सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Friday, October 8, 2010
A dialogue with Mr. Mahak goyal and other well wishers 'हिन्दू जाति' और ‘हिन्दू धर्म‘ की खूबियां और उनका प्रभाव - Anwer Jamal
आपकी आपत्ति जायज़ है
@ मेरे अतुल्य और अमूल्य बंधु-ब्रदर ! आपकी टिप्पणी मिली और पता चला कि आपको मेरा शब्द-चयन पसंद नहीं आया। मुझे ‘हिन्दुओं की तरह‘ लिखने के बजाय ‘कुछ हिन्दुओं की तरह‘ लिखना चाहिए था। मैं आपको ध्यान दिलाना चाहूंगा कि मैंने अपने इन शब्दों में एक लिंक भी दिया था ताकि पढ़ने वालों को पता चल जाए कि मेरा आशय किन हिन्दुओं से है ?
सभी हिन्दू आवागमन को नहीं मानते, यह सच है। मेरे लिखने में अगर अस्पष्टता रह गई है तो मैं आपकी आपत्ति को जायज़ मानते हुए लेख को एडिट करके उसे आपकी मंशा के मुताबिक़ कर दूंगा।
मैंने ऐसा कब कहा कि आपको कुरबानी या किसी इस्लामी मान्यता पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए था ?
मैं तो चाहता हूं कि सवालों का गला नहीं घोंटा जाना चाहिए। जो सवाल मन में उठे उसे सामने रखा जाए ताकि जो उसे हल कर सकता है वह उसे हल कर दे। इस तरह सवाल हल होंगे तो ज्ञान बढ़ेगा और अज्ञान का अंधेरा अपने आप ही दूर हो जाएगा।
ईश्वर और धर्म एक है केवल नाम अलग हैं
सबका मालिक एक है, मानव जाति एक है। ईश्वर ने मानव जाति को सही-ग़लत की तमीज़ सिखाई। ईश्वरीय विधान का नाम ‘धर्म‘ है। हिन्दुस्तान में आया तो इसी धर्म को ‘हिन्दू धर्म‘ कह दिया गया, अरब में आया तो उसे ‘दीन ए अरबी‘ कह दिया गया। कुरआन में इसी को ‘इस्लाम‘ कहा गया और वैदिक साहित्य में धर्म को शांति का स्रोत बताया गया। ‘इस्लाम‘ का धात्वर्थ ही ‘शांति‘ है। मालिक शांति चाहता है और उसके बन्दे भी। जो नाहक़ शांति को भंग करे वह ‘शैतान‘ है। जो मानव जाति को बांटे और उसे आपस में लड़ाए वह शैतान है। हमें मालिक को भी पहचानना है और शैतान को भी। मालिक पर भरोसा करना है और शैतान से खुद को और लोगों को बचाना है ।
बेहतर भविष्य के लिए सुधार लाज़िमी है
मनुष्य चिंतनशील और प्रयोगधर्मी है। उसका हरेक विचार सही नहीं हो सकता। ग़लत विचारों से ग़लत कर्म पैदा होते हैं जिनसे समाज में अशांति और तबाही आती है। अपने और समाज के सामूहिक सुधार के लिए विचारों को परिष्कृत करना अनिवार्य है और इसके लिए हमें आपस में चर्चा-मंत्रणा करनी ही होगी। इसी से भारत एक शक्ति के रूप में उदित होगा। निकट भविष्य के हालात भारत के अनुकूल होंगे लेकिन अगर हम ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ न बन सके तो कोई फ़ायदा न हो सकेगा। समय आएगा और किसी और का चयन कर लिया जाएगा।
किसी भी बात पर खून-खराबा न किया जाए। विवादों को बैठकर बातचीत के माध्यम से सुलझाया जाए क्योंकि खून-खराबे के बाद भी आपस में ही बातचीत करनी पड़ती है। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे सर्वमान्य बातों को सभी आस्तिक-नास्तिक जनों को तुरंत मान लेना चाहिए और जिन बातों में मतभेद है उन पर सलाह-सुझाव लेते-देते रहें।
हिन्दू जाति की खूबियां और उनका प्रभाव
