सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Thursday, November 4, 2010
What was before Darshan आप सोचिए कि दर्शन धर्म का आधार होते तो दर्शन की रचना होने से पहले के लोग क्या धर्म से हीन थे ?- Anwer Jamal
पंकज सिंह राजपूत ने कहा…
D@@@@@ R. ANWER JAMAL
साहब बिल्कुल, उम्मीद लायक जबाब दिया आपने - मैं बच्चों की तरह रंगों की कोई पहेलियाँ नहीं बुछा रहा और न तो आपके सामान्य ज्ञान की परीक्षा ले रहा हूँ - मै तो इन निम्न वाक्यों की तरफ आप का ध्यान दिलाना चाहता हूँ -
परमेश्वर के वचन के अर्थ निर्धारण के लिए केवल मनुष्य की बुद्धि काफ़ी नहीं है। इसे आप परमेश्वर की वाणी कुरआन के आलोक में देखिए।
आप का कहना है की दर्शन और धर्म में अंतर है, (आपकी मूल समस्या)
परन्तु वैदिक धर्म का तो आधार ही दर्शन है, इसीलिए ये छोटा सा प्रश्न पूछा -
ईश्वर (परमेश्वर) तत्त्व है या व्यक्तित्व ?
फोन पर तो आप केवल मेरी जिज्ञासा ही शांत कर पायेंगे, परन्तु जिज्ञासु तो यहाँ और भी है, उनका भी ख्याल कीजिये !!!!
बाकी पत्तियों वाली बात और रंगों वाली बात, इस जिज्ञासा की शांति के बाद !!!!
प्रतीक्षा उत्तर की OOOOOOOOOOOOO..............
.....................................................................................................................................
प्यारे भाई पंकज सिंह राजपूत जी ! आपका और आपके सवालों का स्वागत है।
आपने लिखा है कि मेरी मूल समस्या यह है कि मैं धर्म और दर्शन में अंतर करता हूं। जबकि वैदिक धर्म का आधार ही दर्शन हैं।
मेरे भाई , आप ज़रा सा ग़ौर करते तो समझ लेते कि सनातनी और आर्य समाजी दोनों तरफ़ के विद्वान धर्म का आधार ‘वेद‘ को मानते हैं। वेद जितने समय पुराने हैं दर्शन उतने पुराने नहीं हैं। दर्शनों की रचना उनके बहुत बाद हुई । कुछ के अनुसार अरबों साल बाद और कुछ के अनुसार कुछ हज़ार साल बाद। सभी दर्शनों की रचना एक साथ नहीं हुई है बल्कि एक एक करके अलग अलग टाइम में हुई है।
अब आप सोचिए कि दर्शन धर्म का आधार होते तो दर्शन की रचना होने से पहले के लोग क्या धर्म से हीन थे ?
यदि वे धर्म से युक्त थे तो मानना पड़ेगा कि उन्हें धर्म की व्याख्या के लिए दर्शनों की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। उनके लिए तो धर्म का आधार ईश्वर की वाणी ‘वेद‘ था। बाद में लोगों ने धर्म का आधार केवल वेद न मानकर उनके साथ दर्शनों को भी सम्मिलित कर लिया और फिर पुराणों को भी। उसके बाद भी जो कुछ काव्य और साहित्य रचा जाता रहा उसे धर्म के आधार में सम्मिलित करने की प्रक्रिया अनवरत चलती रही। वास्तविक वेदार्थ के लुप्त होने का यह मूल कारण है।
कृपया ध्यान रखिएगा कि मैं दर्शनों के महत्व का इन्कार नहीं कर रहा हूं और न ही मैं पुराण , इतिहास या काव्य को ही पूरी तरह ख़ारिज कर रहा हूं कि इनमें कुछ भी सत्य नहीं है। नहीं , बल्कि मैं केवल इन्हें धर्म का मूल नहीं मानता क्योंकि इनकी रचना से पहले भी धर्म था और धर्म का पालन करने वाला समाज भी था जो आज के समाज की तरह ‘कन्फ़्यूज़्ड‘ नहीं था।
धर्म का आधार तो वेद हैं लेकिन वेद का वास्तविक अर्थ जानना आज केवल मनुष्य की बुद्धि के बस का काम नहीं है। दयानंद जी का उदाहरण सामने है। उन्होंने ‘वसु‘ की व्याख्या करते हुए लिख डाला कि सूर्य, चन्द्र और समस्त तारों और नक्षत्रों पर मनुष्य आबाद हैं और वे इन्हीं चारों वेदों का पठन पाठन और पालन करते हैं। (देखिए सत्यार्थ प्रकाश, 8 वां समुल्लास)
ज़ाहिर है बुद्धि तो उनमें कुछ कम न थी। इसी तरह परंपरा से प्राप्त महीधर जी का वेदार्थ भी कुछ जगहों पर स्वीकार्य नहीं हो पाता।
ईश्वर और वस्तुओं के लिए प्रयुक्त नामों में एकरूपता भी वास्तविक वेदार्थ तक पहुंच पाने में एक बड़ी बाधा है जैसे कि यह समस्या ऋग्वेद के पहले सूक्त के पहले ही मंत्र से आरंभ हो जाती है कि ‘अग्नि‘ का अर्थ जलाने वाली आग लिया जाए या कि ‘ईश्वर‘। दोनों ही अर्थ वेदविदों ने किए हैं। मेरा इसमें किंचित भी हस्तक्षेप नहीं है।
धर्म का आधार तो वेद को माना जाए और दर्शन व अन्य साहित्य को भी इसी के आधार पर परखा जाए लेकिन वेद के वास्तविक मंतव्य को कैसे समझा जाएगा ?
