सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Wednesday, August 18, 2010
‘मुझे हिन्द की तरफ़ से रब्बानी खुश्बूएं (ईश्वरीय ज्ञान की सुगंध) आती हैं।’ - Prophet Muhammed (s.a.w.)
‘मुझे हिन्द की तरफ़ से रब्बानी खुश्बूएं (ईश्वरीय ज्ञान की सुगंध) आती हैं।’
हज़रत मुहम्मद साहब (सल्ल॰) के इस वचन की अहमियत ठीक तरह सिर्फ़ तभी समझी जा सकती है जबकि लोगों को कहने वाले की महानता का सही बोध हो। जो लोग उन्हें ईश्वर का दूत मानते हैं उन्हें मुस्लिम कहा जाता है। लगभग 153 करोड़ मुस्लिम दिन रात अज़ान और नमाज़ में उनका नाम लेते हैं, उन्हें याद करते हैं उनके लिए दुआ करते हैं और अपनी इबादतों में भी और उसके अलावा भी वे उनकी तारीफ़ करते हैं। जो उन्हें पैग़म्बर के रूप में तो पहचान नहीं पाये लेकिन उन्हें मानवता का उद्धारकर्ता मानकर उनकी तारीफ़ करते हैं, उनकी तादाद भी कई करोड़ है।
‘मुहम्मद’ शब्द का अर्थ होता है ‘तारीफ़ किया गया’।
जिनकी तारीफ़ अपने-पराये और दोस्त-दुश्मन सब करते हों, जिनकी तारीफ़ खुद रब करता हो, जिनकी तारीफ़ बाइबिल, ज़न्द-अवेस्ता, वेद, पुराण, उपनिषद और गुरूग्रन्थ साहिब में हो, जो अल्लाह का बनाया अव्वल नूर हों और अंतिम रसूल हों, जब उनकी पवित्र वाणी से हिन्दुस्तान की तारीफ़ बयान हुई है तो यह एक ऐसी तारीफ़ है जिससे बढ़कर कोई तारीफ़ नहीं हो सकती। यह हिन्दुस्तान की पवित्रता के लिए ऐसी सनद है जिसे कोई रद्द नहीं कर सकता। यह हिन्दुस्तान के लिए ऐसा आशीर्वाद है जिसकी बरकतें ज़ाहिर होना लाज़िमी है। इसमें हिन्दुस्तान के उस मौलिक गुण की निशानदेही भी है जिसपर उसके भविष्य की बेहतरी का दारोमदार है।
ज्ञान हरेक ख़ूबी की कुंजी है। ज्ञान ही उन्नति का आधार है। ज्ञान से ही शक्ति का उदय होता है और शक्ति से शाँति की स्थापना होती है। शाँति से समाज में समृद्धि आती है। लोगों में प्रेम, आदर, सद्भावना और सहिष्णुता के गुण पनपते हैं। ये गुण भारतीय जाति की विशेषता कल भी थे और आज भी हैं। इन्हीं गुणों की वजह से धर्म-मत-सम्प्रदायों की विभिन्नता के बावजूद लोग रोज़मर्रा के कामों में एक दूसरे का सहयोग ले दे रहे हैं। एक दूसरे की खुशी और ग़म में शरीक हो रहे हैं। हाँ, नज़रिये के अन्तर की वजह से उनमें कुछ मतभेद भी हैं और यह बिल्कुल स्वाभाविक है। मतभेद तो एक छोटे से परिवार तक में होते हैं। तब 120 करोड़ की विशाल जनसंख्या में हों तो बिल्कुल स्वाभाविक है।
मतभेद घर में होते हैं तो घर के बड़े आपस में बैठकर बातचीत के ज़रिये उन्हें दूर करते हैं। समय-समय पर सभी धर्म-मतों के आचार्यों की सभाओं और गोष्ठियों का मक़सद भी यही होता है और उनके अच्छे नतीजे भी सामने आये हैं लेकिन समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने राजनीतिक स्वार्थ की ख़ातिर लोगों में भेद डालते हैं। भड़काऊ भाषण देकर लोगों के जज़्बात भड़काते हैं। भाई को भाई से लड़ाते हैं। जिस धरती को वे माँ कहते हैं उसका आंचल उसी की सन्तान के खून से लाल कर देते हैं। कितनी सुहागिनें विधवा हो जाती हैं और कितने ही बच्चे अनाथ हो जाते हैं? बूढ़े माँ-बाप जब अपनी ज़बान औलादों की लाशें देखते हैं तो उनके दिलों पर क्या गुज़रती होगी और कैसे-कैसे श्राप उनके दिल से निकलते होंगे?
दूसरों पर जुल्म ढाने वाला खुद भी सुखी नहीं रहता।
ज्ञान की धरती, प्रेम की धरती, इस पवित्र पुण्य भूमि पर आखिर यह अनाचार कब तक?
