सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



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Friday, March 19, 2010

आखि़र एक हिन्दू भाई गाली दे तो क्या दे ? no way


माननीय डार्विन जी ने कभी फ़रमाया था कि मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे ।

उनसे आज तक साइन्टिस्ट्स साहिबान सहमत न हो सके तो भला हम ही क्यों होते ?

लेकिन कभी कभी ऐसा लगता है कि उनकी बात में पूरी सच्चाई तो चाहे न हो मगर वह पूरी तरह ग़लत भी नहीं है । वे एक पादरी थे । धर्म प्रचार उनका काम था । इसी दौरान उन्हें अपने साथ जानवरों की तरह बर्ताव करने वाले मिले होंगे । शरीर से आदमी जैसे दिखने वाले प्राणियों के लक्षणों पर विचार किया होगा तो वे बग़ैर किसी दिक्क़त के समझ गये होंगे कि हो न हो आज मन बन्दर जैसा रखने वाले ये द्विपाद प्राणी शरीर से भी कभी ज़रूर बन्दर रहे होंगे ।

बस फिर क्या था लोगों ने उन्हें हाथों हाथ महान बना दिया । जबकि इसी खोज को भारत के मनीषी बहुत पहले ही सम्पन्न कर चुके थे और महान तो वे पहले से मशहूर थे ।

हांलाकि वेदों में परलोक में स्थायी स्वर्ग और नर्क का वर्णन है ।

कुल 28 प्रकार के नर्क में से श्रीमद्भागवत में 22 का विवरण तो नाम के साथ आता है यानि कि स्वर्ग नर्क के इनकार की बिल्कुल भी गुंजाइश नहीं है लेकिन फिर भी उन्होंने घोषणा कर दी कि मनुष्य अपने वर्तमान रूप में आने से पहले जानवर वग़ैरह की योनि में चक्कर काटता फिर रहा था ।

भारतीय चिन्तक कई स्तर पर श्री डार्विन जी से न केवल अलग हैं बल्कि अद्भुत रूप से ऊँचे भी हैं । श्री डार्विन जी ने तो पूर्वजों को बन्दर बताया था जबकि भारतीय चिन्तकों ने तो हरेक आदमी को स्वयं ही कई लाख तरह के जानवरों की योनियों के अनुभव से युक्त बताया ।

श्री डार्विन जी की खोज शरीर से आरम्भ होकर शरीर पर ही ख़त्म हो जाती है जबकि भारतीयों की खोज शरीर से आरम्भ होकर मन चित्त बुद्धि आदि का पता लगाते हुए आत्मा पर जाकर ख़त्म होती है । भारतीय चिन्तक भी धर्म प्रचारक थे । उन्हें भी जानवर सिफ़त लोगों ने सताया होगा और इस तरह उनके सामने यह सवाल खड़ा हुआ होगा कि आखि़र ये माजरा क्या है ?

जब सोचा होगा तो वे इसी नतीजे पर पहुंचे होंगे कि हो न हो ये पहले कभी सुअर कुत्ता नाग बिच्छू वगै़रह जानवर रहे होंगे । अब ये जिस्म से भले ही आदमी बन गये हों लेकिन भौंकने काटने और डसने जैसे अपने पुराने संस्कारों से अभी तक मुक्त न हो सके ।

इस तरह उन्होंने एक ऐसी अनोखी थ्योरी बनाने में सफलता हासिल कर ली जो भारत से बाहर तो चाहे कहीं न मिलती हो बल्कि वेदों में भी नहीं मिलती लेकिन इसके बावजूद आज हरेक भारतीय मत में यह ज़रूर मिलती है।

आवागमन में उनका विश्वास ऐसा जमा कि बाद में उन्होंने वेद पुराण के सच्चे स्वर्ग नर्क को ही कल्पना और अलंकार कह डाला । विश्वास ख़ामख्वाह तो जमता नहीं और इतना बड़ा विश्वास तो बिल्कुल भी नहीं कि जिसके लिए अपने मूल धर्म ग्रन्थों की मान्यताओं को ही या तो सिरे से नकारना पड़े या फिर उनके साथ खींचतान करनी पड़े ।

अस्ल बात ये है कि आदमी प्रत्यक्ष को सदा परोक्ष पर तरजीह देता है ।

यह उसका स्वभाव है । स्वर्ग नर्क तो उसने देखा नहीं और इनसान के लौकिक स्वर्गिक सुख का नाश करके उसे नारकीय पीड़ा देने वालों को वह रोज़ देखता भी है और भुगतता भी है ।

आंखिन देखी को कोई आदमी आखि़र कब तक झुठलाएगा ?