यह एक समस्या है जिससे आम पब्लिक अन्जान है लेकिन वेदविद इससे परेशान हैं। मुझे कुरआन से मदद मिली और मुझे निश्चय हो गया कि अगर ‘अग्निमीले‘ के दो अर्थ में से एक लेना है तो कौन सा लेना है। मैंने वह ले लिया जो कुरआन की बिल्कुल पहली सूरा की पहली आयत में वर्णित है। वहां ‘विशेष स्तवन-वंदन परमेश्वर के लिए है जो सब लोकों का स्वामी है‘ लिखा मिलता है।
‘अग्निमीले‘ में भी अग्नि के ईलन-स्तवन की बात आई है सो यह तो केवल ईश्वर के लिए ही विशेष है। यही है कुरआन के आलोक में वेद को देखना। परमेश्वर की वाणी को परमेश्वर की ही वाणी में देखा जाए तो वास्तविक वेदार्थ प्रकट हो जाता है।
आपने यह भी पूछा है कि ईश्वर व्यक्तित्व है या तत्व ?
मैं आपसे कहना चाहूंगा कि क्या मेरे लिए लाज़िमी है कि मैं इन दो शब्दों में से ही किसी शब्द को ज़रूर चुनूं। आप यह पूछिए कि ईश्वर कौन है ?
ईश्वर एक चेतन अस्तित्व है जो सभी उत्कृष्ट गुणों से युक्त है। उसका अस्तित्व और उसके गुण हमारे ज्ञान और कल्पना से परे हैं। उसने हमें अपनी मनन शक्ति से उत्पन्न किया और हमें जीवन दिया , जीने का मक़सद दिया, जीने का विधान दिया, सफलता का मार्ग दिखाया। उसके नियमों का नाम धर्म है। धार्मिक कर्मकांड के ज़रिए उसकी वाणी की सुरक्षा की जाती है , उसके नियमों को स्मृति में सुरक्षित रखा जाता है। जीवन में उनका पालन किया जाता है।
जिस ऋषि के अंतःकरण पर वाणी का अवतरण होता है , वह सारे समाज के लिए आदर्श होता है। वैदिक ऋषियों के आचरण को सुरक्षित न रखे जाने से भी बहुत भारी समस्या का सामना करना पड़ता है।
ये सभी समस्याएं आज वास्तव में सामने हैं। मैंने जो उचित समझा उसका हल आपको बता दिया। आपको इससे ज़्यादा बेहतर हल कोई दूसरा लगे तो आप मुझे वह बताएं।
D@@@@@ R. ANWER JAMAL
साहब बिल्कुल, उम्मीद लायक जबाब दिया आपने - मैं बच्चों की तरह रंगों की कोई पहेलियाँ नहीं बुछा रहा और न तो आपके सामान्य ज्ञान की परीक्षा ले रहा हूँ - मै तो इन निम्न वाक्यों की तरफ आप का ध्यान दिलाना चाहता हूँ -
परमेश्वर के वचन के अर्थ निर्धारण के लिए केवल मनुष्य की बुद्धि काफ़ी नहीं है। इसे आप परमेश्वर की वाणी कुरआन के आलोक में देखिए।
आप का कहना है की दर्शन और धर्म में अंतर है, (आपकी मूल समस्या)
परन्तु वैदिक धर्म का तो आधार ही दर्शन है, इसीलिए ये छोटा सा प्रश्न पूछा -
ईश्वर (परमेश्वर) तत्त्व है या व्यक्तित्व ?
फोन पर तो आप केवल मेरी जिज्ञासा ही शांत कर पायेंगे, परन्तु जिज्ञासु तो यहाँ और भी है, उनका भी ख्याल कीजिये !!!!
बाकी पत्तियों वाली बात और रंगों वाली बात, इस जिज्ञासा की शांति के बाद !!!!
