गुण से युक्त हो वह मुसलिम कहलाता है ।
पवित्र हदीस के मुताबिक़ मुसलिम वह होता है जिसके ‘शर से अन्य लोग सुरक्षित हों ।
वर्ण व्यवस्था के अत्याचार से त्रस्त बहूत से लोगों ने राहत पाने के लिए हिन्दू संस्कृति का त्याग किया और जिसको जहां ख़ैरियत नज़र आयी वहीं चला गया । गोरखपुर के राजा ने भी जैन मत अपना लिया था क्योंकि वेदवादी पण्डों ने उससे यज्ञ कराया और यज्ञ के नाम पर उसकी रानी का सहवास घोड़े से करवा दिया । बेचारी कोमल रानी इतना बड़ा पुण्य झेल न सकी और मर गयी । राजा ने वैदिक धर्म को त्याग दिया । इस घटना को दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में बयान किया है ।
बहरहाल बहुत से कारणों से लोगों ने अन्य मत ग्रहण किये । इन्हीं लोगों में इसलाम ग्रहण करने वाले भी थे । यह भारत में भी हुआ और भारत से बाहर भी हुआ ।
इस तब्दीली के बावजूद प्रायः लोग न तो जात्याभिमान जैसे अपने पूर्व के कुसंस्कारों को त्याग सके और न ही वे ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के उस स्तर को पा सके जो कि इसलाम एक आदमी के लिए मुक़र्रर करता है ।
पूर्ण ‘शान्ति के लिए ‘शान्तिस्वरूप परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण दरकार है और अधिसंख्य मुसलमानों में इसका अभाव स्पष्ट है । पूर्ण समर्पण का यही अभाव मुसलिम दुनिया में सारे फ़साद की जड़ है । अन्यायपूर्वक किसी को सताना या उसकी जान ले लेना एक मुसलमान के लिए हराम है ।
ऐसे जुर्म के अपराधी को उस मालिक ने पवित्र कुरआन में लोक परलोक में भयानक दण्ड की चेतावनी दी है । ज़ुल्म इसलाम की प्रकृति के खि़लाफ़ है । यह हर काल में निन्दनीय रहा है और आज भी है ।
आपने मुसलमानों द्वारा नाइजीरिया में घटित कुकृत्य की निन्दा करने के लिए मुझे पुकारा है । मैं हाज़िर हूं और आपके साथ हूं ।
यदि यह घटना अपने प्रचार के अनुरूप ही घटी है और इसके ज़िम्मेदार वास्तव में मुसलिम हैं तो मैं इसकी निन्दा करता हूं । साथ ही कुछ अर्सा पहले पाकिस्तान में घटित इसी तरह की घटना की भी मैं निन्दा करता हूं ।
इसी के साथ मैं भारत में आये दिन होने वाली उन घटनाओं की भी निन्दा करता हूं जिनमें कभी तो वर्णवादी हिन्दू ग्राहम स्टेंस को उसके बच्चों के साथ ज़िन्दा जला देते हैं और कहीं ये लोग ईसाई नन्स को अपनी हवस का निशाना बनाते रहते हैं।
ज़ुल्म करने वाले हरेक आदमी की चाहे वह वर्णवादी हो या मुसलमान , मैं निन्दा करता हूं । न केवल वर्तमान काल के ज़ालिमों की निन्दा करता हूं बल्कि पूर्व में गुज़र चुके अत्याचारियों की भी निन्दा करता हूं । चाहे वह कितना ही बड़ा बादशाह या सम्राट ही क्यों न रहा हो ?
हक़ीक़त राय को सज़ा ए मौत देने वाले क़ाज़ी की मैं निन्दा करता हूं और श्री रामचन्द्र जी द्वारा ‘शूद्र ‘शम्बूक की हत्या के प्रकरण की सत्यता को ही नकारता हूं परन्तु जो उसे सत्य घटना मानते हैं उनसे इस जघन्य और निर्मम हत्याकांड की निन्दा का अनूरोध करता हूं ।
अमेरिका के दो टॉवर्स पर हमला करके निर्दोष नागरिकों की जान लेने वालोंकी मैं निन्दा करता हूं और राजा रावण की दुश्मनी के बदले में श्री हनुमान जी द्वारा लंकावासी करोड़ों मासूम ‘शहरियों को जीवित जला देने की घटना को सच मानने से ही इनकार करता हूं परन्तु जो लोग लंका दहन को सच मानते हैं उनसे मैं इस घटना की निन्दा का अनुरोध करता हूं । किस तरह औरतें अपनी छाती से अपने मासूम बच्चे चिपका कर उस आग में जलीं ? रामायण में स्पष्ट लिखा है ।
परशुराम द्वारा अकारण अपनी मां रेणुका को और तत्पश्चात करोड़ों क्षत्रियों को मार डालने की बात को मैं विश्वसनीय नहीं मानता लेकिन जो लोग इन बातों को सच मानते हैं उनपर इनकी निन्दा वाजिब है ।
अकारण हुए महाभारत के युद्ध में मरने वाले एक अरब छियासठ करोड़ मृतकों के प्रति कौन ‘शोक व्यक्त करेगा ?
