सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Friday, August 27, 2010
About Namaz on road सड़क पर नमाज़ पढ़कर लोगों को तकलीफ़ न दें -Anwer Jamal
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ‘‘ तुम रास्ते में बैठने से बचो।‘‘
लोगों ने पूछा , ‘‘ऐ अल्लाह के रसूल ! यह तो हमारे लिए ज़रूरी है।‘‘
आपने फ़रमाया, ‘‘ अगर तुम्हारे लिए यह ज़रूरी है तो रास्ते को उसका हक़ दो।‘‘
उन्होंने मालूम किया कि ‘‘रास्ते का क्या हक़ है ?‘‘
आप स. ने फ़रमाया, ‘‘निगाहें नीची रखना, तकलीफ़ देने वाली चीज़ों को रास्ते से हटा देना, सलाम का जवाब देना, नेकी का हुक्म देना और बुराई से मना करना।‘‘ -बुख़ारी, मुस्लिम
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आज एक इलैक्ट्रिक उपकरण सही कराने के लिए रेलवे क्रासिंग पार जाना हुआ तो देखा कि सड़क किनारे बनी हुई एक छोटी सी मस्जिद के बाहर दो लेन वाली सड़कों में से एक को स्टूल वग़ैरह लगाकर ब्लॉक कर दिया है। यह देखते ही मेरे दिल पर एक घुटन सी छा गई। सड़क चलने वालों के लिए बनाई गई है या नमाज़ पढ़ने के लिए ?
क्या सरकारी सड़क पर क़ब्ज़ा करना एक ग़ैर-इस्लामी और हराम काम नहीं है ?
क्या नाजायज़ क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ना भी नाजायज़ नहीं है ?
आज जुमा का दिन है और रमज़ान का महीना है यानि हराम काम से बचने की प्रैक्टिस का महीना है। आज तो हरेक गुनाह से बहुत ही ज़्यादा बचने की कोशिश करनी चाहिए न कि अपनी इबादत को ही गुनाह से आलूदा कर लिया जाए।
अल्लाह के रसूल स. ने तो आम हालात में लोगों का सड़कों पर बैठना पसंद नहीं फ़रमाया और लोगों को तिजारत वग़ैरह जायज़ ज़रूरतों की वजह से वहां बैठने की इजाज़त दी भी तो कुछ शर्तों के साथ कि वे रास्ता चलने वालों का हक़ न मारें, उनके लिए परेशानी खड़ी न करें बल्कि अगर उन्हें परेशान करने वाली कोई झाड़ी वग़ैरह वहां पड़ी हो तो उसे हटा दें।
आज उल्टा हो रहा है कि सड़क पर जहां कुछ भी पड़ा हुआ नहीं है वहां स्टूल वग़ैरह डालकर उसे ब्लॉक किया जा रहा है। परेशान राहगीर मुसलमानों के साथ-साथ उनकी नमाज़ और उनके दीन को भी कोसेंगे। इबादतख़ाने के बाहर दीन के खि़लाफ़ अमल हो रहा है और कर कौन रहे हैं ?, जिनपर लोगों को दीन का सही शऊर देने की ज़िम्मेदारी है। यानि कि वे खुद दीन के सही शऊर से कोरे हैं।
ऐसे मौक़े पर प्रशासन मात्र इस वजह से ख़ामोश रहता है कि उसके हस्तक्षेप से बात सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ जाएगी। उसकी ख़ामोशी से यह मतलब निकाल लिया जाता है कि प्रशासन के दख़लअंदाज़ी न करने का मतलब यह है कि उनके काम पर प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं है।
शहर में बड़ी-बड़ी मस्जिदें हैं, उनमें जाईये। थोड़ा पहले निकलिये, अपने वक्त की कुरबानी दीजिये या फिर अपने माल की कुरबानी दीजिए और संभव हो तो आस-पास की जगह ख़रीदकर अपने पास की मस्जिद को ही अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ बड़ी बना लीजिए।
जो लोग न अपने माल की कुरबानी देना चाहते हैं और न ही अपने वक्त की, उन्हें अपनी सुविधा के लिए शहर के दूसरे तमाम राहगीरों को तकलीफ़ देने और दीन को कलंकित करने का कोई हक़ नहीं है।
2-कोई कह सकता है कि जागरण और कांवड़ जैसे धार्मिक कार्यों के लिए भी तो सड़कें ब्लॉक कर दी जाती हैं ?
