सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Showing posts with label ‘तत्वदर्शी‘. Show all posts
Showing posts with label ‘तत्वदर्शी‘. Show all posts

Saturday, July 24, 2010

The way for mankind धर्म वह ईश्वरीय जीवन पद्धति है जिसके बिना कल्याण संभव नहीं है। वह सदा से एक ही है। - Anwer Jamal

ईश्वर शाश्वत है , धर्म सनातन है , ईश्वर धर्म का मूल है। ईश्वर एक ही है। उसके गुण अनंत हैं। न तो ईश्वर के रूप की कल्पना संभव है और न ही उसके किसी गुण की। मनुष्य एक सामाजिक और नैतिक प्राणी है। उसका जीवन और यह लोक दोनों ही अस्थायी हैं। परलोक स्थायी है। मनुष्य का कर्म धर्मानुकूल ही होना चाहिये और धर्म ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है। ज्ञानी और श्रेष्ठ सदाचारी लोगों के अन्तःकरण में ईश्वर अपनी वाणी का अवतरण करता है , वे उस पर अमल करते हैं और लोगों के सामने एक आदर्श और मिसाल पेश करते हैं। उनके काल में भी और बाद में भी बहुत से लोग उनका विरोध करते हैं। विरोध करने वालों में नादान और कम समझ लोग भी होते हैं और वे लोग भी होते हैं जिनकी चैधराहट पर आंच आ रही होती है। लोग उमूमन सुविधा पसंद होते हैं और होना भी चाहिये लेकिन यह बात तब अपराध बन जाती है जब धर्म की गद्दी पर बैठने वाले लोग अपनी इच्छाओं को धर्म के अधीन करने के बजाय धर्म को अपनी इच्छानुकूल बदलते रहते हैं। उसके मौलिक सिद्धांतों तक में भारी फेर बदल कर देते हैं।

वे न तो उपासना पद्धति को ही प्राचीन विधि के अनुकूल रहने देते हैं और न ही सामाजिक नियमों को।
धर्म केवल उपासना पद्धति और नाम जाप का ही नाम नहीं होता बल्कि वह मनुष्य को जीवन के हर पहलू में हर संकट में सही और सीधा मार्ग दिखाता है।
मनुष्य को ईश्वर ने पैदा किया है और इस कायनात की हरेक चीज़ को भी। कल्याणकारी सीधा मार्ग उस सच्चे स्वामी के सिवा और कोई नहीं जानता। उससे सीधे सन्मार्ग की विनती ही प्रार्थना का मूल है। यह प्रार्थना फलीभूत तब होती है जब केवल उसी एक पर पूरी निष्ठा रखते हुए उसके द्वारा अवतरित धर्म विधान का पालन किया जाए। इस विधान का पालन ही तय करता है कि कौन भक्त वास्तव में ईश्वर के प्रति निष्ठावान है ?

ईश्वर एक है और उसने मानवता को सदा एक ही धर्म की शिक्षा दी है। उस धर्म की शिक्षा उसने अपनी वाणी वेद के माध्यम से दी और महर्षि मनु को आदर्श बनाया तो इस धर्म को वैदिक धर्म या मनु के धर्म के नाम से जाना गया और जब बहुत से लोगों ने वेद को छिपा दिया और इसके अर्थों को दुर्बोध बना दिया तो उसी परमेश्वर ने जगत के अंत में पवित्र कुरआन के माध्यम से धर्म को फिर से सुलभ और सुबोध बना दिया है।

ईश्वर अपनी वाणी कुरआन में स्वयं कहता है-

इन्नहु लफ़ी ज़ुबुरिल्-अव्वलीन ।

अर्थात बेशक यह कुरआन आदिग्रंथों में है।

इस ज़मीन पर ‘वेद‘ सबसे पुराने धार्मिक ग्रंथ हैं।
वेद सार ब्रह्म सूत्र है-

एकम् ब्रह्म द्वितीयो नास्ति , नेह , ना , नास्ति किंचन ।
अर्थात ब्रह्म एक है दूसरा नहीं है, नहीं है, नहीं है, किंचित भी नहीं है।