उनकी विधवाओं और उनके अनाथ बच्चों की दुदर्शा का ज़िम्मेदार किसे माना जाएगा ?
लेकिन हिंसा का इतिहास तो और भी ज़्यादा पुराना है । पवित्र कुरआन में युद्ध के नियमों में हिंसा तलाशने वाले संकीर्णवृत्ति लोगों के ज्ञानवर्धन के लिए वेद से कुछ अंश उद्धृत हैं -
कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना
अर्थात इंद्र ने ऋजिश्वा राजा के साथ मिलकर कृष्ण नाम के असुर की गर्भवती स्त्रियों को मारा था। { ऋगवेद 1/101/1 }
यो वर्चिनः शतमिंद्रः सहस्रमपावपद्
अर्थात इंद्र ने वर्ची के सौ हज़ार पुत्रों को भूमि पर सुला दिया अर्थात मार दिया । { ऋगवेद 2/14/6 }
मुसलिम ‘शासकों द्वारा किये गये अपेक्षाकृत न्यून रक्तपात को लेकर आये दिन इसलाम और मुसलमानों के प्रति अपनी दुर्भावना प्रकट करने वाले अपने खू़नी इतिहास पर ‘शर्मिन्दा होना आख़िर कब सीखेंगे ?
आदरणीय चिपलूनकर जी ,यहां आकर पुकार लगाने से पहले क़त्ल आतंकवाद और लुचाप्पन के आरोपों में गिरफ़तार ‘शंकराचार्य पुरोहित साध्वी बापू और बाबाओं की निन्दा में आज तक आपने कुल कितनी पोस्ट क्रिएट कीं ?
आपने हमें जिस आशा के साथ पुकारा था हमने उसे पूरा करने की हद भर कोशिश की है ।
हम भी आपसे उपरोक्त वर्णित घटनाओं की निन्दा की आशा करते हैं। आपके द्वारा उठाये गये अनपेक्षित प्रसंग के पटाक्षेप के बाद मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि आपने श्री रामचन्द्र जी और सीता माता के गौरव को क्षति पहुंचाने वाले उस मुख्य मुद्दे का कोई निराकरण करना क्यों उचित नहीं समझा जोकि प्रस्तुत पोस्ट का मुख्य विषय है ?
क्या इसे आपके द्वारा विषयान्तर करके ध्यान बंटाने की तकनीक का इस्तेमाल माना जाये जो कि आदमी निरूत्तर और लाचार होने की दशा में करता है ?या फिर यह माना जाए कि आपको न तो उन दोनों के मान सम्मान की कोई परवाह है और न ही इसके निराकरण के किसी उपाय का ही ज्ञान है ?आखि़र आपका यह तथाकथित राष्ट्रवाद है किस काम का ?
कम से कम आप मेरी तरह रामायण के ऐसे असुविधाजनक प्रसंगों की सत्यता को तो नकार ही सकते थे । लेकिन आपने यह भी नहीं किया ।
चलिए मान लेते हैं कि आपको तथाकथित राष्ट्रवाद के प्रचार के चक्कर में पड़कर अपने धर्म के मर्म को समझने अवसर नहीं मिला लेकिन दूसरों ने अपने होंठ क्यों सी लिए ?आख़िर मुसलमान से इतनी नफ़रत क्यों ? कि अगर वह भारत की अस्मिता के प्रतीक श्री रामचन्द्र जी के गौरव की लड़ाई लड़े तब भी उसका साथ देनेकोई न आए ?आख़िर वो लोग कहां सो गये जो चिपलूनकर जी की पोस्ट पर उन्हें उनकी निष्पक्षता की बधाई देने के लिए तांता लगाए खड़े थे ?उनमें से कोई हमें बधाई देने आखि़र क्यों नहीं आया ?
