सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



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Wednesday, September 22, 2010

Mandir-Masjid मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने - Anwer Jamal

शीर्षक ही ग़लत
‘राम मन्दिर-बाबरी मस्जिद विवाद‘ का शीर्षक ही ग़लत है। इस विवाद के अब तक न सुलझ पाने का एक बड़ा कारण यह भी है। राम मन्दिर उस जगह का नाम इसलिए हुआ कि रामभक्त उस जगह राम मन्दिर बनाना चाहते हैं जिसमें राम की पूजा-उपासना की जाएगी। मस्जिद में उस पैदा करने वाले मालिक की पूजा की जाती है इसलिए मस्जिद के साथ बाबर बादशाह का नाम जोड़ने के बजाय उस सच्चे बादशाह का नाम जोड़ना ज़्यादा उचित है जिसकी पूजा-इबादत मस्जिद में की जाती है और मस्जिद का मालिक भी वही है।
जिसे ‘राम‘ कहते हैं उसी को ‘रहीम‘ कहते हैं

‘राम मन्दिर-रहीम मस्जिद विवाद‘ इस प्रकरण के लिए पूरी तरह उचित है। यदि इतना भी कर लिया जाए तो राजनीतिबाज़ों की फैलाई सारी नफ़रतें पल भर में काफ़ूर हो सकती हैं। क्योंकि राम भी उसी मालिक का नाम है और रहीम भी, संस्कृत में जिसे ‘राम‘ कहते हैं अरबी में उसी को ‘रहीम‘ कहते हैं।
जो सदा से है, जिसने किसी से जन्म नहीं लिया और न ही किसी को इनसानों की तरह जन्म दिया, जो सब कुछ जानता है और हर तरह की शक्ति जिसके अधीन है, उस अजन्मे-अविनाशी एक ही पालनहार को राम और रहीम कहा जाता है।
मस्जिद में मुसलमान जिस मालिक की पूजा-इबादत करते हैं हिन्दू भाई उसे ही राम कहते हैं। मस्जिद कहते हैं उस जगह को जहां मालिक को बड़ा मानकर बन्दे खुद को छोटा ज़ाहिर करने के लिए उसके सामने ‘सज्दा‘ करते हैं। सज्दे को संस्कृत में साष्टांग कहते हैं।
नमाज़ में चार मुख्य आसन इस प्रकार हैं-
गीता में  नमाज़
1. क़ियाम - स्थिर आसन अर्थात खड़ा होना।
2. रूकूअ़ - जानुबद्ध आसन अर्थात घुटनों पर हाथ रखकर झुके होने की दशा में कमर को सीधा रखना।
3. सज्दा - साष्टांग अर्थात वह आसन जिसमें धरती को शरीर के आठ अंग स्पर्श करें।
4. क़ाइदा - उपविश्यासन या वज्रासन अर्थात दोनों घुटने मोड़कर बैठना।

गीता के 6ठे अध्याय के 10वें ‘लोक से 14वें ‘लोक तक सूक्ष्म रूप में इन चारों आसनों का वर्णन है और 15वें ‘लोक में इस रीति से योग करने वाले को मृत्यु के बाद भगवद्धाम की प्राप्ति होना बताया है।
इससे पता चलता है कि हिन्दू मनीषियों के लिए न तो नमाज अपरिचित है और न ही वह मालिक जिसके लिए नमाज में नमन और साष्टांग किया जाता है। वस्तुतः नमाज़ भी अरबी भाषा का शब्द नहीं है, यह फ़ारसी भाषा का शब्द है जो संस्कृत से विशेष रूप से क़रीब है। नमाज़ को अरबी में ‘सलात‘ बोलते हैं। ईरान में इस्लाम आया तो उन्होंने अल्लाह को खुदा और सलात को नमाज़ कहा। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ा।
मस्जिद में उसी एक पालनहार को नमन किया जाता है जिसे हिन्दू भाई ‘राम‘ कहते हैं। अगर भाषा भेद से ऊपर उठकर देखा जाए तो मस्जिद तो वास्तव में होती ही है ‘राम मन्दिर‘। मस्जिद इतने ज़्यादा आदर्श रूप में राम मन्दिर होती है कि उससे ज़्यादा बना पाना तो दूर कोई सोच भी नहीं सकता।
रामभक्त जब बाबरी मस्जिद पर कुदाल चलाकर खुश हो रहे थे और सोच रहे थे कि वे एक मस्जिद ढहा रहे हैं तब वास्तव में वे एक ‘राम मन्दिर‘ ही ढहा रहे थे और ऐसा राम मन्दिर ढहा रहे थे जैसा कि वे अपने जीवन में कभी बनाने की सोच भी नहीं सकते। ये लोग अपने साथ बाबरी मस्जिद की ईंटें लेकर गये और उनके साथ तरह-तरह से अपमानजनक बर्ताव करके अपनी कुंठाओं को शांत किया। उनके बुरे नतीजे भी सामने आये और आज तक आ ही रहे हैं।
आज भारत विश्व की एक उभरती हुई शक्ति है लेकिन हम खुद अन्दर से ही कमज़ोर हैं। मन्दिर-मस्जिद के विवाद को न सुलझा पाना हमारी एक ऐसी कमज़ोरी है जिसे आज सारी दुनिया देख रही है। ऐसे में क्या तो हमारी छवि बनेगी और कौन हमसे मार्गदर्शन लेगा ?
राम नाम में शक्ति है
  • हम कहते हैं कि राम नाम में शक्ति है, अल्लाह के नाम में ताक़त है। हमारे धर्मगुरू सत्य और न्याय की बात करते हैं। तब क्यों नहीं हमारे धर्मगुरू बताते कि राम कौन है और रहीम कौन है ?

