सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
जिस पुस्तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया था उसका यह हिन्दी रूपान्तर है, महान सन्त एवं आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी के धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन पर आधारति पुस्तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्मक अध्ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्त के प्रिय शिष्य एस. अब्दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक शिष्य जावेद अन्जुम (प्रवक्ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्तक के असल भाव का प्रतिबिम्ब उतर आए इस्लाम की ज्योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकने का सार्थक प्रयास हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रस्तुत है, More More More
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Sunday, September 25, 2011
जानिए कि परम धर्म क्या है ?
चीजें बोलती हैं, हवा, पानी और रौशनी हर चीज़ बोलती है लेकिन वे हिंदी या अंग्रेज़ी में नहीं बोलती हैं, उनकी अपनी ज बान है, वे अपनी ज़बान में बोलती हैं और उनके बोलने को सुनते वे लोग हैं जिनके कान हैं यानि ऐसे लोग जो कि उनकी भाषा की समझ रखते हैं। वे उनकी बात भी समझते हैं और उनके मूड को भी भांप लेते हैं।
हवा और धूल भरी आंधी उठते देखकर बूढ़े तजर्बेकार लोग बारिश होने की भविष्यवाणी कर देते हैं।
चीज़ें अपनी क्रिया दर्शाती हैं और लोग उनकी क्रिया को उनकी तरफ से एक संदेश और चेतावनी के रूप में पढ ते हैं। जब से मानव जाति की शुरूआत हुई है तब से ही वह अपने आस पास की चीज़ें का अध्ययन करता हुआ आ रहा है।
ये अध्ययनशील लोग वैज्ञानिक कहलाए।
कुछ लोगों ने अपने शरीर का भी अध्ययन किया और उसकी क्रियाओं को जाना-समझा, ये लोग वैद्य, हकीम और डॉक्टर कहलाए।
कुछ लोगों ने मन का भी अध्ययन किया, ये लोग सूफ़ी, संत और योगी कहलाए।
कुछ लोग और ज् यादा गहराई में गए, उन्होंने इंसान और उसके आस पास की सारी चीज़ों को एक अलग तल पर जाना, ये लोग ऋषि और पैग म्बर कहलाए।
हिंदुस्तान में कितने सौ या कितने हज़ार ऋषि हुए हैं, आज कहना मुश्किल है लेकिन हुए ज़रूर हैं, यह ज़रूर कहा जा सकता है।
चाहे आज उनके बारे में पूरी और सही जानकारी मौजूद न हो लेकिन लोग आज भी अच्छे कामों को अच्छा समझते हैं और उन्हें करते हैं तो यह उनकी शिक्षा का ही नतीजा है और फिर ऐसा केवल हिंदुस्तान में ही नहीं है बल्कि सारी दुनिया में यही तरीक़ा है।
अच्छाई का यह तरीक़ा ही धर्म है।
चीज़ें अपनी क्रिया दर्शाती हैं और लोग उनकी क्रिया को उनकी तरफ से एक संदेश और चेतावनी के रूप में पढ ते हैं। जब से मानव जाति की शुरूआत हुई है तब से ही वह अपने आस पास की चीज़ें का अध्ययन करता हुआ आ रहा है।
ये अध्ययनशील लोग वैज्ञानिक कहलाए।
कुछ लोगों ने अपने शरीर का भी अध्ययन किया और उसकी क्रियाओं को जाना-समझा, ये लोग वैद्य, हकीम और डॉक्टर कहलाए।
कुछ लोगों ने मन का भी अध्ययन किया, ये लोग सूफ़ी, संत और योगी कहलाए।
कुछ लोग और ज् यादा गहराई में गए, उन्होंने इंसान और उसके आस पास की सारी चीज़ों को एक अलग तल पर जाना, ये लोग ऋषि और पैग म्बर कहलाए।
