सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Wednesday, September 22, 2010
Mandir-Masjid मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने - Anwer Jamal
शीर्षक ही ग़लत
‘राम मन्दिर-बाबरी मस्जिद विवाद‘ का शीर्षक ही ग़लत है। इस विवाद के अब तक न सुलझ पाने का एक बड़ा कारण यह भी है। राम मन्दिर उस जगह का नाम इसलिए हुआ कि रामभक्त उस जगह राम मन्दिर बनाना चाहते हैं जिसमें राम की पूजा-उपासना की जाएगी। मस्जिद में उस पैदा करने वाले मालिक की पूजा की जाती है इसलिए मस्जिद के साथ बाबर बादशाह का नाम जोड़ने के बजाय उस सच्चे बादशाह का नाम जोड़ना ज़्यादा उचित है जिसकी पूजा-इबादत मस्जिद में की जाती है और मस्जिद का मालिक भी वही है।
जिसे ‘राम‘ कहते हैं उसी को ‘रहीम‘ कहते हैं
‘राम मन्दिर-रहीम मस्जिद विवाद‘ इस प्रकरण के लिए पूरी तरह उचित है। यदि इतना भी कर लिया जाए तो राजनीतिबाज़ों की फैलाई सारी नफ़रतें पल भर में काफ़ूर हो सकती हैं। क्योंकि राम भी उसी मालिक का नाम है और रहीम भी, संस्कृत में जिसे ‘राम‘ कहते हैं अरबी में उसी को ‘रहीम‘ कहते हैं।
जो सदा से है, जिसने किसी से जन्म नहीं लिया और न ही किसी को इनसानों की तरह जन्म दिया, जो सब कुछ जानता है और हर तरह की शक्ति जिसके अधीन है, उस अजन्मे-अविनाशी एक ही पालनहार को राम और रहीम कहा जाता है।
मस्जिद में मुसलमान जिस मालिक की पूजा-इबादत करते हैं हिन्दू भाई उसे ही राम कहते हैं। मस्जिद कहते हैं उस जगह को जहां मालिक को बड़ा मानकर बन्दे खुद को छोटा ज़ाहिर करने के लिए उसके सामने ‘सज्दा‘ करते हैं। सज्दे को संस्कृत में साष्टांग कहते हैं।
नमाज़ में चार मुख्य आसन इस प्रकार हैं-
गीता में नमाज़
1. क़ियाम - स्थिर आसन अर्थात खड़ा होना।
2. रूकूअ़ - जानुबद्ध आसन अर्थात घुटनों पर हाथ रखकर झुके होने की दशा में कमर को सीधा रखना।
3. सज्दा - साष्टांग अर्थात वह आसन जिसमें धरती को शरीर के आठ अंग स्पर्श करें।
4. क़ाइदा - उपविश्यासन या वज्रासन अर्थात दोनों घुटने मोड़कर बैठना।
गीता के 6ठे अध्याय के 10वें ‘लोक से 14वें ‘लोक तक सूक्ष्म रूप में इन चारों आसनों का वर्णन है और 15वें ‘लोक में इस रीति से योग करने वाले को मृत्यु के बाद भगवद्धाम की प्राप्ति होना बताया है।
इससे पता चलता है कि हिन्दू मनीषियों के लिए न तो नमाज अपरिचित है और न ही वह मालिक जिसके लिए नमाज में नमन और साष्टांग किया जाता है। वस्तुतः नमाज़ भी अरबी भाषा का शब्द नहीं है, यह फ़ारसी भाषा का शब्द है जो संस्कृत से विशेष रूप से क़रीब है। नमाज़ को अरबी में ‘सलात‘ बोलते हैं। ईरान में इस्लाम आया तो उन्होंने अल्लाह को खुदा और सलात को नमाज़ कहा। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ा।
मस्जिद में उसी एक पालनहार को नमन किया जाता है जिसे हिन्दू भाई ‘राम‘ कहते हैं। अगर भाषा भेद से ऊपर उठकर देखा जाए तो मस्जिद तो वास्तव में होती ही है ‘राम मन्दिर‘। मस्जिद इतने ज़्यादा आदर्श रूप में राम मन्दिर होती है कि उससे ज़्यादा बना पाना तो दूर कोई सोच भी नहीं सकता।
रामभक्त जब बाबरी मस्जिद पर कुदाल चलाकर खुश हो रहे थे और सोच रहे थे कि वे एक मस्जिद ढहा रहे हैं तब वास्तव में वे एक ‘राम मन्दिर‘ ही ढहा रहे थे और ऐसा राम मन्दिर ढहा रहे थे जैसा कि वे अपने जीवन में कभी बनाने की सोच भी नहीं सकते। ये लोग अपने साथ बाबरी मस्जिद की ईंटें लेकर गये और उनके साथ तरह-तरह से अपमानजनक बर्ताव करके अपनी कुंठाओं को शांत किया। उनके बुरे नतीजे भी सामने आये और आज तक आ ही रहे हैं।
आज भारत विश्व की एक उभरती हुई शक्ति है लेकिन हम खुद अन्दर से ही कमज़ोर हैं। मन्दिर-मस्जिद के विवाद को न सुलझा पाना हमारी एक ऐसी कमज़ोरी है जिसे आज सारी दुनिया देख रही है। ऐसे में क्या तो हमारी छवि बनेगी और कौन हमसे मार्गदर्शन लेगा ?