प्रतीक्षा उत्तर की OOOOOOOOOOOOO..............
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प्यारे भाई पंकज सिंह राजपूत जी ! आपका और आपके सवालों का स्वागत है।
आपने लिखा है कि मेरी मूल समस्या यह है कि मैं धर्म और दर्शन में अंतर करता हूं। जबकि वैदिक धर्म का आधार ही दर्शन हैं।
मेरे भाई , आप ज़रा सा ग़ौर करते तो समझ लेते कि सनातनी और आर्य समाजी दोनों तरफ़ के विद्वान धर्म का आधार ‘वेद‘ को मानते हैं। वेद जितने समय पुराने हैं दर्शन उतने पुराने नहीं हैं। दर्शनों की रचना उनके बहुत बाद हुई । कुछ के अनुसार अरबों साल बाद और कुछ के अनुसार कुछ हज़ार साल बाद। सभी दर्शनों की रचना एक साथ नहीं हुई है बल्कि एक एक करके अलग अलग टाइम में हुई है।
अब आप सोचिए कि दर्शन धर्म का आधार होते तो दर्शन की रचना होने से पहले के लोग क्या धर्म से हीन थे ?
यदि वे धर्म से युक्त थे तो मानना पड़ेगा कि उन्हें धर्म की व्याख्या के लिए दर्शनों की कोई ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। उनके लिए तो धर्म का आधार ईश्वर की वाणी ‘वेद‘ था। बाद में लोगों ने धर्म का आधार केवल वेद न मानकर उनके साथ दर्शनों को भी सम्मिलित कर लिया और फिर पुराणों को भी। उसके बाद भी जो कुछ काव्य और साहित्य रचा जाता रहा उसे धर्म के आधार में सम्मिलित करने की प्रक्रिया अनवरत चलती रही। वास्तविक वेदार्थ के लुप्त होने का यह मूल कारण है।
कृपया ध्यान रखिएगा कि मैं दर्शनों के महत्व का इन्कार नहीं कर रहा हूं और न ही मैं पुराण , इतिहास या काव्य को ही पूरी तरह ख़ारिज कर रहा हूं कि इनमें कुछ भी सत्य नहीं है। नहीं , बल्कि मैं केवल इन्हें धर्म का मूल नहीं मानता क्योंकि इनकी रचना से पहले भी धर्म था और धर्म का पालन करने वाला समाज भी था जो आज के समाज की तरह ‘कन्फ़्यूज़्ड‘ नहीं था।
धर्म का आधार तो वेद हैं लेकिन वेद का वास्तविक अर्थ जानना आज केवल मनुष्य की बुद्धि के बस का काम नहीं है। दयानंद जी का उदाहरण सामने है। उन्होंने ‘वसु‘ की व्याख्या करते हुए लिख डाला कि सूर्य, चन्द्र और समस्त तारों और नक्षत्रों पर मनुष्य आबाद हैं और वे इन्हीं चारों वेदों का पठन पाठन और पालन करते हैं। (देखिए सत्यार्थ प्रकाश, 8 वां समुल्लास)
ज़ाहिर है बुद्धि तो उनमें कुछ कम न थी। इसी तरह परंपरा से प्राप्त महीधर जी का वेदार्थ भी कुछ जगहों पर स्वीकार्य नहीं हो पाता।
ईश्वर और वस्तुओं के लिए प्रयुक्त नामों में एकरूपता भी वास्तविक वेदार्थ तक पहुंच पाने में एक बड़ी बाधा है जैसे कि यह समस्या ऋग्वेद के पहले सूक्त के पहले ही मंत्र से आरंभ हो जाती है कि ‘अग्नि‘ का अर्थ जलाने वाली आग लिया जाए या कि ‘ईश्वर‘। दोनों ही अर्थ वेदविदों ने किए हैं। मेरा इसमें किंचित भी हस्तक्षेप नहीं है।
धर्म का आधार तो वेद को माना जाए और दर्शन व अन्य साहित्य को भी इसी के आधार पर परखा जाए लेकिन वेद के वास्तविक मंतव्य को कैसे समझा जाएगा ?
यह एक समस्या है जिससे आम पब्लिक अन्जान है लेकिन वेदविद इससे परेशान हैं। मुझे कुरआन से मदद मिली और मुझे निश्चय हो गया कि अगर ‘अग्निमीले‘ के दो अर्थ में से एक लेना है तो कौन सा लेना है। मैंने वह ले लिया जो कुरआन की बिल्कुल पहली सूरा की पहली आयत में वर्णित है। वहां ‘विशेष स्तवन-वंदन परमेश्वर के लिए है जो सब लोकों का स्वामी है‘ लिखा मिलता है।
‘अग्निमीले‘ में भी अग्नि के ईलन-स्तवन की बात आई है सो यह तो केवल ईश्वर के लिए ही विशेष है। यही है कुरआन के आलोक में वेद को देखना। परमेश्वर की वाणी को परमेश्वर की ही वाणी में देखा जाए तो वास्तविक वेदार्थ प्रकट हो जाता है।
आपने यह भी पूछा है कि ईश्वर व्यक्तित्व है या तत्व ?