यही वजह रही कि जब जब इस ज़मीन पर ज़ालिमों का झण्डा डण्डा लहराया तो लोगों का न सिर्फ़ जीना मुहाल हो गया बल्कि उन्हें तो ईश्वर और अपनी सनातन मान्यताओं की सत्यता पर ही सन्देह होने लगा ।

समाज में पनपने वाले ज़ुल्म के पीछे ज़ालिम है । यह एक सीधी सादी सच्चाई है । ज़ुल्म के ख़ात्मे के लिए दो ही रास्ते हैं या तो ज़ालिम को नेक नसीहत के ज़रिये लोक हितकारी मार्ग पर लाया जाए या फिर उसका उन्मूलन कर दिया जाए । लेकिन यहां ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उठने वाली हरेक आवाज़ को आवागमन के ट्रांक्विलाइज़र के ज़रिये शान्त कर दिया गया । कहा गया कि जो दुर्दशा तुम्हारी आज है उसके पीछे कोई ज़ालिम नहीं बल्कि तुम खुद ज़िम्मेदार हो । न तुमने पिछले जन्मों में कुकर्म किये होते और न आज तुम्हें ये बुरे दिन देखने पड़ते ।

बहरहाल , वजह जो भी रही हो । हर दौर में और हर देश में चिन्तकों ने इनसान और जानवर के बीच में सम्बंध ढंूढने या बनाने की कोशिश की है । बुरे आदमियों को कुत्ता , सुअर , सांप , और गिद्ध आदि कहा गया है ।

पिछले दिनों एक गोदी के लाल को बड़ी चिन्ता हुई कि सारी दुनिया मुसलमानों पर रिसर्च कर रही है बस मैं ही पीछे रह गया । बस आव देखा न ताव काला चश्मा लगाकर फटाक से लिख डाला कि मंहगाई के लिए मेरे जमाख़ोर रिश्तेदार नहीं बल्कि मुसलमान ज़िम्मेदार हैं । ये वही आवागमन वाली तकनीक है । कारण तो कहीं और हो और घोषित कुछ और कर दिया जाए । अच्छा हुआ कि बेचारा माल्थस ऐसे स्कॉलर्स की आमद से पहले ही मर गया । एक साहब ने भी हक़ बात कहकर उन्हंे गिद्ध घोषित कर दिया ।हालांकि यह हक़ बात नहीं बल्कि सफ़ेद झूठ है क्योंकि न तो वे कभी उड़ते देखे गये हैं और न ही किसी गिद्ध को कभी चश्मा ही लगाए देखा गया है।

बहरहाल इन गोदी के लाल जी ने उनकी बात का बड़ा बुरा माना । लेकिन दो चार दिन पहले जब ये खुद झल्लाये तो अपनी टिप्पणी में ‘सुअर‘ लिख रहे थे । ये तो लिख रहे थे गुस्से में , लेकिन पौराणिक लोग समझ नहीं पा रहे थे कि ये किसी ब्लॉगर को गालियां दे रहे हैं या अपने आराध्य श्री विष्णु जी का नाम ले रहे हैं क्योंकि श्री विष्णु जी का एक अवतार इस रूप में भी हो चुका है ।

हिन्दू भाइयों के सामने बड़ी लाचारी है । गाली देने के लिए वह किसी भी जानवर का नाम नहीं ले सकते । क्योंकि सभी जानवरों के रूप में पहले तो स्वयं ब्रह्मा जी ही अपनी पुत्री के साथ रमण कर चुके हैं । तत्पश्चात श्री विष्णु जी समेत अन्य देवी देवता भी उनके रूप में प्रकट हो चुके हैं । एक सज्जन ने इस कठिनाई को यूं हल किया कि वे मेरे ब्लॉग पर यौनांगों का नाम लिखकर चले गये । लेकिन यहां तो यौनांगों की पूजा भी हर चैराहे पर की जाती है ।

