सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Friday, May 21, 2010
No Problem दुख इनसान को इतना दुखी नहीं करता जितना कि उसे कुबूल न कर पाना ।
दुनिया की हर चीज़ की रचना जोड़े में की गई है ।हर ऐब से पाक है अल्लाह , जिसने सभी चीज़ों को जोड़े में पैदा किया। -पवित्र कुरआन,यासीन,36
सुख का जोड़ा दुख है । जो लोग केवल सुख के अभिलाषी हैं , वास्तव में वे एक ऐसी चीज़ चाहते हैं जो इस दुनिया में आज तक न तो किसी को मिली है और न ही मिल पाएगी । इस दुनिया में अगर आप सुख चाहते हैं तो आपको दुख भी स्वीकार करना होगा । आप स्वीकार न करें तब भी दुख तो आपको पहुंचकर रहेगा लेकिन उसे स्वीकारने का फ़ायदा यह होगा कि अब वह आपको कष्ट नहीं देगा । दुख इनसान को इतना दुखी नहीं करता जितना कि उसे कुबूल न कर पाना ।
आपको परमेश्वर का यह नियम जानना भी होगा और मानना भी कि उसने सुख के साथ दुख को भी आपके भले के लिए अनिवार्य कर दिया है ।किसी भी चीज़ की पहचान इनसान तभी कर पाता है जबकि वह उसके विपरीत का भी अनुभव रखता हो ।मिलन के सुख को वही प्रेमी जान सकता है जिसने विरह की पीड़ा को भोगा हो । मां होने का सुख वही औरत पाती है जिसने प्रसव की वेदना को सहा हो । कुछ बनने के लिए मेहनत और संघर्ष इस दुनिया का अनिवार्य नियम है । आदमी बाप भी होता है और किसी का बेटा भी । बाप का फ़र्ज़ औलाद की हिफ़ाज़त, परवरिश और बेहतर तालीम है और औलाद का फ़र्ज़ यह है कि वह अपने बाप का आदर करे और उसके आदेश का पालन करते हुए उसकी बेहतरीन परम्पराओं को बाक़ी रखे । दोनों ही हालत में आदमी के लिए सख्त मेहनत के सिवाय चारा नहीं है ।
बाप और औलाद की गवाही ले लो । बेशक इनसान को पैदा करके हमने उसे मेहनत और उलझन में डाला है । -पवित्र कुरआन,बलद,3 व 4
मानव सभ्यता के ये दो बुनियादी किरदार हैं बाप और औलाद । यह तक बनने के लिए इनसान को मेहनत किये बग़ैर चारा नहीं है । मेहनत करना ही दुख उठाना है लेकिन जब इनसान के सामने मक़सद साफ़ होता है तो फिर उस मक़सद को पाने की लगन उसके लिए न सिर्फ़ वह कष्ट सहना आसान हो जाता है बल्कि उसे उसमें सुख और आनन्द का अनुभव होने लगता है । मानवीय सभ्यता को बाक़ी रखने के लिए नस्ल चलाना ज़रूरी है । जब लोगों के औलाद होगी तो इनसानी पैदाइश के हर संभव रूप प्रकट होना लाज़िमी है । वे रूप भी हमारी गोद में खेलेंगे जो बहुतों की समस्याओं का समाधान करेंगे और वे रूप भी हमारे साथ रहेंगे जो खुद एक समस्या होंगे । अगर हम एक का स्वागत खुशी खुशी करते हैं तो हमें दूसरे रूप को भी स्वीकार करना होगा क्योंकि यही इस दुनिया का क़ायदा और मालिक का विधान है । अगर हम इसमें तरमीम करके अपाहिज भ्रूणों को मां के पेट में ही मारने के रास्ते पर चल पड़ेंगे तो फिर अपाहिजों और निरूपयोगी बूढ़ों के लिए ज़रूरी रहमदिली का लोगों में नितान्त अभाव हो जाएगा और तब इनसान एक बेरहम व्यापारी तो बन जाएगा लेकिन इनसान नहीं रह पाएगा ।
हम क्या बनना चाहते हैं ?
यह हमें तय करना है । जो आप बनेंगे वही चेतना आपकी औलाद में भी ट्रांसफ़र होगी । आपका फ़ैसला व्यापक प्रभाव रखता है और मानवता को सदा प्रभावित करता रहेगा । आइये प्रभु के सुख-दुख के विधान को स्वीकार कीजिए ताकि दुख आपको भविष्य के सुख का साधन प्रतीत होने लगे । आपकी सही सोच दुख के प्रभाव को बदलने में सक्षम है । पवित्र कुरआन यही सिखाता है ।
वेदज्ञ साहिबान भी बताएं कि वेद मनुष्य की बेहतरी के लिए क्या बताते हैं ?