इस बारे में यह कहा जाएगा कि नबी स. का फ़रमान आपके सामने हैं और एक मुस्लिम की हैसियत से आप उसे मानने के लिए पाबंद हैं। आप खुद को समाज के लिए नफ़ाबख्श बनाईये, अच्छी मिसाल क़ायम कीजिये, दूसरों तक आपकी अच्छाई का असर पहुंचेगा तो हो सकता है कि वे भी अपने व्यवहार पर विचार करें।
रमज़ान के महीने में विभिन्न दीनी संस्थाएं लोगों को रोज़े के क़ायदे-क़ानून समझाने और उनसे चन्दे की अपील करने के लिए कैलेंडर आदि छापते-बांटते हैं। इन संस्थाओं को रमज़ान के महीने में ‘सड़क पर नमाज़ की अदायगी‘ जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी दीनी हुक्म प्रकाशित और प्रचारित करना चाहिये। मस्जिदों के इमाम साहिबान को भी अपने खुत्बों में इस पर लोगों को सही जानकारी देनी चाहिये।
3-इसी मस्जिद से दस क़दम की दूरी पर शहर का एक बेहद महंगा होटल है। वापस लौटते हुए देखा कि होटल के सामने सड़क के डिवाइडर पर रखकर आतिशबाज़ी की जा रही है और उसकी भयानक आवाज़ से मैं लगातार दहलता रहा और सोचता रहा कि अगर किसी वजह से आतिशबाज़ी के यंत्र की दिशा बदल गई तो उसकी चपेट में आकर कोई भी घायल हो सकता है। खुशियों के अवसर पर होने वाली आतिशबाज़ी और फ़ायरिंग से होने वाली मौत की ख़बरें आये दिन अख़बारों में छपती रहती हैं लेकिन लोग फिर भी झूठे दिखावे से बाज़ नहीं आते।
शर्म की बात है कि इसी देश में लोग रोटी और दवाओं जैसी बुनियादी ज़रूरतों को तरस रहे हैं और कुछ लोग दिखावे की ख़ातिर दौलत में आग लगा रहे हैं। यह बेशऊरी आम है पूरे देश में, हर इलाक़े में। खुद आतिशबाज़ के कपड़े उसकी ग़ुरबत का ऐलान कर रहे थे। मासूम बच्चों के सिरों पर रौशनी के हण्डे रखकर बारात निकालने वाले और बारात में शराब पीकर नाचने वाले सिर्फ़ यह दिखा रहे हैं कि उन्हें किसी के दुख से कोई मतलब नहीं है। फिर ऐसे लोगों का समाज अपने नेताओं से यह अपेक्षा क्यों रखता है कि वे उनकी परेशानियों पर समुचित ध्यान दें ?
बेशऊरी आम है हर तरफ़ और रमज़ान का मुक़द्दस महीना चल ही रहा है। मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वे रमज़ान का हक़ अदा करें और अपने अन्दर दीन का सही शऊर जगायें। भूखों-प्यासों के दर्द को समझने के लिये रोज़ा बेहतरीन ज़रिया है। खुदा की रहमत पाने के लिए खुद लोगों के साथ रहम का बर्ताव कीजिये। सड़क रोककर नमाज़ न पढ़ना भी लोगों के साथ रहम के बर्ताव में से ही एक अमल है। शुरूआत इसी से कीजिये।
लोगों ने पूछा , ‘‘ऐ अल्लाह के रसूल ! यह तो हमारे लिए ज़रूरी है।‘‘
आपने फ़रमाया, ‘‘ अगर तुम्हारे लिए यह ज़रूरी है तो रास्ते को उसका हक़ दो।‘‘
उन्होंने मालूम किया कि ‘‘रास्ते का क्या हक़ है ?‘‘
आप स. ने फ़रमाया, ‘‘निगाहें नीची रखना, तकलीफ़ देने वाली चीज़ों को रास्ते से हटा देना, सलाम का जवाब देना, नेकी का हुक्म देना और बुराई से मना करना।‘‘ -बुख़ारी, मुस्लिम
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आज एक इलैक्ट्रिक उपकरण सही कराने के लिए रेलवे क्रासिंग पार जाना हुआ तो देखा कि सड़क किनारे बनी हुई एक छोटी सी मस्जिद के बाहर दो लेन वाली सड़कों में से एक को स्टूल वग़ैरह लगाकर ब्लॉक कर दिया है। यह देखते ही मेरे दिल पर एक घुटन सी छा गई। सड़क चलने वालों के लिए बनाई गई है या नमाज़ पढ़ने के लिए ?