आप मुझे गुरू और गुरूतुल्य कहते हैं, यह आपकी खूबी है, आपकी ही नहीं बल्कि सारी हिन्दू जाति की खूबी है। आपमें विनय है, हिन्दू जाति में विनय है। जहां विनय होता है वहां ज्ञान और हरेक शुभ खुद ब खुद खिंचकर आ ही जाता है और आ भी रहा है। मैं गुरू नहीं हूं लेकिन आपसे आदर पाकर अच्छा लगता है। कोई गाली देता है, बुरा कहता है तो बुरा लगता है। मैं तारीफ़ और निंदा को समभाव से नहीं लेता बल्कि इन्हें इंजॉय करता हूं। दोनों के अपने-अपने रस हैं। जब हम बुरेपन को महसूस कर सकेंगे तब ही हम किसी अच्छेपन को समझने के लायक़ बनते हैं। मुझे बुरा कहने वाले भी मुझ पर उपकार ही करते हैं। वे मुझे कुछ देकर ही जाते हैं ।
मैं भी उन्हें कुछ देने की ही कोशिश कर रहा हूं। अपने जीवन में सत्य ढूंढा, मानवता के दुख-दर्द का कारण और उसका निवारण ढूंढा और पा भी लिया। कुछ पाने के लिए हमें कुछ खोना पड़ता है लेकिन पुरानी चीज़ों से हमें मोह हो जाता है। उन्हें छोड़ते हुए हमें दुख होता है।
ईश्वर तक पहुंचने का बेहतरीन ज़रिया हैं मां-बाप
जो कपड़े अनम ने पहने थे मैंने उन्हें फेंकने न दिया लेकिन मेरी वालिदा साहिबा ने कहा कि इन्हें नहर डाल दो, बच्ची बीमार थी। क्या तुम साइंस को भी नहीं मानते ?
मैंने अपनी वाइफ़ से कहा कि इन्हें पानी में उबाल लो, डिटौल से धो लो लेकिन फेंको नहीं। उन्होंने कहा कि अम्मी ने कहा है फेंकने के लिए, चाहती तो मैं भी नहीं। बहरहाल ‘मां के हुक्म‘ को पूरा करना पड़ा लेकिन उसके कपड़ों को फेंकते हुए उसे फेंकने का सा अहसास दुख देकर गया।
इनसान जज़्बात में जीता है। जज़्बात ही इनसान को कभी इनसान और कभी शैतान बनाते हैं। हमें अपने जज़्बात में संतुलन लाना होगा। अगर हम अपने मां-बाप का हुक्म मानते हैं तो हमें उन्हें रचने वाले मालिक का हुक्म मानना भी सीखना होगा। मां-बाप ईश्वर तक पहुंचने की बेहतरीन सीढ़ी अर्थात बेहतरीन माध्यम हैं। जिसने मां-बाप को छोड़ दिया उसे कोई ध्यान-ज्ञान और समाधि ईश्वर तक नहीं पहुंचा सकती।
परिमार्जन के लिए धन्यवाद
मुझे आपकी बात बुरी नहीं लगी। आपके टोकने से मेरे अंदर सुधार हुआ है। आगे भी टोकते रहें। दो भाई दो हाथों की तरह हैं। एक हाथ खुद को नहीं धो सकता। आपने मेरी कमी की तरफ़ ध्यान दिलाया और मैंने उसे दूर कर लिया। मैं आपका कृतज्ञ हूं। धन्यवाद
धर्म ईश्वर की ओर से होता है
जनाब सतीशचन्द गुप्ता जी की ओर से किसी ने मेरे कथन को उद्धृत करते हुए उस पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। दरअस्ल दुनिया बहुत से दार्शनिकों के दर्शन, कवियों की रचनाओं और लोक परंपराओं के समूह को हिन्दू धर्म के नाम से जानती है। मनुष्य की बातें ग़लत हो सकती हैं बल्कि होती हैं। इसलिए उन्हें मेरे कथन पर ऐतराज़ हुआ लेकिन मैं ईश्वर के उन नियमों को धर्म मानता हूं जो ईश्वर की ओर से मनु आदि सच्चे ऋषियों के अन्तःकरण पर अवतरित हुए। ईश्वर के ज्ञान में कभी ग़लती नहीं होती इसलिए धर्म में भी ग़लत बात नहीं हो सकती। ऋषियों का ताल्लुक़ हिन्दुस्तान से होने के कारण मैं उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहता हूं।
ऋषियों का चरित्र आदर्श होता है
ऋषि-व्यवस्था में कुछ बातें सब ज़मानों के लिए होती हैं और कुछ बातें विशेष परिस्थितियों के लिए। आज हमारे सामने भारतीय ऋषियों का जीवन चरित्र सुरक्षित नहीं है। इसी कारण आज हमें वैदिक साहित्य के वास्तविक मंतव्य को समझने में भारी कठिनाई आती है क्योंकि हम नहीं जानते कि कौन बात तात्कालिक हालात के लिए थी और कौन सी हर ज़माने में पालन करने योग्य ?
