सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Tuesday, November 16, 2010
Sacrifice of animals in Vedic yag वैदिक यज्ञ में पशुबलि और ब्राह्मणों द्वारा गोमांसाहार - According to Sayan and Vivekanand
स्वामी विवेकानंद ने पुराणपंथी ब्राह्मणों को उत्साहपूर्वक बतलाया कि वैदिक युग में मांसाहार प्रचलित था . जब एक दिन उनसे पूछा गया कि भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कौन सा काल था तो उन्होंने कहा कि वैदिक काल स्वर्णयुग था जब "पाँच ब्राह्मण एक गाय चट कर जाते थे ." (देखें स्वामी निखिलानंद रचित 'विवेकानंद ए बायोग्राफ़ी' प॰ स॰ 96)
€ @ अमित जी, क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?
या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ?
2- ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति .
ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है .
-ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य
सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है ।
क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?
जो मुँह में आए कह देते हैं यह नहीं देखते कि अपना कहा हुआ दूसरों से पहले खुद पर ही पड़ रहा है और वैदिक सभ्यता के बारे मेँ खुद को नादान साबित कर रहे हैं बेतुकी और झूठी बात कहने वाले ।
सभी उद्धरण डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात की पुस्तक 'क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म' से साभार
€ @ अमित जी, क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?
या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ?
2- ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति .
ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है .
-ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य
सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है ।
क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?
जो मुँह में आए कह देते हैं यह नहीं देखते कि अपना कहा हुआ दूसरों से पहले खुद पर ही पड़ रहा है और वैदिक सभ्यता के बारे मेँ खुद को नादान साबित कर रहे हैं बेतुकी और झूठी बात कहने वाले ।
सभी उद्धरण डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात की पुस्तक 'क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म' से साभार
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