सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Thursday, April 15, 2010
आप जिस सहानुभूति से वेदों पुराणों और स्मृतियों को समझने का प्रयास करते हैं , पवित्र कुरआन को भी ऐसे सम्मानपूर्वक समझने का प्रयास कीजिये । The solution

ब्लॉग के ज़रिये हम दिलों के बीच मौजूद दीवारों को गिरा सकते हैं । हमारे लेखन का मक़सद भी यही है लेकिन कुछ लोगों का मक़सद यह है कि उन ख़ताओं के लिए भी ज़िम्मेदार भी मुसलमानों को ठहराओ , जिनके गुनाहगार वास्तव में वे खुद हैं ।
किसी हमदर्द के समझाने से मैं शांत हो गया था । मैंने ऐलान 3 दिन के लिए किया था लेकिन मैंने और ज़्यादा मोहलत दी ।
लेकिन मेरी इस ख़ामोशी के अंतराल में एक विषपुरूष ने पूरी पोस्ट क्रिएट कर दी कि मुसलमान संगठित तरीक़े से हिन्दू लड़कियों को मुसलमान बना रहे हैं ।
बताइये , ऐसा क्यों किया गया ?
क्या ऐसे आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला कभी समाप्त हो पाएगा ?
क्या ऐसे में मुझे जवाब देना चाहिये था या फिर मैं चुप लगा जाता ?
कोई हिन्दू भाई इसका उचित जवाब देता तो शायद मैं चुप रह जाता लेकिन मजबूरन मुझे इन आरोपवादियों को सच्चाई बतानी पड़ी और उसमें मैंने जानबूझकर वेदों का नाम तक नहीं लिया ।
वेदों का नाम नहीं लिया तो भाई अमित शर्मा बिगड़ गये बोले कि आपने अपने ब्लॉग का नाम वेद कुरआन क्यों रखा ?
इस ब्लॉग पर आप ख़तना , लिंगाग्र, स्तंभन और वीकनेस का ज़िक्र क्यों कर रहे हैं ?
आप अपने ब्लॉग का नाम बदलिए ।
मैं तो अमित शर्मा जी के अन्दर बिल्कुल मुल्ला मौलवियों जैसी शर्मो-हया देखकर दंग ही तो रह गया ।
सोचता रहा कि क्या जवाब दूं ?
क्या इन्होंने सचमुच वेद नहीं पढ़े ?
अगर पढ़े हैं तो लिंगाग्र जैसे नॉर्मल वर्ड्स पर इस तरह लजाने का नाटक क्यों कर रहे हैं ?
अगर कोई समस्या समाज में मौजूद है और उसका समाधान भी है , तो उसका ज़िक्र क्यों न किया जाएगा ?
हमने तो संक्षिप्त में ज़िक्र किया है , लेकिन कोर्स में तो पूरी संरचना दी गई है जिसे सभी भाई बहन पढ़ते हैं और मां बाप ऊँची फ़ीस देकर पढ़ाते हैं और खुश होते हैं कि हमारे बच्चे विज्ञान पढ़ रहे हैं ।
क्या हमारे पूर्वज कुछ कम वैज्ञानिक थे ?
जिस लिंग की संरचना और कार्यों पर पश्चिमी वैज्ञानिक आज प्रकाश डाल रहे हैं उसकी विवेचना तो हमारे मनीषी हज़ारों या अरबों साल पहले ही कर चुके हैं ।
न सेशे यस्य रोमशं निषेदुषो विजृम्भते ,
सेदीशे यस्य रम्बतेऽन्तरा सक्थ्या कपृद विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः
ऋग्वेद 10-86-17
अर्थात वह मनुष्य मैथुन करने में सक्षम नहीं हो सकता , जिस के बैठने पर लोमयुक्त पुरूषांग बल प्रकाश करता है । वही समर्थ हो सकता है , जिसका पुरूषांग दोनों जांघों के बीच लंबायमान है ।
हमने तो वेदों में आर्य नारी को भी ‘ार्माते लजाते हुए नहीं देखा -
उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथाः ,
सर्वामस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका ।
ऋग्वेद 1- 126- 7
अर्थात मेरे पास आकर मुझे अच्छी तरह स्पर्श करो । यह न जानना कि मैं कम रोमवाली अतः भोग के योग्य नहीं हूं । मैं गांधारी मेषी ( भेड़ ) की तरह लोमपूर्णा ( रोमों से भरी हुई ) और पूर्ण अवयवा ( जिसके अंग पूर्ण यौवन प्राप्त हैं ) हूं ।
अफ़सोस श्री अमित शर्मा जी के हाल पर । मुझे तो लगता है कि उन्होंने शायद आज तक गर्भाधान संस्कार भी न किया होगा अन्यथा वे इस मन्त्र को ज़रूर जानते । सनातन धर्म पुस्तकालय , इटावा द्वारा 1926 में छपवाई गई ‘ ‘षोडष संस्कार विधि‘ के अनुसार गर्भाधान संस्कार में यह मन्त्र लेटी हुई पत्नी की नाभि के आसपास हाथ फेरते हुए 7 बार पढ़ा जाता है ।
ओं पूषा भगं सविता मे ददातु रूद्रः कल्पयतु ललामगुम ।
ओं विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।
आसिंचतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ..