जो बातें तात्कालिक हालात के लिए थीं और आज अप्रासंगिक हो चुकी हैं, वे आज ग़लत लग सकती हैं लेकिन जब उनकी आवश्यकता थी तब वे ग़लत नहीं थीं। यह बात केवल ऋषि-व्यवस्था के लिए है। दार्शनिक और कवि लोग ऋषियों की श्रेणी में नहीं आते। इनकी बातें तभी मान्य हैं जबकि वे ऋषि-व्यवस्था के अनुकूल हों।
धर्म की जगह अब दर्शन का चलन आम है हिन्दू समाज में
हिन्दुओं के पास अब केवल दर्शन और काव्य है, ऋषि-व्यवस्था का लोप हो चुका है, धर्म का लोप हो चुका है। इसीलिए वे अब संस्कृति की बातें करते हैं या फिर दर्शन की। मैं धर्म के उसी सनातन स्वरूप को मानता हूं जो ईश्वरीय है और एक ही मालिक की ओर से हर देश-क़ौम में अलग-अलग काल में प्रकट हुआ। उसमें न कोई कमी कल थी जब उसे सनातन और वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था और न ही कोई कमी आज है जबकि उसे ‘इस्लाम‘ के नाम से जाना जाता है।
कमियां मनुष्य की ओर से हैं
कमियां हो सकती हैं मुफ़्तियों के फ़त्वों और इस्लाम की व्याख्या करने वालों के समझने और समझाने में। आलिमों के लिखे इस्लामी लिट्रेचर में भी कमियां देखने में आती हैं। ये कमियां मनुष्य के चिंतन की कमियां हैं, धर्म की नहीं। ईश्वर हर कमी और कमज़ोरी से पाक है और उसका धर्म भी। ‘हिन्दू धर्म में कोई भी बात ग़लत नहीं हो सकती‘ से मेरा आशय यही है कि मैं ग़लत बातों को ईश्वर की ओर से नहीं मानता, उन्हें धर्म का अंग ही नहीं मानता। दार्शनिकों की बातों को दुनिया हिन्दू धर्म मान बैठी है, उसे ‘हिन्दू दर्शन‘ कहा जाना चाहिए न कि ‘हिन्दू धर्म‘। दर्शन मनुष्य के मन से निकलता है। एक दार्शनिक की बात दूसरा दार्शनिक काटता आया है। एक दार्शनिक के लिए ईश्वर और आत्मा में आस्था रखना भी अनिवार्य नहीं है। भारत में भी नास्तिक दार्शनिक हुए हैं और उनके साहित्य को भी धार्मिक साहित्य में सम्मिलित कर लिया गया। धर्म के लोप होने से ही ऐसा संभव हो पाया। इसीलिए चारों तरफ़ हाहाकार मचा हुआ है।
धर्म से है मनुष्य का कल्याण
धर्म नहीं तो कल्याण नहीं। आओ धर्म की ओर, आओ कल्याण की ओर। इसी को अरबी में ‘हय्या अलल फ़लाह‘ कहते हैं। मस्जिदों से यही आवाज़ लगाई जाती है, सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि सब के लिए लेकिन सब तो वहां क्या जाते, मुसलमान भी कम ही जाते हैं और वहां जाने वाले भी अपने कर्तव्यों का पालन करने में सुस्ती दिखाते हैं।
मुसलमान होने के लिए हकीक़त की दुनिया में रहना ज़रूरी है
@ सुज्ञ जी ! आप की आलोचना का स्वागत है . आप जैसे लोग अभी हमारे बीच हैं यह हमारे लए सामान ए तसल्ली है.