अब भी आप इस पोस्ट को पढ़कर ‘शायद चुपचाप सरक जाएं लेकिन मालिक आपको देख रहा है । एक दिन आप उसके सामने होंगे और अपने कर्मों का हिसाब उसे दे रहे होंगे । तब सत्य को नज़रअन्दाज़ करने की आप क्या जायज़ वजह उसे बताएंगे यह आप आज सोच लीजिए ।अपने लिए और आप सभी के लिए प्रभु से आशीष की कामना करता हूं ।
अग्ने नय सुपथा राय अस्मान । { वेद }
पवित्र हदीस के मुताबिक़ मुसलिम वह होता है जिसके ‘शर से अन्य लोग सुरक्षित हों ।
वर्ण व्यवस्था के अत्याचार से त्रस्त बहूत से लोगों ने राहत पाने के लिए हिन्दू संस्कृति का त्याग किया और जिसको जहां ख़ैरियत नज़र आयी वहीं चला गया । गोरखपुर के राजा ने भी जैन मत अपना लिया था क्योंकि वेदवादी पण्डों ने उससे यज्ञ कराया और यज्ञ के नाम पर उसकी रानी का सहवास घोड़े से करवा दिया । बेचारी कोमल रानी इतना बड़ा पुण्य झेल न सकी और मर गयी । राजा ने वैदिक धर्म को त्याग दिया । इस घटना को दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में बयान किया है ।
बहरहाल बहुत से कारणों से लोगों ने अन्य मत ग्रहण किये । इन्हीं लोगों में इसलाम ग्रहण करने वाले भी थे । यह भारत में भी हुआ और भारत से बाहर भी हुआ ।
इस तब्दीली के बावजूद प्रायः लोग न तो जात्याभिमान जैसे अपने पूर्व के कुसंस्कारों को त्याग सके और न ही वे ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के उस स्तर को पा सके जो कि इसलाम एक आदमी के लिए मुक़र्रर करता है ।
पूर्ण ‘शान्ति के लिए ‘शान्तिस्वरूप परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण दरकार है और अधिसंख्य मुसलमानों में इसका अभाव स्पष्ट है । पूर्ण समर्पण का यही अभाव मुसलिम दुनिया में सारे फ़साद की जड़ है । अन्यायपूर्वक किसी को सताना या उसकी जान ले लेना एक मुसलमान के लिए हराम है ।
ऐसे जुर्म के अपराधी को उस मालिक ने पवित्र कुरआन में लोक परलोक में भयानक दण्ड की चेतावनी दी है । ज़ुल्म इसलाम की प्रकृति के खि़लाफ़ है । यह हर काल में निन्दनीय रहा है और आज भी है ।
आपने मुसलमानों द्वारा नाइजीरिया में घटित कुकृत्य की निन्दा करने के लिए मुझे पुकारा है । मैं हाज़िर हूं और आपके साथ हूं ।
यदि यह घटना अपने प्रचार के अनुरूप ही घटी है और इसके ज़िम्मेदार वास्तव में मुसलिम हैं तो मैं इसकी निन्दा करता हूं । साथ ही कुछ अर्सा पहले पाकिस्तान में घटित इसी तरह की घटना की भी मैं निन्दा करता हूं ।
इसी के साथ मैं भारत में आये दिन होने वाली उन घटनाओं की भी निन्दा करता हूं जिनमें कभी तो वर्णवादी हिन्दू ग्राहम स्टेंस को उसके बच्चों के साथ ज़िन्दा जला देते हैं और कहीं ये लोग ईसाई नन्स को अपनी हवस का निशाना बनाते रहते हैं।
ज़ुल्म करने वाले हरेक आदमी की चाहे वह वर्णवादी हो या मुसलमान , मैं निन्दा करता हूं । न केवल वर्तमान काल के ज़ालिमों की निन्दा करता हूं बल्कि पूर्व में गुज़र चुके अत्याचारियों की भी निन्दा करता हूं । चाहे वह कितना ही बड़ा बादशाह या सम्राट ही क्यों न रहा हो ?
हक़ीक़त राय को सज़ा ए मौत देने वाले क़ाज़ी की मैं निन्दा करता हूं और श्री रामचन्द्र जी द्वारा ‘शूद्र ‘शम्बूक की हत्या के प्रकरण की सत्यता को ही नकारता हूं परन्तु जो उसे सत्य घटना मानते हैं उनसे इस जघन्य और निर्मम हत्याकांड की निन्दा का अनूरोध करता हूं ।
अमेरिका के दो टॉवर्स पर हमला करके निर्दोष नागरिकों की जान लेने वालोंकी मैं निन्दा करता हूं और राजा रावण की दुश्मनी के बदले में श्री हनुमान जी द्वारा लंकावासी करोड़ों मासूम ‘शहरियों को जीवित जला देने की घटना को सच मानने से ही इनकार करता हूं परन्तु जो लोग लंका दहन को सच मानते हैं उनसे मैं इस घटना की निन्दा का अनुरोध करता हूं । किस तरह औरतें अपनी छाती से अपने मासूम बच्चे चिपका कर उस आग में जलीं ? रामायण में स्पष्ट लिखा है ।
परशुराम द्वारा अकारण अपनी मां रेणुका को और तत्पश्चात करोड़ों क्षत्रियों को मार डालने की बात को मैं विश्वसनीय नहीं मानता लेकिन जो लोग इन बातों को सच मानते हैं उनपर इनकी निन्दा वाजिब है ।
अकारण हुए महाभारत के युद्ध में मरने वाले एक अरब छियासठ करोड़ मृतकों के प्रति कौन ‘शोक व्यक्त करेगा ?
