सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Friday, April 2, 2010
अब आप देख सकते हैं कि अपने पूर्वजों की ज्ञान चेतना का सच्चा वारिस कौन है ? Eternal Truth

इनसान एक सामाजिक प्राणी है । समाज के लिए संगठन की ज़रूरत होती है और संगठन के लिए नियम और नेतृत्व की आवश्यकता होती है । इनसान की रचना ईश्वर ने की है तो स्वाभाविक है कि उसे जीवन जीने के लिए हरेक ज़रूरी चीज़ की तरह नियम भी वही देगा । इन्हीं नियमों का नाम धर्म है ।
इन नियमों को जीवन में उतारने वालों को भी ईश्वर ही समाज के सामने एक आदर्श के तौर पर पेश करता है । इन्हें समाज ऋषि और पैग़म्बर के नाम से जानता है ।
ये निष्कलंक जीवन जीते हैं लेकिन बाद में लोग अपने नाजायज़ स्वार्थ की पूर्ति की ख़ातिर उनके चरित्र को बिगाड़ देते हैं ।
इसकी एक ताज़ा मिसाल श्री कृष्ण जी हैं । एक महान व्यक्तित्व के बारे में ऐसी बातें जोड़ दी गईं जो वास्तव में उन्होंने कभी की ही नहीं । वे पवित्र थे । उनका चरित्र भी पवित्र था । उनके बारे में ग़लत बातें बाद में ईजाद की गईं । यही गलत बातें विकार कहलाती हैं । महापुरूष कभी ग़लत आचरण नहीं करते क्यों कि वे जानते हैं कि समाज उनका अनुकरण करता है । श्री कृष्ण जी ने इस बात को गीता जी में बताया भी है ।
नैतिकता के आदर्श महापुरूषों को अनैतिकता का स्रोत बताना भी बुद्धि का दिवालियापन है और उस पर ख़ामोश रहना भी अपने पूर्वजों के प्रति और पूरी मानवजाति के प्रति घोर अपराध है ।
अब आप देख सकते हैं कि अपने पूर्वजों की ज्ञान चेतना का सच्चा वारिस कौन है ?
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मेरा देश मेरा धर्म said...
गुरूजी शिष्यवत करबद्ध प्रणाम !
गुरूजी शिष्यवत करबद्ध प्रणाम !
हरी अनंत हरी कथा अनंता
कृपा करके इस वाक्य का अर्थ समझादिजिये.
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April 2, 2010 10:45 AM
April 2, 2010 10:45 AM
पालनहार प्रभु का एक गुणवाचक नाम हरि भी है अर्थात अपने भक्तों के पाप और दुखों का हरण करने वाला । क्यों कि वह अपने पर आश्रित असंख्य जीवों के पाप और दुखों का हरण अनन्त विधियों से करता है इसलिये उस पालनहार प्रभु श्री हरि का गुणगान और उसके आदर्श भक्तों की कथाओं को अनन्त काल तक भी कहा जाये तो उसका हक़ अदा नहीं हो सकता । आपने आदेश दिया तो मैंने अति संक्षेप में आपके हुक्म की तामील करते हुए आपके आदरवश कुछ लिख दिया है वर्ना तो आप स्वयं ज्ञानी हैं । आपकी टिप्पणी पाना ही मेरे लिए सम्मान की बात है । स्वयं को शिष्य बताना भी आपके अन्दर के विनय को दर्शाता है । आपके वचनों के द्वारा भी वह पालनहार मेरे दिल के दुख को हरता है । आप भी उस महान प्रभु की अद्भुत योजना में प्रयुक्त हो रहे हैं । आप स्वयं में प्रभु पालनहार का वरदान हैं ।अन्ततः ईश्वर एक है और नैतिकता के मानदण्ड अर्थात धर्म भी सदा से एक ही है ।
इसी सच्चाई को आज हमें पहचानना है ।
आइये , अपना फ़र्ज़ अदा करें ।
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