१- मैंने बिना तर्क दिए कहीं नहीं कहा कि मांसाहार का विरोध न करें . बल्कि मैंने बताया है कि मांसाहार का विरोध क्यों न करें . प्रमाण भी दिए हैं अब हज और क़ुरबानी का वक़्त सामने है , बात उठेगी तो फिर दूंगा हालाँकि मैं पाचन प्रॉब्लम कि वजह से मांसाहार नहीं करता . मुसलमान होने के लिए गोश्त खाना ज़रूरी नहीं है लेकिन हकीक़त कि दुनिया में रहना ज़रूरी है . मानव जाति के लगभग ७ अरब सदस्यों का पालन बिना मांसाहार के संभव नहीं है.
२- मैं सभी तीर्थंकरों का आदर करता हूँ और जैन आचार्यों का भी. वर्तमान में होने वाले सर्वधर्म संवाद कि शुरुआत में जैन आचार्यों का बड़ा योगदान है . इससे ज्ञान बढ़ा , प्यार बढ़ा , देश आगे बढ़ा .
३- संबोधित व्यक्ति की मान्यताएं सामने रहें तो अपनी बात के लिए शब्द चयन आदि सटीक रहता है , बात को समझाना आसन रहता है .
४- मैं सवालों का सवागत करता हूँ . शिष्टता को बनाये रखें तो संवाद देर तक कायम रह सकता है . आपसे कभी भाषा आदि कि शिकायत नहीं आई . अन्य उद्दंड ब्लोगर्स से भी मैं आपकी मिसाल देकर विनती करता रहता हूँ , आप जानते ही होंगे .
@ कहाँ रह गए राकेश लाल जी ?
क्या सारा मैटर कल ही पेस्ट कर डाला ? अब इन सवालों के जवाब कौन देगा ?
@ रविन्द्र जी ! लीजिये हमने आपके कहने के मुताबिक भाई महक की बात मान ली है . हम आपकी लम्बी उम्र की दुआ मालिक से मांगते हैं . लगे रहिये , हमारे साथ बने रहिये .
@ मेरे अतुल्य और अमूल्य बंधु-ब्रदर ! आपकी टिप्पणी मिली और पता चला कि आपको मेरा शब्द-चयन पसंद नहीं आया। मुझे ‘हिन्दुओं की तरह‘ लिखने के बजाय ‘कुछ हिन्दुओं की तरह‘ लिखना चाहिए था। मैं आपको ध्यान दिलाना चाहूंगा कि मैंने अपने इन शब्दों में एक लिंक भी दिया था ताकि पढ़ने वालों को पता चल जाए कि मेरा आशय किन हिन्दुओं से है ?
सभी हिन्दू आवागमन को नहीं मानते, यह सच है। मेरे लिखने में अगर अस्पष्टता रह गई है तो मैं आपकी आपत्ति को जायज़ मानते हुए लेख को एडिट करके उसे आपकी मंशा के मुताबिक़ कर दूंगा।
मैंने ऐसा कब कहा कि आपको कुरबानी या किसी इस्लामी मान्यता पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए था ?