मैं आपसे कहना चाहूंगा कि क्या मेरे लिए लाज़िमी है कि मैं इन दो शब्दों में से ही किसी शब्द को ज़रूर चुनूं। आप यह पूछिए कि ईश्वर कौन है ?
ईश्वर एक चेतन अस्तित्व है जो सभी उत्कृष्ट गुणों से युक्त है। उसका अस्तित्व और उसके गुण हमारे ज्ञान और कल्पना से परे हैं। उसने हमें अपनी मनन शक्ति से उत्पन्न किया और हमें जीवन दिया , जीने का मक़सद दिया, जीने का विधान दिया, सफलता का मार्ग दिखाया। उसके नियमों का नाम धर्म है। धार्मिक कर्मकांड के ज़रिए उसकी वाणी की सुरक्षा की जाती है , उसके नियमों को स्मृति में सुरक्षित रखा जाता है। जीवन में उनका पालन किया जाता है।
जिस ऋषि के अंतःकरण पर वाणी का अवतरण होता है , वह सारे समाज के लिए आदर्श होता है। वैदिक ऋषियों के आचरण को सुरक्षित न रखे जाने से भी बहुत भारी समस्या का सामना करना पड़ता है।
ये सभी समस्याएं आज वास्तव में सामने हैं। मैंने जो उचित समझा उसका हल आपको बता दिया। आपको इससे ज़्यादा बेहतर हल कोई दूसरा लगे तो आप मुझे वह बताएं।
Tuesday, August 17, 2010
Real sence of Dharma एक है धर्मसार है - Anwer Jamal
वेदसार ब्रह्मसूत्र-
एकम् ब्रह्म द्वितीयो नास्ति, नेह, ना, नास्ति किंचन।
अर्थात ब्रह्म एक है दूसरा नहीं है, नहीं है, नहीं है, किंचित मात्र नहीं है।
कुरआन का सार कलिमा ए तय्यबा है जिसका अव्वल हिस्सा यह है-
ला इलाहा इल-लल्लाह
अर्थात अल्लाह के सिवाय कोई वंदनीय-उपासनीय नहीं है।
एक ही अजन्मे, अविनाशी सृष्टिकर्ता को संस्कृत में ‘ब्रह्म’ और अरबी भाषा में ‘अल्लाह’ कहा जाता है। शांति स्वरूप और अरबी भाषा में ‘अल्लाह’ कहा जाता है। शांतिस्वरूप और अस्सलाम भी उसी के सगुण नाम हैं। उस मालिक का नाम लेने वालों के मिज़ाज में भी शान्ति और सलमाती झलकनी चाहिये जो कि धर्म का मूल है और ‘इस्लाम’ का तो धात्वर्थ ही शांति है।
एकम् ब्रह्म द्वितीयो नास्ति, नेह, ना, नास्ति किंचन।
अर्थात ब्रह्म एक है दूसरा नहीं है, नहीं है, नहीं है, किंचित मात्र नहीं है।
कुरआन का सार कलिमा ए तय्यबा है जिसका अव्वल हिस्सा यह है-
ला इलाहा इल-लल्लाह
अर्थात अल्लाह के सिवाय कोई वंदनीय-उपासनीय नहीं है।
एक ही अजन्मे, अविनाशी सृष्टिकर्ता को संस्कृत में ‘ब्रह्म’ और अरबी भाषा में ‘अल्लाह’ कहा जाता है। शांति स्वरूप और अरबी भाषा में ‘अल्लाह’ कहा जाता है। शांतिस्वरूप और अस्सलाम भी उसी के सगुण नाम हैं। उस मालिक का नाम लेने वालों के मिज़ाज में भी शान्ति और सलमाती झलकनी चाहिये जो कि धर्म का मूल है और ‘इस्लाम’ का तो धात्वर्थ ही शांति है।
ईश्वर और धर्म शांति का स्रोत हैं।
आइये, शांति पाएं, शांति फैलाएं।।
Wednesday, May 12, 2010
ईशवाणी हमारे कल्याण के लिए अवतरित की गई है , यदि इस पर ध्यानपूर्वक चिंतन और व्यवहार किया जाए तो यह नफ़रत और तबाही के हरेक कारण को मिटाने में सक्षम है ।
वेद
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः
मैं तुम सबको समान मन्त्र से अभिमन्त्रित करता हूं ।
ऋग्वेद , 10-191-3
कुरआन
कु़ल या अहलल किताबि तआलौ इला कलिमतिन सवाइम्-बयनना व बयनकुम
तुम कहो कि हे पूर्व ग्रन्थ वालों ! हमारे और तुम्हारे बीच जो समान मन्त्र हैं , उसकी ओर आओ ।
पवित्र कुरआन , 3-64 - शांति पैग़ाम , पृष्ठ 2 , अनुवादकगण : स्वर्गीय आचार्य विष्णुदेव पंडित , अहमदाबाद , आचार्य डा. राजेन्द प्रसाद मिश्र , राजस्थान , सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ , रामपुर
एक ब्रह्मवाक्य भी जीवन को दिशा देने और सच्ची मंज़िल तक पहुंचाने के लिए काफ़ी है ।
जो भी आदमी धर्म में विश्वास रखता है , वह यक़ीनी तौर पर ईश्वर पर भी विश्वास रखता है । वह किसी न किसी ईश्वरीय व्यवस्था में भी विश्वास रखता है । ईश्वरीय व्यवस्था में विश्वास रखने के बावजूद उसे भुलाकर जीवन गुज़ारने को आस्तिकता नहीं कहा जा सकता है । ईश्वर पूर्ण समर्पण चाहता है । कौन व्यक्ति उसके प्रति किस दर्जे समर्पित है , यह तय होगा उसके ‘कर्म‘ से , कि उसका कर्म ईश्वरीय व्यवस्था के कितना अनुकूल है ?