  • उसकी पूजा-इबादत की सही रीति क्या है ?

  • उसके बन्दों के दरम्यान जब विवाद की नौबत आ जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए ?

राम के भक्त और रहीम के बन्दे आपस में लड़ेंगे तो उनका मालिक उनसे राज़ी नहीं होगा और उनके हालात देखकर दूसरे बहुत से लोग ईश्वर और धर्म से पल्ला झाड़कर नास्तिक ज़रूर बन जाएंगे। इन सबके पापों का बोझ भी उनपर ही पड़ेगा।
रामचन्द्र  उपासक थे , उपासनीय नहीं यह आलिम-ज्ञानियों का काम है। उनका कर्तव्य है कि वे लोगों को बताएं कि राम-रहीम एक ही मालिक के नाम हैं और यह कि रामचन्द्र जी जीवन भर उपासना करते रहे, वे उपासक थे , उपासनीय नहीं हैं। वे सर्वज्ञ नहीं थे, दूसरे राजकुमारों की तरह उन्होंने भी वसिष्ठ को गुरू बनाकर उनसे ज्ञान प्राप्त किया। वे सर्वशक्तिमान भी नहीं थे, उन्हें अपनी योजनाओं को सफल बनाने के लिए बहुत से लोगों से सहयोग लेना पड़ा। उन्होंने त्याग किया, कष्ट सहे, संघर्ष किया और विजय पाई। उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहकर याद किया जाता है। उन्हें ईश्वर कहना उनके सारे परिश्रम पर पानी फेरना है, ईश्वर की अवज्ञा करना है। ईश्वर उपासनीय है और श्री रामचन्द्र जी आदरणीय हैं।
इतने दंगे हुए, इतना खून बहा लेकिन आज भी मुसलमानों श्री रामचन्द्र जी का नाम आदर से ही लेते हैं। नफ़रत की बुनियाद पर भ्रम की दीवारें खड़ी करने वाले तो पवित्र कुरआन के विरूद्ध पत्रक छापकर बांटते देखे जा सकते हैं लेकिन किसी मुसलमान आलिम ने आज तक रामायण से लेकर कोई पत्रक तैयार नहीं किया।
ज़्यादातर हिन्दू और ज़्यादातर मुसलमान शांतिप्रिय हैं। नफ़रत फैलाने वाले कम हैं और आजकल तो कमज़ोर भी हैं।
‘जोड़ो और राज करो‘ की नीति पर चलने का समय  है
राम का सच्चा स्वरूप सामने आते ही मन्दिर-मस्जिद विवाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। आज तक बांटो और राज करो की नीति पर चला गया। अब ‘जोड़ो और राज करो‘ की नीति पर चलने का समय आ गया है। भारत को नये चैलेंजेज़ के मुक़ाबले के लायक़ बनाने के लिए और उसे विश्व का सिरमौर बनाने के लिए अब यही एकमात्र मार्ग है। यदि इस मार्ग पर आगे न बढ़ा गया तो अपनी आपसी लड़ाईयों से ही हम खुद तबाह हो जाएंगे।