राम नाम में शक्ति है
राम के भक्त और रहीम के बन्दे आपस में लड़ेंगे तो उनका मालिक उनसे राज़ी नहीं होगा और उनके हालात देखकर दूसरे बहुत से लोग ईश्वर और धर्म से पल्ला झाड़कर नास्तिक ज़रूर बन जाएंगे। इन सबके पापों का बोझ भी उनपर ही पड़ेगा।
रामचन्द्र उपासक थे , उपासनीय नहीं यह आलिम-ज्ञानियों का काम है। उनका कर्तव्य है कि वे लोगों को बताएं कि राम-रहीम एक ही मालिक के नाम हैं और यह कि रामचन्द्र जी जीवन भर उपासना करते रहे, वे उपासक थे , उपासनीय नहीं हैं। वे सर्वज्ञ नहीं थे, दूसरे राजकुमारों की तरह उन्होंने भी वसिष्ठ को गुरू बनाकर उनसे ज्ञान प्राप्त किया। वे सर्वशक्तिमान भी नहीं थे, उन्हें अपनी योजनाओं को सफल बनाने के लिए बहुत से लोगों से सहयोग लेना पड़ा। उन्होंने त्याग किया, कष्ट सहे, संघर्ष किया और विजय पाई। उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहकर याद किया जाता है। उन्हें ईश्वर कहना उनके सारे परिश्रम पर पानी फेरना है, ईश्वर की अवज्ञा करना है। ईश्वर उपासनीय है और श्री रामचन्द्र जी आदरणीय हैं।
इतने दंगे हुए, इतना खून बहा लेकिन आज भी मुसलमानों श्री रामचन्द्र जी का नाम आदर से ही लेते हैं। नफ़रत की बुनियाद पर भ्रम की दीवारें खड़ी करने वाले तो पवित्र कुरआन के विरूद्ध पत्रक छापकर बांटते देखे जा सकते हैं लेकिन किसी मुसलमान आलिम ने आज तक रामायण से लेकर कोई पत्रक तैयार नहीं किया।
ज़्यादातर हिन्दू और ज़्यादातर मुसलमान शांतिप्रिय हैं। नफ़रत फैलाने वाले कम हैं और आजकल तो कमज़ोर भी हैं।
‘जोड़ो और राज करो‘ की नीति पर चलने का समय है
राम का सच्चा स्वरूप सामने आते ही मन्दिर-मस्जिद विवाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। आज तक बांटो और राज करो की नीति पर चला गया। अब ‘जोड़ो और राज करो‘ की नीति पर चलने का समय आ गया है। भारत को नये चैलेंजेज़ के मुक़ाबले के लायक़ बनाने के लिए और उसे विश्व का सिरमौर बनाने के लिए अब यही एकमात्र मार्ग है। यदि इस मार्ग पर आगे न बढ़ा गया तो अपनी आपसी लड़ाईयों से ही हम खुद तबाह हो जाएंगे।
राम तारक मंत्र इस तबाही से बचा सकता है-
राम रामायः नमः
अर्थात राम के राम के लिए नमन है।
मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने
जिस राम को यहां नमन किया जा रहा है, उसके स्वरूप का परिचय आम किया जाए तो हिन्दू और मुसलमान तब दो नहीं रहेंगे और न ही उनमें कोई विवाद ही रहेगा।
मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने, लेकिन वास्तव में केवल पालनहार राम का ही मन्दिर बनना चाहिए, अन्य का नहीं। मेरा मक़सद तो आपको एक सच्चे मालिक की पहचान कराना है, आप हिन्दी-संस्कृत जानते हैं तो उसे उसमें पहचान लीजिए, अगर आप उर्दू-अरबी जानते हैं तो उसके ज़रिए जान लीजिये कि आप का एक मालिक है जिसने आपको ज़िन्दगी बतौर इम्तेहान दी है और वह आपसे आपके कर्मों का हिसाब लेगा। हमें चाहिए कि हम उसके सामने ज़ालिम और मुजरिम बनकर न जाएं। चारों तरफ़ तबाही मची हुई है, हम सच्चे दिल से तौबा करें और नेक राह पर चलें और दूसरों को भी नेकी की प्रेरणा दें।
‘राम मन्दिर-बाबरी मस्जिद विवाद‘ का शीर्षक ही ग़लत है। इस विवाद के अब तक न सुलझ पाने का एक बड़ा कारण यह भी है। राम मन्दिर उस जगह का नाम इसलिए हुआ कि रामभक्त उस जगह राम मन्दिर बनाना चाहते हैं जिसमें राम की पूजा-उपासना की जाएगी। मस्जिद में उस पैदा करने वाले मालिक की पूजा की जाती है इसलिए मस्जिद के साथ बाबर बादशाह का नाम जोड़ने के बजाय उस सच्चे बादशाह का नाम जोड़ना ज़्यादा उचित है जिसकी पूजा-इबादत मस्जिद में की जाती है और मस्जिद का मालिक भी वही है।
जिसे ‘राम‘ कहते हैं उसी को ‘रहीम‘ कहते हैं
‘राम मन्दिर-रहीम मस्जिद विवाद‘ इस प्रकरण के लिए पूरी तरह उचित है। यदि इतना भी कर लिया जाए तो राजनीतिबाज़ों की फैलाई सारी नफ़रतें पल भर में काफ़ूर हो सकती हैं। क्योंकि राम भी उसी मालिक का नाम है और रहीम भी, संस्कृत में जिसे ‘राम‘ कहते हैं अरबी में उसी को ‘रहीम‘ कहते हैं।
जो सदा से है, जिसने किसी से जन्म नहीं लिया और न ही किसी को इनसानों की तरह जन्म दिया, जो सब कुछ जानता है और हर तरह की शक्ति जिसके अधीन है, उस अजन्मे-अविनाशी एक ही पालनहार को राम और रहीम कहा जाता है।
मस्जिद में मुसलमान जिस मालिक की पूजा-इबादत करते हैं हिन्दू भाई उसे ही राम कहते हैं। मस्जिद कहते हैं उस जगह को जहां मालिक को बड़ा मानकर बन्दे खुद को छोटा ज़ाहिर करने के लिए उसके सामने ‘सज्दा‘ करते हैं। सज्दे को संस्कृत में साष्टांग कहते हैं।