इस धरती और आकाश का और सारी चीज़ों का मालिक वही पालनहार है ।
हम उसी के राज्य के निवासी हैं । सच्चा राजा वही है । सारी प्रकृति उसी के अधीन है और उसके नियमों का पालन करती है । मनुष्य को भी अपने विवेक का सही इस्तेमाल करना चाहिये और उस सर्वशक्तिमान के नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिये ताकि हम उसके दण्डनीय न हों । वास्तव में तो ईश्वर एक ही है और उसका धर्म भी , लेकिन अलग अलग काल में अलग अलग भाषाओं में प्रकाशित ईशवाणी के नवीन और प्राचीन संस्करणों में विश्वास रखने वाले सभी लोगों को चाहिये कि अपने और सबके कल्याण के लिए उन बातों आचरण में लाने पर बल दिया जाए जो समान हैं । ईशवाणी हमारे कल्याण के लिए अवतरित की गई है , यदि इस पर ध्यानपूर्वक चिंतन और व्यवहार किया जाए तो यह नफ़रत और तबाही के हरेक कारण को मिटाने में सक्षम है ।
आज की पोस्ट भाई अमित की इच्छा का आदर और उनसे किये गये अपने वादे को पूरा करने के उद्देश्य से लिखी गई है । उन्होंने मुझसे आग्रह किया था कि मैं वेद और कुरआन में समानता पर लेख लिखूं । मैंने अपना वादा पूरा किया । उम्मीद है कि लेख उन्हें और सभी प्रबुद्ध पाठकों को पसन्द आएगा ।
आज की पोस्ट भाई अमित की इच्छा का आदर और उनसे किये गये अपने वादे को पूरा करने के उद्देश्य से लिखी गई है । उन्होंने मुझसे आग्रह किया था कि मैं वेद और कुरआन में समानता पर लेख लिखूं । मैंने अपना वादा पूरा किया । उम्मीद है कि लेख उन्हें और सभी प्रबुद्ध पाठकों को पसन्द आएगा ।
Photo- S. Abdullah Tariq in white dress
Monday, May 3, 2010
सर्मपण से होता है दुखों का अन्त Submission to God

मनुष्य का मार्ग और धर्म
पालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है। दुख तो मनुष्य तब भोगता है जब वह ‘मार्ग’ से विचलित हो जाता है। मार्ग पर चलना ही मनुष्य का कर्तव्य और धर्म है। मार्ग से हटना अज्ञान और अधर्म है जो सारे दूखों का मूल है। पालनहार प्रभु ने अपनी दया से मनुष्य की रचना की उसे ‘मार्ग’ दिखाया ताकि वह निरन्तर ज्ञान के द्वारा विकास और आनन्द के सोपान तय करता हुआ उस पद को प्राप्त कर ले जहाँ रोग,शोक, भय और मृत्यु की परछाइयाँ तक उसे न छू सकें। मार्ग सरल है, धर्म स्वाभाविक है। इसके लिए अप्राकृतिक और कष्टदायक साधनाओं को करने की नहीं बल्कि उन्हें छोड़ने की ज़रूरत है।
ईश्वर प्राप्ति सरल है
ईश्वर सबको सर्वत्र उपलब्ध है। केवल उसके बोध और स्मृति की ज़रूरत है। पवित्र कुरआन इनसान की हर ज़रूरत को पूरा करता है। इसकी शिक्षाएं स्पष्ट,सरल हैं और वर्तमान काल में आसानी से उनका पालन हो सकता है। पवित्र कुरआन की रचना किसी मनुष्य के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। इसके विषयों की व्यापकता और प्रामाणिकता देखकर कोई भी व्यक्ति आसानी से यह जान सकता है कि इसका एक-एक शब्द सत्य है। आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के बाद भी पवित्र कुरआन में वर्णित कोई भी तथ्य गलत नहीं पाया गया बल्कि उनकी सत्यता ही प्रमाणित हुई है। कुरआन की शब्द योजना में छिपी गणितीय योजना भी उसकी सत्यता का एक ऐसा अकाट्य प्रमाण है जिसे कोई भी व्यक्ति जाँच परख सकता है।
पालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है। दुख तो मनुष्य तब भोगता है जब वह ‘मार्ग’ से विचलित हो जाता है। मार्ग पर चलना ही मनुष्य का कर्तव्य और धर्म है। मार्ग से हटना अज्ञान और अधर्म है जो सारे दूखों का मूल है। पालनहार प्रभु ने अपनी दया से मनुष्य की रचना की उसे ‘मार्ग’ दिखाया ताकि वह निरन्तर ज्ञान के द्वारा विकास और आनन्द के सोपान तय करता हुआ उस पद को प्राप्त कर ले जहाँ रोग,शोक, भय और मृत्यु की परछाइयाँ तक उसे न छू सकें। मार्ग सरल है, धर्म स्वाभाविक है। इसके लिए अप्राकृतिक और कष्टदायक साधनाओं को करने की नहीं बल्कि उन्हें छोड़ने की ज़रूरत है।
ईश्वर प्राप्ति सरल है
ईश्वर सबको सर्वत्र उपलब्ध है। केवल उसके बोध और स्मृति की ज़रूरत है। पवित्र कुरआन इनसान की हर ज़रूरत को पूरा करता है। इसकी शिक्षाएं स्पष्ट,सरल हैं और वर्तमान काल में आसानी से उनका पालन हो सकता है। पवित्र कुरआन की रचना किसी मनुष्य के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। इसके विषयों की व्यापकता और प्रामाणिकता देखकर कोई भी व्यक्ति आसानी से यह जान सकता है कि इसका एक-एक शब्द सत्य है। आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के बाद भी पवित्र कुरआन में वर्णित कोई भी तथ्य गलत नहीं पाया गया बल्कि उनकी सत्यता ही प्रमाणित हुई है। कुरआन की शब्द योजना में छिपी गणितीय योजना भी उसकी सत्यता का एक ऐसा अकाट्य प्रमाण है जिसे कोई भी व्यक्ति जाँच परख सकता है।
प्राचीन धर्म का सीधा मार्ग
ईश्वर का नाम लेने मात्र से ही कोई व्यक्ति दुखों से मुक्ति नहीं पा सकता जब तक कि वह ईश्वर के निश्चित किये हुए मार्ग पर न चले। पवित्र कुरआन किसी नये ईश्वर,नये धर्म और नये मार्ग की शिक्षा नहीं देता। बल्कि प्राचीन ऋषियों के लुप्त हो गए मार्ग की ही शिक्षा देता है और उसी मार्ग पर चलने हेतु प्रार्थना करना सिखाता है।
‘हमें सीधे मार्ग पर चला, उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने कृपा की।’
(पवित्र कुरआन 1:5-6)
ईश्वर की उपासना की सही रीति
मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन यह इस पर निर्भर है कि वह ईश्वर को अपना मार्गदर्शक स्वीकार करना कब सीखेगा?
वह पवित्र कुरआन की सत्यता को कब मानेगा? और सामाजिक कुरीतियों और धर्मिक पाखण्डों का व्यवहारतः उन्मूलन करने वाले अन्तिम सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (स.) को अपना आदर्श मानकर जीवन गुज़ारना कब सीखेगा?
सर्मपण से होता है दुखों का अन्त
ईश्वर सर्वशक्तिमान है वह आपके दुखों का अन्त करने की शक्ति रखता है। अपने जीवन की बागडोर उसे सौंपकर तो देखिये। पूर्वाग्रह,द्वेष और संकीर्णता के कारण सत्य का इनकार करके कष्ट भोगना उचित नहीं है। उठिये,जागिये और ईश्वर का वरदान पाने के लिए उसकी सुरक्षित वाणी पवित्र कुरआन का स्वागत कीजिए। भारत को शान्त समृद्ध और विश्व गुरू बनाने का उपाय भी यही है।
क्या कोई भी आदमी दुःख, पाप और निराशा से मुक्ति के लिये इससे ज़्यादा बेहतर, सरल और ईश्वर की ओर से अवतरित किसी मार्ग या ग्रन्थ के बारे में मानवता को बता सकता है?