मैं तो चाहता हूं कि सवालों का गला नहीं घोंटा जाना चाहिए। जो सवाल मन में उठे उसे सामने रखा जाए ताकि जो उसे हल कर सकता है वह उसे हल कर दे। इस तरह सवाल हल होंगे तो ज्ञान बढ़ेगा और अज्ञान का अंधेरा अपने आप ही दूर हो जाएगा।
ईश्वर और धर्म एक है केवल नाम अलग हैं
सबका मालिक एक है, मानव जाति एक है। ईश्वर ने मानव जाति को सही-ग़लत की तमीज़ सिखाई। ईश्वरीय विधान का नाम ‘धर्म‘ है। हिन्दुस्तान में आया तो इसी धर्म को ‘हिन्दू धर्म‘ कह दिया गया, अरब में आया तो उसे ‘दीन ए अरबी‘ कह दिया गया। कुरआन में इसी को ‘इस्लाम‘ कहा गया और वैदिक साहित्य में धर्म को शांति का स्रोत बताया गया। ‘इस्लाम‘ का धात्वर्थ ही ‘शांति‘ है। मालिक शांति चाहता है और उसके बन्दे भी। जो नाहक़ शांति को भंग करे वह ‘शैतान‘ है। जो मानव जाति को बांटे और उसे आपस में लड़ाए वह शैतान है। हमें मालिक को भी पहचानना है और शैतान को भी। मालिक पर भरोसा करना है और शैतान से खुद को और लोगों को बचाना है ।
बेहतर भविष्य के लिए सुधार लाज़िमी है
मनुष्य चिंतनशील और प्रयोगधर्मी है। उसका हरेक विचार सही नहीं हो सकता। ग़लत विचारों से ग़लत कर्म पैदा होते हैं जिनसे समाज में अशांति और तबाही आती है। अपने और समाज के सामूहिक सुधार के लिए विचारों को परिष्कृत करना अनिवार्य है और इसके लिए हमें आपस में चर्चा-मंत्रणा करनी ही होगी। इसी से भारत एक शक्ति के रूप में उदित होगा। निकट भविष्य के हालात भारत के अनुकूल होंगे लेकिन अगर हम ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ न बन सके तो कोई फ़ायदा न हो सकेगा। समय आएगा और किसी और का चयन कर लिया जाएगा।
किसी भी बात पर खून-खराबा न किया जाए। विवादों को बैठकर बातचीत के माध्यम से सुलझाया जाए क्योंकि खून-खराबे के बाद भी आपस में ही बातचीत करनी पड़ती है। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे सर्वमान्य बातों को सभी आस्तिक-नास्तिक जनों को तुरंत मान लेना चाहिए और जिन बातों में मतभेद है उन पर सलाह-सुझाव लेते-देते रहें।
हिन्दू जाति की खूबियां और उनका प्रभाव
आप मुझे गुरू और गुरूतुल्य कहते हैं, यह आपकी खूबी है, आपकी ही नहीं बल्कि सारी हिन्दू जाति की खूबी है। आपमें विनय है, हिन्दू जाति में विनय है। जहां विनय होता है वहां ज्ञान और हरेक शुभ खुद ब खुद खिंचकर आ ही जाता है और आ भी रहा है। मैं गुरू नहीं हूं लेकिन आपसे आदर पाकर अच्छा लगता है। कोई गाली देता है, बुरा कहता है तो बुरा लगता है। मैं तारीफ़ और निंदा को समभाव से नहीं लेता बल्कि इन्हें इंजॉय करता हूं। दोनों के अपने-अपने रस हैं। जब हम बुरेपन को महसूस कर सकेंगे तब ही हम किसी अच्छेपन को समझने के लायक़ बनते हैं। मुझे बुरा कहने वाले भी मुझ पर उपकार ही करते हैं। वे मुझे कुछ देकर ही जाते हैं ।
मैं भी उन्हें कुछ देने की ही कोशिश कर रहा हूं। अपने जीवन में सत्य ढूंढा, मानवता के दुख-दर्द का कारण और उसका निवारण ढूंढा और पा भी लिया। कुछ पाने के लिए हमें कुछ खोना पड़ता है लेकिन पुरानी चीज़ों से हमें मोह हो जाता है। उन्हें छोड़ते हुए हमें दुख होता है।
ईश्वर तक पहुंचने का बेहतरीन ज़रिया हैं मां-बाप
जो कपड़े अनम ने पहने थे मैंने उन्हें फेंकने न दिया लेकिन मेरी वालिदा साहिबा ने कहा कि इन्हें नहर डाल दो, बच्ची बीमार थी। क्या तुम साइंस को भी नहीं मानते ?