नमाज़ में चार मुख्य आसन इस प्रकार हैं-
गीता में नमाज़
1. क़ियाम - स्थिर आसन अर्थात खड़ा होना।
2. रूकूअ़ - जानुबद्ध आसन अर्थात घुटनों पर हाथ रखकर झुके होने की दशा में कमर को सीधा रखना।
3. सज्दा - साष्टांग अर्थात वह आसन जिसमें धरती को शरीर के आठ अंग स्पर्श करें।
4. क़ाइदा - उपविश्यासन या वज्रासन अर्थात दोनों घुटने मोड़कर बैठना।
गीता के 6ठे अध्याय के 10वें ‘लोक से 14वें ‘लोक तक सूक्ष्म रूप में इन चारों आसनों का वर्णन है और 15वें ‘लोक में इस रीति से योग करने वाले को मृत्यु के बाद भगवद्धाम की प्राप्ति होना बताया है।
इससे पता चलता है कि हिन्दू मनीषियों के लिए न तो नमाज अपरिचित है और न ही वह मालिक जिसके लिए नमाज में नमन और साष्टांग किया जाता है। वस्तुतः नमाज़ भी अरबी भाषा का शब्द नहीं है, यह फ़ारसी भाषा का शब्द है जो संस्कृत से विशेष रूप से क़रीब है। नमाज़ को अरबी में ‘सलात‘ बोलते हैं। ईरान में इस्लाम आया तो उन्होंने अल्लाह को खुदा और सलात को नमाज़ कहा। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ा।
मस्जिद में उसी एक पालनहार को नमन किया जाता है जिसे हिन्दू भाई ‘राम‘ कहते हैं। अगर भाषा भेद से ऊपर उठकर देखा जाए तो मस्जिद तो वास्तव में होती ही है ‘राम मन्दिर‘। मस्जिद इतने ज़्यादा आदर्श रूप में राम मन्दिर होती है कि उससे ज़्यादा बना पाना तो दूर कोई सोच भी नहीं सकता।
रामभक्त जब बाबरी मस्जिद पर कुदाल चलाकर खुश हो रहे थे और सोच रहे थे कि वे एक मस्जिद ढहा रहे हैं तब वास्तव में वे एक ‘राम मन्दिर‘ ही ढहा रहे थे और ऐसा राम मन्दिर ढहा रहे थे जैसा कि वे अपने जीवन में कभी बनाने की सोच भी नहीं सकते। ये लोग अपने साथ बाबरी मस्जिद की ईंटें लेकर गये और उनके साथ तरह-तरह से अपमानजनक बर्ताव करके अपनी कुंठाओं को शांत किया। उनके बुरे नतीजे भी सामने आये और आज तक आ ही रहे हैं।
आज भारत विश्व की एक उभरती हुई शक्ति है लेकिन हम खुद अन्दर से ही कमज़ोर हैं। मन्दिर-मस्जिद के विवाद को न सुलझा पाना हमारी एक ऐसी कमज़ोरी है जिसे आज सारी दुनिया देख रही है। ऐसे में क्या तो हमारी छवि बनेगी और कौन हमसे मार्गदर्शन लेगा ?
राम नाम में शक्ति है
- हम कहते हैं कि राम नाम में शक्ति है, अल्लाह के नाम में ताक़त है। हमारे धर्मगुरू सत्य और न्याय की बात करते हैं। तब क्यों नहीं हमारे धर्मगुरू बताते कि राम कौन है और रहीम कौन है ?
- उसकी पूजा-इबादत की सही रीति क्या है ?
- उसके बन्दों के दरम्यान जब विवाद की नौबत आ जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए ?
राम के भक्त और रहीम के बन्दे आपस में लड़ेंगे तो उनका मालिक उनसे राज़ी नहीं होगा और उनके हालात देखकर दूसरे बहुत से लोग ईश्वर और धर्म से पल्ला झाड़कर नास्तिक ज़रूर बन जाएंगे। इन सबके पापों का बोझ भी उनपर ही पड़ेगा।
रामचन्द्र उपासक थे , उपासनीय नहीं यह आलिम-ज्ञानियों का काम है। उनका कर्तव्य है कि वे लोगों को बताएं कि राम-रहीम एक ही मालिक के नाम हैं और यह कि रामचन्द्र जी जीवन भर उपासना करते रहे, वे उपासक थे , उपासनीय नहीं हैं। वे सर्वज्ञ नहीं थे, दूसरे राजकुमारों की तरह उन्होंने भी वसिष्ठ को गुरू बनाकर उनसे ज्ञान प्राप्त किया। वे सर्वशक्तिमान भी नहीं थे, उन्हें अपनी योजनाओं को सफल बनाने के लिए बहुत से लोगों से सहयोग लेना पड़ा। उन्होंने त्याग किया, कष्ट सहे, संघर्ष किया और विजय पाई। उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहकर याद किया जाता है। उन्हें ईश्वर कहना उनके सारे परिश्रम पर पानी फेरना है, ईश्वर की अवज्ञा करना है। ईश्वर उपासनीय है और श्री रामचन्द्र जी आदरणीय हैं।
इतने दंगे हुए, इतना खून बहा लेकिन आज भी मुसलमानों श्री रामचन्द्र जी का नाम आदर से ही लेते हैं। नफ़रत की बुनियाद पर भ्रम की दीवारें खड़ी करने वाले तो पवित्र कुरआन के विरूद्ध पत्रक छापकर बांटते देखे जा सकते हैं लेकिन किसी मुसलमान आलिम ने आज तक रामायण से लेकर कोई पत्रक तैयार नहीं किया।
ज़्यादातर हिन्दू और ज़्यादातर मुसलमान शांतिप्रिय हैं। नफ़रत फैलाने वाले कम हैं और आजकल तो कमज़ोर भी हैं।
‘जोड़ो और राज करो‘ की नीति पर चलने का समय है
राम का सच्चा स्वरूप सामने आते ही मन्दिर-मस्जिद विवाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। आज तक बांटो और राज करो की नीति पर चला गया। अब ‘जोड़ो और राज करो‘ की नीति पर चलने का समय आ गया है। भारत को नये चैलेंजेज़ के मुक़ाबले के लायक़ बनाने के लिए और उसे विश्व का सिरमौर बनाने के लिए अब यही एकमात्र मार्ग है। यदि इस मार्ग पर आगे न बढ़ा गया तो अपनी आपसी लड़ाईयों से ही हम खुद तबाह हो जाएंगे।
