सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Saturday, April 24, 2010
किसी भी कुरीति को हिन्दू कुरीति या मुस्लिम कुरीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये । Reformation
महाजाल ब्लॉग स्वामी के इस कथन से मैं सहमत हूं कि वेद पुराण में बहुत सी बातें अप्रासंगिक और बकवास हैं । यही बात इसलाम की व्याख्या करने वाली बहुत सी किताबों के बारे में भी सही है ।हज़रत यूसुफ़ आदि नबियों के क़िस्सों में बहुत इसराईली रिवायतें सम्मिलित होने से उनमें विकार आ गया है । पवित्र कुरआन की कई तफ़सीरों में भी इसराईली रिवायतें सम्मिलित हो गई हैं । कुछ फ़त्वे भी ग़ैर ज़िम्मेदारीपूर्वक दिये जाने से न सिर्फ़ ग़लत बल्कि निंदनीय हैं ।
हज़रत शेख़ अहमद सरहिन्दी , शाह वलीउल्लाह और अन्य मुजद्दिद उलेमा ने इनको तफ़्सील के साथ बयान किया है । बेहतर समाज के लिए बेहतर नियम ज़रूरी हैं । आज समाज तबाह हो रहा है । लोग रोटी , पानी और सुरक्षा के लिए तरस रहे हैं । समय एक क़ीमती सरमाया है, उसे फ़ालतू क्रियाओं में गंवाना अक्लमन्दी नहीं कहा जा सकता । पाखण्ड को धर्म का नाम नहीं दिया जा सकता ।
इससे बुद्धिजीवियों में धर्म के प्रति वितृष्णा पैदा होती है । लोगों को नास्तिक बनाकर उनके सदाचरण को तबाह करने की अनुमति नहीं दी जा सकती ।
कुरीति केवल कुरीति होती है ।
किसी भी कुरीति को हिन्दू कुरीति या मुस्लिम कुरीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये । किसी भी कुरीति के विरोध से केवल समाज के भविष्य से लापरवाह लोगों की भावना ही आहत होती है । हम सब बुद्धिजीवी हैं और यह मंच विचार और चर्चा के लिए ही है । अतार्किक लोगों को हरेक जगह झांकने से परहेज़ करना चाहिये ।
लोग बदल रहे हैं , समाज बदल रहा है ।
लेकिन बदलकर वह बन क्या रहा है ?
वह केवल नास्तिक और भौतिकवादी बन रहा है ।
जब देश के आंगन में नक्सली हमले में मारे गए मासूमों की लाशें पड़ी थीं , तब इस देश के युवा आई पी एल के मैचों का लुत्फ़ उठा रहे थे । कैसी संवेदनहीनता है यह ?
हिन्दू धर्मगुरू भी कह रहे हैं कि अब धर्म से नहीं बल्कि केवल आध्यात्मिकता से ही कल्याण होगा . समाज को ध्यान के साथ साथ एक संतुलित व्यवस्था भी दरकार है जो उन्हें रोटी , पानी , दवा , घर , रोज़गार और सुरक्षा प्रदान कर सके । यह व्यवस्था इसलाम है । पवित्र कुरआन इसका आधार है । यह पूर्ण सुरक्षित है और यह कट्टरता नहीं बल्कि सत्य है । यही बात हम मुहम्मद साहब के वचनों के बारे में नहीं कह सकते क्योंकि उनमें कुछ नक़ली हदीसें मिलाना साबित हो चुका है , हालांकि उन्हें पहचानकर अलग कर दिया गया है ।महाजाल ब्लॉगस्वामी द्वारा कुरआन को वेद पुराण की तरह समझ लेना यह साबित करता है कि उन्होंने उसे क्रमबद्ध ढंग से अब तक पढ़ा ही नहीं है । इसका सुबूत खुद उनका कथन है -
मैं अधिकतर आजकल चल रहे हालातों पर लिखता हूं… वेद-पुराण-कुरान पकड़कर नहीं बैठा
रहता… क्योंकि उन "सभी धार्मिक किताबों" में कई बाते अप्रासंगिक हैं, बकवास हैं…।
लेकिन आप हैं कि आज के जमाने की बातें छोड़कर वेदों की आलोचना में लगे रहते हैं,
क्योंकि उससे आपको अपना कार्य जस्टिफ़ाई करने में मदद मिलती है। अन्त में एक फ़ाइनल
बात, आप हमेशा नरेन्द्र मोदी, प्रज्ञा, तोगड़िया आदि को कट्टर और आतंकवादी बताते हो…
यानी विश्व में कुल कितने हिन्दू आतंकवादी हुए? जिन्होंने हिन्दू ग्रन्थ पढ़े और जिन पर हिन्दू संस्कार हुए।
मैं उन्हें चैलेंज करता हूं कि वे मेरे किसी लेख का हवाला दें कि मैंने किस लेख में मोदी , प्रज्ञा और तोगड़िया आदि को आतंकवादी कहा है ?
इसी तरह उन्होंने पवित्र कुरआन को ढंग से पढ़े बग़ैर ही राय क़ायम कर ली है ।
बेहतर है कि वे एक बार किसी अच्छे आलिम द्वारा अनूदित कुरआन व्याख्या सहित पूरा पढ़ लें । पवित्र कुरआन का अनुवाद मुफ़्त मंगाने के लिए के लिए सम्पर्क करें - http://www.cpsglobal.org/
इसके बावजूद मैं वेदादि में उनके द्वारा सत्य स्वीकारने के साहस की तारीफ़ करता हूं ।
इसके बावजूद मैं वेदादि में उनके द्वारा सत्य स्वीकारने के साहस की तारीफ़ करता हूं ।
प्रिय प्रवीण जी और महक जी के कथन से सहमत हूं । सभी धार्मिक नियमों और परम्पराओं की समीक्षा को अब और टालना आत्मघाती क़दम है जिसका नुक्सान हमारे साथ हमारी आने वाली नस्लें भी उठाएंगी ।
भाई अमित जी को चाहिये था कि वे श्रीमान महक जी के प्रश्नों का तथ्यपरक उत्तर देते । भावनात्मक संबोधन सटीक जवाब का विकल्प नहीं हुआ करता ।
इस सबके बाद मैं यह कहूंगा कि
प्रिय भाई अमित ! अल्लाह न करे आपको कभी ज़रूरत पड़े , लेकिन अगर कभी पड़ जाये तो आप अपने लिए या अपने किसी प्यारे के लिए मेरे बदन से मेरे खून की आखि़री बूंद तक निचोड़ लेना ।
यही बात मैं महाजाल ब्लॉग के स्वामी के लिए भी कहता हूं लेकिन एक फ़र्क़ है । भाई अमित के लिए यह कहने में मुझे अपने दिल पर ज़ोर नहीं डालना पड़ा जबकि महाजाल स्वामी के लिए कहने में मुझे अपने दिल को समझाना पड़ा ।उम्मीद है कि हालात सुधरेंगे तो शायद तब यह बात भी बाक़ी न रहे । और प्रवीण जी आप भी इसमें शामिल हैं ।
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