सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Tuesday, May 25, 2010
Obey your parents अपने पिता और माता का आदर करना
दयालु परमेश्वर कहता है -और हमने इनसान को उसके मां बाप के मामले में ताकीद की, उसकी मां ने दुख उठाकर उसको पेट में रखा और दो बरस मे उसका दूध छुड़ाना हुआ कि तू मेरा शुक्र कर और अपने मां बाप का , मेरी ही तरफ़ लौट कर आना है । -सूरह ए लुक़मान, 14
ईसा मसीह अलैहिस्सलाम का कथन भी देखिये -
यहूदियों के किसी अगुवे ने यीशु से पूछा, ‘‘हे उत्तम गुरू, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं ?‘‘यीशु ने उत्तर दिया, ‘‘तुम मुझे उत्तम क्यों कहते हो ? कोई उत्तम नहीं केवल एक, अर्थात परमेश्वर ही उत्तम है । तुम आज्ञाओं को तो जानते ही होगे : ‘व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और माता का आदर करना ।‘ -लूका, 18-20
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रचनाएं अपने रचनाकार का परिचय कराती हैं । हर चीज़ परमेश्वर की रचना है । हरेक चीज़ से उस परमेश्वर के गुण झलक रहे हैं । उसके गुणों की बेहतरीन झलक ‘मां बाप‘ में नज़र आती है । जो परमेश्वर को पाना चाहे उसे अपने मां-बाप को पा लेना चाहिए। मां बाप को पाना, उनकी सेवा करना, उनकी बात मानना और उन्हें राज़ी कर लेना आसान है। मां-बाप की रज़ा में ही ख़ुदा की रज़ा है।
खुदा को पा लेना, उसकी रज़ा को पा लेना सहज सरल है। परमेश्वर ने इनसान के लिए हर वह चीज़ पाना आसान बनाया है जिसपर उसके जीवन का दारोमदार है जैसे कि हवा, रौशनी वग़ैरह।इनसान केवल शरीर ही नहीं है उसके अन्दर मन भी है। मन में कुछ उमंगें, सपने और आशाएं भी हैं। इनसान ज्यों ज्यों बचपन से जवानी और फिर बुढ़ापे की तरफ़ बढ़ता है उसकी उमंगें एक एक करके दम तोड़ने लगती हैं। उसके ज़्यादातर सपने हक़ीक़त की ज़मीन से टकराकर चूर चूर हो जाते हैं। इस सबके बावजूद वह जीता है क्योंकि उसके मन में एक आस अभी तक ज़िन्दा होती है। यह आस उसे ख़ुद से या समाज से नहीं बल्कि अपने पैदा करने वाले से होती है। अपने मां बाप के रूप में वह उसका जलवा देख चुका होता है कि उसने उनसे जब जो मांगा वह उसे मिला, फ़ौरन मिला या कुछ समय बाद मिला। ईश्वर से भी मनुष्य को यह उम्मीद होती है कि वह उसकी ख्वाहिशें पूरी करेगा, उसका कल्याण करेगा। कुछ लोगों ने समझा कि ईश्वर को पाने के लिए मां-बाप और समाज को छोड़कर कठिन तपस्या करना ज़रूरी है और वे मां-बाप को छोड़कर निकल गए। उन्होंने सहज सुलभ को दुर्लभ बना डाला, खुद के लिए भी और सारे समाज के लिए भी , जबकि वे तो मंज़िल पर ही खड़े थे लेकिन उन्हें ‘बोध‘ न था।उस दयालु मालिक ने हरेक को उसकी मंज़िल के दरवाज़े पर ही पैदा किया है और उसका कल्याण मां-बाप के हुक्म को मानने में ही रख दिया है। मां-बाप हमेशा बच्चे की भलाई चाहते हैं और सही बात बताते हैं। वे रचे भी गए हैं इसी मक़सद के लिए। हरेक रचना अपना मक़सद पूरा कर रही है और अपने रचयिता का परिचय दे रही है क्योंकि रचनाएं अपने रचनाकार का परिचय देती हैं।
Sunday, March 21, 2010
क्या वाक़ई भगवान छोटा और अल्लाह बड़ा है ? Rajyoga or Saashtang .
