सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to

जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं आचार्य मौलाना शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है, More More More



Showing posts with label गीता में युद्ध. Show all posts
Showing posts with label गीता में युद्ध. Show all posts

Saturday, April 17, 2010

गीता में युद्धोन्माद - Dr. Surendra Kumar Sharma 'Agyat'

वेदों की ही विचारधारा आगे महाकाव्यों में प्रतिफलित हुई । महाभारत में जो ‘गीता‘ मिलती है , उसका प्रमुख लक्ष्य युद्धोन्माद पैदा करना ही है । इस की रचना ही अर्जुन में युद्धलिप्सा जगाने के लिए की गई थी , यद्यपि यह तो नहीं माना जा सकता कि वर्तमान गीता का एक एक शब्द युद्धक्षेत्र में लिखा व कहा गया था । पिछले कम से कम एक हज़ार वर्षों से महाभारत के भीष्म पर्व में जिस रूप में गीता मिलती है , उस से पता चलता है कि जब अर्जुन धनुषबाण छोड़कर युद्ध से विमुख होता है तब श्रीकृष्ण , जो गीता का कथित वक्ता है , उसे अनार्य आदि कहकर फटकार लगाता है और अपनी विविध बातों से उसे युद्ध के लिए भड़काता है तथा संबंधियों को युद्ध में क़त्ल करने में किसी भी प्रकार की अनैतिकता न होने की बात करता है । उदाहरण के लिए कुछ कथन प्रस्तुत हैं -
यदृच्छया चोप्पन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्
अथ चेत् त्वमिमं धम्र्यं संग्रामं न करिष्यसि
ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्ययसि
( गीता , 2-32,33 )
अर्थात हे अर्जुन , इस तरह के युद्ध का मौक़ा ख़ुशक़िस्मत क्षत्रियों को ही प्राप्त होता है , यह तो स्वर्ग के खुले द्वार सा है । यदि तू इस धर्मयुद्ध को नहीं करेगा , ( क्षत्रिय होने से युद्ध करना तेरा धर्म है , ) तो तेरा धर्म व यश नष्ट हो जाएगा और तुझे पाप लगेगा ।
हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम

तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय :
( गीता , 2-37 )
अर्थात हे अर्जुन , यदि तू इस युद्ध में मारा गया तो तुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी । यदि तू जीत गया तो पृथ्वी का भोग करेगा । अतः उठ और युद्ध के लिए तैयार हो ।
युद्धाय युज्यस्व ( गीता , 2-38 )

अर्थात युद्ध करने के लिए युद्ध करो ।
निर्ममो भूत्वा युध्यस्व ( गीता , 3-30 )
अर्थात ममतारहित होकर युद्ध करो ।
तस्मात् त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् ( गीता , 3-33 )
अर्थात अर्जुन , उठो यश प्राप्त करो और शत्रुओं को जीत कर इस समृद्ध राज्य का आनन्द उठाओ ।
सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ( गीता , 8-7 )
अर्थात हे अर्जुन , तू मेरा अर्थात मुझ परमात्मा का स्मरण कर और युद्ध कर ।
महाभारत में अन्यत्र भी ऐसी बातें बहुतायत से मिलती हैं , यथाः