उनकी विधवाओं और उनके अनाथ बच्चों की दुदर्शा का ज़िम्मेदार किसे माना जाएगा ?
लेकिन हिंसा का इतिहास तो और भी ज़्यादा पुराना है । पवित्र कुरआन में युद्ध के नियमों में हिंसा तलाशने वाले संकीर्णवृत्ति लोगों के ज्ञानवर्धन के लिए वेद से कुछ अंश उद्धृत हैं -
कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना
अर्थात इंद्र ने ऋजिश्वा राजा के साथ मिलकर कृष्ण नाम के असुर की गर्भवती स्त्रियों को मारा था। { ऋगवेद 1/101/1 }
यो वर्चिनः शतमिंद्रः सहस्रमपावपद्
अर्थात इंद्र ने वर्ची के सौ हज़ार पुत्रों को भूमि पर सुला दिया अर्थात मार दिया । { ऋगवेद 2/14/6 }
मुसलिम ‘शासकों द्वारा किये गये अपेक्षाकृत न्यून रक्तपात को लेकर आये दिन इसलाम और मुसलमानों के प्रति अपनी दुर्भावना प्रकट करने वाले अपने खू़नी इतिहास पर ‘शर्मिन्दा होना आख़िर कब सीखेंगे ?
आदरणीय चिपलूनकर जी ,यहां आकर पुकार लगाने से पहले क़त्ल आतंकवाद और लुचाप्पन के आरोपों में गिरफ़तार ‘शंकराचार्य पुरोहित साध्वी बापू और बाबाओं की निन्दा में आज तक आपने कुल कितनी पोस्ट क्रिएट कीं ?
आपने हमें जिस आशा के साथ पुकारा था हमने उसे पूरा करने की हद भर कोशिश की है ।
हम भी आपसे उपरोक्त वर्णित घटनाओं की निन्दा की आशा करते हैं। आपके द्वारा उठाये गये अनपेक्षित प्रसंग के पटाक्षेप के बाद मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि आपने श्री रामचन्द्र जी और सीता माता के गौरव को क्षति पहुंचाने वाले उस मुख्य मुद्दे का कोई निराकरण करना क्यों उचित नहीं समझा जोकि प्रस्तुत पोस्ट का मुख्य विषय है ?
क्या इसे आपके द्वारा विषयान्तर करके ध्यान बंटाने की तकनीक का इस्तेमाल माना जाये जो कि आदमी निरूत्तर और लाचार होने की दशा में करता है ?या फिर यह माना जाए कि आपको न तो उन दोनों के मान सम्मान की कोई परवाह है और न ही इसके निराकरण के किसी उपाय का ही ज्ञान है ?आखि़र आपका यह तथाकथित राष्ट्रवाद है किस काम का ?
कम से कम आप मेरी तरह रामायण के ऐसे असुविधाजनक प्रसंगों की सत्यता को तो नकार ही सकते थे । लेकिन आपने यह भी नहीं किया ।
चलिए मान लेते हैं कि आपको तथाकथित राष्ट्रवाद के प्रचार के चक्कर में पड़कर अपने धर्म के मर्म को समझने अवसर नहीं मिला लेकिन दूसरों ने अपने होंठ क्यों सी लिए ?आख़िर मुसलमान से इतनी नफ़रत क्यों ? कि अगर वह भारत की अस्मिता के प्रतीक श्री रामचन्द्र जी के गौरव की लड़ाई लड़े तब भी उसका साथ देनेकोई न आए ?आख़िर वो लोग कहां सो गये जो चिपलूनकर जी की पोस्ट पर उन्हें उनकी निष्पक्षता की बधाई देने के लिए तांता लगाए खड़े थे ?उनमें से कोई हमें बधाई देने आखि़र क्यों नहीं आया ?
अब भी आप इस पोस्ट को पढ़कर ‘शायद चुपचाप सरक जाएं लेकिन मालिक आपको देख रहा है । एक दिन आप उसके सामने होंगे और अपने कर्मों का हिसाब उसे दे रहे होंगे । तब सत्य को नज़रअन्दाज़ करने की आप क्या जायज़ वजह उसे बताएंगे यह आप आज सोच लीजिए ।अपने लिए और आप सभी के लिए प्रभु से आशीष की कामना करता हूं ।
अग्ने नय सुपथा राय अस्मान । { वेद }
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