क्या सरकारी सड़क पर क़ब्ज़ा करना एक ग़ैर-इस्लामी और हराम काम नहीं है ?
क्या नाजायज़ क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ना भी नाजायज़ नहीं है ?
आज जुमा का दिन है और रमज़ान का महीना है यानि हराम काम से बचने की प्रैक्टिस का महीना है। आज तो हरेक गुनाह से बहुत ही ज़्यादा बचने की कोशिश करनी चाहिए न कि अपनी इबादत को ही गुनाह से आलूदा कर लिया जाए।
अल्लाह के रसूल स. ने तो आम हालात में लोगों का सड़कों पर बैठना पसंद नहीं फ़रमाया और लोगों को तिजारत वग़ैरह जायज़ ज़रूरतों की वजह से वहां बैठने की इजाज़त दी भी तो कुछ शर्तों के साथ कि वे रास्ता चलने वालों का हक़ न मारें, उनके लिए परेशानी खड़ी न करें बल्कि अगर उन्हें परेशान करने वाली कोई झाड़ी वग़ैरह वहां पड़ी हो तो उसे हटा दें।
आज उल्टा हो रहा है कि सड़क पर जहां कुछ भी पड़ा हुआ नहीं है वहां स्टूल वग़ैरह डालकर उसे ब्लॉक किया जा रहा है। परेशान राहगीर मुसलमानों के साथ-साथ उनकी नमाज़ और उनके दीन को भी कोसेंगे। इबादतख़ाने के बाहर दीन के खि़लाफ़ अमल हो रहा है और कर कौन रहे हैं ?, जिनपर लोगों को दीन का सही शऊर देने की ज़िम्मेदारी है। यानि कि वे खुद दीन के सही शऊर से कोरे हैं।
ऐसे मौक़े पर प्रशासन मात्र इस वजह से ख़ामोश रहता है कि उसके हस्तक्षेप से बात सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ जाएगी। उसकी ख़ामोशी से यह मतलब निकाल लिया जाता है कि प्रशासन के दख़लअंदाज़ी न करने का मतलब यह है कि उनके काम पर प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं है।
शहर में बड़ी-बड़ी मस्जिदें हैं, उनमें जाईये। थोड़ा पहले निकलिये, अपने वक्त की कुरबानी दीजिये या फिर अपने माल की कुरबानी दीजिए और संभव हो तो आस-पास की जगह ख़रीदकर अपने पास की मस्जिद को ही अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ बड़ी बना लीजिए।
जो लोग न अपने माल की कुरबानी देना चाहते हैं और न ही अपने वक्त की, उन्हें अपनी सुविधा के लिए शहर के दूसरे तमाम राहगीरों को तकलीफ़ देने और दीन को कलंकित करने का कोई हक़ नहीं है।
2-कोई कह सकता है कि जागरण और कांवड़ जैसे धार्मिक कार्यों के लिए भी तो सड़कें ब्लॉक कर दी जाती हैं ?