और अपाहिज भ्रूण के विषय में वह क्या उपाय सुझाता है ?
Thursday, March 18, 2010
किस अनुवाद में लिखा है कि अल्लाह का अर्थ मनमोहन है ? The opening surah of Holy Quran
यहां ब्लॉग लिखा जा रहा है ,कोई महाभारत का युद्ध नहीं लड़ा जा रहा है ।
कल हमारे प्रिय भाई आदरणीय श्री तारकेश्वर गिरी जी ने एक ऐतिहासिक ब्लॉग लिखा । ऐतिहासिक भी वह कई वजह से कहलाने का हक़दार है ।प्रमुख वजह तो यह बनी कि मेरे मनभावन ब्लॉगावतार श्री श्री सारथि जी महाराज ने मेरे हृदय परिवर्तन की भविष्यवाणी कर दी और उनकी भविष्यवाणी कभी मिथ्या नहीं होती ।
सो अचानक आज जब सुबह सोकर उठा तो खु़द को धान के देश में बिल्कुल विचार शून्य पाया । तब मेरे निर्मल मन में जो विचार उठे , आज आपको अर्पित करता हूं ।
प्रेम की धरती ज्ञान के फूल
सत्य के बिना मनुष्य को सफलता नहीं मिल सकती ।
सत्य क्या है , इसका फैसला करना इनसान के लिए हमेशा से ही एक बड़ा मुश्किल काम रहा है । इसके पीछे कई कारण हैं । जिनमें से एक है इनसान का अपनी भाषा संस्कृति के प्रति स्वाभाविक लगाव ।
ईश्वर सत्य है । उसने अपनी कल्पना शक्ति से सृष्टि की रचना की । हर चीज़ उसकी कारीगरी का बेहतरीन नमूना है । हरेक चीज़ आज़ाद भी है और दूसरी सभी चीज़ों के साथ जुड़ी हुई भी है । इन सभी चीज़ों से इनसान रात दिन नफ़ा उठा रहा है । इनसान ख़ुद भी उस मालिक की एक बेहतरीन रचना है ।
ईश्वर मौजूद है । इसका पता इनसान को खुद अपने वजूद से ही चल सकता है ।
बस शर्त यह है कि वह संजीदगी से ग़ौर करे ।
हर चीज़ बामक़सद है । इनसान के हरेक अंग का एक मक़सद है जिसे उसका वह अंग पूरा करता है । यहां तक कि एक बाल भी बेवजह नहीं है । हरेक बाल तक अपना मक़सद पूरा कर रहा है ।इनसान के जीवन का भी एक मक़सद है । उसी मक़सद के लिए वह इस धरती पर पैदा होता है , एक निश्चित अवधि तक वह यहां रहता बसता है और फिर यहां से चला जाता है ।
वह यहां किस मक़सद को पूरा करने के लिए आता है ?
वह कहां से आता है ?
फिर कहां चला जाता है ?
उसके लिए क्या करना सही है और क्या करना ग़लत है ?
किस काम का क्या परिणाम होता है?
क्या मृत्यु के बाद भी जीवन है ?
इस तरह के बहुत से सवाल इनसान के मन में उठते हैं । ये महज़ कोई दार्शनिक प्रकृति के सवाल नहीं हैं बल्कि ये इनसान की फ़ितरत में शामिल हैं ।
इनसान की सच्ची मंज़िल क्या है ?
और उसे पाने का सीधा सच्चा मार्ग क्या है ?
यह वह सबसे बड़ा सवाल है , जिसके हरेक भाषा में इनसान ने अपने मालिक से सदा ही प्रार्थना की है । परमेश्वर ने अपने निज ज्ञान अर्थात वेद के अवतरण का समापन पवित्र कुरआन के रूप में किया । उसका आरम्भ भी उसने मनुष्य की इसी सबसे बड़ी और फ़ितरी ज़रूरत को दुआ का रूप देकर किया । उसने सबसे पहले मनुष्य को दुआ की तालीम देकर बताया कि
आप जो चाहें पा सकते हैं
लेकिन पहले आपको अपनी अनिश्चय की स्थिति से निकलना होगा ।
सबसे पहले आपको निश्चय करना होगा कि आपको पाना क्या है ?
