सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Wednesday, May 26, 2010
Vibha Rani said- जो सनातन धर्म के नाम पर बेटी की इच्छा का अनादर करते हैं.मुझे ऐसे मां बाप और ऐसी पूजा इबादत से सख्त ऐतराज़ है.
दयालु पालनहार कहता है -‘और अगर वे दोनों तुझपर ज़ोर डालें कि तू मेरे साथ ऐसी चीज़ को शरीक ठहराए जो तुझको मालूम नहीं तो उनकी बात न मानना, और दुनिया में उनके साथ नेक बर्ताव करना और तुम उस शख्स के रास्ते की पैरवी करना जिसने मेरी तरफ़ रूजू किया है, फिर तुम सबको मेरे पास आना है, फिर मैं तुमको बता दूंगा जो कुछ तुम करते रहे। -सूरह ए लुक़मान,15
मां-बाप का फ़र्ज़ औलाद की सही परवरिश करना है, उसे सही-ग़लत की तमीज़ सिखाना है ताकि वह सही रास्ते पर चले और अपना, अपने परिवार का और समाज का भला कर सके, लेकिन अगर मां-बाप सही-ग़लत का भेद ठीक से न समझते हों और वे अपनी औलाद को भी पूर्वजों की परम्परा के नाम पर ग़लत शिक्षा दें तो औलाद को चाहिये कि उनकी ग़लत बात को न माने और उस आदमी का अनुसरण करें जिसे सही-ग़लत का सच्चा बोध हो और वह एक परमेश्वर के प्रति पूरी निष्ठा के साथ समर्पित हो। मान्यताओं के अन्तर के बावजूद औलाद पर अपने मां-बाप के साथ ‘नेक बर्ताव‘ करना अनिवार्य है। आखि़रकार हरेक आदमी को लौटकर अपने मालिक के पास ही जाना है और तब हरेक जान लेगा कि जगत का सच्चा शासक केवल एक परमेश्वर है और कोई भी उसके वुजूद या उसके किसी भी गुण में न तो साझीदार है और न ही सहायक।
जगत भी उसका है और उसी की योजना और आदेश इसमें क्रियान्वित है। जो भी अपने जीवन को उसकी योजना के अनुसार गुज़ारेगा वह खुद को सदा के नर्क से बचा लेगा और जो शक में रहेगा तो वह समय भी आएगा जब वह खुद को नर्क की धधकती आग में पाएगा। तब वह जान लेगा कि जिस नर्क को वह जीवन भर झूठ या अलंकार समझता रहा था वह सचमुच मौजूद है।जो लोग में नर्क में जलने-बसने के पात्र हैं उनकी हद से बढ़ी हिर्स ओ हवस ने इस दुनिया में भी तरह तरह की आग भड़काकर इसे भी नर्क का नमूना बनाकर रख दिया है। ग्लोबल वॉर्मिंग मानवता के इन्हीं दुश्मनों की देन है। दूसरों का हक़ हराम तरीक़े से डकारने वाले इन झूठों के फ़रेब को पहचानना भी कल्याण की अनिवार्य शर्त है।बेहतर बात बताना मां-बाप के फ़र्ज़ में दाखि़ल है लेकिन अगर की सत्य और न्याय की बेहतर समझ रखती है तो फिर अपने मां-बाप को सही बात बताना उनकी ज़िम्मेदारी है।
क्या आप जानते हैं कि वह कौन सा मूल सत्य है जिस पर सारी सच्चाईयों का दारोमदार है ?
ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की पवित्र वाणी में देखिए-
एक धर्मशास्त्री आया। उसने उन्हें वाद-विवाद करते सुना। उसने देखा कि यीशु ने उन्हें अच्छा उत्तर दिया है। उसने यीशु से पूछा, ‘‘सब से महत्वपूर्ण आज्ञा कौन सी है? ‘‘यीशु ने उत्तर दिया, ‘‘सब आज्ञाओं में से यह मुख्य हैः ‘हे इस्राएल सुन, हमारा प्रभु परमेश्वर एक ही प्रभु है। तू अपनी सारी शक्ति से प्रेम करना।‘ और दूसरी यह है, ‘तू अपने पड़ौसी से अपने समान प्रेम करना।‘ इससे बड़ी और कोई आज्ञा नहीं है।‘‘ -नया नियम, मरकुस, 12 : 28-31
बेशक मां-बाप अपने बच्चों की भलाई चाहते हैं, मगर जब मां-बाप अपने झूठेपवित्र कुरआन अपने पाठकों से खुद बात करता है और उन्हें उनकी समस्याओं का सच्चा और स्थायी समाधान देता है, जैसा कि आपने देखा कि बहन विभा के मन में सूरह ए लुक़मान की 14वीं आयत को पढ़ते समय जो प्रश्न पैदा हुआ उसका उत्तर ठीक वहीं यानि 15वीं आयत में मौजूद है।
मान-प्रतिष्ठा को अपना ज़ाती सवाल बता कर बच्चों की इच्छाओं को ताक पर रखने लग जाएं,
तब ऐसे मां बाप के इन विचारों का विरोध होना ही चाहिये. ताज़ातरीन उदाहरण निरुपमा
पाठक का है, जो सनातन धर्म के नाम पर बेटी की इच्छा का अनादर करते हैं. निरुपमा की
मौत को हम अगर मां बाप की पूजा के बर अक्स रखें तो माफ करें, मुझे ऐसे मां बाप और
ऐसी पूजा इबादत से सख्त ऐतराज़ है.
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