राम तारक मंत्र इस तबाही से बचा सकता है-
राम रामायः नमः
अर्थात राम के राम के लिए नमन है।
मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने
जिस राम को यहां नमन किया जा रहा है, उसके स्वरूप का परिचय आम किया जाए तो हिन्दू और मुसलमान तब दो नहीं रहेंगे और न ही उनमें कोई विवाद ही रहेगा।
मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने, लेकिन वास्तव में केवल पालनहार राम का ही मन्दिर बनना चाहिए, अन्य का नहीं। मेरा मक़सद तो आपको एक सच्चे मालिक की पहचान कराना है, आप हिन्दी-संस्कृत जानते हैं तो उसे उसमें पहचान लीजिए, अगर आप उर्दू-अरबी जानते हैं तो उसके ज़रिए जान लीजिये कि आप का एक मालिक है जिसने आपको ज़िन्दगी बतौर इम्तेहान दी है और वह आपसे आपके कर्मों का हिसाब लेगा। हमें चाहिए कि हम उसके सामने ज़ालिम और मुजरिम बनकर न जाएं। चारों तरफ़ तबाही मची हुई है, हम सच्चे दिल से तौबा करें और नेक राह पर चलें और दूसरों को भी नेकी की प्रेरणा दें।
Monday, August 30, 2010
About Namaz on road part 2nd मस्जिद को तिमंज़िली बना लीजिये और जब तक तामीर का काम पूरा हो तब तक नमाज़ दो या तीन शिफ़्टों में पढ़ लीजिये। इस तरह नमाज़ मस्जिद के अंदर ही अदा हो जायेगी और इबादत करने वाले जुल्म करने और लोगों के लिए फ़ित्ना बनने से बच जाएंगे। - Anwer Jamal
ऐ हमारे रब ! हमें इन्कारियों के लिए फ़ित्ना न बना और ऐ हमारे रब, हमें बख् दे, बेशक तू ज़बर्दस्त है, हिकमत वाला है। पवित्र कुरआन, 60, 5
दीन रहमत है, दीन ख़ैरख्वाही है, दीन अद्ल है, दीन फ़ज़्ल है, दीन हक़ है और ज़ुल्म बातिल है। दीन रहमत है न सिर्फ़ मुसलमानों के लिए बल्कि सबके लिए, सारे जहां के लिए। अगर कोई अमल दुनिया के ज़हमत बन रहा है, लोगों की हक़तल्फ़ी हो रही है, जुल्म हो रहा है तो यक़ीन कर लीजिये कि यह ‘कुछ और‘ है दीन हरगिज़ नहीं है।
ज़ुल्म इंसाफ़ का विलोम है। आम तौर पर लोग मारपीट और क़त्ल वग़ैरह को ही जुल्म मानते हैं लेकिन ‘ज़ुल्म‘ की परिभाषा है ‘चीज़ का ग़ैर महल‘ में इस्तेमाल करना यानि किसी चीज़ का वह इस्तेमाल करना जो उस चीज़ का सही इस्तेमाल न हो। मस्लन मस्जिद नमाज़ के लिए बनाई जाती है और लोग उसमें इबादत और एतकाफ़ न करें तो यह मस्जिद पर जुल्म है। इसी तरह सड़क इसलिए बनाई जाती है ताकि लोग उसपर चलकर अपनी ज़रूरतें पूरी करें। सड़क की स्वाभाविक प्रकृति उसपर चलना है। अगर कुछ लोग सड़क पर चलने के फ़ितरी अमल में ख़लल डालते हैं तो वे सड़क पर चलने वालों पर ही नहीं बल्कि खुद सड़क पर भी जुल्म करते हैं।
बारात,जुलूस और प्रदर्शनों की वजह से आये दिन लोग यह जुल्म सरे आम करते हैं। अक्सर इसे टाल दिया जाता है क्योंकि यह जुल्म करने वाले हक़ अदा करने का मिज़ाज ही कब रखते हैं, लेकिन हद तो तब हो जाती है कि जब यह जुल्म वह तबक़ा करता है जिसे रब ने ‘हक़ व इंसाफ़‘ का गवाह बनने के लिए ही उठाया हो, और फिर यह रास्ता रोकना भी इबादत करने के लिए हो तो जुर्म और भी ज़्यादा संगीन हो जाता है।
नमाज़ में दुआ मांगी जा रही है ‘दिखा और चला हमें सीधा रास्ता‘ और हालत यह है कि उनकी दुआ की ख़ातिर दूसरे बहुत से लोग रास्ता चलने से महरूम खड़े हैं या फिर दुश्वारी से गुज़र रहे हैं। यह सड़क पर भी जुल्म है और सड़क पर चलने वालों पर भी।
इसलिए कि मस्जिद छोटी पड़ जाती है और लोग ज़्यादा आ जाते हैं। इसका सीधा सा समाधान यह है कि मस्जिद को तिमंज़िली बना लीजिये और जब तक तामीर का काम पूरा हो तब तक नमाज़ दो या तीन शिफ़्टों में पढ़ लीजिये। इस तरह नमाज़ मस्जिद के अंदर ही अदा हो जायेगी और इबादत करने वाले जुल्म करने और लोगों के लिए फ़ित्ना बनने से बच जाएंगे।
हिन्दू भाईयों से हमेशा नमाज़ की अदायगी में सहयोग मिलता आया है, यह सच है और इसके लिए मुस्लिम समुदाय हिन्दू भाईयों का शुक्रगुज़ार है और खुद भी उनके आयोजनों में बाधा नहीं डालता लेकिन याद रहे कि लोगों को भड़काकर राजनीति करने वाले इंसान के रूप में शैतान भी हमारे दरम्यान ही रहते-बसते हैं। मुसलमानों को कोई भी मौक़ा शैतान को नहीं देना चाहिये जिसकी वजह से शैतान लीडर हिन्दू भाइयों और मुसलमान भाईयों को एक दूसरे के खि़लाफ़ खड़ा करने में कामयाब हो सके।