हिंदुस्तान में कितने सौ या कितने हज़ार ऋषि हुए हैं, आज कहना मुश्किल है लेकिन हुए ज़रूर हैं, यह ज़रूर कहा जा सकता है।
चाहे आज उनके बारे में पूरी और सही जानकारी मौजूद न हो लेकिन लोग आज भी अच्छे कामों को अच्छा समझते हैं और उन्हें करते हैं तो यह उनकी शिक्षा का ही नतीजा है और फिर ऐसा केवल हिंदुस्तान में ही नहीं है बल्कि सारी दुनिया में यही तरीक़ा है।
अच्छाई का यह तरीक़ा ही धर्म है।
खुदगर्ज़ और कमज़ोर राजनेताओं ने एक धरती को हजारों टुकड़ों में बांट डाला है लेकिन उनके बांटने से धरती हजारों नहीं बन गई हैं। धरती आज भी एक है और हमारी बनाई राजनीतिक सीमाओं को प्रकृति ने कभी नहीं माना, वह आज भी नहीं मानती है।
भलाई के तरीक़े को, धर्म को, जो कभी एक ही था, उसे भी कभी नासमझी की वजह से तो कभी लालच और नफ रत की वजह से हमने बांटा और बार बार बांटा लेकिन हमारे बांटने की वजह से वह बंट नहीं गया है।
धर्म आज भी एक ही है।
परोपकार धर्म है और ऐसा धर्म है कि इस जैसा धर्म दूसरा नहीं है। यह ऐसा धर्म है कि इससे कोई नास्तिक भी इंकार नहीं कर सकता।
नास्तिक जिस बात से इंकार करता है, वह शोषण और अन्याय होता है, जिसे धर्म का नाम लेकर किया जाता है।
धर्म के नाम पर अधर्म किया जाता है और आज से नहीं बल्कि यह पहले से होता आ रहा है।
न तो हर आदमी धार्मिक है और न ही हरेक आदमी का हरेक काम धर्म कहला सकता है।
धर्म वही है जो कल्याण करता है।
किसी भी मुल्क में समझदार नर-नारियों का कोई भी समूह जब भी समाज की सामूहिक उन्नति के लिए कुछ नियम-क़ायदे बनाएंगा तो उनका बहुत बड़ा हिस्सा हरेक धर्म-मत में पहले से मौजूद मिलेगा।
क्या यह ताज्जुब की बात नहीं है ?
हां, कुछ बातें उनसे टकराती हुई भी मिल सकती हैं। किसी जगह ये बातें कुछ होंगी और किसी जगह कुछ लेकिन इन सबका नतीजा एक समान होगा कि ये बातें उन लोगों के जीवन को नष्ट कर रही होंगी, जो कि इन पर चल रहे होंगे और अपना जीवन नष्ट होते देखकर लोगों ने इन पर चलना भी अब छोड दिया होगा।
इन बातों को कब किसने शुरू किया, आज ठीक से यह भी नहीं कहा जा सकता।
ऐसी बातों को लेकर अपने पूर्वजों को, अपने महापुरूषों को गालियां केवल वही दे सकता है, जिसे भले-बुरे की तमीज ही नहीं है।
ऐसे लोग जो धर्म और अधर्म तक का अंतर नहीं जानते वे अधर्म के काम को धर्म के नाम पर होता देखकर उसे भी धर्म समझ लेते हैं और फिर धर्म को कोसना शुरू कर देते हैं।
भलाई के तरीक़े को, धर्म को, जो कभी एक ही था, उसे भी कभी नासमझी की वजह से तो कभी लालच और नफ रत की वजह से हमने बांटा और बार बार बांटा लेकिन हमारे बांटने की वजह से वह बंट नहीं गया है।
धर्म आज भी एक ही है।
परोपकार धर्म है और ऐसा धर्म है कि इस जैसा धर्म दूसरा नहीं है। यह ऐसा धर्म है कि इससे कोई नास्तिक भी इंकार नहीं कर सकता।
नास्तिक जिस बात से इंकार करता है, वह शोषण और अन्याय होता है, जिसे धर्म का नाम लेकर किया जाता है।
धर्म के नाम पर अधर्म किया जाता है और आज से नहीं बल्कि यह पहले से होता आ रहा है।
न तो हर आदमी धार्मिक है और न ही हरेक आदमी का हरेक काम धर्म कहला सकता है।
धर्म वही है जो कल्याण करता है।
किसी भी मुल्क में समझदार नर-नारियों का कोई भी समूह जब भी समाज की सामूहिक उन्नति के लिए कुछ नियम-क़ायदे बनाएंगा तो उनका बहुत बड़ा हिस्सा हरेक धर्म-मत में पहले से मौजूद मिलेगा।
क्या यह ताज्जुब की बात नहीं है ?
