सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Monday, July 12, 2010
Death on namazsheet जीवन का सबसे बड़ा सच मौत है। मौत आदमी के सामने है और आदमी अपनी मौत से ग़ाफ़िल है। -Anwer Jamal
हर नफ़्स को मौत का मज़ा चखना है और तुम्हें पूरा बदला तो बस क़ियामत के दिन मिलेगा, सो जो शख्स आग से बच जाए और जन्नत में दाखि़ल किया जाए वही कामयाब रहा और दुनिया की ज़िन्दगी तो बस धाखे का सौदा है। यक़ीनन तुम अपने जान और माल में आज़माए जाओगे, और तुम बहुत सी दुखदायी बातें सुनोगे उनसे जिन्हें तुमसे पहले ‘किताब‘ मिली और उनसे भी जिन्होंने शिर्क किया। आलेइमरान, 184
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मुबारक पब्लिक स्कूल हापुड़ का एक मशहूर और पुराना स्कूल है। जनाब अनवार अहमद साहब की वालिदा ने बेशुमार बच्चों को तालीम के ज़ेवर से आरास्ता किया और फिर उनके बाद उनकी औलाद ने भी उस शमा ए इल्म को बुझने न दिया। हापुड़ के लोग अनवार साहब को मास्टर अनवार के नाम से जानते हैं। ‘मास्टर‘ लफ़्ज़ उनके नाम का हिस्सा ही बनकर रह गया है। इसके अलावा पब्लिशिंग का काम भी है। परसों मास्टर अनवार साहब का फ़ोन आया। उन्होंने ग़मज़दा से लहजे में बताया कि उनकी बहन सबीहा का 7 जुलाई 2010 को रात 10ः30 बजे सिर्फ़ 45 की उम्र में इंतिक़ाल हो गया है। उन्होंने अपने पीछे 3 बच्चे छोड़े हैं। एक लड़का बिलाल-18 साल,दो लड़कियां अस्फी-12 साल और सुमय्या-9 साल। उनके पति पिछले 25 साल से दुबई में ही काम करते हैं। मौत की ख़बर सुनकर वे आए और पछताए कि उनकी पत्नी उनसे हिंदुस्तान में रहने के लिए कहती रही लेकिन वे नहीं माने । शायद अब वे दुबई न लौटेंगे।
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन ।
अर्थात हम सब अल्लाह के हैं और बेशक हम सबको उसी की तरफ़ लौटना है।
इनसान की ज़िंदगी धोखे में बीत रही है। जहां उसे लौटकर जाना है उसकी तरफ़ न तो उसका ध्यान है और न ही वहां काम आने वाले सत्कर्मों को करने की फ़िक्र। अगर लोगों को बताया जाए कि तुम्हारा एक मालिक है वह तुम्हें धरती से क़ियामत के दिन सशरीर निकालेगा ताकि तुम्हें तुम्हारे कामों का सिला दिया जाए तो हर वह आदमी इस बात का विरोध करने लगता है जिसके दर्शन से यह सत्य टकराता है या उसके हितों पर चोट पड़ती है। जो लोग रास्ता देखना ही नहीं चाहते वे सत्य के प्रचारकों को तरह तरह की दुख देने वाली बातें कहते हैं। लेकिन सच्चा हमदर्द वही है जो उनकी बातों को इग्नोर करके उन्हें परम सत्य से आगाह करता रहे। जीवन का सबसे बड़ा सच मौत है। मौत आदमी के सामने है और आदमी अपनी मौत से ग़ाफ़िल है।
सबीहा साहिबा वैसे भी नेक तबियत की मालिका थीं और मौत से कुछ वक्त पहले उन्होंने अल्लाह से तौबा की, तसबीह लेकर नमाज़ पढ़ने के लिए मुसल्ले पर बैठीं और उनकी रूह परवाज़ कर गई। वे डायबिटीज़ की पेशेंट थीं।
अल्लाह उनकी मग़फ़िरत फ़रमाये और हमें उनकी मौत से सबक़ लेकर जागने और ज़्यादा से ज़्यादा नेक अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये। आमीन
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मुबारक पब्लिक स्कूल हापुड़ का एक मशहूर और पुराना स्कूल है। जनाब अनवार अहमद साहब की वालिदा ने बेशुमार बच्चों को तालीम के ज़ेवर से आरास्ता किया और फिर उनके बाद उनकी औलाद ने भी उस शमा ए इल्म को बुझने न दिया। हापुड़ के लोग अनवार साहब को मास्टर अनवार के नाम से जानते हैं। ‘मास्टर‘ लफ़्ज़ उनके नाम का हिस्सा ही बनकर रह गया है। इसके अलावा पब्लिशिंग का काम भी है। परसों मास्टर अनवार साहब का फ़ोन आया। उन्होंने ग़मज़दा से लहजे में बताया कि उनकी बहन सबीहा का 7 जुलाई 2010 को रात 10ः30 बजे सिर्फ़ 45 की उम्र में इंतिक़ाल हो गया है। उन्होंने अपने पीछे 3 बच्चे छोड़े हैं। एक लड़का बिलाल-18 साल,दो लड़कियां अस्फी-12 साल और सुमय्या-9 साल। उनके पति पिछले 25 साल से दुबई में ही काम करते हैं। मौत की ख़बर सुनकर वे आए और पछताए कि उनकी पत्नी उनसे हिंदुस्तान में रहने के लिए कहती रही लेकिन वे नहीं माने । शायद अब वे दुबई न लौटेंगे।
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन ।
अर्थात हम सब अल्लाह के हैं और बेशक हम सबको उसी की तरफ़ लौटना है।
इनसान की ज़िंदगी धोखे में बीत रही है। जहां उसे लौटकर जाना है उसकी तरफ़ न तो उसका ध्यान है और न ही वहां काम आने वाले सत्कर्मों को करने की फ़िक्र। अगर लोगों को बताया जाए कि तुम्हारा एक मालिक है वह तुम्हें धरती से क़ियामत के दिन सशरीर निकालेगा ताकि तुम्हें तुम्हारे कामों का सिला दिया जाए तो हर वह आदमी इस बात का विरोध करने लगता है जिसके दर्शन से यह सत्य टकराता है या उसके हितों पर चोट पड़ती है। जो लोग रास्ता देखना ही नहीं चाहते वे सत्य के प्रचारकों को तरह तरह की दुख देने वाली बातें कहते हैं। लेकिन सच्चा हमदर्द वही है जो उनकी बातों को इग्नोर करके उन्हें परम सत्य से आगाह करता रहे। जीवन का सबसे बड़ा सच मौत है। मौत आदमी के सामने है और आदमी अपनी मौत से ग़ाफ़िल है।
सबीहा साहिबा वैसे भी नेक तबियत की मालिका थीं और मौत से कुछ वक्त पहले उन्होंने अल्लाह से तौबा की, तसबीह लेकर नमाज़ पढ़ने के लिए मुसल्ले पर बैठीं और उनकी रूह परवाज़ कर गई। वे डायबिटीज़ की पेशेंट थीं।
अल्लाह उनकी मग़फ़िरत फ़रमाये और हमें उनकी मौत से सबक़ लेकर जागने और ज़्यादा से ज़्यादा नेक अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये। आमीन
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