सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



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Tuesday, March 23, 2010

क्या वाक़ई हज्रे अस्वद शिवलिंग है ? Black stone : A sign of ancient spiritual history.


क्या वाक़ई हज्रे अस्वद शिवलिंग है ?

हमने कल आपको बताया था कि सच्चा शिव कौन है ?

सच्चा शिव वह परमेश्वर है जिसने मनुष्य को अपने स्वभाव पर रचा ।

परमेश्वर ने मनुष्य की रचना अपने अंश से नहीं बल्कि अपनी मनन शक्ति से की ।

मनुष्य की रचना से पहले भी हरेक चीज़ की रचना उसने ऐसे ही की ।

कायनात तरक्क़ी करते हुए एक स्टेज से दूसरी स्टेज की तरफ़ बढ़ती रही ।

ईश्वरीय योजना के अनुसार चीज़ें बनती रहीं और मिटती रहीं । यह सिलसिला आज भी जारी है । इसी दरम्यान वह मरहला आया जब ईश्वर ने प्रथम मानव की सृष्टि की और उसी के वाम पक्ष से , उसके बायें भाग से उसकी पत्नी को पैदा किया ।

यही जोड़ा पहला जोड़ा था । इसी से सारे मनुष्यों की उत्पत्ति हुई ।इसी पहले जोड़े को शिव और पार्वती कहा गया । इसी प्रथम पुरूष को ब्रह्मा कहा गया । शिव भी परमेश्वर का गुणवाचक नाम है और ब्रह्मा भी । क्योंकि मनुष्य में ईश्वर के गुण प्रतिबिम्बित होते हैं , इसलिये ईश्वर के अधिकतर सगुण नाम प्रायः प्रथम पुरूष के लिए इस्तेमाल हुए हैं ।

प्रथम के लिए संस्कृत में आद्य और आदि शब्द भी आये हैं ।

आदि से ही शब्द आदिम् बना जो कालान्तर में मुख सुख के कारण आदम प्रचलित हो गया । ईश्वर कल्याण करता है । अतः शिव कहलाता है । उत्पत्ति करने के कारण उसे ही ब्रह्मा कहा जाता है ।

प्रथम पुरूष ने इस सुंदर धरा पर सन्तान को पैदा किया । उसका रक्षण-शिक्षण किया । मनुष्य जाति का आरम्भ करके सारे जगत का कल्याण किया । मानव जाति की उत्पत्ति करने की वजह से उन्हें ब्रह्मा कहा गया और सबका कल्याण करने के कारण उन्हें शिव कहा गया ।

यहां यह भी समझ लेना ज़रूरी है कि लिंग का अर्थ होता है ‘चिन्ह‘ अर्थात निशान ।

नर की पहचान उनके यौनांग से होने के कारण उसे भी लिंग कह दिया जाता है ।

इस तरह लिंग शब्द कई अर्थ देता है जिनमें से दो का बयान यहां कर दिया गया ।

एक शिवलिंग तो वह है जो आम तौर से भारत के शिवालयों में बल्कि आजकल तो खुले आम हरेक नगर के चैराहों पर देखे जा सकते हैं । ये तो यौनांगों की आकृतियां हैं ।

पवित्र काबा के काले पत्थर का कोई सम्बन्ध यौनांग से नहीं है और न वह भारत के शिवलिंग की तरह लम्बा होता है ।

हज्रे अस्वद एक अण्डाकार काला पत्थर है ।

शिव अर्थात अजन्मे परमेश्वर और प्रथम पुरूष का स्मृति चिन्ह होने के कारण उसे शिवलिंग कहा जा सकता है ।

यह पत्थर स्वर्ग का है ।

यह मनुष्य को उसके महान स्वर्गिक पद और रूप की स्मृति का बोध कराता है ।

यह मनुष्य पर ईश्वर के जीवन रूपी सबसे बड़े वरदान की याद दिलाता है ।

यह शून्य रूपाकार वाला पत्थर इनसान को उसकी वास्तविक पापशून्य स्थिति की भी याद दिलाता है । इनसान के अवचेतन में उसका इतिहास और उसकी स्मृतियां मौजूद होती हैं ।

इस दिव्य चिन्ह को देखते ही उसके अवचेतन में दबा पड़ा उसका निष्पापी स्वरूप उसकी चेतना पर छा जाता है और उसके लिए पाप के मार्ग पर और आगे बढ़ना असंभव बना देता है । इस समय एक मानव अपने उस रूप को पा लेता है जैसा कि वह अपने शिशुकाल में था । यहीं से उसके दिल में अपने गुनाहों पर शर्मिन्दगी पैदा होती है , जो तौबा का रूप ले लेती है । यह उसके जीवन का टर्निंग पॉइंट होता है ।