ऋग्वेद 10-184-1
अर्थात पूषा और सविता देवता मुझे भग ( स्त्री की योनि ) दें , रूद्र देवता उसे सुन्दर बनाए । विष्णु स्त्री की योनि को गर्भ धारण करने योग्य बनाए , त्वष्टा गर्भ के रूप का निश्चय करे , प्रजापति वीर्य का सिंचन करे और धाता गर्भ को स्थिर करे ।
देखा अमित जी ! आप तो मात्र वेदों की भावना को आत्मसात न कर पाने के कारण शर्मा रहे थे वर्ना ऐसी कोई बात नहीं है और न ही मुझे अपने ब्लॉग का नाम ही बदलने की ज़रूरत है ।
भाई अमित जी को तो इसमें भी खोट निकालना था और बताना था कि महान तो केवल हम हैं । सो उन्होंने हमें इल्ज़ाम दे डाला -
हम गर्भाधान संस्कार करतें है,तो वोह भी हमारा एक सम्यक रीती से निभाया जाने वाला धार्मिक संस्कार है. लेकिन आप जिस परम्परा का अनुगमन करतें है वहाँ काम, वासना की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाता है ,और उसके आवश्यक संस्कार के रूप में लिंगाग्र को कपडे से रगड़कर स्थंबन का स्वाभाव विकसित किया जाता है, ताकि चार चार प्रियतमाओं सहित खुद की भी वासना पूर्ति हो सके.
बृहदारण्यक उपनिषद , 6-4-7 के अनुसार
स्त्री यदि मैथुन न करने दे तो उसे उस की इच्छा के अनुसार वस्त्र आदि दे कर उसके प्रति प्रेम प्रकट करे । इतने पर भी यदि वह मैथुन न करने दे तो उसे डंडे या हाथ से ( थप्पड़ , घंूसा आदि ) मारकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे । यदि यह भी संभव न हो तो ‘मैं तुझे शाप दे दूंगाा , तुम्हें वंध्या अथवा भाग्यहीना बना दूंगा ‘ - ऐसा कहकर ‘इंद्रियेण‘ इस मंत्र का पाठ करते हुए उसके पास जाए । उस अभिशाप से वह ‘दुर्भगा‘ एवं वंध्या कही जाने वाली अयशस्विनी ( बदनाम ) ही हो जाती है ।
अब कहिये , क्या यही है गर्भाधान की सम्यक रीति ?
अरे भाई , क्यों देवताओं की तरह कामातुर हो रहे हो ?
पत्नी के मन को भी तो समझो । उसे कोई प्रॉब्लम भी तो हो सकती है ?
पहले अपनी पत्नी के मन को समझना सीखो । फिर वे न किसी इच्छाधारी के पास जायेंगी और न किसी मुसलमान के पास । तब आपके दिमाग़ से लव जिहाद का फ़र्ज़ी डर भी निकल जाएगा ।
कृप्या अपनी लड़कियों को बदनाम न करें , उन्हें अच्छी बातें सिखायंे ।
लेकिन आप अच्छी बातें सिखाएंगे किस किताब से ?
सब जगह तो उपरोक्त सामग्री भरी पड़ी है ।
भाई अमित जी ने मेरी ग़लतफ़हमी दूर करते हुए बताया कि
फिर वही बात जमाल साहब आपको हर जगह काम ही काम(वासना युक्त ) ही क्यों दिखाई देता है. बार बार एक ही बात क्यों सिखलानी पड़ती है की वेद एक सम्पूर्ण ज्ञान है जिसमें जीवन के हर एक पक्ष का समावेश है. आप तो ऐसे उचल कूद मचा रहे है जैसे की ७वी ८वी में पड़ने वाला उपरी क्लासेस में पदाई जाने वाली जीव विज्ञान विषयक की पुस्तक को पढकर हैरान हो जाये .