‘हमें सीधे मार्ग पर चला, उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने कृपा की।’
(पवित्र कुरआन 1:5-6)
ईश्वर की उपासना की सही रीति
मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन यह इस पर निर्भर है कि वह ईश्वर को अपना मार्गदर्शक स्वीकार करना कब सीखेगा?
वह पवित्र कुरआन की सत्यता को कब मानेगा? और सामाजिक कुरीतियों और धर्मिक पाखण्डों का व्यवहारतः उन्मूलन करने वाले अन्तिम सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (स.) को अपना आदर्श मानकर जीवन गुज़ारना कब सीखेगा?
सर्मपण से होता है दुखों का अन्त
ईश्वर सर्वशक्तिमान है वह आपके दुखों का अन्त करने की शक्ति रखता है। अपने जीवन की बागडोर उसे सौंपकर तो देखिये। पूर्वाग्रह,द्वेष और संकीर्णता के कारण सत्य का इनकार करके कष्ट भोगना उचित नहीं है। उठिये,जागिये और ईश्वर का वरदान पाने के लिए उसकी सुरक्षित वाणी पवित्र कुरआन का स्वागत कीजिए। भारत को शान्त समृद्ध और विश्व गुरू बनाने का उपाय भी यही है।
क्या कोई भी आदमी दुःख, पाप और निराशा से मुक्ति के लिये इससे ज़्यादा बेहतर, सरल और ईश्वर की ओर से अवतरित किसी मार्ग या ग्रन्थ के बारे में मानवता को बता सकता है?
Saturday, March 27, 2010
ताकि हरेक जान ले कि सच्चा मुसलमान कैसा होता है ? Submission to Allah, The real God .

बहन फ़िरदौस जी ,
विचारोत्तेजक लेख के लिए बधाई ।
मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं कि इनसान के कल्याण के लिए इसलाम काफ़ी है
मुसलमानों को आरक्षण के चक्कर में पड़ने के बजाए इसलाम को मज़बूती से थामना चाहिये ।
असल बात यह है कि हिन्दुस्तान में लोग वर्णवाद से घबराकर मुसलमान तो हो गये लेकिन जाति पांति का भेदभाव उनके अन्दर इतनी गहराई तक घुस चुका था कि इसलाम कुबूल करने बाद भी वह पूरी तरह न जा सका ।
इसलाम के अन्दर ज़कात का निज़ाम है ।
अगर सभी साहिबे निसाब मुसलमान वाजिब ज़कात अदा करें तो मुसलमानों के साथ साथ हिन्दुओं की भी ग़रीबी दूर हो जायेगी । तब न गुरबत होगी और न बग़ावत होगी । आज मुल्क में नक्सलवाद तबाही मचा रहा है । हां , मानता हूं कि इसके पीछे भुखमरी की शिकार जनता है और इसके लिए पूंजी का असमान वितरण है । इसके पीछे मधु कोड़ा जैसे बेईमान नेता और अफ़सर हैं ।
इसके पीछे ये हैं और इसके पीछे वे हैं ।
क्या किसी चीज़ के पीछे हम भी हैं ?
क्या कभी हमने यह जानने का प्रयास किया ?
सकता है कि इस दुनिया के क़ानून में नक्सलवाद के पीछे मुसलमान ज़िम्मेदार न माना जाये लेकिन दुनिया सिर्फ़ यही तो नहीं है । यह तो अमल की दुनिया है , एक रोज़ अन्जाम की दुनिया भी तो ज़ाहिर होगी । एक दिन वह भी तो आना है जब सारे हाकिमों को हुकूमत अता करने वाला खुद को ज़ाहिर करेगगा । तब वह हरेक हाकिम से हिसाब लेगा ।
मरती सिसकती दुनिया को उसने जीने की राह दिखाई थी , अपना ज्ञान भेजकर ।
उसके ज्ञान को कितना फैलाया ?तब वह हिसाब लेगा ।हिसाब तो वह आज भी ले रहा है और पापियों को सज़ा भी दे रहा है लेकिन अभी सज़ा के साथ सुधरने की मोहलत और ढील भी दे रहा है । ढील देखकर लोग अपने ज़ुल्म में और बढ़े जा रहे हैं ।सोच रहे हैं कि इस दुनिया का कोई रखवाला न कभी था और न ही आज है । कर लो जो करना है ।
बड़े पेट भरे पापियों की नास्तिकता और अमीरी देखकर छोटे लोगों के दिल से भी पाप और उसके बुरे अन्जाम का डर निकलता जा रहा है ।
ज़मीन पर खुदा का पैग़ाम , पवित्र कुरआन मौजूद हो लेकिन अहले ज़मीन की अक्सरियत उससे नावाक़िफ़ हो ।
इसलाम का अर्थ ही सलामती हो और लोग इसलाम से ही ख़तरा महसूस कर रहे हों ।
इसलाम फ़िरक़ेबन्दी के ख़ात्मे के लिए भेजा गया हो और खुद इसलाम में ही फ़िरक़े बनाकर रख दिये गये हों ।क्या इन सबका ज़िम्मेदार भी मुसलमान नहीं है ।बाबरी मस्जिद ढहाने वाले कुछ जोशीले हिन्दू जत्थे तो सबको नज़र आते हैं लेकिन उन्हें भड़काकर इस मक़ाम पहुंचाने वाले आज़म ख़ां जैसे कमअक्ल और ख़ुदग़र्ज़ लीडर्स उनसे कहीं ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं । और सिर्फ़ लीडर्स पर ही ज़िम्मेदारी डालकर हम बच नहीं सकते ।
हम मुसलमानों का , खुद का अपना हाल क्या है?