राम तारक मंत्र इस तबाही से बचा सकता है-

राम रामायः नमः
अर्थात राम के राम के लिए नमन है।

मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने
जिस राम को यहां नमन किया जा रहा है, उसके स्वरूप का परिचय आम किया जाए तो हिन्दू और मुसलमान तब दो नहीं रहेंगे और न ही उनमें कोई विवाद ही रहेगा।
मैं चाहता हूं कि अयोध्या में राम मन्दिर बने, लेकिन वास्तव में केवल पालनहार राम का ही मन्दिर बनना चाहिए, अन्य का नहीं। मेरा मक़सद तो आपको एक सच्चे मालिक की पहचान कराना है, आप हिन्दी-संस्कृत जानते हैं तो उसे उसमें पहचान लीजिए, अगर आप उर्दू-अरबी जानते हैं तो उसके ज़रिए जान लीजिये कि आप का एक मालिक है जिसने आपको ज़िन्दगी बतौर इम्तेहान दी है और वह आपसे आपके कर्मों का हिसाब लेगा। हमें चाहिए कि हम उसके सामने ज़ालिम और मुजरिम बनकर न जाएं। चारों तरफ़ तबाही मची हुई है, हम सच्चे दिल से तौबा करें और नेक राह पर चलें और दूसरों को भी नेकी की प्रेरणा दें।

Thursday, August 12, 2010

Oneness एकता से बढ़कर है ‘एकत्व‘ जो कि राम के भक्त और रहीम के बन्दों के दरम्यान पहले से ही मौजूद है लेकिन उन्हें बोध नहीं है। दोनों के ही लिये वासनाओं के पीछे दौड़ना जायज़ नहीं है। -Anwer Jamal

हिन्दू हो या मुसलमान, हरेक को उस अजन्मे अविनाशी सृष्टिकर्ता परमेश्वर के आदेश का पालन उस रीति से करना चाहिये जिस तरह ऋषियों ने करके दिखाया।
कुरआन परमेश्वर की वाणी है और हज़रत मुहम्मद साहब स. उसके दूत हैं इसीलिये हम उनका अनुकरण करते हैं। आप भी उनका अनुकरण कीजिये लेकिन अगर आप कुरआन को परमेश्वर की वाणी और हज़रत मुहम्मद साहब स. को उसका दूत नहीं मानते तो आप जिस ग्रंथ में निर्भ्रांत सत्य पायें और जिस व्यक्ति में ऋषि का मूल लक्षण; ‘सर्वविद्याओं का यथावत जानना‘ पायें उसका अनुकरण करें। अपनी वासना के पीछे दौड़ना न मुसलमान के लिये जायज़ है और न ही हिन्दू के लिये। यही वासना भ्रष्टाचार का मूल है जो देश-समाज को किसी घुन की तरह चाट रहा है। कल्याण के लिये ‘तत्व‘ को समझना ज़रूरी है। सृष्टिकर्ता को मुसलमान अल्लाह, रहमान, रहीम और हिन्दू भाई ईश्वर, ब्रह्म और राम कहते हैं। उसे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और न्यायकारी बताते हैं। हरेक चीज़ को उसी ‘एक‘ के द्वारा उत्पन्न किया जाना मानते हैं। भलाई-बुराई का फल भी उसी के द्वारा दिया जाना मानते हैं। लोग एकता की बातें करते हैं लेकिन मैं ‘एकत्व‘ का बोध कराना चाहता हूं। लोगों को चाहिये कि वे अपने लिये जो व्यवहार पसंद करते हैं वही दूसरों के साथ भी करें।
भाई सुज्ञ के अनुरोध पर मैं यह टिप्पणी एक पोस्ट के रूप में पेश कर रहा हूं उम्मीद है कि राम के भक्त और रहीम के बन्दे इस पर अपेक्षित ध्यान देकर खुद को वासनाओं की भंवर से निकालने और देश-समाज को बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे।
  • रमज़ान के इस पवित्र माह में अब ब्लॉगिंग के लिये समय मिल पाना मुश्किल है, सो अब कभी-कभार ही कहने-सुनने का मौक़ा मिल पाएगा।