सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



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Tuesday, March 16, 2010

वेद आर्य नारी को बेवफ़ा क्यों बताते हैं ? The heart of an Aryan lady .


समन्दर ए हक़ीक़त के ग़व्वास , जनाब ए मोहतरम द्विवेदी जी !
आपने मेरे लेख ‘‘वेदों में कहाँ आया है कि इन्द्र ने कृष्ण की गर्भवती स्त्रियों की हत्या की ?‘‘ के अनुवाद पर आपत्ति उठाई है ।

इंद्र ने ऋजिश्वा राजा के साथ मिलकर कृष्ण नाम के असुर की गर्भवती स्त्रियों को मारा था। { ऋगवेद 1/101/1 }

यो वर्चिनःशतमिंद्रः सहस्रमपावपद्

अर्थात इंद्र ने वर्ची के सौ हज़ार पुत्रों को भूमि पर सुला दिया अर्थात मार दिया । { ऋगवेद 2/14/6 }

मैंने पहले भी अर्ज़ किया था कि मैं न तो अनुवाद करता हूं और न उसके साथ छेड़छाड़ ही करता हूं । प्रस्तुत दोनों हवाले लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ श्री सुरेन्द्र कुमार ‘शर्मा अज्ञात जी के ग्रन्थ से साभार उद्धृत हैं । यदि आप किसी अन्य सनातनी विद्वान के अर्थ को सही मानते हैं तो मैं भी आपके आदरवश उसे ही स्वीकार लंूगा और अपनी पोस्ट को एडिट करके वही अनुवाद लगा दूंगा ।पोस्ट की हैडिंग भी उसी के मुताबिक़ चेंज कर दूंगा ।

वेदों में मानवजाति का प्राचीन इतिहास है । तब की परम्पराओं और मान्यताओं को जानना आज डायनासोर्स के जीवाश्म ढंूढने से भी ज़्यादा ज़रूरी है । अतीत का बोध होना ज्ञानी समाज का प्रमुख लक्षण होता है।

आपने दीन दुखियों की सेवा का परामर्श दिया । मैं आपसे सहमत हूं । अपने संपर्क में आने वाले ज़रूरतमन्दों की मैं हदभर मदद करता हूं । कुदरती क़हर के शिकार लोगों के लिए भी हमने अपने दोस्तों की मदद से कई ट्रक सहायता सामग्री भेजी है । जल्दी ही उनके फ़ोटो भी नेट पर आपको उपलब्ध करा दूंगा । भविष्य में भी दीन दुखियों की सेवा करता रहूंगा और अब तो आप जैसे समान विचार वाले बुज़ुर्ग भी मिल गये हैं तो आप से भी सहयोग लिया जाता रहेगा बल्कि आप अपनी सुविधानुसार अंशदान कर सकें , आपकी सुविधा की ख़ातिर मैं अपने ब्लॉग पर ही नेट बैंकिंग की सुविधा भी उपलब्ध करा दूंगा ।

आपकी इच्छा को तो मैं आदेश का दर्जा देता हूं । आपकी इच्छा का सम्मान करना हमारा फ़र्ज़ है । दीन दुखियों की सेवा के लिए परलोक के इनकार की नहीं बल्कि उसके स्वीकार की ज़रूरत है । हर आदमी अपनी मेहनत का अच्छा फल चाहता है ।

प्रायः दुनिया में नेक आदमी को नेकी का अच्छा बदला मिलने के बजाए तिरस्कार और कष्ट ही मिलते हैं ।

बताइये सीता माता ने तो अपने दर पर एक भिखारी देखा और उसकी भूख मिटाने के लिए फल दिए लेकिन उस भिखारी ने उन्हें क्या दिया ?

उन्हें एक दीन दुखी की सेवा करके क्या मिला ?

दुनिया में उन्हें कुछ मिला नहीं और परलोक का स्वर्ग नर्क कुछ होता नहीं तो फिर भला कोई किसी को अपना माल और वक्त क्यों देगा ?

सीमा पर एक सिपाही अपनी जान भला क्यों देगा ?

परलोक का इनकार करके आप तो उस प्रेरणा का ही नाश कर रहे हैं जिसके भरोसे आदमी नेकी करता है ।यह ठीक है कि वर्णवादियों ने लोगों को स्वर्ग नर्क के नाम पर ख़ूब ठगा है । यह उनका पाप था । सिर्फ़ इसी वजह से परलोक असत्य नहीं माना जा सकता । लोग तो नक़ली करेंसी देकर भी ठग रहे हैं लेकिन इससे असली करेंसी का यक़ीन तो ख़त्म नहीं हो जाता ।

आप कहते हैं कि परलोक को किसने देखा है ?