यह लम्हा हरेक को नसीब नहीं होता बल्कि यह वरदान केवल उसी को नसीब होता है जो कि ईश्वरीय वरदान का खोजी होता है । जो लोग अपने नाम के साथ हाजी लिखकर मुसलिम मतदाताओं को प्रभावित करने आदि की ग़र्ज़ से हज करते हैं उनमें न तो किसी चेतना का उदय होता है और न ही वे ईश्वर के इस दिव्य वरदान को पाते हैं ।

पवित्र काबा का काला पत्थर कुछ दीगर वजहों से कुछ और भी ख़ासियतें रखता है । उन सब ख़ासियतों के कारण और अपने पूर्वजों से इसकी निस्बत होने के कारण एक मुसलिम इससे प्रेम करता है ।इनसान जिससे प्रेम करता है , उसे वह आदर भी देता है ।

इस दिव्य चिन्ह को चूमकर एक मुसलमान अपने प्रेम और आदर को ही प्रकट करता है ।


लेकिन...


क्या हज्रे अस्वद को चूमना मूर्ति पूजा के समान नहीं है ?...

इस पर हम कल बात करेंगे , इन्शा अल्लाह ।

@आदरणीय सीनियर सिटीज़न जनाब ए. बी. जी ,एकता और सुधार की बातों को मानने के लिए हम प्रमाण नहीं मांगते ।इस उम्र में आप पर अधिक लोड डालना वैसे भी ठीक नहीं । लोगों को ज़रूरत हुई तो आपकी बात के समर्थन में प्रमाण भी हम ही उपलब्ध करा देंगे । वैसे भी यह मुमकिन नहीं है कि पृथ्वी के केन्द्र पर एक अहम हिन्दू तीर्थ हो और उसका ज़िक्र वेदों और पुराणों में न हो ।

अलबत्ता हरेक महापुरूष के बारे में फैला दी गई अश्लील और बेहूदा कथाओं को विकार समझकर हम नकारते हैं । अब यदि आप या कोई दीगर आदमी उन्हें सत्य मानता है तो उनकी सत्यता के हक़ में प्रमाण दिया जाना ज़रूरी है । आप दें या कोई और , जो चाहे दे । हो सकता है कि हम ग़लत समझ रहे हों और हक़ीक़त कुछ और हो ।

@प्रिय मोहक मुस्कान स्वामी भाई अमित जी ,आपके सवाल के जवाब में मेरा चुप रहना मात्र इस कारण से है कि

1- मैं आपको खोना नहीं चाहता ।

2- दो आदमियों की बातचीत में ऐसे भी प्रसंग आ जाते हैं जो दूसरे लोगों को नागवार लगते हैं ।

3- इसीलिये मैंने आपको दो प्रश्नवीरों का हश्र सुनाकर सावधान करना अपना फ़र्ज़ समझा ।

4- आजकल मैं श्री मुरारी जी की सलाह मानकर ‘लहजा सुधार प्रैक्टिस‘ कर रहा हूं । आपको जवाब देता हूं तो मेरी प्रैक्टिस खण्डित हो जायेगी ।

... लेकिन आपके आग्रह को पूरा करने के लिए मैं आपको जवाब देने का प्रयास करूंगा ।

आज एक सवाल मैं भी अपने पाठकों से पूछना चाहूंगा । पाठकों की गिनती तो काउन्टर तक़रीबन 300 दिखाता है जबकि टिप्पणियां उससे आधी या तिहाई भी नहीं मिलतीं । जब हम आपके लिए अपने विचार प्रकट करने के लिए घण्टों मेहनत करते हैं तो क्या आप दो वाक्य लिखकर अपनी पसंद या नापसंद नहीं लिख सकते ?

मैं अपने सभी पाठकों के प्रति आभार व्यक्त करता हूं और उनके प्रति भी जो मुझे नियमित रूप से नापसन्द का वोट देते हैं । उनकी नियमित आमद सराहनीय है ।

सबका आभार ।

हमारा तो मिज़ाज ये है कि

माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके

कुछ ख़ार कम तो कर गये , गुज़रे जिधर से हम

क्या हम कह सकते हैं कि एक और दिन ऐसा गुज़र गया जबकि किसी की भावना आहत नहीं हुई ?