कुछ और कहकर भी गाली दिया जाना सम्भव नहीं है क्योंकि यहां तो यह मान्यता भी है कि ईश्वर कण कण में है । इस तरह पहले तो वही ईश्वर बन जाता है जिसे गाली दी जा रही है और उसके बाद वह गाली में जिस चीज़ का भी नाम लेगा वह चीज़ भी ईश्वर बन जाती है ।

आखि़र एक हिन्दू भाई गाली दे तो क्या दे ?

लेकिन आखि़र गाली दे ही क्यों ?

गाली देना कोई धर्म का अंग तो है नहीं कि दिये बग़ैर काम नहीं चलता । मत दीजिये गाली । धर्म तो गाली गलौच से रोकता है ।

ख़ैर , इनकी अक्ल भी गोदी के लाल जितनी ही छोटी है । चारों तरफ़ इच्छाधारी घ्ूम रहे हैं और इनकी समझ में परदे का फ़ायदा भी नहीं समा पा रहा है ।

अरे गोल गप्पे वालों ने तो परदानशीन औरतों के लिए फ़ैमिली केबिन का भी बन्दोबस्त कर रखा है । अपने बिज़नेस की फ़िक्र गोल गप्पे वाला करे या वह परदे वाली करे जिसे खाने हों , आप क्यों चिन्ता में घुल रहे हैं ?

या हो सकता हो कि उनको ही गोल गप्पों की दुकान खोलने का आयडिया आ रहा हो और परदे की वजह से अपनी सेल मारे जाने का डर सता रहा हो ।बहरहाल कोई किसी भी चीज़ की दुकान खोले हमें क्या ?

हमारा विषय तो आदमी और जानवर के बीच के रिश्ते की हक़ीक़त पर तब्सरा करना है और उसमें ये गोदी के लाल कहीं भी फ़िट नहीं बैठते । न तो जानवर में और न ही आदमी में ।

हमें तो भाई खुद को सुधारना है । हमें किसी से क्या लेना ? हमारे प्रिय विचार शून्य बन्धु ने भी हमें शवान वाणी प्राणियों की बातों को नज़रअन्दाज़ करने की सलाह दी है ।

पहले ही बहुत कुछ उठा पटक हो चुकी है । हम तो सच कह दें लेकिन भाई कोई सुनने के लिए भी तो तैयार हो । यहां तो शायरी की डिमांड है , तो लो फिर शायरी ही सुनो ।
ग़ज़ल

देखने में तो परस्तार ए खुदा हैं कितने

हां मगर साहिबे तसलीम ओ रिज़ा हैं कितने

कहीं दरिया कहीं सूरज कहीं पत्थर कहीं पेड़

बाज़ बन्दों के ज़माने में खु़दा हैं कितने

सच को ईमान समझते हुए सच बोला था

लोग इस शहर के अब मुझसे ख़फ़ा हैं कितने

इश्क़ में अहदे वफ़ा करना बड़ी बात नहीं

देखना ये है कि पाबन्द ए वफ़ा हैं कितने

तेरी चाहत सभी रखते हैं मगर ये भी देख

ज़िन्दगी तेरे रफ़ीक़ों में भला हैं कितने

यहां मज़लूम के रोने पे भी पाबन्दी है

मेरी बस्ती के क़वानीन जुदा हैं कितने

मन्ज़िलें क्या उन्हें सिम्तों का नहीं इल्म ‘सईद‘

यूं तो कहने को यहां राहनुमा हैं कितने
अर्थ

परस्तार - पुजारी ,साहिबे तसलीम ओ रिज़ा - पूर्ण समर्पित , रफ़ीक़ - दोस्त , मज़लूम - पीड़ित , क़वानीन - क़ानून का बहुवचन , सिम्त - दिशा ,राहनुमा - राह दिखाने वाला

डा. सईद आरिफ़ी