इस बारे में यह कहा जाएगा कि नबी स. का फ़रमान आपके सामने हैं और एक मुस्लिम की हैसियत से आप उसे मानने के लिए पाबंद हैं। आप खुद को समाज के लिए नफ़ाबख्श बनाईये, अच्छी मिसाल क़ायम कीजिये, दूसरों तक आपकी अच्छाई का असर पहुंचेगा तो हो सकता है कि वे भी अपने व्यवहार पर विचार करें।
रमज़ान के महीने में विभिन्न दीनी संस्थाएं लोगों को रोज़े के क़ायदे-क़ानून समझाने और उनसे चन्दे की अपील करने के लिए कैलेंडर आदि छापते-बांटते हैं। इन संस्थाओं को रमज़ान के महीने में ‘सड़क पर नमाज़ की अदायगी‘ जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी दीनी हुक्म प्रकाशित और प्रचारित करना चाहिये। मस्जिदों के इमाम साहिबान को भी अपने खुत्बों में इस पर लोगों को सही जानकारी देनी चाहिये।
3-इसी मस्जिद से दस क़दम की दूरी पर शहर का एक बेहद महंगा होटल है। वापस लौटते हुए देखा कि होटल के सामने सड़क के डिवाइडर पर रखकर आतिशबाज़ी की जा रही है और उसकी भयानक आवाज़ से मैं लगातार दहलता रहा और सोचता रहा कि अगर किसी वजह से आतिशबाज़ी के यंत्र की दिशा बदल गई तो उसकी चपेट में आकर कोई भी घायल हो सकता है। खुशियों के अवसर पर होने वाली आतिशबाज़ी और फ़ायरिंग से होने वाली मौत की ख़बरें आये दिन अख़बारों में छपती रहती हैं लेकिन लोग फिर भी झूठे दिखावे से बाज़ नहीं आते।
शर्म की बात है कि इसी देश में लोग रोटी और दवाओं जैसी बुनियादी ज़रूरतों को तरस रहे हैं और कुछ लोग दिखावे की ख़ातिर दौलत में आग लगा रहे हैं। यह बेशऊरी आम है पूरे देश में, हर इलाक़े में। खुद आतिशबाज़ के कपड़े उसकी ग़ुरबत का ऐलान कर रहे थे। मासूम बच्चों के सिरों पर रौशनी के हण्डे रखकर बारात निकालने वाले और बारात में शराब पीकर नाचने वाले सिर्फ़ यह दिखा रहे हैं कि उन्हें किसी के दुख से कोई मतलब नहीं है। फिर ऐसे लोगों का समाज अपने नेताओं से यह अपेक्षा क्यों रखता है कि वे उनकी परेशानियों पर समुचित ध्यान दें ?
बेशऊरी आम है हर तरफ़ और रमज़ान का मुक़द्दस महीना चल ही रहा है। मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वे रमज़ान का हक़ अदा करें और अपने अन्दर दीन का सही शऊर जगायें। भूखों-प्यासों के दर्द को समझने के लिये रोज़ा बेहतरीन ज़रिया है। खुदा की रहमत पाने के लिए खुद लोगों के साथ रहम का बर्ताव कीजिये। सड़क रोककर नमाज़ न पढ़ना भी लोगों के साथ रहम के बर्ताव में से ही एक अमल है। शुरूआत इसी से कीजिये।
Monday, June 21, 2010
इस्लाम के पैग़म्बरःहज़रत मुहम्मद (सल्ल.) Written by Prof. Ramakrishna Rao
अध्याय .1
इस्लाम के पैग़म्बरःहज़रत मुहम्मद (सल्ल.)
मुहम्मद (सल्ल.) का जन्म अरब के रेगिस्तान में मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार 20 अप्रैल 571 ई. में हुआ। ‘मुहम्मद’ का अर्थ होता है ‘जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो।’ मेरी नज़र में आप अरब के सपूतों में महाप्रज्ञ और सबसे उच्च बुद्धि के व्यक्ति हैं। क्या आपसे पहले और क्या आप के बाद, इस लाल रकतीले अगम रेगिस्तान में जन्मे सभी कवियों और शासकों की अपेक्षा आप का प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है।जब आप पैदा हूए अरब उपमहीद्वीप केवल एक सूना रेगिस्तान था। मुहम्मद(सल्ल.) की सशक्त आत्मा ने इस सूने रेगिस्तान से एक नए संसार का निर्माण किया, एक नए जीवन का, एक नई संस्कृति और नई सभ्यता का। आपके द्वारा एक ऐसे नये राज्य की स्थापना हुई, जो मराकश से ले कर इंडीज़ तक फैला और जिसने तीन महाद्वीपों-एशिया, अफ्ऱीक़ा, और यूरोप के विचार और जीवन पर अपना अभूतपूर्व प्रभाव डाला।