कितने परसेन्ट मुसलमान मस्जिदों में जाते हैं ?
जो जाते हैं उनमें से कितने लोग कुरआन पाक को समझने और उस पर अमल करने का प्रयास करते हैं ?
कितने लोग हैं जो अपनी बीवियों को महर की अदायगी निकाह के वक्त करते हैं ?
कितने लोग हैं जो अपनी जायदाद में अपनी बेटियों को भी उनका हक़ उनका हिस्सा देते हैं ?
कुरआन अमल के लिए है । कुरआन सबसे बड़े हाकिम का फ़रमान है ।
इसकी नाफ़रमानी दण्डनीय है । हम नाफ़रमानी कर रहे हैं और लगातार किये जा रहे हैं ।
हम पर मालिक की सज़ा पड़ रही है और हमारी वजह से दूसरे भी कष्ट भोग रहे हैं ।
ऐ मुसलमान अपने गिरेबां में झांक ।
अपने जुर्मों की तावील न कर , बहाने न बना । वक्त रहते सुधर जा । इसलाम हर समस्या का समाधान है । आज यह एक किताबी बात बनकर रह गयी है । इसे करके दिखा । लोग आज समस्याओं से ही तो दुखी हैं । उन्हें समाधान ही तो चाहिये । अगर वाक़ई इसलाम सच्चा पक्का समाधान है तो फिर कौन उसका इनकार करके घाटा उठाना चाहेगा , सिवाए नादान के ?किसी भी समाज की तबाही उसकी अपनी अन्दरूनी कमज़ोरी के कारण होती है और जब तक उनको दूर न किया जाये तब भला नहीं हुआ करता । विरोधी तो केवल षड्यंत्र कर सकता है लेकिन उसे हरगिज़ कामयाबी नहीं मिल सकती अगर खुद के अन्दर कमज़ोरी न हो । लीडर अपने अन्जाम से डरें और अवाम भी खुद को संभाले ।खुदा इनसान को दो ही फ़िर्क़ां में बांटकर देखता है ।
भला और बुरा ।
देखिये कि आप खुद को किस वर्ग में पाते हैं ?
यहां एक बात और ध्यान देने के लायक़ है कि क्या हम सच्चे मुसलमान हैं ?
सही बात तो यह है कि कौन सच्चा है और कौन पाखण्डी ?
इस बात का हक़ीक़ी फ़ैसला तो इनसाफ़ के दिन मालिक खुद करेगा ।लेकिन एक बात जो हम कह सकते हैं वह यह है कि अगर हम सच्चे दिल से इसलाम की सच्चाई का यक़ीन रखते हैं तो हम सच्चे मुसलमान हैं ।लेकिन यहां आकर ही हमारा काम पूरा नहीं हो जाता बल्कि यहां से हमारा काम आरम्भ होता है ।
इसलाम का अर्थ है एक अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण ।
यहां हर आदमी का स्तर अलग अलग है । समर्पण की प्रक्रिया एक दिन में सम्पन्न होने वाली चीज़ नहीं है बल्कि यह जीवन भर चलने वाला अमल है । जो दिल से इसलाम को सच्चा मानते हैं उनकी मान्यता का असर उनके जीवन में भी झलकना लाज़िमी भी है और झलकता भी है ।
पुराने लोग मरते रहते हैं और नये पैदा होते रहते हैं इस तरह यह जीवन भी चलता रहता है और इसलाम में ढलने चलने की प्रक्रिया भी ।सुधार की इब्तदा होती है नमाज़ से
मुसलमान को चाहिये कि अपनी सारी जि़न्दगी को ही नमाज़ बना दे ।
अपने आपको खुदा के सामने पूरी तरह झुका दे ताकि हरेक जान ले कि सच्चा मुसलमान कैसा होता है ?
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