पवित्र कुरआन के सार को कलिमा ए तय्यिबा कहा जाता है -

ला इलाहा इल्-लल्लाह
अर्थात परमेश्वर के सिवा कोई अन्य उपासनीय नहीं है।

वेद और कुरआन दोनों के मानने वाले ईश्वर की इच्छा से इस मुल्क में इकठ्ठे हो चुके हैं।
वेदों के बारे में वैदिक विद्वान भी एकमत नहीं हैं। कोई इनमें इतिहास बताता है और कोई इनमें इतिहास को सिरे से नकारता है। कोई इन्द्र का अर्थ राजा करता है और दूसरा कोई उसका अर्थ ईश्वर बताता है।
कोई ब्राह्मण ग्रंथों को वेदों का भाग बताता है और दूसरा वर्ग उसे मात्र व्याख्या बताता है। कोई उन्हें चार-पांच हज़ार साल पूर्व ऋषियों द्वारा रचित बताता है और कोई इन्हें तिब्बत में लगभग दो अरब वर्ष पूर्व का ज्ञान बताता है।
यही हाल जाति के अनुसार कर्म की है। नारी और शूद्रों के अधिकारों की है। विधवा नारियों की समस्याओं के समाधान की है। 100 वर्ष की आयु मानकर चार आश्रमों के पालन की है, यज्ञ और हवन की है। स्वर्ग और नर्क के विभागों की नाम सहित ऐसी व्याख्या भी यहां मिलेगी कि आदमी पढ़ते हुए समझेगा कि सारा दृश्य उसकी नज़रों के सामने है और फिर वहीं यह भी लिखा मिलेगा कि स्वर्ग नाम सुख का और नर्क नाम दुख का है दोनों वास्तव में अलंकार हैं।
ग़र्ज़ यह कि हज़ारों साल के दौरान बहुत से कवि और दार्शनिक पैदा हुए और उन्होंने अपनी अपनी बुद्धि से बहुत सा साहित्य रचा। उनमें कुछ बातें बहुत उच्च स्तर की हैं और बहुत सी ऐसी हैं जिनमें अत्याचार और अश्लीलता है।
अपनी इच्छाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिये महापुरूषों और ऋषियों के चरित्र को ऐसा विकृत कर दिया गया कि महाभारत में अपने बाप से उत्पन्न आदमी को ढूंढना मुश्किल हो जाता है।
श्री रामचन्द्र जी और श्री कृष्ण जी समेत बहुत से महापुरूषों के जीवन चरित्र के साथ खिलवाड़ किया गया है। मानवता के सामने आज आदर्श का संकट है । वह किसे सही माने और किस के जीवन के अनुसार अपना जीवन ढाले। दोनों ही महापुरूष भारतीय जनमानस में अति लोकप्रिय है परंतु दोनों के ही जीवन चरित्र को लीला कह दिया गया।

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इस जगत में आने मानवता का सबसे बड़ा संकट उस दयालु ईश्वर ने हल कर दिया है। मुहम्मद साहब सल्ल. के अंतःकरण पर अवतरित ईश्वरीय वाणी ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित है। उनकी जीवनी भी सुरक्षित है। उनके बताये गये नियम पूर्णतः वेदानुकूल हैं, आज के समय में सरलतापूर्वक पालनीय हैं। उनके द्वारा बतायी गयी उपासना पद्धति भी सहज सरल और पालनीय है। कटते जंगल, बढ़ते ग्लोबल वॉर्मिंग और घटते घी के दौर में आज जब हवन

करना लगभग साढ़े छः अरब मनुष्यों के लिये संभव नहीं है तब भी नमाज़ अदा करना आसान है, हरेक के लिये , ग़रीब के लिये भी और अमीर के लिये भी।
धर्म वह ईश्वरीय जीवन पद्धति है जिसके बिना कल्याण संभव नहीं है। वह सदा से एक ही है। अलग अलग भाषाओं में उसके बहुत से नाम हैं। एक ही धर्म आज केवल विकारों के कारण बहुत से मतों की भीड़ में दब गया है लेकिन ‘तत्वदर्शी‘ उसे अपनी ज्ञानदृष्टि से आसानी से पहचान लेता है और मान भी लेता है।
विश्व के परिदृश्य में भारत एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति है। अगर हमने समझदारी से अपने मनमुटाव दूर कर लिये तो फिर यह विश्व की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति भी होगा। विश्व नेतृत्व पद हमारे सामने है लेकिन हमें खुद को उसके योग्य साबित करना होगा।