मैंने अपनी वाइफ़ से कहा कि इन्हें पानी में उबाल लो, डिटौल से धो लो लेकिन फेंको नहीं। उन्होंने कहा कि अम्मी ने कहा है फेंकने के लिए, चाहती तो मैं भी नहीं। बहरहाल ‘मां के हुक्म‘ को पूरा करना पड़ा लेकिन उसके कपड़ों को फेंकते हुए उसे फेंकने का सा अहसास दुख देकर गया।
इनसान जज़्बात में जीता है। जज़्बात ही इनसान को कभी इनसान और कभी शैतान बनाते हैं। हमें अपने जज़्बात में संतुलन लाना होगा। अगर हम अपने मां-बाप का हुक्म मानते हैं तो हमें उन्हें रचने वाले मालिक का हुक्म मानना भी सीखना होगा। मां-बाप ईश्वर तक पहुंचने की बेहतरीन सीढ़ी अर्थात बेहतरीन माध्यम हैं। जिसने मां-बाप को छोड़ दिया उसे कोई ध्यान-ज्ञान और समाधि ईश्वर तक नहीं पहुंचा सकती।
परिमार्जन के लिए धन्यवाद
मुझे आपकी बात बुरी नहीं लगी। आपके टोकने से मेरे अंदर सुधार हुआ है। आगे भी टोकते रहें। दो भाई दो हाथों की तरह हैं। एक हाथ खुद को नहीं धो सकता। आपने मेरी कमी की तरफ़ ध्यान दिलाया और मैंने उसे दूर कर लिया। मैं आपका कृतज्ञ हूं। धन्यवाद
धर्म ईश्वर की ओर से होता है
जनाब सतीशचन्द गुप्ता जी की ओर से किसी ने मेरे कथन को उद्धृत करते हुए उस पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। दरअस्ल दुनिया बहुत से दार्शनिकों के दर्शन, कवियों की रचनाओं और लोक परंपराओं के समूह को हिन्दू धर्म के नाम से जानती है। मनुष्य की बातें ग़लत हो सकती हैं बल्कि होती हैं। इसलिए उन्हें मेरे कथन पर ऐतराज़ हुआ लेकिन मैं ईश्वर के उन नियमों को धर्म मानता हूं जो ईश्वर की ओर से मनु आदि सच्चे ऋषियों के अन्तःकरण पर अवतरित हुए। ईश्वर के ज्ञान में कभी ग़लती नहीं होती इसलिए धर्म में भी ग़लत बात नहीं हो सकती। ऋषियों का ताल्लुक़ हिन्दुस्तान से होने के कारण मैं उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहता हूं।
ऋषियों का चरित्र आदर्श होता है
ऋषि-व्यवस्था में कुछ बातें सब ज़मानों के लिए होती हैं और कुछ बातें विशेष परिस्थितियों के लिए। आज हमारे सामने भारतीय ऋषियों का जीवन चरित्र सुरक्षित नहीं है। इसी कारण आज हमें वैदिक साहित्य के वास्तविक मंतव्य को समझने में भारी कठिनाई आती है क्योंकि हम नहीं जानते कि कौन बात तात्कालिक हालात के लिए थी और कौन सी हर ज़माने में पालन करने योग्य ?
जो बातें तात्कालिक हालात के लिए थीं और आज अप्रासंगिक हो चुकी हैं, वे आज ग़लत लग सकती हैं लेकिन जब उनकी आवश्यकता थी तब वे ग़लत नहीं थीं। यह बात केवल ऋषि-व्यवस्था के लिए है। दार्शनिक और कवि लोग ऋषियों की श्रेणी में नहीं आते। इनकी बातें तभी मान्य हैं जबकि वे ऋषि-व्यवस्था के अनुकूल हों।
धर्म की जगह अब दर्शन का चलन आम है हिन्दू समाज में
हिन्दुओं के पास अब केवल दर्शन और काव्य है, ऋषि-व्यवस्था का लोप हो चुका है, धर्म का लोप हो चुका है। इसीलिए वे अब संस्कृति की बातें करते हैं या फिर दर्शन की। मैं धर्म के उसी सनातन स्वरूप को मानता हूं जो ईश्वरीय है और एक ही मालिक की ओर से हर देश-क़ौम में अलग-अलग काल में प्रकट हुआ। उसमें न कोई कमी कल थी जब उसे सनातन और वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था और न ही कोई कमी आज है जबकि उसे ‘इस्लाम‘ के नाम से जाना जाता है।