इसके अलावा एक बात यह कॉमन सेंस की है कि हम इस देश के नागरिक हैं और हम सभी को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। आदमी अपने घर से किसी ज़रूरत के तहत ही निकलता है। कहीं आग लग रही होती है और फ़ायर ब्रिगेड को समय पर पहुंचना होता है और बैंक लुट रही होती है, औरतों की इज़्ज़तों पर डाका पड़ रहा होता है और पुलिस उस तरफ़ भागी चली जा रही होती है। किसी मरीज़ को सीरियस कंडीशन में अस्पताल ले जाया जा रहा होता है या फिर छोटे बच्चे स्कूल से अपने घर लौट रहे होते हैं। इसके अलावा भी बहुत सी इमरजेंसी होती हैं जिनके सही समय पर पूरा न होने की वजह से बहुत से लोग अपनी जान और आबरू हमेशा के लिए गंवा बैठते हैं।
दीन रहमत है और मुसलमानों को चाहिए कि वे दुनिया में रहमत फैलाने वाले बनें न कि सोये हुए फ़ित्नों को जगाने की कोशिश करें। सड़क पर नमाज़ अदा करना सड़क पर और राहगीरों पर जुल्म है, अपनी नमाज़ को गुनाह से आलूदा करना है। खुदा पाक है और पाक अमल ही उसकी बारगाह तक पहुंचता है जो आदमी इतनी सी बात भी न पहचान सके, वह बेशऊर है। ये बेशऊर लोग जो रमज़ान में मस्जिदें भर देते हैं वे रमज़ान ख़त्म होते ही नदारद हो जाते हैं।
क्या नमाज़ रमज़ान के बाद फ़र्ज़ नहीं रहती ?
हक़ीक़त यह है कि उन्हें नमाज़, दीन और उसके तक़ाज़ों का सही शऊर ही नहीं था। अगर उन्हें वाक़ई मारिफ़त और शऊर होता तो वे बाद में भी नमाज़ के पाबन्द रहते। ये लोग नमाज़ पर भी जुल्म करते हैं। दीनी संस्थाओं से वाबस्ता लोगों को चाहिए वे लोगों में दीन का सही शऊर पैदा करें और मुस्लिम समाज को सही दिशा देकर देश और दुनिया को बेहतर संदेश दें।
दीन रहमत है, दीन ख़ैरख्वाही है, दीन अद्ल है, दीन फ़ज़्ल है, दीन हक़ है और ज़ुल्म बातिल है। दीन रहमत है न सिर्फ़ मुसलमानों के लिए बल्कि सबके लिए, सारे जहां के लिए। अगर कोई अमल दुनिया के ज़हमत बन रहा है, लोगों की हक़तल्फ़ी हो रही है, जुल्म हो रहा है तो यक़ीन कर लीजिये कि यह ‘कुछ और‘ है दीन हरगिज़ नहीं है।
ज़ुल्म इंसाफ़ का विलोम है। आम तौर पर लोग मारपीट और क़त्ल वग़ैरह को ही जुल्म मानते हैं लेकिन ‘ज़ुल्म‘ की परिभाषा है ‘चीज़ का ग़ैर महल‘ में इस्तेमाल करना यानि किसी चीज़ का वह इस्तेमाल करना जो उस चीज़ का सही इस्तेमाल न हो। मस्लन मस्जिद नमाज़ के लिए बनाई जाती है और लोग उसमें इबादत और एतकाफ़ न करें तो यह मस्जिद पर जुल्म है। इसी तरह सड़क इसलिए बनाई जाती है ताकि लोग उसपर चलकर अपनी ज़रूरतें पूरी करें। सड़क की स्वाभाविक प्रकृति उसपर चलना है। अगर कुछ लोग सड़क पर चलने के फ़ितरी अमल में ख़लल डालते हैं तो वे सड़क पर चलने वालों पर ही नहीं बल्कि खुद सड़क पर भी जुल्म करते हैं।
बारात,जुलूस और प्रदर्शनों की वजह से आये दिन लोग यह जुल्म सरे आम करते हैं। अक्सर इसे टाल दिया जाता है क्योंकि यह जुल्म करने वाले हक़ अदा करने का मिज़ाज ही कब रखते हैं, लेकिन हद तो तब हो जाती है कि जब यह जुल्म वह तबक़ा करता है जिसे रब ने ‘हक़ व इंसाफ़‘ का गवाह बनने के लिए ही उठाया हो, और फिर यह रास्ता रोकना भी इबादत करने के लिए हो तो जुर्म और भी ज़्यादा संगीन हो जाता है।
नमाज़ में दुआ मांगी जा रही है ‘दिखा और चला हमें सीधा रास्ता‘ और हालत यह है कि उनकी दुआ की ख़ातिर दूसरे बहुत से लोग रास्ता चलने से महरूम खड़े हैं या फिर दुश्वारी से गुज़र रहे हैं। यह सड़क पर भी जुल्म है और सड़क पर चलने वालों पर भी।
इसलिए कि मस्जिद छोटी पड़ जाती है और लोग ज़्यादा आ जाते हैं। इसका सीधा सा समाधान यह है कि मस्जिद को तिमंज़िली बना लीजिये और जब तक तामीर का काम पूरा हो तब तक नमाज़ दो या तीन शिफ़्टों में पढ़ लीजिये। इस तरह नमाज़ मस्जिद के अंदर ही अदा हो जायेगी और इबादत करने वाले जुल्म करने और लोगों के लिए फ़ित्ना बनने से बच जाएंगे।
हिन्दू भाईयों से हमेशा नमाज़ की अदायगी में सहयोग मिलता आया है, यह सच है और इसके लिए मुस्लिम समुदाय हिन्दू भाईयों का शुक्रगुज़ार है और खुद भी उनके आयोजनों में बाधा नहीं डालता लेकिन याद रहे कि लोगों को भड़काकर राजनीति करने वाले इंसान के रूप में शैतान भी हमारे दरम्यान ही रहते-बसते हैं। मुसलमानों को कोई भी मौक़ा शैतान को नहीं देना चाहिये जिसकी वजह से शैतान लीडर हिन्दू भाइयों और मुसलमान भाईयों को एक दूसरे के खि़लाफ़ खड़ा करने में कामयाब हो सके।
इसके अलावा एक बात यह कॉमन सेंस की है कि हम इस देश के नागरिक हैं और हम सभी को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। आदमी अपने घर से किसी ज़रूरत के तहत ही निकलता है। कहीं आग लग रही होती है और फ़ायर ब्रिगेड को समय पर पहुंचना होता है और बैंक लुट रही होती है, औरतों की इज़्ज़तों पर डाका पड़ रहा होता है और पुलिस उस तरफ़ भागी चली जा रही होती है। किसी मरीज़ को सीरियस कंडीशन में अस्पताल ले जाया जा रहा होता है या फिर छोटे बच्चे स्कूल से अपने घर लौट रहे होते हैं। इसके अलावा भी बहुत सी इमरजेंसी होती हैं जिनके सही समय पर पूरा न होने की वजह से बहुत से लोग अपनी जान और आबरू हमेशा के लिए गंवा बैठते हैं।