उदारता की ज़रूरत
मैंने जब पैग़म्बर मुहम्मद के बारे में लिखने का इरादा किया तो पहले तो मुझे संकोच हुआ, क्योंकि यह एक ऐसे धर्म के बारे में लिखने का मामला था जिसका मैं अनुयायी नहीं हूँ और यह एक नाज़ूक मामला भी है क्योंकि दूनिया में विभिन्न धर्मों के माननेवाले लोग पाए जाते हैं और एक धर्म के अनुयायी भी परस्पर विरोधी मतों (school of thought) और फ़िरक़ों में बंटे रहते हैं।हालाँकि कभी-कभी यह दावा किया जाता है कि धर्म पूर्णतः एक व्यक्तिगत मामला है, लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि धर्म में पूरे जगत् को अपने घेरे में ले लेने की प्रवृत्ति पाई जाती है, चाहे उसका संबंध प्रत्यक्ष से हो या अप्रत्यक्ष चीज़ों से। वह किसी न किसी तरह और कभी न कभी हमारे हृदय, हमारी आत्माओं और हमारे मन और मस्तिष्क में अपनी राह बना लेता है। चाहे उसका ताल्लुक़ उसके चेतन से हो, अवचेतन या अचेतन से हो या किसी ऐसे हिस्से से हो जिसकी हम कल्पना कर सकते हों। यह समस्या उस समय और ज़्यादा गंभीर और अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है जबकि इस बात का गहरा यक़ीन भी हो कि हमारा भूत, वर्तमान और भविष्य सब के सब एक अत्यन्त कोमल, नाज़ुक, संवेदनशील रेशमी सूत्रों से बंधे हुए हैं। यदि हम कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील हुए तो फिर हमारे सन्तुलन केन्द्र के अत्यन्त तनाव की स्थिति में रहने की संभावना बनी रहती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो दूसरों के धर्म के बारे में जितना कम कुछ कहा जाए उतना ही अच्छा है। हमारे धर्मों को तो बहुत ही छिपा रहना चाहिए। उनका स्थान तो हमारे हृदय के अन्दर होना चाहिए और इस सिलसिले में हमारी ज़ुबान बिल्कुल नहीं खुलनी चाहिए।
मनुष्य: एक सामाजिक प्राणी
लेकिन समस्या का एक दूसरा पहलू भी है। मनुष्य समाज में रहता है और हमारा जीवन चाहे-अनचाहे, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे लोगों के जीवन से जुड़ा होता है। हम एक ही धरती का अनाज खाते हैं, एक ही जल-स्रोत का पानी पीते हैं और एक ही वायुमंडल की हवा में सांस लेते हैं। ऐसी दशा में भी, जबकि हम अपने निजी विचारों व धार्मिक धारणाओं पर क़ायम हों, अगर हम थोड़ा-बहुत यह भी जान लें कि हमारा पड़ोसी किस तरह सोचता है, उसके कर्मों के मुख्य प्रेरणा-स्रोत क्या हैं? तो यह जानकारी कम से कम अपने माहौल के साथ तालमेल पैदा करने में सहायक बनेगी। यह बहुत ही पसन्दीदा बात है कि आदमी को संसार मे धर्मों के बारे में उचित भावना के साथ जानने की कोशिश करनी चाहिये, ताकि आपसी जानकारी और मेल-मिलाप को बढ़ावा मिले और हम बेहतर तरीक़े से अपने क़रीब या दूर के पास-पड़ोस के लोगों की क़द्र कर सकें।