कमियां मनुष्य की ओर से हैं
कमियां हो सकती हैं मुफ़्तियों के फ़त्वों और इस्लाम की व्याख्या करने वालों के समझने और समझाने में। आलिमों के लिखे इस्लामी लिट्रेचर में भी कमियां देखने में आती हैं। ये कमियां मनुष्य के चिंतन की कमियां हैं, धर्म की नहीं। ईश्वर हर कमी और कमज़ोरी से पाक है और उसका धर्म भी। ‘हिन्दू धर्म में कोई भी बात ग़लत नहीं हो सकती‘ से मेरा आशय यही है कि मैं ग़लत बातों को ईश्वर की ओर से नहीं मानता, उन्हें धर्म का अंग ही नहीं मानता। दार्शनिकों की बातों को दुनिया हिन्दू धर्म मान बैठी है, उसे ‘हिन्दू दर्शन‘ कहा जाना चाहिए न कि ‘हिन्दू धर्म‘। दर्शन मनुष्य के मन से निकलता है। एक दार्शनिक की बात दूसरा दार्शनिक काटता आया है। एक दार्शनिक के लिए ईश्वर और आत्मा में आस्था रखना भी अनिवार्य नहीं है। भारत में भी नास्तिक दार्शनिक हुए हैं और उनके साहित्य को भी धार्मिक साहित्य में सम्मिलित कर लिया गया। धर्म के लोप होने से ही ऐसा संभव हो पाया। इसीलिए चारों तरफ़ हाहाकार मचा हुआ है।
धर्म से है मनुष्य का कल्याण
धर्म नहीं तो कल्याण नहीं। आओ धर्म की ओर, आओ कल्याण की ओर। इसी को अरबी में ‘हय्या अलल फ़लाह‘ कहते हैं। मस्जिदों से यही आवाज़ लगाई जाती है, सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि सब के लिए लेकिन सब तो वहां क्या जाते, मुसलमान भी कम ही जाते हैं और वहां जाने वाले भी अपने कर्तव्यों का पालन करने में सुस्ती दिखाते हैं।
मुसलमान होने के लिए हकीक़त की दुनिया में रहना ज़रूरी है
@ सुज्ञ जी ! आप की आलोचना का स्वागत है . आप जैसे लोग अभी हमारे बीच हैं यह हमारे लए सामान ए तसल्ली है.
१- मैंने बिना तर्क दिए कहीं नहीं कहा कि मांसाहार का विरोध न करें . बल्कि मैंने बताया है कि मांसाहार का विरोध क्यों न करें . प्रमाण भी दिए हैं अब हज और क़ुरबानी का वक़्त सामने है , बात उठेगी तो फिर दूंगा हालाँकि मैं पाचन प्रॉब्लम कि वजह से मांसाहार नहीं करता . मुसलमान होने के लिए गोश्त खाना ज़रूरी नहीं है लेकिन हकीक़त कि दुनिया में रहना ज़रूरी है . मानव जाति के लगभग ७ अरब सदस्यों का पालन बिना मांसाहार के संभव नहीं है.
२- मैं सभी तीर्थंकरों का आदर करता हूँ और जैन आचार्यों का भी. वर्तमान में होने वाले सर्वधर्म संवाद कि शुरुआत में जैन आचार्यों का बड़ा योगदान है . इससे ज्ञान बढ़ा , प्यार बढ़ा , देश आगे बढ़ा .
३- संबोधित व्यक्ति की मान्यताएं सामने रहें तो अपनी बात के लिए शब्द चयन आदि सटीक रहता है , बात को समझाना आसन रहता है .
४- मैं सवालों का सवागत करता हूँ . शिष्टता को बनाये रखें तो संवाद देर तक कायम रह सकता है . आपसे कभी भाषा आदि कि शिकायत नहीं आई . अन्य उद्दंड ब्लोगर्स से भी मैं आपकी मिसाल देकर विनती करता रहता हूँ , आप जानते ही होंगे .
@ कहाँ रह गए राकेश लाल जी ?
क्या सारा मैटर कल ही पेस्ट कर डाला ? अब इन सवालों के जवाब कौन देगा ?
@ रविन्द्र जी ! लीजिये हमने आपके कहने के मुताबिक भाई महक की बात मान ली है . हम आपकी लम्बी उम्र की दुआ मालिक से मांगते हैं . लगे रहिये , हमारे साथ बने रहिये .
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