आप वकील हैं । आप जानते हैं कि चश्मदीद गवाहों के अलावा अदालत परिस्तिथिजन्य साक्ष्यों को भी अहमियत देती है ।आंख से नज़र न आने वाली चीज़ों को आदमी अपनी अक्ल से देख सकता है । इनसान ने जब अपनी आंख से परमाणु को देखा भी नहीं था तब भी उसने परमाणु का पता लगा लिया था ।

इनसान को दर्द होता है जिसे डाक्टर नहीं देख सकता लेकिन कोई डाक्टर मरीज़ को झूठा नहीं मानता बल्कि हरेक पैथी में पेन किलर दवाएं भी ठीक उसी तरह बनाई गई हैं जैसे कि नज़र आने वाले फोड़े फुन्सियों की । आंख से नज़र न आना किसी हक़ीक़त के इनकार के लिए पर्याप्त नहीं है ।

सूरज का नियत समय पर निकलना खुद इस बात का सुबूत है कि कोई है जो इस निज़ाम को कन्ट्रोल कर रहा है ।

देखी तो आपने अपनी आत्मा को भी नहीं है । क्या आप मान लेंगे कि आप में आत्मा ही नहीं है ?

और अब मैं कहता हूं कि आप ईश्वर और परलोक को देख भी सकते हैं लेकिन हरेक चीज़ के लिए प्रयास और अभ्यास ज़रूरी है । आप भी जो चाहे देख सकते हैं।

मुसलिम सूफ़ी इसी राह के तो एक्सपर्ट हैं ।वैदिक साहित्य भी योग और अध्यात्म का का़यल है । अपने अनुभव के आधार पर मैं रूहानियत और अध्यात्म की सत्यता की गवाही देता हूं । अति से बचते हुए इसका इस्तेमाल मुफ़ीद है ।

क्या आप मुझसे सहमत हैं ?

अगर नहीं हैं तो क्यों ?

कुछ शिक्षित महिलाओं ने भी आपत्ति दुख और नाराज़गी प्रकट की है । मैं समझ नहीं पाया कि उन की आपत्ति धर्म ग्रन्थों की बात बताने को लेकर है

या इस बात पर है कि एक मुसलमान ये बातें क्यों बता रहा है

या उनका ये विश्वास है कि उनके धर्मग्रन्थों में तो कोई कमी नहीं है लेकिन मैं जबरन उनमें कमी निकाल रहा हूं ।

लीजिये उनकी पेश ए खिदमत है उनकी प्रशंसा (?) खुद वेदों की ज़ुबानी ।

न वै स्त्रैणानि सख्यानि संति सालावृकाणां हृदयान्येता

स्त्रियों और वृकों का हृदय एकसा होता है , उनकी मित्रता कभी अटूट नहीं होती ।ऋग्वेद 10:95:15 अनुवाद पं. श्री राम ‘शर्मा आचार्य

1- वृक का अर्थ क्या होता है ?

2- पवित्र वेद पुरूषों को आर्य नारी से क्यों सावधान कर रहा है ?

3- आर्य नारी का दिल वृक जैसा ख़तरनाक क्यों बताया गया है ?

4-क्या सचमुच आर्य नारी वफ़ादार नहीं होती ?

उपरोक्त मन्त्र पढ़कर ऐसे ही कुछ स्वाभाविक प्रश्न खड़े हो जाते हैं । जिनका जवाब मैं दे सकता हूं परन्तु हो सकता है कि मेरे ब्लॉग के पाठकों में से कोई इनका जवाब दे सकता हो । मैं चाहूंगा कि इनका जवाब वही दें । वर्ना यहां माननीय द्विवेदी जी , मधुर वाणी के स्वामी ज़िन्दगी की पाठशाला के शिक्षक महोदय और अवधिया जी जैसे विद्वान भी मौजूद हैं । वे तो आपको बता ही देंगे ।

इस तरह कोई ये भी नहीं कहेगा कि मैं वेद मन्त्र का अर्थ क्यों बता रहा हूं ?

देखते हैं कि कौन देता है इन सवालों का जवाब ?