फिर हमारे विचार वास्तव में उतने बिखरे नहीं हैं जैसा कि वे ऊपर से दिखाई देते हैं। वास्तव में वे कुछ केन्द्रों के गिर्द जमा होकर स्टाफ़िक़ जैसा रूप धारण कर लेते हैं, जिन्हें दुनिया के महान धर्मों और जीवन्त आस्थाओं के रूप में देखते हैं। जो धरती में लाखों ज़िन्दगियों का मार्गदर्शन करते और उन्हें प्रेरित करते हैं। अतः अगर हम इस संसार के आदर्श नागरिक बनना चाहते हैं तो यह हमारी जि़म्मेदारी भी है कि उन महान धर्मों और उन दार्शनिक सिद्धान्तों को जानने की अपने बस भर कोशिश करें, जिनका मानव पर शासन रहा है।
पैग़म्बर : ऐतिहासिक व्यक्तित्व
इन आरम्भिक टिप्पणियों के बावजूद धर्म का क्षेत्र ऐसा है, जहाँ प्रायः बुद्धि और संवेदन के बीच संघर्ष पाया जाता है। यहाँ फिसलने की इतनी सम्भावना रहती है कि आदमी को उन कम समझ लोगों का बराबर ध्यान रखना पड़ता है, जो वहाँ भी घुसने से नहीं चूकते, जहाँ प्रवेश करते हुए फ़रिश्ते भी डरते है। इस पहलू से भी यह अत्यन्त जटिल समस्या है। मेरे लेख का विषय एक विशेष धर्म के सिद्धान्तों से है। वह धर्म ऐतिहासिक है और उसके पैग़म्बर का व्यक्तित्व भी ऐतिहासिक है। यहाँ तक कि सर विलियम म्यूर जैसा इस्लाम विरोधी आलोचक भी कु़रआन के बारे में कहता है, ‘‘शायद संसार में (कु़रआन के अतिक्ति) कोई अन्य पुस्तक ऐसी नहीं है, जो बारह शताब्दियों तक अपने विशुद्ध मूल के साथ इस प्रकार सुरक्षित हो।’’1 मैं इसमें इतना और बढ़ा सकता हूँ कि पैग़म्बर मुहम्मद भी एक ऐसे अकेले ऐतिहासिक महापुरुष हैं, जिनके जीवन की एक-एक घटना को बड़ी सावधनी के साथ बिल्कुल शुद्ध रूप में बारीक से बारीक विवरण के साथ आनेवाली नसलों के लिए सुरक्षित कर लिया गया है। उनका जीवन और उनके कारनामे रहस्य के परदों में छुपे हुए नहीं हैं। उनके बारे में सही-सही जानकारी प्राप्त करने के लिए किसी को सिर खपाने और भटकने की ज़रूरत नहीं। सत्य रूपी मोती प्राप्त करने के लिए ढेर सारी रास से भूसा उड़ाकर चन्द दाने प्राप्त करने जैसे कठिन परिश्रम की ज़रूरत है।
पूर्वकालीन भ्रामक चित्रण
मेरा काम इस लिए और आसान हो गया है कि अब वह समय तेज़ी से गुज़र रहा है, जब कुछ राजनैतिक और इसी प्रकार के दूसरे कारणों से कुछ आलोचक इस्लाम का ग़लत और बहुत ही भ्रामक चित्रण किया करते थे।1
प्रोफ़सर बीबान ‘केम्ब्रिज मेडिवल हिस्ट्री (Cambrigd madieval history) में लिखता है-‘‘ इस्लाम और मुहम्मद के संबंध में 19वीं सदी के आरम्भ से पूर्व यूरोप में जो पुस्तकें प्रकाशित हुईं उनकी हैसियत केवल साहित्यिक कौतूहलों की रह गई है’’मेरे लिए पैग़म्बर मुहम्मद के जीवन-चित्र के लिखने की समस्या बहुत ही आसान हो गई है, क्योंकि अब हम इस प्रकार के भ्रामक ऐसिहासिक तथ्यों का सहारा लेने के लिए मजबूर नहीं हैं और इस्लाम के संबंध में भ्रमक निरूपणों के स्पष्ट करने में हमारा समय बर्बाद नहीं होता।मिसाल के तौर पर इस्लामी सिद्धान्त और तलवार की बात किसी उल्लेखनीय क्षेत्र में ज़ोरदार अन्दाज़ में सुनने को नहीं मिलती। इस्लाम का यह सिद्धान्त कि ‘धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नही’, आज सब पर भली-भाँति विदित है।
पूरी किताब पढने के लिए .... http://islaminhindi.blogspot.com/
Sunday, June 13, 2010