दारूल उलूम के आलिमों ने देश की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी है और अपनी जानें कुर्बान की हैं। उनके देशप्रेम पर वे लोग उंगली उठा रहे हैं जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में न कभी भाग लिया और न ही कोई क़ुर्बानी दी, बड़ी हास्यास्पद सी बात है।
हज़रत मुहम्मद साहब (सल्ल॰) के इस वचन की अहमियत ठीक तरह सिर्फ़ तभी समझी जा सकती है जबकि लोगों को कहने वाले की महानता का सही बोध हो। जो लोग उन्हें ईश्वर का दूत मानते हैं उन्हें मुस्लिम कहा जाता है। लगभग 153 करोड़ मुस्लिम दिन रात अज़ान और नमाज़ में उनका नाम लेते हैं, उन्हें याद करते हैं उनके लिए दुआ करते हैं और अपनी इबादतों में भी और उसके अलावा भी वे उनकी तारीफ़ करते हैं। जो उन्हें पैग़म्बर के रूप में तो पहचान नहीं पाये लेकिन उन्हें मानवता का उद्धारकर्ता मानकर उनकी तारीफ़ करते हैं, उनकी तादाद भी कई करोड़ है।
‘मुहम्मद’ शब्द का अर्थ होता है ‘तारीफ़ किया गया’।
जिनकी तारीफ़ अपने-पराये और दोस्त-दुश्मन सब करते हों, जिनकी तारीफ़ खुद रब करता हो, जिनकी तारीफ़ बाइबिल, ज़न्द-अवेस्ता, वेद, पुराण, उपनिषद और गुरूग्रन्थ साहिब में हो, जो अल्लाह का बनाया अव्वल नूर हों और अंतिम रसूल हों, जब उनकी पवित्र वाणी से हिन्दुस्तान की तारीफ़ बयान हुई है तो यह एक ऐसी तारीफ़ है जिससे बढ़कर कोई तारीफ़ नहीं हो सकती। यह हिन्दुस्तान की पवित्रता के लिए ऐसी सनद है जिसे कोई रद्द नहीं कर सकता। यह हिन्दुस्तान के लिए ऐसा आशीर्वाद है जिसकी बरकतें ज़ाहिर होना लाज़िमी है। इसमें हिन्दुस्तान के उस मौलिक गुण की निशानदेही भी है जिसपर उसके भविष्य की बेहतरी का दारोमदार है।
ज्ञान हरेक ख़ूबी की कुंजी है। ज्ञान ही उन्नति का आधार है। ज्ञान से ही शक्ति का उदय होता है और शक्ति से शाँति की स्थापना होती है। शाँति से समाज में समृद्धि आती है। लोगों में प्रेम, आदर, सद्भावना और सहिष्णुता के गुण पनपते हैं। ये गुण भारतीय जाति की विशेषता कल भी थे और आज भी हैं। इन्हीं गुणों की वजह से धर्म-मत-सम्प्रदायों की विभिन्नता के बावजूद लोग रोज़मर्रा के कामों में एक दूसरे का सहयोग ले दे रहे हैं। एक दूसरे की खुशी और ग़म में शरीक हो रहे हैं। हाँ, नज़रिये के अन्तर की वजह से उनमें कुछ मतभेद भी हैं और यह बिल्कुल स्वाभाविक है। मतभेद तो एक छोटे से परिवार तक में होते हैं। तब 120 करोड़ की विशाल जनसंख्या में हों तो बिल्कुल स्वाभाविक है।
मतभेद घर में होते हैं तो घर के बड़े आपस में बैठकर बातचीत के ज़रिये उन्हें दूर करते हैं। समय-समय पर सभी धर्म-मतों के आचार्यों की सभाओं और गोष्ठियों का मक़सद भी यही होता है और उनके अच्छे नतीजे भी सामने आये हैं लेकिन समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने राजनीतिक स्वार्थ की ख़ातिर लोगों में भेद डालते हैं। भड़काऊ भाषण देकर लोगों के जज़्बात भड़काते हैं। भाई को भाई से लड़ाते हैं। जिस धरती को वे माँ कहते हैं उसका आंचल उसी की सन्तान के खून से लाल कर देते हैं। कितनी सुहागिनें विधवा हो जाती हैं और कितने ही बच्चे अनाथ हो जाते हैं? बूढ़े माँ-बाप जब अपनी ज़बान औलादों की लाशें देखते हैं तो उनके दिलों पर क्या गुज़रती होगी और कैसे-कैसे श्राप उनके दिल से निकलते होंगे?
दूसरों पर जुल्म ढाने वाला खुद भी सुखी नहीं रहता।
ज्ञान की धरती, प्रेम की धरती, इस पवित्र पुण्य भूमि पर आखिर यह अनाचार कब तक?
दारूल उलूम के आलिमों ने देश की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी है और अपनी जानें कुर्बान की हैं। उनके देशप्रेम पर वे लोग उंगली उठा रहे हैं जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में न कभी भाग लिया और न ही कोई क़ुर्बानी दी, बड़ी हास्यास्पद सी बात है।
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