किसी की ये अदा भी खूब रही कि अपने काव्य मंजूषा को गद्य मंजूषा बना दिया और उसमें भी अल्लाह को बड़ा और भगवान को छोटा कह दिया ।क्या वाक़ई भगवान छोटा और अल्लाह बड़ा है ?
छोटाई और बड़ाई की तुलना के लिए दो वुजूद होना लाज़िमी है । इस सृष्टि के रचनाकार को अरबी भाषा में ’अल्लाह’ कहते हैं । उसी को संस्कृत में ’भगवान‘ कहते हैं ।
‘भगः सकलैश्वय्र्यं सेवनं वा विद्यते यस्य स भगवान्‘
अर्थात जो समस्त ऐश्वर्य से युक्त वा भजने योग्य है वह भगवान है ।
दोनों एक ही रचनाकार के नाम हैं । इसके बावजूद दोनों नामों में एक अन्तर है।
अरबी भाषा में अल्लाह पालनहार का निज नाम है जो केवल उसी मालिक के लिए लिखा और बोला जाता है । यह नाम किसी आदमी के लिए लिखना नाजायज़ है जबकि अरबी भाषा का ही नाम ‘रहीम‘ है , यह उसका गुणवाचक नाम है । यह उस मालिक के गुण को व्यक्त करने के लिए भी आता है और बन्दों की रहमदिली को ज़ाहिर करने के लिए भी ।
संस्कृत साहित्य में उसका निज नाम ऊँ माना गया है । भगवान उसका गुणवाचक नाम है । मुसलमान भाई तो इस बात की एहतियात रखते हैं कि अपने बच्चों का नाम अल्लाह नहीं रखते लेकिन हिन्दू भाई अपने बच्चों का नाम ऊँ भी रख देते हैं और भगवान भी ।
क्या मुसलमानों की यह एक ऐसी ख़ासियत नहीं है जिसे हिन्दू भाईयों को भी अपनाने की ज़रूरत है?
भाई तारकेश्वर जी ने मुझे अपने साथ हरिद्वार स्थित श्री रामदेव जी के आश्रम में ले जाने का प्रस्ताव दिया है । उन्हें लगता है कि इससे मुझे सुकून मिलेगा ।
उनके आश्रम को तो उनके गुरू जी ही छोड़कर चले गये । तब से रामदेव जी खुद बेचैन हैं । वहां मुझे क्या चैन मिलेगा ?
मेरे पड़ौसी श्री पं. प्रेमनारायण शर्मा जी अपनी 65 वर्षीय माता जी को उनके 10 दिवसीय कैम्प में लेकर पहुंचे । माता जी को दमा ,बवासीर , कंब्ज़ , ल्यूकोरिया व गैस ट्रबल आदि बीमारियां थीं । माननीय रामदेव जी के निर्देशन में उन्होंने जो कुछ किया उसके नतीजे में उनकी पुरानी बीमारियों में से तो एक न गयी अलबत्ता 7 वें दिन उनकी रीढ़ की हड्डी का मोहरा ज़रूर सरक गया ।
माता जी मधुमेह की भी मरीज़ हैं , आप्रेशन भी नहीं करा सकतीं थीं। बिस्तर पर ही टट्टी आदि करने लगीं । पूरा घर मुसीबत में पड़ गया । वे मेरे पास आये , दवा ली ,लाभ हुआ तो ’लला , लला ’ कहकर बहुत दुआएं दीं ।
योग कोई खेल नहीं है कि आते ही जोत दो । साधक की काफ़ी मुद्दत तो यम नियम और आसन की सिद्धि में ही निकल जाती है । तब कहीं जाकर प्राणायाम का नम्बर आता है । ल्ेकिन यम नियम की पाबन्दी तो वह करे जिसे ईश्वर से जुड़ना हो , यहां तो लोग कसरत के लिये आते हैं और मक़सद होता है बीमारी से नजात ।
पतंजलि के योगदर्शन में भी योग का अर्थ ईश्वर से जुड़ना नहीं मिलता । इसीलिये बादरायण ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ब्रह्मसूत्र अर्थात वेदान्तदर्शन के एक सूत्र में कहा है :
एतेन योगः प्रत्युक्तः ब्रह्मसूत्र 2-1-3