हां, कुछ बातें उनसे टकराती हुई भी मिल सकती हैं। किसी जगह ये बातें कुछ होंगी और किसी जगह कुछ लेकिन इन सबका नतीजा एक समान होगा कि ये बातें उन लोगों के जीवन को नष्ट कर रही होंगी, जो कि इन पर चल रहे होंगे और अपना जीवन नष्ट होते देखकर लोगों ने इन पर चलना भी अब छोड दिया होगा।
इन बातों को कब किसने शुरू किया, आज ठीक से यह भी नहीं कहा जा सकता।
ऐसी बातों को लेकर अपने पूर्वजों को, अपने महापुरूषों को गालियां केवल वही दे सकता है, जिसे भले-बुरे की तमीज ही नहीं है।
ऐसे लोग जो धर्म और अधर्म तक का अंतर नहीं जानते वे अधर्म के काम को धर्म के नाम पर होता देखकर उसे भी धर्म समझ लेते हैं और फिर धर्म को कोसना शुरू कर देते हैं।
यह बिल्कुल ऐसे है जैसे कि एक शरीफ़ आदमी का 'मास्क' लगाकर कोई आदमी किसी का मर्डर करके भाग जाए और पब्लिक भागते हुए उसकी शक्ल देख ले और जा चढ़े शरीफ आदमी के घर और उसे पीट पीट कर मार डाले।
यह नासमझों का काम है, इसे न्याय नहीं अन्याय कहा जाएगा।
इसे समाज सुधार नहीं बल्कि इसे समाज में फ साद का नाम दिया जाएगा।
जो धर्म के नाम पर अधर्म कर रहे हैं, दूसरों को दबा रहे हैं, उन्हें अपमानित कर रहे हैं, वे भी समाज में फ़साद कर रहे हैं और जो लोग अधर्मी लोगों के कामों के कारण धर्मी महापुरूषों को गालियां दे रहे हैं, उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं, वे भी समाज में फ़साद ही फैला रहे हैं।
जो इंसान ख़ामोश चीज़ों तक की ज बान जानता हो, वह इतना बहरा कैसे हो जाता है कि धर्म की उन हज़ारों ठीक बातों को वह कभी सुनता ही नहीं, जिनका चर्चा दुनिया के हरेक धर्म-मत के ग्रंथ में मिलता है लेकिन अपना सारा ज़ोर उन बातों पर लगा देता है जिन पर सारी दुनिया तो क्या ख़ुद उस धर्म-मत के मानने वाले भी एक मत नहीं हैं।
यह कैसा अन्याय है ?
यह कैसा अंधापन है ?
कैसे मूर्ख हैं वे, जो इन अंधों को अपना साथी और अपना गुरू बनाते हैं ?
अपने अंधेपन को ये जानते तक नहीं हैं और कोई बताए तो मानते भी नहीं हैं।
जो आंख वाले हैं, उनकी नैतिक जि म्मेदारी है कि वे अंधों को मार्ग दिखाएं।
अंधों को मार्ग दिखाना परोपकार है, धर्म है बल्कि परम धर्म है।
कौन है जो इस धर्म की आलोचना कर सके ?
यह नासमझों का काम है, इसे न्याय नहीं अन्याय कहा जाएगा।
इसे समाज सुधार नहीं बल्कि इसे समाज में फ साद का नाम दिया जाएगा।
जो धर्म के नाम पर अधर्म कर रहे हैं, दूसरों को दबा रहे हैं, उन्हें अपमानित कर रहे हैं, वे भी समाज में फ़साद कर रहे हैं और जो लोग अधर्मी लोगों के कामों के कारण धर्मी महापुरूषों को गालियां दे रहे हैं, उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं, वे भी समाज में फ़साद ही फैला रहे हैं।
जो इंसान ख़ामोश चीज़ों तक की ज बान जानता हो, वह इतना बहरा कैसे हो जाता है कि धर्म की उन हज़ारों ठीक बातों को वह कभी सुनता ही नहीं, जिनका चर्चा दुनिया के हरेक धर्म-मत के ग्रंथ में मिलता है लेकिन अपना सारा ज़ोर उन बातों पर लगा देता है जिन पर सारी दुनिया तो क्या ख़ुद उस धर्म-मत के मानने वाले भी एक मत नहीं हैं।
यह कैसा अन्याय है ?
यह कैसा अंधापन है ?
कैसे मूर्ख हैं वे, जो इन अंधों को अपना साथी और अपना गुरू बनाते हैं ?
अपने अंधेपन को ये जानते तक नहीं हैं और कोई बताए तो मानते भी नहीं हैं।
जो आंख वाले हैं, उनकी नैतिक जि म्मेदारी है कि वे अंधों को मार्ग दिखाएं।
अंधों को मार्ग दिखाना परोपकार है, धर्म है बल्कि परम धर्म है।
कौन है जो इस धर्म की आलोचना कर सके ?
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