दीन रहमत है और मुसलमानों को चाहिए कि वे दुनिया में रहमत फैलाने वाले बनें न कि सोये हुए फ़ित्नों को जगाने की कोशिश करें। सड़क पर नमाज़ अदा करना सड़क पर और राहगीरों पर जुल्म है, अपनी नमाज़ को गुनाह से आलूदा करना है। खुदा पाक है और पाक अमल ही उसकी बारगाह तक पहुंचता है जो आदमी इतनी सी बात भी न पहचान सके, वह बेशऊर है। ये बेशऊर लोग जो रमज़ान में मस्जिदें भर देते हैं वे रमज़ान ख़त्म होते ही नदारद हो जाते हैं।
क्या नमाज़ रमज़ान के बाद फ़र्ज़ नहीं रहती ?
हक़ीक़त यह है कि उन्हें नमाज़, दीन और उसके तक़ाज़ों का सही शऊर ही नहीं था। अगर उन्हें वाक़ई मारिफ़त और शऊर होता तो वे बाद में भी नमाज़ के पाबन्द रहते। ये लोग नमाज़ पर भी जुल्म करते हैं। दीनी संस्थाओं से वाबस्ता लोगों को चाहिए वे लोगों में दीन का सही शऊर पैदा करें और मुस्लिम समाज को सही दिशा देकर देश और दुनिया को बेहतर संदेश दें।
Friday, August 27, 2010
About Namaz on road सड़क पर नमाज़ पढ़कर लोगों को तकलीफ़ न दें -Anwer Jamal
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ‘‘ तुम रास्ते में बैठने से बचो।‘‘
लोगों ने पूछा , ‘‘ऐ अल्लाह के रसूल ! यह तो हमारे लिए ज़रूरी है।‘‘
आपने फ़रमाया, ‘‘ अगर तुम्हारे लिए यह ज़रूरी है तो रास्ते को उसका हक़ दो।‘‘
उन्होंने मालूम किया कि ‘‘रास्ते का क्या हक़ है ?‘‘
आप स. ने फ़रमाया, ‘‘निगाहें नीची रखना, तकलीफ़ देने वाली चीज़ों को रास्ते से हटा देना, सलाम का जवाब देना, नेकी का हुक्म देना और बुराई से मना करना।‘‘ -बुख़ारी, मुस्लिम
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आज एक इलैक्ट्रिक उपकरण सही कराने के लिए रेलवे क्रासिंग पार जाना हुआ तो देखा कि सड़क किनारे बनी हुई एक छोटी सी मस्जिद के बाहर दो लेन वाली सड़कों में से एक को स्टूल वग़ैरह लगाकर ब्लॉक कर दिया है। यह देखते ही मेरे दिल पर एक घुटन सी छा गई। सड़क चलने वालों के लिए बनाई गई है या नमाज़ पढ़ने के लिए ?
क्या सरकारी सड़क पर क़ब्ज़ा करना एक ग़ैर-इस्लामी और हराम काम नहीं है ?
क्या नाजायज़ क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ना भी नाजायज़ नहीं है ?
आज जुमा का दिन है और रमज़ान का महीना है यानि हराम काम से बचने की प्रैक्टिस का महीना है। आज तो हरेक गुनाह से बहुत ही ज़्यादा बचने की कोशिश करनी चाहिए न कि अपनी इबादत को ही गुनाह से आलूदा कर लिया जाए।
अल्लाह के रसूल स. ने तो आम हालात में लोगों का सड़कों पर बैठना पसंद नहीं फ़रमाया और लोगों को तिजारत वग़ैरह जायज़ ज़रूरतों की वजह से वहां बैठने की इजाज़त दी भी तो कुछ शर्तों के साथ कि वे रास्ता चलने वालों का हक़ न मारें, उनके लिए परेशानी खड़ी न करें बल्कि अगर उन्हें परेशान करने वाली कोई झाड़ी वग़ैरह वहां पड़ी हो तो उसे हटा दें।
आज उल्टा हो रहा है कि सड़क पर जहां कुछ भी पड़ा हुआ नहीं है वहां स्टूल वग़ैरह डालकर उसे ब्लॉक किया जा रहा है। परेशान राहगीर मुसलमानों के साथ-साथ उनकी नमाज़ और उनके दीन को भी कोसेंगे। इबादतख़ाने के बाहर दीन के खि़लाफ़ अमल हो रहा है और कर कौन रहे हैं ?, जिनपर लोगों को दीन का सही शऊर देने की ज़िम्मेदारी है। यानि कि वे खुद दीन के सही शऊर से कोरे हैं।
ऐसे मौक़े पर प्रशासन मात्र इस वजह से ख़ामोश रहता है कि उसके हस्तक्षेप से बात सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ जाएगी। उसकी ख़ामोशी से यह मतलब निकाल लिया जाता है कि प्रशासन के दख़लअंदाज़ी न करने का मतलब यह है कि उनके काम पर प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं है।
शहर में बड़ी-बड़ी मस्जिदें हैं, उनमें जाईये। थोड़ा पहले निकलिये, अपने वक्त की कुरबानी दीजिये या फिर अपने माल की कुरबानी दीजिए और संभव हो तो आस-पास की जगह ख़रीदकर अपने पास की मस्जिद को ही अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ बड़ी बना लीजिए।
जो लोग न अपने माल की कुरबानी देना चाहते हैं और न ही अपने वक्त की, उन्हें अपनी सुविधा के लिए शहर के दूसरे तमाम राहगीरों को तकलीफ़ देने और दीन को कलंकित करने का कोई हक़ नहीं है।
2-कोई कह सकता है कि जागरण और कांवड़ जैसे धार्मिक कार्यों के लिए भी तो सड़कें ब्लॉक कर दी जाती हैं ?
