सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



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Thursday, April 29, 2010

आस्तिक होने के लिए केवल ईश्वर का गुणगान करना ही काफ़ी नहीं है बल्कि उसकी बताई हुई ‘जीवन पद्धति‘ का पालन करना भी ज़रूरी है । Follow The Truth

हम सब एक समाज में रहते हैं । सभी सुख , कल्याण और आनन्द चाहते हैं । सभी अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा चाहते हैं । एक बेहतर समाज केवल तभी आकार ले सकता है जबकि उसके सदस्य बेहतर हों । समाज के सदस्य तभी बेहतर हो सकते हैं जबकि वे बेहतर नियमों की पाबन्दी करें ।
नियम तोड़ने वाले लोग कभी बेहतर समाज नहीं बना सकते और वे लोग भी कभी सफल नहीं हो सकते जो नियमों के तो पाबन्द हों लेकिन वे नियम ही समय और धन को बर्बाद करने वाले हों ।
आज बहुत लोग ईश्वर का नाम लेते हैं और समझते हैं कि वे आस्तिक हैं । आस्तिक होने के लिए केवल ईश्वर का गुणगान करना ही काफ़ी नहीं है बल्कि उसकी बताई हुई ‘जीवन पद्धति‘ का पालन करना भी ज़रूरी है ।
उदाहरणार्थ भाई अमित जी हैं । वे वेदादि ग्रन्थों को ईश्वरीय ज्ञान मानते हैं तो उनके लिए लाज़िम है कि वे उनका पालन करें । वेदानुसार अमित जी के पिताजी को 50 वर्ष की आयु होते ही नौकरी करने या खेती करने का अधिकार नहीं बचता । उन्हें घर पर रहने का अधिकार भी नहीं बचता । उनके लिए जंगल जाने का प्रावधान है । प्राचीन काल में यही किया जाता था । अब अगर अमित जी के या किसी भी भारतीय संस्कृति-धर्मवादी के पिताजी 50 वर्ष के बाद भी अपने ही घर पर जमे हुए हैं तो वे अपने धर्म का उल्लंघन और इसलाम का पालन कर रहे हैं ।
यह एक ग़लत बात है कि आप ऐलान करते हैं एक व्यवस्था पर आस्था रखने का और पालन करते हैं उस व्यवस्था का जिसकी कमियां बयान किये बिना आपका दिन नहीं गुज़रता । अगर आप अपने धर्म का पालन नहीं कर पा रहे हैं अगर आप अपने धर्म की परम्पराओं को व्यवहारिक नहीं पाते हैं तो खुलकर स्वीकार कीजिये । चोर दरवाज़े से इस्लाम के उसूल क्यों लेते हैं ?
यही बात उपासना पद्धति की है । भारत की आबादी आज लगभग 1 अरब 18 करोड़ है । क्या आज भारत की प्रति व्यक्ति आय इतनी है कि वे सभी दिन में 3 बार आग में घी-नारियल आदि खाद्य सामग्री जलाकर वैदिक रीति से प्रभु का नाम ले सकें ?
जबकि नमाज़ में लगभग न के बराबर ख़र्च है । इसे अमीर और ग़रीब सभी अदा कर सकते हैं ।
भाई मनुज जी ने बताया कि मुसलमान भी दहेज लेते हैं । इस बात को वे भी जानते हैं कि मुसलमानों में दहेज का वह रूप क़तई नहीं है जो कि हिन्दुओं में पाया जाता है ।हिन्दू भाईयों में तो विवाह की बातचीत ही इस कथन से आरम्भ होती है कि ‘हां जी , तो आप ब्याह में कितना ख़र्च कर सकते हैं ?‘

जबकि मुसलमानों में इतनी बात कहने वाला ज़लील करके घर से भगा दिया जाता है । अलबत्ता मुस्लिम राजपूतों में आज भी हिन्दुओं की तरह ही दहेज की गु्फ़्तगू बिना ज़िल्लत फ़ील किये की जाती है । हिन्दुओं और मुसलमानों में दहेज के चलन के बावजूद एक बुनियादी अन्तर यह है कि जब एक हिन्दू दहेज लेता या देता है तो वह वेदादि ग्रन्थों का पालन कर रहा होता है । श्री रामचन्द्र जी और शिव जी के ‘आदर्श विवाह‘ की नकल कर रहा होता है जबकि मुसलमान जब दहेज ले या दे रहा होता है वह पवित्र कुरआन का उल्लंघन कर रहा होता है । वह मानवता के आदर्श पैग़म्बर साहब से आचरण से दूर होकर ही यह सब कर रहा होता है । यही हाल मुसलमानों में दूसरी कुरीतियों का है ।
मनुज जी ने कहा कि मुसलमान अपनी समस्याओं के हल के लिए 1500 साल पीछे की ओर देखता है जबकि हिन्दू आगे की ओर देखता है ।
बेचारा हिन्दू पीछे क्या देखेगा ?

उसके पास पीछे देखने के लिए न कोई आदर्श व्यवस्था है और न ही कोई आदर्श व्यक्तित्व । ऐसा नहीं है कि यहां आदर्श मानव हुए ही नहीं । बिल्कुल हुए हैं और एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों हज़ारों हुए हैं लेकिन बाद के लोगों ने उनका जीवन चरित्र न सिर्फ़ यह कि सुरक्षित नहीं रखा बल्कि बिगाड़ और दिया । अगर हीरा 1500 वर्ष गुज़रने के बाद भी अपनी क़ीमत नहीं खोता , अगर पहिया हज़ारों साल गुज़रने के बाद भी अप्रासंगिक नहीं होता तो फिर बराबरी , भाईचारे और ब्याजमुक्त व्यवस्था के सिद्धान्त कैसे अप्रासंगिक हो सकते हैं ?हालात के उतार चढ़ाव के मद्दे नज़र इस्लाम में मुज्तहिद आलिम और राष्ट्राध्यक्ष को ‘ज्ञान‘ के आलोक में समयानुकूल फ़ैसले लेने का पूरा अधिकार है । काल परिस्थिति और मानव स्वभाव के कारण आने वाले हरेक विकार को दूर करने के लिए समय समय पर मुजद्दिद आलिम हुए हैं और सृष्टि के अंत तक होते रहेंगे ।
समस्याओं का हल जहां है मुसलमान वहीं देखता है । आपका वर्तमान बनाने वाले पिछले काल के हिन्दू सुधारकों ने भी वहीं देखा था । और जो लोग आज कहीं और देख रहे हैं वे समस्या को हल नहीं कर रहे हैं बल्कि समस्या को और ज़्यादा बढ़ा रहे हैं । तसलीमा नसरीन , फ़िरदौस ख़ान और मुज़्फ्फ़र हुसैन जी ने किस नगर से कितनी कुरीतियां दूर कीं ? समाज को उनकी देन बताइये तो सही ।
हमारा मक़सद उन उसूलों की खोज होना चाहिये जिन से समाज बेहतर बन सके । अब चाहे वे आगे से मिलें या पीछे से । इसलाम इससे रोकता नहीं है । इसलाम का नियम है कि हिकमत अर्थात तत्वदर्शिता की बात जहां से भी मिले ले ली जाये । भारत को बेहतर और सशक्त बनाने के लिए हमें नफ़रत का ख़ात्मा करना होगा और अपने दिमाग़ को बेहतर विचारों के लिए खोलना होगा । जो बेहतर है वही पहले भी धर्म था और आज भी वही धर्म है । जो निकृष्ट है वह न पहले कभी धर्म था और न ही आज उसे धर्म कहा जा सकता है ।