युद्धाय क्षत्रियः सृष्टः संजयेह जयाय च ,
जयन वा वध्यमानो वा प्राप्नोतींद्रसलोकताम्
न शकभवने पुण्ये दिवि तद् विद्यते सुखम् ।
यदमित्रान् वशे कृत्वा क्षत्रियः सुखमेधते
मन्युना दह्यमानेन पुरूषेण मनस्विना ,
निकृतेनेह बहुशः शत्रून प्रति जिगीषया
आत्मानं वा परित्यज्य शत्रुं वा विनिपात्य च ,
अतोऽन्येन प्रकारेण शन्तिरस्य कुतो भवेत्
इह प्राज्ञों हि पुरूषः स्वल्पमप्रियमिच्छति ,
यस्य स्वल्प प्रियं लोके ध्रुवं तस्याल्पमप्रियम्
( महाभारत , उद्योगपर्व , 135-13 से 17 तक )
अर्थात हे संजय , क्षत्रिय जाति इस संसार में युद्ध और विजय के लिए ही रची गई है । यह जीत कर भी और मरकर भी स्वर्ग को प्राप्त करती है ।
क्षत्रिय को जो सुख शत्रुओं को अपने अधीन कर के मिलता है वह उसे स्वर्ग में इंद्र के पवित्र व सुंदर भवन में भी नहीं मिलता । क्रोध से जलने वाले मानी पुरूष को बारबार तिरस्कृत होने पर भी विजय की इच्छा से शत्रुओं पर आक्रमण करना ही चाहिये ।
युद्ध में अपने शरीर को त्याग कर अथवा शत्रु के शरीर को गिरा कर ही उस के हृदय को शांति मिल सकती है , अन्य किसी तरह से नहीं ।
बुद्धिमान पुरूष संसार में अल्प ऐश्वर्य को पर्याप्त नहीं समझता । जगत में थोड़े वैभव से संतुष्ट होने वाले का वह वैभव अनर्थकारी होता है । अतः राजाओं को थोड़े से संतोष नहीं करना चाहिये ।
ये विचार वैदिक काल के अधिक निकट हैं , यद्यपि लिपिबद्ध काफ़ी बाद में हुए । इन में युद्ध में सीधे लड़ने और उस में शत्रु को मार देने अथवा खुद मर जाने की बात है । क्षत्रिय को लड़ना ही चाहिये और विजय प्राप्त करनी ही चाहिये । यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि मुद्दा क्या है , उसे बिना युद्ध के , बिना मारकाट के , अन्य तरीक़ों से सुलझाया जा सकता है या नहीं । हर क्षत्रिय का यह धर्म है कि वह मारकाट करता रहे ।
- यह चिरस्मरणीय लेख ‘हिंदू इतिहास : हारों की दास्तान ‘ पृष्ठ 73-75 , से साभार उद्धृत है । यह पुस्तक विश्व विजय प्रा. लि. एम-12, कनाट सरकस , नई दिल्ली 110001 पर उपलब्ध है । भाई अमित जी ने यह जताया था कि वैदिक साहित्य के साथ उन्हें हमसे ज़्यादा ताल्लुक़ है लिहाज़ा वे उम्र में हमसे छोटे होने के बावजूद इस विषय में हमारे बड़े भाई हैं । हमें छोटा ही सही लेकिन भाई तो माना । हमें तो इस बात की भी खुशी है ।मैंने प्रिय प्रवीण जी व सत्य वाचक श्री महक जी की टिप्पणी मिलने के बाद विश्लेषण किया तो जाना कि कुछ बुद्धिजीवीनुमा जीवों को यह समस्या नहीं है कि हमारे ग्रन्थों की आलोचना क्यों हो रही है क्योंकि प्रायः इससे भी ज़्यादा आलोचनात्मक लेख ब्लॉगवाणी व चिठ्ठाजगत पर प्रकाशित होते ही रहते हैं और लोग मामूली सा कुनमुना कर रह जाते हैं लेकिन इस तरह आपे से बाहर होकर गालियां वहां नहीं बकते । कारण यह है कि उन लेखकों को दुनिया हिन्दू कहती है लेकिन मुझे नहीं बख्शा जाता क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं । हालांकि मैं वेदादि में सत्यांश मानता हूं और उनकी दिव्यता और पवित्रता में विश्वास भी रखता हूं । यह तथ्य साफ़ हो जाने के बाद मैंने उचित जाना कि अब वैदिक साहित्य के संबंध में मैं खुद कुछ न कहकर ऐसे महान हिन्दू विद्वानों के लेखों के माध्यम से सत्य को उद्घाटित करूं जिनके माननीय बाप दादा ने गर्भ से ही वेदों के मंत्र सुने हैं और दुनिया में उन्हें प्रकांड पण्डित माना जाता है । डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ एक ऐसे ही विद्वान घराने के पण्डित हैं । अपने परिचय में वे स्वयं लिखते हैं -
मेरी दो पीढ़ियां हिंदू धर्म से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं । मेरे पिता
शास्त्रार्थ महारथी पं. अमरनाथ शास्त्री ‘प्रतिवादि-भयंकर‘, सनातन धर्म प्रतिनिधि
सभा पंजाब ( लाहौर ) से संबद्ध रहे । वे त्यागमूर्ति पं. गोस्वामी गणेशदत्त जी के
साथ धर्म प्रचार का काम करते रहे और आर्य समाजियों से शास्त्रार्थ करते रहे । स्मरण
रहे , उन हाथों पराजित हो कर 1936 में फ़तहगढ़ चूडियां (पंजाब) में प्रसिद्ध आर्य
समाजी विद्वान शास्त्रार्थ महारथी पं. मनसाराम ने 1875 के ‘सत्यार्थ प्रकाश‘ को मंच पर ही आग लगा दी थी ।

- पृष्ठ 13 , भूमिका ‘क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म ?‘ अगर अमित जी खुद को मेरा बड़ा भाई समझते हैं तो मेरे पास उनके ताऊ जी मौजूद हैं । उम्मीद है कि अमित जी भी डा. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ जी को अपने से श्रेष्ठतर व विश्वसनीय मानेंगे । अब किसी भी संस्कृति प्रेमी को मुझे बुरा कहने का कोई हक़ नहीं पहुंचता । आप मुझे चुप करना चाहते थे तो लीजिये मैं तो चुप हो गया और काफ़ी हद तक अपना ब्लॉग ही मैं तो ब्राह्मण को सौंप रहा हूं । मैं तो बहुत लिहाज़ करता था कुछ कहने में , लेकिन डा. अज्ञात साहब सच कहने में किसी का ज़रा भी लिहाज़ नहीं करते । मैं तो वेदों में ईश्वर की वाणी का अंश मानता हूं लेकिन वे तो ईश्वर को ही नहीं मानते तो वेदों को ईश्वरीय क्या मानेंगे ?
आप मुझ आस्तिक को बर्दाश्त न कर पाये लेकिन अब आपको एक नास्तिक को सुनना और सराहना या फिर कराहना होगा । जब कोई आदमी किसी नेमत की क़द्र नहीं करता तो उसके साथ ऐसा ही होता है ।
अब आपको अपने समाज के एक से बढ़कर एक विद्वानों के अमृतवचन सुनने को मिलेंगे और जब आपको अपनी ग़लती का अहसास हो जाएगा और आपको लगेगा कि इनसे तो अनवर ही ठीक था तो फिर मैं ही बोलूंगा लेकिन तब आपको मानना पड़ेगा कि अमित जी मेरे बड़े भाई नहीं हैं बल्कि वे मेरे अनुज ही हैं आयु में भी और ज्ञान में भी और अगर कोई नहीं मानेगा तब भी वह इस फ़ैक्ट को जल्द ही जान लेगा ।