इस बारे में यह कहा जाएगा कि नबी स. का फ़रमान आपके सामने हैं और एक मुस्लिम की हैसियत से आप उसे मानने के लिए पाबंद हैं। आप खुद को समाज के लिए नफ़ाबख्श बनाईये, अच्छी मिसाल क़ायम कीजिये, दूसरों तक आपकी अच्छाई का असर पहुंचेगा तो हो सकता है कि वे भी अपने व्यवहार पर विचार करें।
रमज़ान के महीने में विभिन्न दीनी संस्थाएं लोगों को रोज़े के क़ायदे-क़ानून समझाने और उनसे चन्दे की अपील करने के लिए कैलेंडर आदि छापते-बांटते हैं। इन संस्थाओं को रमज़ान के महीने में ‘सड़क पर नमाज़ की अदायगी‘ जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी दीनी हुक्म प्रकाशित और प्रचारित करना चाहिये। मस्जिदों के इमाम साहिबान को भी अपने खुत्बों में इस पर लोगों को सही जानकारी देनी चाहिये।
3-इसी मस्जिद से दस क़दम की दूरी पर शहर का एक बेहद महंगा होटल है। वापस लौटते हुए देखा कि होटल के सामने सड़क के डिवाइडर पर रखकर आतिशबाज़ी की जा रही है और उसकी भयानक आवाज़ से मैं लगातार दहलता रहा और सोचता रहा कि अगर किसी वजह से आतिशबाज़ी के यंत्र की दिशा बदल गई तो उसकी चपेट में आकर कोई भी घायल हो सकता है। खुशियों के अवसर पर होने वाली आतिशबाज़ी और फ़ायरिंग से होने वाली मौत की ख़बरें आये दिन अख़बारों में छपती रहती हैं लेकिन लोग फिर भी झूठे दिखावे से बाज़ नहीं आते।
शर्म की बात है कि इसी देश में लोग रोटी और दवाओं जैसी बुनियादी ज़रूरतों को तरस रहे हैं और कुछ लोग दिखावे की ख़ातिर दौलत में आग लगा रहे हैं। यह बेशऊरी आम है पूरे देश में, हर इलाक़े में। खुद आतिशबाज़ के कपड़े उसकी ग़ुरबत का ऐलान कर रहे थे। मासूम बच्चों के सिरों पर रौशनी के हण्डे रखकर बारात निकालने वाले और बारात में शराब पीकर नाचने वाले सिर्फ़ यह दिखा रहे हैं कि उन्हें किसी के दुख से कोई मतलब नहीं है। फिर ऐसे लोगों का समाज अपने नेताओं से यह अपेक्षा क्यों रखता है कि वे उनकी परेशानियों पर समुचित ध्यान दें ?
बेशऊरी आम है हर तरफ़ और रमज़ान का मुक़द्दस महीना चल ही रहा है। मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वे रमज़ान का हक़ अदा करें और अपने अन्दर दीन का सही शऊर जगायें। भूखों-प्यासों के दर्द को समझने के लिये रोज़ा बेहतरीन ज़रिया है। खुदा की रहमत पाने के लिए खुद लोगों के साथ रहम का बर्ताव कीजिये। सड़क रोककर नमाज़ न पढ़ना भी लोगों के साथ रहम के बर्ताव में से ही एक अमल है। शुरूआत इसी से कीजिये।
लोगों ने पूछा , ‘‘ऐ अल्लाह के रसूल ! यह तो हमारे लिए ज़रूरी है।‘‘
आपने फ़रमाया, ‘‘ अगर तुम्हारे लिए यह ज़रूरी है तो रास्ते को उसका हक़ दो।‘‘
उन्होंने मालूम किया कि ‘‘रास्ते का क्या हक़ है ?‘‘
आप स. ने फ़रमाया, ‘‘निगाहें नीची रखना, तकलीफ़ देने वाली चीज़ों को रास्ते से हटा देना, सलाम का जवाब देना, नेकी का हुक्म देना और बुराई से मना करना।‘‘ -बुख़ारी, मुस्लिम
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आज एक इलैक्ट्रिक उपकरण सही कराने के लिए रेलवे क्रासिंग पार जाना हुआ तो देखा कि सड़क किनारे बनी हुई एक छोटी सी मस्जिद के बाहर दो लेन वाली सड़कों में से एक को स्टूल वग़ैरह लगाकर ब्लॉक कर दिया है। यह देखते ही मेरे दिल पर एक घुटन सी छा गई। सड़क चलने वालों के लिए बनाई गई है या नमाज़ पढ़ने के लिए ?
क्या सरकारी सड़क पर क़ब्ज़ा करना एक ग़ैर-इस्लामी और हराम काम नहीं है ?
क्या नाजायज़ क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ना भी नाजायज़ नहीं है ?