संकल्प और प्रयास का मरहला तो बाद का है ।
ईश्वर को सारी मानवता से प्यार है । उसने बहुत सी भाषाओं में अपनी वाणियां अवतरित करके मानवता को शिक्षित किया । उन ग्रन्थों के आलिम विद्वानों ने उनका अनुवाद करके उन्हें उन लोगों के लिए भी समझना आसान कर दिया जो उसकी मूल भाषा नहीं जानते । अनुवाद करते समय भी विद्वानों ने अलग अलग वर्ग की ज़रूरतों को सामने रखा । पवित्र कुरआन का अनुवाद भी बहुत से विद्वानों ने किया है ।
बाज़ार में सबसे ज़्यादा बिकने वाले अनुवादों में से एक अनुवाद श्री नन्द कुमार अवस्थी जी का भी है । इस वक्त मेरे सामने हज़रत मौलाना फ़ज़्लुर्रहमान गंज मुरादाबादी साहब रहमतुल्लाह अलैहि ( जन्म 1208 हिजरी - मृत्यु 1313 हिजरी ) का अनुवाद मौजूद है ।
यह एक बहुत पुरानी किताब है जिसे मैं काफ़ी कोशिश के बाद पाने में कामयाब हो सका । मौलाना को इसलामी जगत में बहुत ऊँचा मक़ाम हासिल है । उनके इस अनुवाद की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह पूरब की भाषा में है और इसमें वैदिक साहित्य की पारिभाषिक शब्दावली का बेतक्रल्लुफ़ प्रयोग किया गया है । आदमी पढ़ते वक्त बिल्कुल यह महसूस नहीं करता कि वह जो पढ़ रहा है , वह अरबी का अनुवाद है ।
पवित्र कुरआन की पहली सूराः का अनुवाद पढ़कर आप भी इसकी मिठास का अन्दाज़ा बख़ूबी लगा सकते हैं ।
अलफ़ातिहा
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम पहले ही पहल नाम लेता हूं मनमोहन का जो बड़ी मयामोह का महर वाला है ।
1- अलहम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन
सब सराहत मनमोहन को है जो सारे संसार का पालनहारा बड़ी मायामोह का महरवाला है ।
2- मालिकि यौमिद्दीन
जिसके बस में चुकौती का दिन है ।
3- इय्याका ना बुदु व इय्याका नस्तईन
हम तेरा ही आसरा चाहते हैं और तुझी को पूजते हैं ।
4- इहदि नस्सिरातल मुस्तक़ीम
चला हमको सीधी राह डगमग नहीं ।
5- सिरातल् लज़ीना अनअमता अलैइहिम
उन लोगों की जिन पर तेरी दया हुई
6,7- ग़इरिल मग़ज़ूबि अलैइहिम वलज़्ज़ाल्लीन
न उनकी जिन पर तेरी झुंझलाहट हुई और न राह कुराहों की और न खोये हुओं की और न राह भटके हुओं की ।
इसमें नाम अल्लाह का अनुवाद मनमोहन किया गया है और अनुवाद का नाम भी ‘मनमोहन की बातें‘ रखा गया है । लोगों के दिलों को जोड़ने के लिए सभी मतों के बहुत से विद्वान हमेशा से जुटे हुए हैं । प्रस्तुत अनुवाद भी उसी की एक कड़ी है ।
इस ब्लॉग को बनाने का मक़सद भी यही है लेकिन कुछ लोगों ने आकर नुक्ताचीनी करना और अपनी योग्यता दर्शाना आरम्भ कर दिया और बात दूसरी ही दिशा में मुड़ गयी ।
अब अगर आप चाहते हैं बात दोबारा उस दिशा में न जाने पाये तो कृपया मेरा सहयोग करें और शेख़ी बघारने वाले तत्वों को हतोत्साहित करें ।मुझे आपका प्यार और सहयोग आज भी दरकार है ।
क्या मैं आपसे उम्मीद करूं कि मुझे आपका प्यार और सहयोग सदा मिलेगा ?
मैं अपनी विदुषी बहनों से भी कहूंगा कि वे निःसंकोच आकर मेरी पोस्ट पढ़ें । इन्शा अल्लाह अब उनकी फ़ीलिंग्स हर्ट नहीं होंगी ।
मैंने तो अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर दी लेकिन अब आपकी आरम्भ हो जाती है ।
क्या आप अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने और सहयोग देने के लिए तैयार हैं ?
पिछली पोस्ट पर कुछ प्रश्न उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं । उनका क्या जवाब दिया जाए?
आदरणीय तारकेश्वर जी , जनाब सतीश सक्सेना साहब , रचना मैडम , ज्योत्स्ना दीदी और अन्य सभी बन्धुओं व विदुषी देवियों आप सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन करें ।
क्योंकि अगर मैं जवाब देता हूं तो आप लोगों की फ़ीलिंग्स हर्ट होंगी और अगर नहीं देता हूं तो मेरी होंगी ।
अब बताइये दुर्बोधग्रस्त लोगों के सवालों का जवाब किस प्रकार दिया जाए ?
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