अर्थात इससे हम योग का खंडन करते हैं , इससे योग रद्द समझा जाए ।
इस ब्रह्मसूत्र की व्याख्या में शंकराचार्य जी ने लिखा है कि योग क्योंकि वेदों की परवाह नहीं करता , अतः उका खंडन किया गया है , उसे रद्द किया गया हैः
निराकरणं तु न वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण निश्रेयसमधिगम्यत इति
- ब्रह्मसूत्र 2-1-3 पर शंकरभाष्य
अर्थात बिना वेदों के योगमार्ग का आश्रय लेने मात्र से , कल्याण नहीं होता ; अतः इसका निराकरण ( खंडन ) किया गया है। वेदों में योग शब्द तो मिलता है लेकिन इसका अर्थ वहां क्या है ?देखिये -
योगः रथे योजनम्
ऋग्वेद 1-34-9 पर सायणभाष्य
अर्थात योग का अर्थ है :
रथ में जोड़ना ; जबकि योग वाले योग शब्द का अर्थ करते हुए कहते हैं कि , चित्तवृत्तियों के निरोध का नाम योग है :
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः पांजलयोगसूत्र 1-2
इसके बावजूद मैं शंकराचार्य जीकी तरह योग का पूरी तरह खंडन नहीं करता । मैं योग को हितकारी मानता हूं और स्वयं योग करता हूं लेकिन मैं आष्टांग योग के बजाए साष्टांग योग करता हूं । यह सहज सरल और प्रभाव में तीव्र है ।
षटचक्रों का जागरण जल्दी होता हैं। इसके ज़रिये व्यक्ति में निवृत्ति की नहीं बल्कि प्रवृत्ति की भावनाएं जन्म लेती हैं ।
इसे कुंवारे , गृहस्थ , बच्चे , बूढ़े और औरतें बल्कि गर्भवती औरतें तक आसानी से कर सकती हैं । यह सहजता से सिद्ध होने वाला योग है । इससे मनुष्य ईश्वर को तुरन्त उपलब्ध होता है । ईश्वर ही भगवान है । अरबी भाषा में उसी को अल्लाह कहते हैं । जब सबका मालिक एक है तो वह एक मालिक स्वयं से ही बड़ा या छोटा कैसे हो सकता है?
लेकिन कहने वालों का क्या है ?
वैदिक साहित्य का सबसे ज़्यादा बेड़ा ग़र्क़ कवियों ने ही किया है और ये अब भी बाज़ नहीं आ रहे हैं । मुसलमान अज़ान देते हैं , कहते हैं -
अल्लाहु अकबर : अर्थात भगवान सबसे बड़ा है ।
आओ सत्य को पहचानें और मिलकर चलें कल्याण की ओर ।
...लेकिन हरिद्वार की बात तो रह ही गयी ।
हरिद्वार निश्चय ही एक रमणीय जगह है । मैं खुद इसी के दामन में रहता हूं । मेरी नसों में गंगाजल ही व्याप्त है । अब मैं आऊँ या भाई तारकेश्वर जी आयें , जो भी रास्ता निकले लेकिन मिलकर कहीं न कहीं तो जाना ही है ।
तो क्यों न मिलकर काबा ही चलें ?
वह आपका भी तीर्थ है और हमारा भी ।वेद पहले से ही प्रतिमा पूजा से रोकते हैं ।इसलाम के माध्यम से उसी लोप हो चुके वैदिक धर्म का नवीनीकरण हुआ है । यज्ञादि तो आपने भी निरस्त कर रखे हैं , ईश्वर ने इसलाम में भी निरस्त करके आपके विचार पर प्रामाणिकता की मुहर लगा दी है ।
आइये , नफ़रत छोड़कर प्रेम से देखिये ।
विकारग्रस्त परम्पराएं अनेक किए हुए हैं । इसीलिए मैं विकार को अस्वीकार करता हंू ।
This artistic concept is drawn by my 9 yrs old son, Master Anas Khan. He is a good preacher also and has his own blog on
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