आज जुमा का दिन है और रमज़ान का महीना है यानि हराम काम से बचने की प्रैक्टिस का महीना है। आज तो हरेक गुनाह से बहुत ही ज़्यादा बचने की कोशिश करनी चाहिए न कि अपनी इबादत को ही गुनाह से आलूदा कर लिया जाए।
अल्लाह के रसूल स. ने तो आम हालात में लोगों का सड़कों पर बैठना पसंद नहीं फ़रमाया और लोगों को तिजारत वग़ैरह जायज़ ज़रूरतों की वजह से वहां बैठने की इजाज़त दी भी तो कुछ शर्तों के साथ कि वे रास्ता चलने वालों का हक़ न मारें, उनके लिए परेशानी खड़ी न करें बल्कि अगर उन्हें परेशान करने वाली कोई झाड़ी वग़ैरह वहां पड़ी हो तो उसे हटा दें।
आज उल्टा हो रहा है कि सड़क पर जहां कुछ भी पड़ा हुआ नहीं है वहां स्टूल वग़ैरह डालकर उसे ब्लॉक किया जा रहा है। परेशान राहगीर मुसलमानों के साथ-साथ उनकी नमाज़ और उनके दीन को भी कोसेंगे। इबादतख़ाने के बाहर दीन के खि़लाफ़ अमल हो रहा है और कर कौन रहे हैं ?, जिनपर लोगों को दीन का सही शऊर देने की ज़िम्मेदारी है। यानि कि वे खुद दीन के सही शऊर से कोरे हैं।
ऐसे मौक़े पर प्रशासन मात्र इस वजह से ख़ामोश रहता है कि उसके हस्तक्षेप से बात सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ जाएगी। उसकी ख़ामोशी से यह मतलब निकाल लिया जाता है कि प्रशासन के दख़लअंदाज़ी न करने का मतलब यह है कि उनके काम पर प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं है।
शहर में बड़ी-बड़ी मस्जिदें हैं, उनमें जाईये। थोड़ा पहले निकलिये, अपने वक्त की कुरबानी दीजिये या फिर अपने माल की कुरबानी दीजिए और संभव हो तो आस-पास की जगह ख़रीदकर अपने पास की मस्जिद को ही अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ बड़ी बना लीजिए।
जो लोग न अपने माल की कुरबानी देना चाहते हैं और न ही अपने वक्त की, उन्हें अपनी सुविधा के लिए शहर के दूसरे तमाम राहगीरों को तकलीफ़ देने और दीन को कलंकित करने का कोई हक़ नहीं है।
2-कोई कह सकता है कि जागरण और कांवड़ जैसे धार्मिक कार्यों के लिए भी तो सड़कें ब्लॉक कर दी जाती हैं ?
इस बारे में यह कहा जाएगा कि नबी स. का फ़रमान आपके सामने हैं और एक मुस्लिम की हैसियत से आप उसे मानने के लिए पाबंद हैं। आप खुद को समाज के लिए नफ़ाबख्श बनाईये, अच्छी मिसाल क़ायम कीजिये, दूसरों तक आपकी अच्छाई का असर पहुंचेगा तो हो सकता है कि वे भी अपने व्यवहार पर विचार करें।
रमज़ान के महीने में विभिन्न दीनी संस्थाएं लोगों को रोज़े के क़ायदे-क़ानून समझाने और उनसे चन्दे की अपील करने के लिए कैलेंडर आदि छापते-बांटते हैं। इन संस्थाओं को रमज़ान के महीने में ‘सड़क पर नमाज़ की अदायगी‘ जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी दीनी हुक्म प्रकाशित और प्रचारित करना चाहिये। मस्जिदों के इमाम साहिबान को भी अपने खुत्बों में इस पर लोगों को सही जानकारी देनी चाहिये।
3-इसी मस्जिद से दस क़दम की दूरी पर शहर का एक बेहद महंगा होटल है। वापस लौटते हुए देखा कि होटल के सामने सड़क के डिवाइडर पर रखकर आतिशबाज़ी की जा रही है और उसकी भयानक आवाज़ से मैं लगातार दहलता रहा और सोचता रहा कि अगर किसी वजह से आतिशबाज़ी के यंत्र की दिशा बदल गई तो उसकी चपेट में आकर कोई भी घायल हो सकता है। खुशियों के अवसर पर होने वाली आतिशबाज़ी और फ़ायरिंग से होने वाली मौत की ख़बरें आये दिन अख़बारों में छपती रहती हैं लेकिन लोग फिर भी झूठे दिखावे से बाज़ नहीं आते।
शर्म की बात है कि इसी देश में लोग रोटी और दवाओं जैसी बुनियादी ज़रूरतों को तरस रहे हैं और कुछ लोग दिखावे की ख़ातिर दौलत में आग लगा रहे हैं। यह बेशऊरी आम है पूरे देश में, हर इलाक़े में। खुद आतिशबाज़ के कपड़े उसकी ग़ुरबत का ऐलान कर रहे थे। मासूम बच्चों के सिरों पर रौशनी के हण्डे रखकर बारात निकालने वाले और बारात में शराब पीकर नाचने वाले सिर्फ़ यह दिखा रहे हैं कि उन्हें किसी के दुख से कोई मतलब नहीं है। फिर ऐसे लोगों का समाज अपने नेताओं से यह अपेक्षा क्यों रखता है कि वे उनकी परेशानियों पर समुचित ध्यान दें ?
बेशऊरी आम है हर तरफ़ और रमज़ान का मुक़द्दस महीना चल ही रहा है। मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वे रमज़ान का हक़ अदा करें और अपने अन्दर दीन का सही शऊर जगायें। भूखों-प्यासों के दर्द को समझने के लिये रोज़ा बेहतरीन ज़रिया है। खुदा की रहमत पाने के लिए खुद लोगों के साथ रहम का बर्ताव कीजिये। सड़क रोककर नमाज़ न पढ़ना भी लोगों के साथ रहम के बर्ताव में से ही एक अमल है। शुरूआत इसी से कीजिये।
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