Muslim means ? मैं मज़ार पर नहीं जाता और न ही मुझे इस पर गर्व है कि मैं मुस्लिम हूं।
1- यहां सब शांति शांति है। तो क्यों न ऐसे में जनाब सतीश सक्सेना साहब को ही छेड़ लिया जाये। रोते हुए बच्चों को हंसाने की ज़िम्मेदारी भी तो उन्हीं के सिर है। जनाब पेरिस गये तो वहां से भी किसी बच्चे की फ़ोटो खींच लाए। बचपन खोते ज़िम्मेदार बच्चों की गिनती दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। ख़ैर, बच्चे ही क्या बड़े भी रोते हैं तो जनाब उनके लिए भी अपील जारी कर देते हैं। ब्लॉगर्स पर बिल्कुल चित्रगुप्त स्टाइल में नज़र रखते हैं और यह बिल्कुल स्वाभाविक भी है क्योंकि माना जाता है कि चित्रगुप्त जी से उनकी बिरादरी का रिश्तेदारी का लिंक है।
बहरहाल बहुत पहले उनकी एक पोस्ट का शीर्षक किसी ने मुझे फ़ोन पर बताया था तभी मेरे मन में अपने लिए यह लाइन उभरी थी कि मैं मज़ार पर नहीं जाता और न ही मुझे इस पर गर्व है कि मैं मुस्लिम हूं।
ऐसा इसलिए है कि सभी बुजुर्गों के मज़ारों पर जाना इस्लाम में नहीं है। इस्लाम का अर्थ है समर्पण और मुस्लिम वह है जो अपने विचार और कामों को सच्चे मालिक के हुक्म के अधीन कर दे।
मैं जब भी अपना जायज़ा लेता हूं तो मुझे अपनी कमियां ही नज़र आती हैं अभी तक समर्पण के उस वांछित स्तर तक मैं नहीं पहुंचा जिसका आदर्श मनु महाराज, हज़रत इबराहीम और पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने हमारे सामने रखा है और जिसे उनके पवित्र सत्संगियों ने प्रत्यक्ष करके दिखाया है। इस्लाम मेरे लिए गर्व यानि फ़ख्र की नहीं बल्कि फ़िक्र की बात है। फ़िक्र इस बात की कि क्या मैं इस्लाम अर्थात समर्पण के अपने दावे में सच्चा हूं ?
मोमिन की तो 2 ही हालतें हैं कि मोमिन मुश्किलों और आज़माईशों पर सब्र करता है और नेमत पर शुक्र। फ़ख्र करने की तालीम इस्लाम नहीं देता इसीलिये मैं इस्लाम पर गर्व नहीं करता। अक्सर लोगों ने वे काम तो छोड़ दिये जिन्हें करना था और उन कामों को करने लगे जिन्हें नहीं करना था, गर्व करना भी उन्हीं में से एक है।
2- पेरिस रिटर्न जनाब सतीश जी आजकल कुछ फ़ुर्सत में नज़र आ रहे हैं क्योंकि ताज़ा पोस्ट को उन्होंने तब पब्लिश किया जबकि दो तिहाई रात गुज़र चुकी थी।
एक निस्तेज से नौजवान को देखकर उन्होंने कुछ ऐसा लिखा कि हम पढ़ते ही उनके मौहल्ले की तरफ़ दौड़ लिये। हस्बे मामूल सांकल लगी हुई थी फिर भी अपनी चिठ्ठी दरवाज़े के नीचे से अन्दर सरका ही दी। ख़ैर जनाब ने उसे पढ़ा भी और दुनिया को पढ़वाया भी और फिर क़हक़हा मारकर बताया कि मैं तो वाइन पीता ही नहीं।
ठीक है साहब, नहीं पीते तो अच्छा है लेकिन सुबह की चाय तो भाभी के साथ पी लिया कीजिये। आप रात को 4.00 बजे सोयेंगे तो फिर उठेंगे कब ?
फिर अगर वे आपको चाय बनाकर न दें और आप बर्दाश्त कर लें तो आपका क्या कमाल ?
कमाल तो हमारी मां समान भाभी का है इंजीनियर साहब कि आपका कम्प्यूटर अभी तक सलामत है और सिर आदि भी।
क्या मैं यहां थोड़ा सा मुस्कुरा सकता हूं ? ---:)
मैं तो अपनी हालत जानता हूं कि कैसे अपनी बीवी की फटकार झेलता हूं और इसी पर आपकी हालत को क़यास कर सकता हूं। अब तो बच्चे भी मुझे कम्प्यूटर वाले अब्बू कहने लगे हैं।
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