जब वेद जीवन के हर पक्ष का विवेचन कर रहें है तो पति पत्नी के बीच होने वाली मीठी नोकझोंक का तरीका भी सिखाएगा, यहाँ मारने कूटने की बात नहीं आई है बंधु . गृहस्थ में पति पत्नी के बीच मान-मनुहार आदि जो रस्वर्धक सम्यक क्रियाये है उनका उल्लेख है. मारण का उपदेश नहीं है ताडन का उल्लेख है,और ताडन मारण-कूटन नहीं होता मेरे भाई .यहां 'काम' का अमर्यादित आवेग नहीं है। शास्त्रों में जो ६४ कलाओं का ज्ञान प्रदान किया गया है उनमे एक काम कला भी है. उसका अध्यन भी आवश्यक है, उसमें पति-पत्नी की इन सामान्य प्रीतिवर्धक चेस्ताओं का वर्णन है ,इसमें आप इतने क्यों उद्विग्न है. इतनी सामान्य सी बात आपके दिमाग में क्यों कर नहीं घुसी.भारतीय संस्कृति में प्रजवर्धन के लिए प्रजनन क्रिया को यज्ञ बतलाया है.
मैं उनकी बात समझ भी जाता लेकिन वेद में तो यह भी आया है -
जिस समय पिता ने अपनी कन्या ( उषा ) के साथ सम्भोग किया , उस समय पृथिवी के साथ मिलकर शुक्र का सेक किया अर्थात वीर्य सींचा , सुकृती देवों ने व्रतरक्षक ब्रह्म ( वास्तोष्पति वा रूद्र ) का निर्माण किया ।
ऋग्वेद 10-61-7
मुझे तो इस मन्त्र पर भी कोई ऐतराज़ नहीं है क्योंकि भाई अमित इसका भी निराकरण कर देंगे ।
मुझे इस बात पर ऐतराज़ है कि जब आप वेदों की शर्मनाक बातों के गूढ़ार्थ निकाल सकते हैं और उनसे सन्तुष्ट भी हो जाते हैं तो फिर पवित्र कुरआन की आयतों के सरल अर्थ को समझते समय आपकी अक्ल क्यों बदल जाती है ?
अब आपको उसमें कमियां कैसे दिखाई देने लगती हैं ?
आप जिस सहानुभूति से वेदों पुराणों और स्मृतियों को समझने का प्रयास करते हैं , पवित्र कुरआन को भी ऐसे सम्मानपूर्वक समझने का प्रयास कीजिये । सारे विवाद समाप्त हो जाएंगे ।
कल Pushpendra ji और Zeal ji ने भी पूछा था कि प्रेम कैसे फैलेगा ?
मैं कहता हूं कि दो पैमानों से नापना छोड़ दीजिए , प्रेम फैल जाएगा । अगर आप अपने ग्रन्थ का सम्मान चाहते हैं तो दूसरा भी तो यही चाहता है । अगर आप खुद को गद्दार कहलाना पसन्द नहीं करते तो दूसरा भी अपने लिए इस लफ़्ज़ को पसन्द नहीं करता ।
अगर आप बेजा इल्ज़ाम किसी पाक किताब या पूरी क़ौम पर लगाएंगे तो फिर दूसरी तरफ़ से जवाब आना तो लाज़िमी ही है । महाभारत से लेकर ताज़ा नक्सली हमले तक जब भी भाई ने भाई को मारा मुल्क और वतन का सिर्फ़ और सिर्फ़ नुक्सान ही हुआ है ।
हिन्दुओं की तरह हरेक जुर्म के गुनाहगार मुसलमानों में भी हैं । उन्हें पकड़ो और सज़ा दो लेकिन न किसी बेगुनाह हिन्दू को नक्सलवादी घोषित करके मारो और न ही किसी बेगुनाह मुसलमान को ।
आपकी तरह मैं भी समाज में इज़्ज़त से अपने प्यारे वतन की खि़दमत करते हुए जीना चाहता हूं और अपने बच्चों को भी यही सिखाना चाहता हूं । फिर क्यों आप मुझे और मेरी क़ौम को संदिग्ध बनाने पर तुले हुए हैं ?
क्या आप चाहते हैं कि मेरा बच्चा किसी दिन दंगे का शिकार होकर मर जाए ?
मैं तो आपके बच्चे के लिए ऐसा नहीं चाहता ।
अपने बच्चों की हिफ़ाज़त के लिए हमें कूटनीति को छोड़कर सत्य और न्याय को अपनाना ही होगा । हम सब ऋषियों की सन्तान हैं । इस पवित्र भूमि पर इसके अलावा हमारे लिए न तो कोई पथ है और न ही कोई उपाय ।
सत्य में ही मुक्ति है । इसी से प्रेम उपजेगा और इसी से भारत बनेगा विश्वगुरू । क़ौमों लड़ाना कोई सेवा नहीं है । हत्या चाहे जिस भी मनुष्य की हो लेकिन लहू महर्षि मनु का ही बहता है , मरता धरती का ही लाल है ।
आप अम्न का माहौल बनाने के लिए मिलकर जो कुछ भी करेंगे , मुझे सदा अपने साथ पाएंगे और मुझ जैसे हरेक मुसलमान को भी ।
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